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Act II.]
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SAKUNTALA.

किसी ऐसे अनगढ़ योगी के हाथ लग जायगा जिस का सब शङ्गार सिर में हिंगोट का तेल होगा।


दुष्य० । मित्र वह परबस है और उस का पिता घर नहीं है ॥


माढ० । भला तुम को वह कैसा चाहती है6³ ॥


दुष्य० । सुनो । तपस्वियों की कन्या स्वभाव की सकुचीली6⁴ होती हैं। तौ भी जब मैं उस के संमुख हुआ उस ने आंख चुराकर मेरी ओर देखा और किसी मिस से हंसी भी। लाज के मारे वह न65 तो प्रीति को प्रगट ही कर सकी न गुप्त ही रख सकी।।


माढ० । और क्या। देखते ही तुम्हारी गोद में आ बैठती66 ॥


दुष्य० । जिस समय मुझ से बिछुरने लगी बड़ी ही सुघड़ाई से अपनी चाह दिखायी। थोड़ी सी चली फिर पांव में कांटा लगने का मिस करके बेअवसर67 खड़ी हो रही । फिर कुछ चलकर वृक्ष से अपने वल्कलवस्त्र छुड़ाने के मिस68 पीछे को निहारी ॥


माढ० । धन्य है आये तो मग के पीछे थे। यहां और ही खेल रच दिया70 । मित्र इसी से यह तपोवन तुम को उपवन से अधिक प्यारा लगता है।


दुष्य० । हे सखा किसी किसी तपस्वी ने मुझे पहचान भी लिया है। अब कहो किस मिस से इस आश्रम में चलें ॥


माढ० । इस से अधिक और क्या मिस राजा को चाहिये कि तपस्वियों से अन्न का अपना छठा7¹ भाग मांगो ।।


दुष्यः । धिक मूर्ख । कुछ और मिस बतला जिस में बड़ाई मिले । तपस्वियों की रक्षा के लिये तो मैं रत्नों के ढेर उठा डालं तो भी उचित हो । क्योंकि जो सब वर्षों से राजा को प्राप्त होता है सो सदा नहीं रहता परंतु तपस्या कर छठा भाग अक्षय है। सो ये ब्राह्मण हम को देते हैं ।।


( नेपथ्य ने ) अब हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ ॥