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प्राचीन चिह्न/ओङ्कार-मान्धाता

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प्राचीन चिह्न  (1929) 
द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी

[ ७९ ]मध्य-प्रदेश में एक जिला नीमार है। इस जिले का सदर- मुकाम खण्डवा है। वहीं जिले के हाकिम रहते हैं। खण्डवा से इन्दौर होती हुई राजपूताना-मालवा रेलवे की एक शाख अजमेर को जाती है। इस शाख पर मोरटक्का नाम का एक स्टेशन है। वह खण्डवा से ३७ मील है। इस स्टेशन से ७ मील दूर, नर्मदा के ऊपर, मान्धाता नाम का गॉव है। मोर- टका के आगे बरवाहा स्टेशन है। वहाँ से भी लोग मान्धाता जाते हैं। इस गाँव का कुछ भाग नर्मदा के दक्षिणी किनारे पर है और कुछ नदी के बीच मे एक टापू के ऊपर है। यह टापू कोई डेढ़ मील लम्बा है। इस पर ऊँची-ऊँची दो पहा- ड़ियाँ हैं। ये पहाड़ियों उत्तर-दक्षिण हैं। उनके बीच की ज़मीन खाली है। पूर्व की तरफ़ ये दोनों पहाड़ियों एक दूसरी से मिल गई हैं और उनके कगार नर्मदा के भीतर तक चले गये हैं। दक्षिण की तरफ जो पहाड़ी है उसके दक्षिणी सिरे पर मान्धाता का जो भाग बसा हुआ है वह बहुत ही सुन्दर है। उसके मकान, मन्दिर और दूकानों की लैने' देखकर तबीयत खुश हो जाती है। महाराजा होलकर का महल सबसे ऊँचा और सबसे अधिक शोभायमान है। पहाड़ी के ऊँचे-नीचे सिरे तराशकर चौरस कर दिये गये हैं; उन्ही
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पर मकान बने हुए हैं। जिस पहाड़ी पर मान्धाता है उस पर, गॉव से कुछ दूर, घना जङ्गल है। उस जङ्गल के भीतर प्राचीन इमारतों के चिह्न दूर-दूर तक पाये जाते हैं। कौस्यन्स साहब ने मध्य-प्रदेश की प्राचीन इमारतों पर एक पुस्तक लिखी है। उसमे उन्होने अपनी राय दी है कि किसी समय, इस पहाडी पर, मान्धाता की वर्तमान बस्ती से बहुत बड़ी बस्ती थी।

नर्मदा का बड़ा माहात्म्य है। गङ्गा से उतरकर नर्मदा ही का नम्बर है। अनेक साधु-संन्यासी नर्मदा की प्रदक्षिणा करते हैं। भड़ौच के पास नर्मदा समुद्र मे गिरी है। वहीं से ये लोग नर्मदा के किनारे-किनारे अमरकण्टक तक चले जाते हैं और फिर वहाँ से ये दूसरे किनारे से भड़ौंच को लौट जाते हैं। इस प्रदक्षिणा में कोई तीन वर्ष लगते है। मान्धाता में प्रदक्षिणा करनेवाले इन साधुओं की बड़ी भीड़ रहती है। जाते भी ये वहाँ ठहरते हैं और लौटते भी।

नर्मदा के बीच मे जो टापू है वह भी पर्वतप्राय है। उस पर अनेक फाटकों, मन्दिरो, मठो और मकानों के निशान हैं। दो-एक मन्दिरों को छोड़कर शेष सब इमारते उजड़ी और आधी उजड़ी हुई दशा में पड़ी है। कही-कही पर किले की दीवार के भी चिह्न हैं। मान्धाता के वर्तमान नगर से यह उजाड़ नगर बिलकुल अलग है। इसमे एक-आध विशाल मन्दिर और मकान अब तक बने हुए हैं, और वे देखने लायक हैं।
[ ८१ ]मान्धाता में श्रीङ्कारजी का प्रसिद्ध मन्दिर है। उसकी गिनती शिव के द्वादश लिङ्गो में है। दूर-दूर से लोग वहाँ यात्रा के लिए आते हैं। ओङ्कारजी का मन्दिर बहुत प्राचीन नही; परन्तु उसके विशाल पाये बहुत पुराने हैं। वे किसी दूसरे मन्दिर के हैं। उसके भग्न हो जाने पर ये स्तम्भ इस मन्दिर में लगाये गये हैं। पुरातत्त्व के पण्डितों का अनुमान ऐसा ही है। इस मन्दिर में एक विचित्रता है। इसमे जो शिवलिङ्ग है वह दरवाज़े के सामने नही है। इससे वह सामने से देख नहीं पड़ता। वह गर्भ-गृह के एक तरफ है। इस कारण, बरामदे के सबसे दूरवर्ती कोने पर गये बिना, लिङ्ग के दर्शन बाहर से नहीं हो सकते।

मान्धाता में पहाड़ की चोटी पर सिद्धनाथ अथवा सिद्धेश्वर का एक मन्दिर है। वह सबसे अधिक पुराना है। परन्तु वह, इस समय, उजाड़ दशा में पड़ा हुआ है । वह एक ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। उसके पायों को, चारों तरफ, पत्थर के बड़े- बड़े हाथो थामे हुए हैं। उनमे से दो हाथी नागपुर के अजायब- घर मे पहुँच गये हैं। वहॉ, दरवाजे पर खड़े हुए, वे चौकीदारी का काम कर रहे हैं। इस मन्दिर का गर्भ-गृह अब तक बना हुआ है। उसमे चार दरवाज़े हैं। शिखर गिर गया है। ओसारे की छत भी गिर गई है। जो भाग इस मन्दिर का शेष है उस पर बहुत अच्छा काम है। जिस समय यह मन्दिर अच्छी दशा में रहा होगा उस समय इसकी शोभा वर्णन करने लायक रही होगी।
[ ८२ ]नर्मदा के बायें तट पर कई पुराने मन्दिर हैं। यद्यपि उन मन्दिरों की महिमा, इस समय, कम हो गई है, तथापि जो लोग ओङ्कारजी को जाते हैं वे इनके भो दर्शन करते हैं । जिनको पुरानी वस्तुओं से प्रेम है उनको तो इन्हे अवश्य ही देखना चाहिए।

गौरी-सोमनाथ के मन्दिर के सामने एक प्रकाण्ड नन्दी है। हरे पत्थर को काटकर उसकी मूति बनाई गई है।

मान्धाता में नर्मदा के तट पर बने हुए घाटों की शोभा । को देखकर चित्त बहुत प्रसन्न होता है।

सुनने में आता है कि १०२४ ईसवी में जब महमूद गज़- नवी ने सोमनाथ के मन्दिर को तोड़ा तब मान्धाता में ओङ्कार- जी के मन्दिर के सिवा अमरेश्वर नामक महादेव का भी एक मन्दिर था। उसकी भी गिनती द्वादश लिङ्गों में थी। परन्तु सत्रहवी और अठारहवी शताब्दी की लड़ाइयों मे नर्मदा का दक्षिणी तट, जहाँ पर ये दोनों मन्दिर थे, बिलकुल उजाड़ हो गया। उस पर इतना घना जङ्गल हो आया कि जब पेशवा ने ओड्रारजी के मन्दिर की मरम्मत करानी चाही तब वह, बहुत हूँढ़ने पर भी, न मिला। इससे उसने एक नया ही मन्दिर बनवाकर उसका नाम ओङ्कारजी रख दिया। पीछे से राजा मान्धाता को ओड्करजी का पुराना मन्दिर मिला और उसने उसकी मरम्मत भी कराई। परन्तु पेशवा के बनवाये हुए मन्दिर का तब तक इतना नाम हो गया था, कि लोगों ने
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असल की अपेक्षा उस नकली मन्दिर ही की अधिक प्रतिष्ठा की। इसी से उस मन्दिर की प्रधानता रही।

ठाकुर जगमोहनसिह ने, जिस समय वे खण्डवा में तह- सीलदार थे, ओङ्कारचन्द्रिका नामक एक पद्यबद्ध छोटो सी पुस्तक लिखी है। उसमें उन्होंने ओङ्कारजी का अच्छा वर्णन किया है।

[जनवरी १६०५


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[ ८४ ]श्रीरङ्गपत्तन बहुत प्राचीन नगर है। इस समय वह प्रायः

उजाड़ पड़ा है। परन्तु एक समय वह विशेष वैभवशाली था। जिस समय वहाँ हैदर अली और टीपू की राजधानी थी उस समय उसमे अनेक ऐसी बाते हुई हैं जिन्होने दक्षिण के इतिहास के सैकड़ों पृष्ठो को व्याप्त कर लिया है।

श्रीरङ्गपत्तन माइसोर-राज्य में है। वहाँ जाने के दो मार्ग हैं। एक जबलपुर या इटारसी होकर मन्माड़, धोंड, होटगी, रायचूर, आरकोनम, और बँगलोर के रास्ते; दूसरा होटगी से सीधे बँगलोर के रास्ते। पीछेवाला मार्ग सीधा है, परन्तु इधर से जाने मे होटगी से छोटी पटरी की रेलवे लाइन होकर जाना पड़ता है। इसलिए जानेवाला देर से पहुँचता है।

कावेरी नदी में एक छोटा सा द्वीप है । श्रीरङ्गपत्तन उसके पश्चिमी किनारे पर है। उसकी आबादी इस समय कोई १५,००० है। वहाँ श्रीरङ्गजी का एक मन्दिर है। उसी के नाम पर इसका नाम श्रीरङ्गपत्तन पड़ा है। इस मन्दिर में विष्णु की मूर्ति है। यह मन्दिर बहुत प्राचीन है। श्रीरङ्ग- पत्तन से यह बहुत पहले का है। प्राचीन होने के कारण इसमे स्थापित मूर्ति का नाम आदि-रङ्ग है। यह मन्दिर किले के भीतर है। किवदन्ती है कि गौतम मुनि ने इस मन्दिर मे