है, वह सर्वथा शुद्धात्मा बन जाता है। इडा, पिंगला और सुषुम्ना, जिन्हें गंगा, वंक्नाल एव अवधूती भी कहते हैं—के सगम में अपने-अपने अंगो को धोलो। इसमे तेरे समस्त पाप घुल जाएँगे।
अलंकार—रूपक–ग्यान दृष्टि, निंहकर्म जल,
विशेष—बाह्य कर्म-काण्ड को व्यर्थ बताकर योग-साधन की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। कबीरदास के ऊपर नाथ-सम्प्रदाय की साधना का स्पष्टतः गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
(२) इडा को गंगा कहा है। सुषुम्ना को बकनाल या पश्चिम दिशा भी कहते हैं। सुषुम्ना को अवधूती या बालरडा तपस्विनी भी कहा गया है। ६ वी पक्ति कबीरदास का अभिप्राय इडा पिंगला और सुषुम्ना के सगम से है। कथन में कुछ दुष्क्रमत्व दोष आगया है।
(३९२)
भजि नारदादि सुकादि बंदित, चरन पंकज भांमिनी।
भजि भजिसि भूषन पिया मनोहर, देव देव सिरोवनीं॥ टेक॥
बुधि नाभि चदन चरचिता, तन रिदा मंदिर भीतरा।
रांम राजसि नन बानी, सुजान सुदर सुंदरा॥
बहु पाप परबत छेदनां, भौ ताप दुरिति निवारणां।
कहै कबीर गोब्यद भजि, परमांनंद बंदित कारणां॥
शब्दार्द—भामिनी=सुन्दर स्त्री (जीवात्मा); छेदणां=नष्ट करने वाले। दुरित=सकट। निवारणा=दूर करने वाले। कारणा=कारणभूत, उत्पत्ति के कारण। भूषन पिया=लक्ष्मी।
सन्दर्भ—कबीर भगवद भजन का उपदेश देते हैं।
भावार्थ—री आत्मा सुन्दरी, नारद इत्यादि मुनि तथा शुकदेव इत्यादि ऋषियो के द्वारा वन्दित भगवान के चरण-कमलो का भजन कर। लक्ष्मी के हृदय के आभूषण एव अत्यन्त मनोहर तथा सम्पूर्ण देवताओ के सिर पर मणि के समान शोभा देने वाले इन चरणों का भजन कर। चन्दन से चर्चित बुद्धि-रूपी नाभि तथा शरीर एव हृदय-रूपी मन्दिर में विराजमान आत्मारूपी राम सुशोभित हो रहे हैं। राम अत्यन्त ज्ञानी हैं। वह अपने सुन्दर नेत्रो एव वाणी से सुशोभित हैं तथा सुन्दरो में भी सुन्दर है अथवा सुन्दरो की सुन्दरता हैं। वह सम्पूर्ण पापो के पहाडो को नष्ट करने वाले हैं तथा ससार के कष्टो एव संकटो को दूर करने वाले हैं। कबीर कहते हैं, तू उन गोविंद का भजन कर जो परमानंद स्वरूप हैं तथा सृष्टि के उत्पत्ति कारणो (सृष्टि के उत्पादक तत्त्वों) द्वारा वन्दित हैं।
- अलंकार—(i) रूपक—चरन पंकज, बुधि-नाभि तन रिदा मन्दिर।
- (ii) सभग पद यमक—भजि भजिति।
- (iii) यमक—देव देव।