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प्राचीन चिह्न/साँची के पुराने स्तूप

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प्राचीन चिह्न  (1929) 
द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी
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१——साँची के पुराने स्तूप

इस लेख के द्वारा हम लगभग २५०० वर्ष की कुछ पुरानी इमारतों का संक्षिप्त वर्णन सुनाते हैं। वे इमारते बौद्ध लोगों के स्तूपों का एक समूह है। इसके बतलाने की आवश्यकता नहीं कि स्तूप किसे कहते हैं। जिसने बनारस मे सारनाथ का स्तूप देखा है वह स्तूप का मतलब अच्छी तरह जानता होगा।

किसी-किसी का ख़याल है कि घर और मन्दिर इत्यादि बनाने और पत्थर पर नक्काशी का काम करने की विद्या हम लोगो ने ग्रीसवालों से सीखी है। या, अगर सीखी नही, तो उनकी विद्या से थोड़ा-बहुत लाभ अवश्य उठाया है। परन्तु यह बात निर्मूल है। ग्रीकों और हिन्दुओं का सङ्घर्ष, ईसा के पहले, चौथी शताब्दी मे हुआ। परन्तु सॉची के स्तूप इस बात की गवाही दे रहे हैं कि उससे भी पहले भारत- वर्ष के वासियों ने अदभुत-अदभुत मन्दिर बनाना आप ही आप सीख लिया था। इन स्तूपों से एक और बात का भी पता
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लगता है। उसके चित्र यह जाहिर करते हैं कि जिस समय ये स्तूप बने हैं उस समय, नहीं उससे भी पहले, इस देश के निवासी शिल्पकला. साधारण सभ्यता और विद्या में बहत बढ-चढे थे। जब कोई कम सभ्य या असभ्य जाति किसी सभ्य जाति का संसर्ग पाती है तब वह तत्काल ही उसकी सभ्यता की नकल नहीं करने लग जाती। इसके लिए कुछ समय दरकार होता है। अतएव, यदि, क्षण भर के लिए, यह भी मान ले कि ग्रीक ही लोगों ने हमको घर बनाना सिखलाया, तो यह कदापि नहीं माना जा सकता कि हमारा और उनका योग होत ही उन्होंने मूर्तिया खोदने और दीवार उठाने पर सबक देना शुरू कर दिया ! ऐसा होना खयाल ही में नहीं आ सकता। अँगरेज़ों को इस देश में आये कई सी वर्ष हुए। पर, हमने, इतने दिनों में कितना कला-कौशल सीखा? इस देश मे पुराने मन्दिरों और पत्थर के कामो के जो नमूने जहा-तहाँ रह गये हैं उनका ढङ्ग ही निराला है। अतएव वे किसी की नकल नहीं हैं। वौद्धों के पुराने स्तूपो को देखकर कनिंदाम और फरगुसन इत्यादि विद्वानों को उनकी प्राचीनता और उनके शिल्पनिर्माण की अद्भुतता पर बडा आश्चर्य हुआ है। उन्होने यह साफ़-साफ़ कबुल कर लिया है कि भारतवर्प ने इस विद्या मे बहुत बड़ी उन्नति की थी और जब अँगरेजों के पूर्वज वन में वनमानुसों के समान रहते थे तब भारतवर्षवाले ऐसे स्तूप, मन्दिर और प्रासाद बनाते थे
[  ]जिनको देखकर आजकल के कूपर्सहिलवाले बट बड़े सिनियर भी आश्चर्य के महासमुद्र में गोता लगा जाते हैं।

डाक्टर फरगुसन का मत है कि बौद्ध लोगों की प्राचीन इमारते पॉच भागों मे बॉटी जा सकती हैं । यथा——

(१) पत्थर के विशाल खम्भे, या लाटें, जिन पर लेख खोदे जाते थे।

(२) स्तूप——जो गौतम बुद्ध की किसी अवशिष्ट वस्तु को रक्षित रखने या किसी पवित्र घटना या स्थान का स्मरण दिलाने के लिए बनाये जाते थे।

(३) रेल्स अर्थात् पत्थर के एक प्रकार के घेरे जो स्तूपों के चारों ओर बनाये जाते थे और जिन पर बहुत बारीक नक्काशी का काम रहता था।

(४) चैत्य अर्थात् प्रार्थना-मन्दिर ।

(५) विहार अर्थात् बौद्ध-संन्यासियों के रहने के स्थान।

स्तूपो का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध समुदाय भिलसा के पास है। यह शहर सेधिया के राज्य में है। कानपुर से जो रेल बम्बई,को जाती है वह भिलसा मे ठहरती है। वहाँ स्टेशन है। भिलसा बहुत पुराना शहर है। वह बेतवा नदी के तट पर बसा हुआ है। उसका प्राचीन नाम विदिशा है। उसके आस-पास अनेक स्तूप हैं। वे सब "भिलसा स्तूपों" के नाम से प्रसिद्ध हैं। पर सॉची के स्तूप भूपाल की बेगम साहबा की रियासत में हैं। सॉची भी रेल का स्टेशन है।
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वह भिलसा से पॉच मील आगे है। स्तूपो ही के कारण वहाँ यह स्टेशन बना है। स्टेशन के पास बेगम साहबा ने, दर्शकों के सुभीते के लिए, एक डाक बंगला भी बनवा दिया है। सभ्य संसार को भिलसा के स्तूपो की सूचना, इस जमाने मे, सबसे पहले कनिहाम साहब ने दी, फिर फरगुसन साहब ने। १८५४ ईसवी मे कनिहाम साहब ने "भिलसा टोप्स' नाम की एक किताब लिखी। उसमे इन स्तूपो का विस्तृत वर्णन है और इनके और इनके अवयवों के सैकड़ों चित्र भी हैं। इसके अनन्तर डाकर फरगुसन ने एक किताब लिखी। उसका नाम है “वृक्ष और सर्पपूजा' (Trees and Serpent Worship)। इस किताब के आधे हिस्से मे इन स्तूपो का खूब पतेवार वर्णन है और साथ ही कोई ५० से भी अधिक चित्र भी हैं। इन्ही किताबो की बदौलत सभ्य-संसार ने इन स्तूपों को जाना; इनकी कारीगरी कुछ-कुछ उसकी समझ मे आई; भारत के प्राचीन वैभव का कुछ अनुमान उसको हुआ। तब से । योरप और अमेरिकावाले तक इन स्तूपो को देखने आते हैं। जिन लोगो ने दुनिया भर की सैर की है उनका मत है कि मिश्र के पिरामिडों ( स्तूपो ) को छोडकर संसार मे ऐसी कोई इमारत नही जिसे देखकर उतना आश्चर्य, आतङ्क और पूज्यभाव हृदय मे उत्पन्न होता है जितना कि भिलसा के स्तूपो को देखकर होता है। मूर्तिभञ्जक मुसलमानों ने इन स्तूपो पर भी हथौड़ा चलाया है और इनकी अनन्त मूत्तियों
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को छिन्न-भिन्न कर डाला है। तथापि अभी इनकी कुछ अंश शेष है जिससे भारतवर्ष की प्राचीन कारीगरी का कुछ-कुछ अनुमान किया जा सकता है। ये स्तूप अपने समय मे इतने प्रसिद्ध थे कि सुदूरवर्ती चोन देश से भी बौद्ध परिव्राजक यहाँ आते थे। परन्तु बली काल ने इनको नष्टप्राय कर दिया है । ये, इस समय, घने जगल के बीच मे आ गये हैं और जङ्गली जीवों ने इनको अपना घर बना लिया है।

भिलसा के बौद्ध-स्तूप पूर्व-पश्चिम १७ मील और उत्तर- दक्षिण ६ मील तक की ज़मीन पर फैले हुए हैं। सब मिला-. कर वे ६५ हैं। उनकी तफसील इस तरह हैं——

१० सॉची मे। ८ सोनारी में। ७ सतधारा मे। ३ श्रोधर मे। ३७ भोजपुर मे।

ये स्तूप प्राय: अशोक के समय के अर्थात् ईसा से ३०० वर्ष पहले के हैं। परन्तु साँची और सतधारा के स्तूप इनसे भी पुराने हैं । वे ईसा से कुछ कम ६०८ वर्ष पहले के मालूम होते हैं। अर्थात् उनको बने कोई ढाई हज़ार वर्ष हुए ।

भूपाल से सॉची २६ मील है। वहाँ से कुछ दूर पर विश्वनगर किंवा वेशनगर नामक एक प्राचीन शहर के चिह्न हैं। इस शहर का दूसरा नाम चैत्यगिरि था। बौद्धो के चैत्य नामक प्रार्थना-मन्दिरों की अधिकता के कारण इसका नाम चैत्यगिरि हो गया था। इसके आस-पास अनेक मन्दिर, चैत्य और स्तूप भग्नावस्था में पड़े हैं। इससे सूचित होता हैं
[  ]कि मालवा का यह प्रान्त किसी समय बहुत ही अच्छी दशा में था। यहाँ पर, कहीं-कही, पहाड़ियों के बीच के दरों मे, पानी इकट्ठा करने के इरादे से, प्राचीन समय मे जो बांध बाँधे गये थे, वे अब तक विद्यमान हैं। जान पड़ता है, पुराने बौद्ध-भिक्षु परमार्थ-चिन्तक भी थे और किसानी का भी काम करते थे।

साँची के सबसे प्रधान स्तूप के दक्षिण तरफ़ जो खम्भा है उस पर, प्राचीन पाली भाषा मे, “शान्ति-सड्डम" खुदा हुआ है। इसे कोई-कोई “सन्तसङ्घम' अथवा “सन्ता-सङ्घम" भी पढ़ते हैं। साँचो इसी शान्ति अथवा सन्त शब्द का अप- भ्रश जान पड़ता है। बौद्ध साधु विहारी ही में रहते थे; स्तूपों मे नहीं। इससे “सन्त-सनम" पाठ ठीक नहीं मालूम होता। “शान्ति-सङ्कम" ही अधिक युक्तियुक्त बोध होता है। हमने सॉची के स्तूप प्रत्यक्ष देखे हैं, कई बार देखे हैं। पहली दफे. जब हम उन्हे देखने गये तब उनके प्राचीन वैभव का विचार करके और उनकी इस समय की भग्नावस्था को देख- कर हमारी आँखो मे आँसू भर आये। जिस पहाड़ी पर सॉची है वह औरों से अलग है। वह वहाँ पर अकेली ही है। वह विन्ध्याचल की पर्वतमाला का एक टुकड़ा है। उसका ऊपरी भाग समतल है और कही-कही पर सघन वृक्षा से आवृत है। सॉची के स्तूप इस पहाड़ी के उत्तर-दक्षिण हैं। पहाडी का यह भाग बेतवा नदी के बॉये किनारे से थोड़ी ही दूर पर है। इस पहाड़ी पर खंडहर ही खॅडहर
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देख पडते हैं। इन खंडहरों मे १० स्तूप, एक चैत्य, गुप्तवंशी राजाओं के जमाने का बना हुआ एक मन्दिर और एक-विहार-इतनी इमारतों के भग्नावशिष्ट हैं। अशोक के ऊँचे-ऊँचे स्तम्भों के भी कुछ अंश यहाँ पर पड़े हैं। इन पर अशोक की घोषणा के कोई-कोई अक्षर अब तक देख पड़ते हैं। चीन के परि-ब्राजक यात्री फाह्यान ने सॉची का नाम “शा-ची" लिखा है । उसका कथन है कि जब वह इस देश मे आया तब सॉची एक बहुत बड़ा राज्य था। वह कहता है कि साँची वह जगह है जहाँ पर गौतम बुद्ध ने पवित्र पीतपर्णा के पेड़ को लगाया था। यह पेड़ हमेशा सात फुट ऊँचा बना रहता था और यदि काट भी डाला जाता था तो फिर बढ़ जाता था।

पानी मे उठनेवाले बुलबुलों की तरह मनुष्य-जीवन नश्वर समझा गया है। जीवन की नश्वरता का स्मरण दिलाने के लिए बौद्धों ने जितने स्तूप बनाये हैं, सब बुलबुलों की शकल के बनाये है। साँची का सबसे बड़ा स्तूप भी उसी शकल का है। वह मॉची की पहाड़ी के पश्चिम है। उसके भीतर रक्खी गई कोई भी स्मारक वस्तु आज तक नहीं पाई गई। इससे अनुमान होता है कि यह स्तूप आदि बुद्ध की यादगार में बनाया गया है। इसके चारों दरवाज़ों पर बुद्ध की चार मूर्तियाँ हैं। इससे यह बात और भी अधिक दृढ़ता से अनु- मान की जाती है। नेपाल मे यह नियम है कि इस प्रकार के स्तूपों के दरवाजे पर बुद्ध की मूर्तियो अवश्य रक्खी जाती
[  ]उखड़ गया है। पलस्तर पर रङ्गीन चित्रों की एक अनुपम चित्रावली जरूर रही होगी; यह लोगो का अनुमान है। घेरे मे जो पत्थर के लम्बे-लम्बे टुकड़े ( रेल ) हैं उन पर उनके बनवानेवालों के नाम खुदे हुए हैं। इससे जान पड़ता है कि स्तूप के चारों ओर जो घेरा है वह पोछे से, क्रम-क्रम से, बना है। इस घेरे के बन जाने पर फाटक और फाटकों पर तोरण बने हैं। स्तूप के दक्षिणी और पश्चिमी तोरण गिर पड़े थे। १८८२-८३ ईसवी मे अगरेजी गवर्नमेट ने उनकी मरम्मत करा दी, उत्तरी और पूर्वी फाटकों की फिर से जुड़ाई कराकर मज़बूत करा दिया; और स्तूप के चारों तरफ़ जो घेरा है उसकी भी मरम्मत कराकर जहाँ-जहाँ पर वह टेढा हो गया था वहाँ-वहाँ पर उसे सीधा करा दिया। घेरे, फाटकों और तोरणों मे जितनी मूर्तियाँ थीं सबको साफ़ करा दिया। फाटकों के ऊपर जो तोरण है उन पर, आगे और पीछे दोनों तरफ़ बहुत ही अच्छा काम था। एक चावल भर भी जगह ऐसी न थी जहाँ कोई कारीगरी का काम न हो। इन तारणों पर गौतम बुद्ध का जीवनचरित चित्रित था। उनके जीवन की जितनी मुख्य-मुख्य घटनाये थी वे सब पत्थर पर खोदकर, मूर्तियों के रूप मे, दिखलाई गई थी। अब भी इस चित्रात्मक चरित का बहुत कुछ अंश देखने को मिलता है। इसके सिवा बौद्धों के जातक नामक ग्रन्थो मे बुद्ध के पहले ५०० जन्मो से सम्बन्ध रखनेवाली जो गाथाये हैं उनका भी दृश्य इन तोरणों
[ ११ ]बिदा होना, तपस्या करना, बोधिवृक्ष के नीचे बोधिसत्वता को पाना, उपदेश करना और अन्त मे निर्वाण को पहुँचना—इत्यादि शाक्य मुनि के जीवन की सारी घटनाये बड़े ही कौशल से मूर्तियों के रूप मे दिखलाई गई हैं।

कही-कहीं पर वृक्षों की, पशुओं की और स्वयं स्तूपो की पूजा की जाने के भी चित्र इस स्तूप में हैं। रामग्राम नामक नगर में एक स्तूप है। उसकी मूर्ति यहाँ बनी हुई है। उसे हाथी, अपनी सूंड़ में पानी ला-लाकर, साफ़ कर रहे हैं और झाड़ से उस पर की खाक झाड़ रहे हैं। बरगद का एक वृक्ष है। वह एक मन्दिर से घिरा हुआ है। उसकी दाहिनी ओर, पूजा के लिए अपने सेवक-समूह के साथ एक राजा बैठा है। बाई ओर दैत्य हैं; घोड़े और हाथियों पर सवार राजा के सैनिक उनको कुचलते हुए चले जाते हैं । यह बड़ा ही विलक्षण दृश्य है। सैकड़ों मूर्तियाँ आकाश की तरफ़ हाथ उठाये प्रार्थना कर रही हैं। मनुष्य का जैसा सिर लगाये भेड़ और शेर इधर-उधर झॉक रहे हैं; शाक्य मुनि का चिह्न, चक्र, ठौर- ठौर पर, अपने बनानेवालों के शिल्पकौशल की प्रशंसा सी कर रहा है। हिरनों के झुण्ड के झुण्ड भागते हुए, कहीं- कहीं, दिखाई दे रहे हैं। दक्षिणी तोरण के ऊपर एक शहर के घेरे जाने का दृश्य बड़ा ही मजेदार है। यह धर्मयुद्ध का एक दृश्य है। गौतम बुद्ध की कुछ अवशिष्ट चीज़े छीनना है। इसी लिए यह युद्ध छिड़ा है और शहर को घेरना पड़ा
[ १३ ]साज-सामान दुरुस्त है। दुन्दुभी, मेरी, मृदङ्ग और वीणा के भी चित्र है। चारपाइयाँ हैं, खूबसूरत तिपाइयाँ हैं; बड़ी- बड़ी नावे हैं। स्त्रियाँ पानी भर रही है; अनाज साफ़ कर । रही है, और रोटी बना रही है।

यह सबसे बड़े स्तूप की बात हुई। जो स्तूप इससे छोटा है उसका व्यास ३६ फुट है। उसमे भी चार फाटक हैं और चारों तरफ़ घेरा बना हुआ है। घेरे की उंचाई ७।। फुट है। उसके भी खम्भों पर फूलों, पत्तियो और जानवरो इत्यादि के बड़े ही सुन्दर चित्र खचित हैं। दरवाजे पर एक स्त्री हाथ में कमल लिये हुए खड़ी है। उसकी बनावट बहुत ही चित्त- बेधक है। यह स्तूप ईसा के कोई २०० वर्ष पहले का है। इस पर जो लेख हैं उनकी लिपि अशोक के समय की लिपि से मिलती है। इसके भीतर अशोक के समय मे हुए, बौद्ध धर्म के अनुयायी, दस-ग्यारह साधुओ की स्मारक चीज़े मिली हैं।

तीसरे नम्बर का स्तूप बिलकुल हो बरबाद हालत मे पड़ा है। उसका बहुत ही थोड़ा अंश शेष रह गया है। उसकी इमारत ईसा के कोई ५५० वर्ष पहले की जान पड़ती है। उसके भीतर बुद्ध के दो प्रसिद्ध चेलो के स्मारक पदार्थ मिले हैं।

और स्तूप बहुत छोटे हैं। उनमे कोई विशेषता नही; और न उनमे किसी की स्मारक कोई वस्तु ही मिली है।

बड़े स्तूप के दक्षिण-पूर्व गुप्तवंशी राजो के समय का एक छोटा सा मन्दिर है। वह कोई १७०० वर्ष का पुराना है।
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जिस नमूने का वह है उस नमूने का सबसे पुराना मन्दिर वही है।

भारतवर्ष की इन पुरातन इमारतो की कारीगरी देखकर यहाँ की पुरानी सभ्यता और शिल्प-कौशल का बहुत कुछ पता मिलता है। इन पर जो लता, पत्र, पशु, पक्षी और नर, नारियो इत्यादि की मूर्तियाँ हैं वे इस बात का प्रमाण हैं कि २५०० वर्ष पहले जब इस दुनिया मे, दो एक देशों को छोड- कर, असभ्यता और जङ्गलीपन का पूरा साम्राज्य था तब भारतवर्ष मे विद्या, कारीगरी और साधारण सभ्यता किस दरजे को पहुँच गई थी। पर, इस समय, बात बिलकुल उलटी हो गई है। अफ़सोस !

[जून १९०६



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