पृष्ठ:Shri Chandravali - Bharatendu Harschandra - 1933.pdf/५०

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     श्रीचंद्रावली

चन्द्रा०-(घबड़ाकर दोनोंहाथ छुड़ाकर आॅसू भर के) बस बस नाथ, बहुत भई, इतनी न सही जायगी | आपकी आँखों में आँसू देखकर मुझसे धोरज न धरा जायगा । (गले लगा लेती है)। (विशाखा आती है) विशाखा-सखी ! बधाई हैं | स्वामिनी ने आज्ञा दई है के प्यारे सों कही है चंद्रावली की कुंज मै सुखेन पधारो | चंद्रा०-(बड़े आनंद से घबड़ाकर ललिता-विशाखा से) सखियो, मैं तो तुम्हारे दिए पीतम पाये हैं । (हाथ जाड़कर) तुमारो गुन जनम-जनम आऊॅगी विशाखा-साखी, पीतम तेरो तू पीतम की, हम तो तेरी टहलनओ है । यह सब तौ तुम सबन की लीला है । यामै कौन बोलै और बोलै हू कहा जो कछृ समझौ तौ बोलै-या प्रेम की तो अकथ कहानी है । तेरे प्रेम को परिलेख तो प्रेम की टकसार होयगो और उत्तम प्रेमिन को छोड़ि और काहू की समझ ही मैं न आवैगो । तू धन्य, तेरो प्रेम धन्य, या प्रेम के समझिवेवारे धन्य और तेरे प्रेम को चरित्र जो पढ़ै सो धन्थ । तो मैं और स्वामिनी मैं भेद नही है, ताहू मैं तू रस की पोपक ठैरी । बस, अब हमारी दोउन की यही बिनती है कै तुम दोउ गलबाही ढैकै विराजौ और हम युगल जोड़ी को दर्शन करि आज नेत्र सफल करें। (गलबाही देकर जुगल स्वरूप बैठते हैं) दोनों-नीकें निरखि निहारि नैन भरि नैनन को फल आजु लहौ री । जुगुल रूप छबि अमित माधुरी रुम-सुधा-रस-सिन्धु बहौरी ॥ इनहीं सौं अभिलाख लाख करि इक इनहीँ कों नितहि चहौरी । जो नर-तनहि सफल करि चाहो इनही के पद-कंज गहौ री ॥ करम ज्ञान-सन्सार-जाल तजि वरु बदनामी कोटि सहौ री । इनहीं के रस-मत्त मगन नित इनहीं के है जगत रहौ री ॥ इनके बल जग-जाल कोटि अध तृन सम प्रेम प्रभाव दहौ री । इनहीं को सरबस करि जानौ यहै मनोरथ जिय उमहौ री ॥ राधा-चंद्रावली-कृष्ण-ब्रज-जमुना-गिरिवर मुखहिं कहौ रे । जनम जनम यह कठिन प्रेमव्रत 'हरीचंद' इकरस निबहौ री ॥ भग० प्यारी । और जो इच्छा होय सो कहौ । काहे सों कै जो तुम्हैं प्यारी है गोई हमैं हूँ प्यारो है चन्द्र।॰-नरथ । और कोई इदृछा नहीं, हमारी तो सब इदृछा की अवधि आपके दर्शन ही ताई है तथापि भरत को यह वाक्य सफल होय-