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[ Act III.
SAKUNTALÀ

आती है 10 अचानक मेरे सामने ऐसी आई है मानो पैरों को बेड़ी आई13 ॥ (बडे चाव से पहुंची को उठा लिया)


शकू० (अपनी बांह को देखकर आप ही आप) हाय में ऐसी दुर्बल हो गई हूं कि वाह से कङ्कण गिरता भी न जाना" ॥


दुष्य० । (कङ्कण को उठाकर और छाती से लगाकर आप हो आप अहा कैसा सख इस के छूने से हृदय को होता है । हे प्यारी इस कङ्कण ने मुझे धीरज दिया है जिस के देने से त नट गई ॥


शकु० । (आप ही आप) अब मुझ से यहां नहीं रहा जाता" । चलूं । इसी मिस से दिखाई दूं ॥ (हौले हौले उस की ओर जाती हुई)


दुष्य० । (हर्ष से) अहा इन नेत्रों को फिर भी जीवनमूरि का दर्शन हुआ । यह भी भाग्य में लिखा था कि विलाप के पीछे फिर दैव कुछ सुख देगा । जैसे प्यासे पपीहा की टेर मुनके घटा पानी देती है ।


शकु० । (राजा के आगे खड़ी होकर) हे पुरुवंशी जब मैं आधी दूर निकल गई तब बांह से गिरे कङ्कण की सुध आई । मेरा हृतय साख भरता है कि तुम ही ने लिया होगा । हे महाभाग मैं बिनती करती हूं मेरा कङ्कण दे दो । नहीं तो मुनि लोगों में दोनों का चवाव होगा"॥


दुष्य० । एक भांति दूंगा'" ॥


शकु० । कैसे दोगे।


दुष्य० । जो तू मुझे बांह में पहना देने दे॥


शकु० । अच्छा । क्या डर है ॥ (नगीच गई)


शकु०' । तौ आओ। इस चटान पर बैठे । (दोनों बैठे । शकुन्तला का हाथ लेकर) अहा इस बांह में फिर नवीन लता के समान पहला बल और रूप आया । अथवा इस की दशा कामदेव की सी है कि शिव-द्रोह आयाह की ज्वाला से भस्म होकर फिर देवताओं के अमृत बरसाने से सजीव हुआ ॥


शकु० । (राना का हाथ मसककर) हे आर्य पुत्र वेग पहनाओ॥