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ActIII.]
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SAKUNTALÀ.

शकु० । फिरकर) छोड़ो छोड़ो । हे पुरुवंशी नीति का पालन करो। यद्यपि मैं काम से पीड़ित हूं तो भी पराधीन हूं । देखो आश्रम में तपस्वी लोग इधर उधर फिरते हैं ॥

दुष्यः । हे कामिनी गुरुजनों का कुछ भय मत कर । काहे से कि कन्व धर्म को जानते हैं । तुझे दोष न देंगे। बहुतेरी ऋषि कन्या गान्धर्व रीति से ब्याही गई हैं। उन के मा बाप ने कुछ दोष नहीं लगाया ॥

शकु० । अञ्चल छोड़ दो। मैं अपनी सखियों से कुछ बात कह आऊं।(घोड़ी दूर गई फिर पीछे को देखकर हे) पुरुवंशी यद्यपि तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं हुई है और मैं ने केवल क्षणमात्र" बातें ही कर लेने दी हैं तो भी शकुन्तला को भूल मत जाना ॥

दुष्य । हे सुन्दरी तू चाहे जितनी दूर जा मेरे हृदय से न्यारी न होगी । जैसे वृक्ष की छाया चाहे जितनी बढ़े जड़ को नहीं छोड़. ती है॥ शकुछ ! (कुछ चलकर साप ही साप) क्या करूं । इस ने इतनी विनती की है कि मेरे पैर आगे को नहीं पड़ते हैं । अब वृक्षों की ओट बैठकर देखू तो यह मुझे कैप्ता चाहता है ॥ (वृष्ठों में बैठ गई)

दुष्य । (साप ही शाप) हाय मुझ स्नेही को छोड़कर यह ऐसी जाती है मानो कभी पहचान ही न थी । शरीर को" तो कोमल है परंत मन की" बड़ी निठुर है । जैसे सिरस का फूल तौ नरम होता है परंतु डाली कठोर होती है ।

शकु० । (साप ही आप) यह सुनकर अब मुझ में चलने की सामर्थ्य नहीं रही।

दुष्य० । (आप ही लाप) अब प्यारी के बिना इस सूने ठौर में क्या करूंगा।(चल दिया। फिर आगे देखकर बोला) अहा अब तो कुछ टहरूंगा। क्योंकि उस के हाथ से गिरी यह कमलनाल की पहुंची जिस में उशीर की सुगन्ध
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