प्रेमचंद रचनावली (खण्ड ५)/गबन/अड़तीस

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १७३ ]देवीदीन ने उसे आदर की दृष्टि से देखकर कहा-तुम सब कर लोगी बहू, अब मुझे विश्वास हो गया। जब तुमने कलेजा इतना मजबूत कर लिया है, तो तुम सब कुछ कर सकती हो।

'तो यहां से नौ बजे चलें?"

'हां, मैं तैयार हूं।'

अड़तीस



वह रमानाथ, जो पुलिस के भय से बाहर न निकलता था, जो देवीदीन के घर में चोरों की तरह पड़ा जिंदगी के दिन पूरे कर रहा था, आज दो महीनों से राजसी भोग-विलास में डूबा हुआ है। रहने को सुंदर सजा हुआ बंगला है, सेवा-टहल के लिए चौकीदारों का एक दल, सवारी के लिए मोटर। भोजन पकाने के लिए एक काश्मीरी बावरची है। बड़े-बड़े अफसर उसको मुंह ताका करते हैं। उसके मुंह से बात निकली नहीं कि पूरी हुई । इतने ही दिनों में उसके मिजाज में इतनी नफासत आ गई है, मानो वह खानदानी रईस हो। विलास ने उसकी विवेक-बुद्धि को सम्मोहित-सा कर दिया है। उसे कभी इसका खयाल भी नहीं आता कि मैं क्या कर रहा हूं और मेरे हाथों कितने बेगुनाहों का खून हो रहा है। उसे एकांत-विचार का अवसर ही नहीं दिया जाता। रात को वह अधिकारियों के साथ सिनेमा या थिएटर देखने जाता है, शाम को मोटरों की सैर होती है। मनोरंजन के नित्य नए सामान होते रहते हैं। जिस दिन अभियुक्तों को मजिस्ट्रेट ने सेशन सुपुर्द किया, सबसे ज्यादा खुशी उसी को हुई। उसे अपना सौभाग्य-सूर्य उदय होता हुआ मालूम होता था।

पुलिस को मालूम था कि सेशन जज के इजलास में यह बहार न होगी। संयोग से जज हिन्दुस्तानी थे और निष्पक्षता के लिए बदनाम। पुलिस हो या चोर, उनकी निगाह में बराबर था। वह किसी के साथ रू-रिआयत न करते थे। इसलिए पुलिस ने रमा को एक बार उन स्थानों की सैर कराना जरूरी समझा, जहां वारदातें हुई थीं। एक जमींदार की सजी-सजाई कोठी में डेरा पड़ा। दिन-भर लोग शिकार खेलते, रात को ग्रामोफोन सुनते, ताश खेलते और बजरों पर नदियों की सैर करते। ऐसा जान पड़ता था कि कोई राजकुमार शिकार खेलने निकला है।

इस भोग-विलास में रमा को अगर कोई अभिलाषा थी, तो यह कि जालपा भी यहां होती। जब तक वह पराश्रित था, दरिद्र था, उसकी विलासेंद्रियां मानो मूर्च्छित हो रही थीं। इन शीतल झोंकों ने उन्हें फिर सचेत कर दिया। वह इस कल्पना में मग्न था कि यह मुकदमा खत्म होते ही उसे अच्छी जगह मिल जायगी। तब वह जाकर जालपा को मना लावेगा और आनंद से जीवन-सुख भोगेगा। हां, वह नए प्रकार का जीवन होगा, उसकी मर्यादा कुछ और होगी,सिद्धांत कुछ और होंगे। उसमें कठोर संयम होगा और पक्का नियंत्रण । अब उसके जीवन को कुछ उद्देश्य होगा,कुछ आदर्श होगा। केवल खाना, सोना और रुपये के लिए हाय-हाय करना ही जीवन का व्यापार न होगा। इसी मुकदमे के साथ इस मार्ग-हीन जीवन का अंत हो जायगा। [ १७४ ]दुर्बल इच्छा ने उसे यह दिन दिखाया था और अब एक नए और संस्कृत जीवन का स्वप्न दिखा रही थी। शराबियों की तरह ऐसे मनुष्य रोज ही संकल्प करते हैं, लेकिन उन संकल्प का अंत क्या होता है। नए-नए प्रलोभन सामने आते रहते हैं और संकल्प की अवधि भी बढ़ती चली आती है। नए प्रभात का उदय कभी नहीं होता।

एक महीना देहात की सैर के बाद रमा पुलिस के सहयोगियों के साथ अपने बंगले पर जा रहा था। रास्ता देवीदीन के घर के सामने से था; कुछ दूर ही से उसे अपना कमरा दिखाई दिया। अनायास ही उसकी निगाह ऊपर उठ गई। खिड़की के सामने कोई खड़ा था। इस वक्त देवीदीन वहां क्या कर रहा है? उसने जरा ध्यान से देखा। यह तो कोई औरत है!मगर औरत कहां से आई? क्यों देवीदीन ने वह कमरा किराए पर तो नहीं उठा दिया? ऐसा तो उसने कभी नहीं किया।

मोटर जरा और समीप आई तो उस औरत का चेहरा साफ नजर आने लगा। रमा चौंक पड़ा। यह तो जालपा है ! बेशक जालपा है ! मगर नहीं, जालपा यहां कैसे आयगी? मेरा पता-ठिकाना उसे कहां मालूम ! कहीं बुढ्ढे ने उसे खत तो नहीं लिख दिया? जालपा ही है। नायब दारोगा मोटर चला रही थी। रमा ने बड़ी मित्रता के साथ कहा-सरदार साहब, एक मिनट के लिए रुक जाइए। मैं जरा देवीदीन से एक बात कर लूं। नायब ने मोटर जरा धीमी कर दी, लेकिन फिर कुछ सोचकर उसे आगे बढ़ा दिया।

रमा ने तेज होकर कहा-आप तो मुझे कैदी बनाए हुए हैं।

नायब ने खिसियाकर कहा-आप तो जानते हैं, डिप्टी साहब कितनी जल्द जामे से बाहर हो जाते हैं।

बंगले पर पहुंचकर रमा सोचने लगा, जालपा से कैसे मिलें। वहां जालपा ही थी, इसमें अब उसे कोई शुबहा न था। आंखों को कैसे धोखा देता। हृदय में एक ज्वाला-सी उठी हुई थी,क्या करूं? कैसे जाऊं? उसे कपड़े उतारने की सुधि भी न रही। पंद्रह मिनट तक वह कमरे के द्वार पर खड़ा रहा। कोई हिकमत न सूझी। लाचार पलंग पर लेटा रहा।

जरा ही देर में वह फिर उठा और सामने सहन में निकल आया। सड़क पर उसी वक्त बिजली रोशन हो गई। फाटक पर चौकीदार खड़ा था। रमा को उस पर इस समय इतना क्रोध आया, कि गोली मार दे। अगर मुझे कोई अच्छी जगह मिल गई, तो एक-एक से समझेंगा। तुम्हें तो डिसमिस कराके छोडूंगा। कैसा शैतान की तरह सिर पर सवार है। मुंह तो देखो जरा। मालूम होता है बकरी की दुम है। वाह रे आपकी पगड़ी। कोई टेकरी होने वाली कुली है। अभी कुत्ता भूंक पड़े, तो आप दुम दबाकर भागेंगे; मगर यहां ऐसे डटे खड़े हैं मनो किसी किले के द्वार की रक्षा कर रहे हैं।

एक चौकीदार ने आकर कहा-इसपिट्टर साहब ने बुलाया है। कुछ नए तवे मंगवाए हैं।

रमा ने झल्लाकर कह—मुझे इस वक्त फुरसत नहीं है।

फिर सोचने लगा। जालपा यहां कैसे आई? अकेले ही आई है या और कोई साथ है? जालिम ने बुड्ढे से एक मिनट भी बात नहीं करने दिया। जालपा पूछेगी तो जरूर, कि क्यों भागे थे। साफ-साफ कह दूंगा, उस समय और कर ही क्या सकता था। पर इन थोड़े दिनों के कष्ट ने [ १७५ ]
जीवन का प्रश्न तो हल कर दिया। अब आनंद से जिंदगी कटेगी। कोशिश करके उसी तरफ अपना तबादला करवा लूंगा। यह सोचते-सोचते रमा को खयाल आया कि जालपा भी यहां मेरे साथ रहे, तो क्या हरज है। बाहर वालों से मिलने की रोक-टोक है। जालपा के लिए क्या रुकावट हो सकती है। लेकिन इस वक्त इस प्रश्न को छेड़ना उचित नहीं। कल इसे तय करूंगा। देवीदीन भी विचित्र जीव है। पहले तो कई बार आया, पर आज उसने भी सन्नाय खींच लिया। कम-से-कम इतना तो हो सकता था कि आकर पहरे वाले कांस्टेबल से जालपा के आने की खबर मुझे देता। फिर मैं देखता कि कौन जालपा को नहीं आने देता। पहले इस तरह की कैद जरूरी थी; पर अब तो मेरी परीक्षा पूरी हो चुकी। शायद सब लोग खुशी से राजी हो जाएंगे।

रसोइया थाली लाया। मांस एक ही तरह का था। रमा थाली देखते ही झल्ला गया। इन दिनों रुचिकर भोजन देखकर ही उसे भूख लगती थी। जब तक चार-पांच प्रकार का मांस न हो,चटनी-अचार न हो, उसकी तृप्ति न होती थी।

बिगड़कर बोला-क्या खाऊं तुम्हारा सिर? थाली उठा ले जाओ।

रसोइए ने डरते-डरते कहा- हुजूर,इतनी जल्द और चीजें कैसे बनाता । अभी कुल दो घंटे तो आए हुए हैं।

'दो घंटे तुम्हारे लिए थोड़े होते हैं।'

'अब हुजूर से क्या कहूं।"

'मत बको।'

'हुजूर'

‘मत बको ? डैम ।'

रसोइए ने फिर कुछ न कहा। बोतल लाया,बर्फ तोड़कर ग्लास में डाली और पीछे हटकर खड़ा हो गया।

रमा को इतना क्रोध आ रहा था कि रसोइए को नोंच खाए। उसका मिजाज इन दिनों बहुत तेज हो गया था।

शराब का दौर शुरू हुआ,तो रमा का गुस्सा और भी तेज हुआ। लाल-लाल आंखों से देखकर बोला-चाहूं तो अभी तुम्हारा कान पकड़कर निकाल दें। अभी, इसी दम । तुमने समझा क्या है।

उसका क्रोध बढ़ता देखकर रसोइया चुपके-से सरक गया। रमा ने ग्ला लिया और दो-चार लुकमे खाकर बाहर सहन में टहलने लगा। यही धुन सवार थी, कैसे यहां से निकल जाऊं।

एकाएक उसे ऐसा जान पड़ा कि तार के बाहर वृक्षों की आड़ में कोई है। हां,कोई खड़ा उसकी तरफ ताक रहा है। शायद इशारे से अपनी तरफ बुन्ग रहा है। रमानाथ का दिल धकड़ने लगा। कहीं षड्यंत्रकारियों ने उसके प्राण लेने की तो नहीं ठानी है। यह शंका उसे सदैव बनी रहती थी। इसी खयाल से वह रात को बंगले के बाहर बहुत कम निकलता था। आत्म-रक्षा के भाव ने उसे अंदर चले जाने की प्रेरणा की। उसी वक्त एक भोटर सड़क पर निकली। उसके प्रकाश में रमा ने देखा, वह अंधेरी छाया स्त्री है। उसकी साड़ी साफ नजर आ रही है। फिर उसे ऐसा मालूम हुआ कि वह स्त्री उसकी ओर आ रही है। उसे फिर शंका हुई, कोई मर्द यह वेश [ १७६ ]
बदलकर मेरे साथ छल तो नहीं कर रहा है। वह ज्यों-ज्यों पीछे हटता गया, वह छाया उसकी ओर बढ़ती गई,यहां तक कि तार के पास आकर उसने कोई चीज रमा की तरफ फेंकी। रमा चीख मारकर पीछे हट गया; मगर वह केवल एक लिफाफा था। उसे कुछ तस्कीन हुई। उसने फिर जो सामने देखा,तो वह छाया अंधकार में विलीन हो गई थी। रमा ने लपककर वह लिफाफा उठा लिया। भय भी था और कौतूहल भी। भय कम था,कौतूहल अधिक। लिफाफे को हाथ में लेकर देखने लगा। सिरनामा देखते ही उसके हृदय में फुरहरियां-सी उड़ने लगीं। लिखावट जालपा की थी। उसने फौरन लिफाफा खोला। जालपा ही की लिखावट थी। उसने एक ही सांस में पत्र पढ़ डाला और तब एक लंबी सांस ली। उसी सांस के साथ चिंता का वह भीषण भार जिसने आज छ: महीने से उसकी आत्मा को दबाकर रखा था,वह सारी मनोव्यथा जो उसका जीवन-रक्त चूस रही थी,वह सारी दुर्बलता, लज्जा,ग्लानि मानो उड़ गई, छूमंतर हो गई। इतनी स्फूर्ति, इतना गर्व, इतना आत्म-विश्वास उसे कभी न हुआ था। पहली सनक यह सवार हुई, अभी चलकर दारोगा से कह दूं, मुझे इस मुकदमे से कोई सरोकार नहीं है,लेकिन फिर खयाल आयी,बयान तो अब हो ही चुका,जितना अपयश मिलना था,मिल ही चुका,अब उसके फल से क्यों हाथ धोऊ। मगर इन सबों ने मुझे कैसा चकमा दिया है और अभी तक मुगालते में डाले हुए हैं। सब-के-सब मेरी दोस्ती का दम भरते हैं,मगर अभी तक असली बात मुझसे छिपाए हुए हैं। अब भी इन्हें मुझ पर विश्वास नहीं। अभी इसी बात पर अपना बयान बदल दें, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो। यही न होगा, मुझे कोई जगह न मिलेगी। बला से, इन लोगों के मनसूबे तो खाक में मिल जाएंगे। इस दगाबाजी की सजा हो मिल जायगी। और, यह कुछ न सही, इतनी बड़ी बदनामी से तो कुछ जाऊंगा। यह सब शरारत जरूर करेंगे, लेकिन झूठा इल्जाम लगाने के सिवा और कर ही क्या सकते हैं। जब मेरा यहा रहना साबित ही नहीं तो मुझ पर दोष ही क्या लग सकती हैं। सके मुंह में कालिख लग जायगी। मुंह तो दिखाया न जाएगा मुकदमा क्या चलाएंगे।

मगर नहीं, इन्होंने मुझसे चाल चली है, तो मैं भी इनसे वही चाल चलूं। कह दूंगा,अगर मुझे आज कोई अच्छी जगह मिल जाएगी, तो मैं शहादत दंगा,वरना साफ कह देगा,इस मामले से मेरा कोई संबंध नहीं। नहीं तो पीछे से किसी छोटे-मोटे थाने में नायब दारोगा बनाकर भेज दें और वहां सड़ा करू लुंग्गा इंस्पेक्टरी और कल दस बजे मेरे पास नियुक्ति का परवाना आ जाना चाहिए। वह चला कि इसी वक्त दारोगा से कह दूं, लेकिन फिर रुक गया। एक बार जालपा से मिलने के लिए उसके प्राण तड़प रहे थे। उसके प्रति इतना अनुराग, इसनी श्रद्धा उसे कमी न हुई थी, मानो वह कोई दैवी-शक्ति हो जिसे देवताओं ने उसकी रक्षा के लिए भेजा हो।

दस बज गए थे। रमानाथ ने बिजली गुल कर दी और बरामदे में आकर जोर से किवाड़ बंद कर दिए, जिसमें पहरे वाले सिपाही को मालूम हो, अंदर से किवाड़ बंद करके सो रहे हैं। वह अंधेरे बरामदे में एक मिनट खड़ा रहा। तब आहिस्ता से उतरा और कांटेदार फेंसिंग के पास आकर सोचने लगी, उस पार कैसे जाऊ? शायद् अभी जालपा बगीचे में हो। देवीदीन जरूर उसके साथ होगा। केवल यही तार उसकी राह रोके हुए था। उसे फांद जाना असंभव था। उसने तारों के बीच से लेकर निकल जाने का निश्चय किया। अपने सब कपले समेट लिए और कांटों [ १७७ ]
को बचाता हुआ सिर और कंधे को तार के बीच में डाला; पर न जाने कैसे कपड़े फंस गए। उसने हाथ से कपड़ों को छुड़ाना चाहा, तो आस्तीन कांटों में फंस गई। धोती भी उलझी हुई थी। बेचारा बड़े सकंट में पड़ा। न इस पार जा सकता था, न उस पार। जरा भी असावधानी हुई और कांटे उसकी देह में चुभ जाएंगे।

मगर इस वक्त उसे कपड़ों की परवा न थी। उसने गर्दन और आगे बढ़ाई और कपड़ों में लंबा चीरा लगाती उस पार निकल गया। सारे कपड़े तार-तार हो गए। पीठ में भी कुछ खरोंचे लगे; पर इस समय कोई बंदूक का निशाना बांधकर भी उसके सामने खड़ा हो जाता, तो भी वह पीछे न हटता। फटे हुए कुरते को उसने वहीं फेंक दिया; गले की चादर फट जाने पर भी काम दे सकती थी, उसे उसने ओढ़ लिया, धोती समेट ली और बगीचे में घूमने लगा। सन्नाटा था। शायद रखवाला खटिक खाना खाने गया हुआ था। उसने दो-तीन बार धीरे-धीरे जालपा का नाम लेकर पुकारा भी किसी की आहट न मिली;पर निराशा होने पर भी मोह ने उसका गला न छोड़ा। उसने एक पेड़ के नीचे जाकर देखा। समझ गया,जालपा चली गई। वह उन्हीं पैरों देवीदीन के घर की ओर चला। उसे जरा भी शोक न था। बला से किसी को मालूम हो जाय कि मैं बंगले से निकल आया हूं, पुलिस मेरा कर ही क्या सकती है। मैं कैदी नहीं हूं, गुलामी नहीं लिखाई है।

आधी रात हो गई थी। देवीदीन भी आध घंटा पहले लौटा था और खाना खाने जा रहा था कि एक नंगे- धड़गे आदमी को देखकर चौंक पड़ा। रमा ने चादर सिर पर बांध ली थी और देवीदीन को डराना चाहता था।

देवीदीन ने सशंक होकर कहा-कौन है?

सहसा पहचान गया और झपटकर उसकी हाथ पकड़ता हुआ बोला-तुमने तो भैया खूब भेस बनाया है? कपड़े क्या हुए? ।

रमानाथ-तार से निकल रहा था। सब उसके कांटों में उलझकर फट गए।

देवीदीन-राम राम । देह में तो कांटे नहीं चुभे?

रमानाथ-कुछ नहीं,दो-एक खरोंचे लग गए। मैं बहुत बचाकर निकला।

देवीदीन-बहू की चिट्ठी मिल गई न?

रमानाथ-हां,उसी वक्त मिल गई थी। क्या वह भी तुम्हारे साथ थी?

देवीदीन-वह मेरे साथ नहीं थीं,मैं उनके साथ था। जब से तुम्हें मोटर पर आते देखा,तभी से जाने-जाने लगाए हुए थीं।

रमानाथ–तुमने कोई खत लिखा था?

देवीदीन—मैंने कोई खत-पत्तर नहीं लिखा भैया!वह आईं तो मुझे आप हो अचंभा हुआ कि बिना जाने-बुझे कैसे आ गईं। पीछे से उन्होंने बताया। वह सतरंजे वाला नकसा उन्हीं ने पराग से भेजा था और इनाम भी वहीं से आया था।

रमा की आंखें फैल गई। जालपा की चतुराई ने उसे विस्मय में डाल दिया। इसके साथ ही पराजय के भाव ने उसे कुछ खिन्न कर दिया। यहां भी उसकी हार हुई। इस बुरी तरह !

बुढ़िया ऊपर गई हुई थी। देवीदीन ने जीने के पास जाकर कहा-अरे क्या करती है? बहू [ १७८ ]
से कह दे। एक आदमी उनसे मिलने आया ।

यह कहकर देवीदीन ने फिर रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला-चलो, अब सरकारमें तुम्हारी पेसी होगी। बहुत भागे थे। बिना वारंट के पकड़े गए। इतनी आसानी से पुलिस भी न पकड़ सकती।

रमा का मनोल्लास द्रवित हो गया था। लज्जा से गड़ा जाता था। जालपा के प्रश्नों का उसके पास क्या जवाब था। जिस भय से वह भागा था, उसने अंत में उसका पीछा करके उसेपरास्त ही कर दिया। वह जालपा के सामने सीधी आंखें भी तो न कर सकता था। उसने हाथछुड़ा लिया और जीने के पास ठिठक गया।

देवीदीन ने पूछा-क्यों रुक गए?

रमा ने सिर खुजलाते हुए कहा-चलो, मैं आता हूं।

बुढ़िया ने ऊपर ही से कहा-पूछो, कौन आदमी है, कहां से आया है?

देवीदीन ने विनोद किया-कहता है, मैं जो कुछ कहूंगा, बहू से ही कहूंगा।

'कोई चिठी लाया है?'

'नहीं।

सन्नाटा हो गया। देवीदीन ने एक क्षण के बाद पूछा-कह दूं, लौट जाय?

जालपा जीने पर आकर बोली-कौन आदमी है, पूछती तो हूं।

'कहता है, बड़ी दूर से आया हूं।'

'है कहां?'

'यह क्या खड़ा है।'

"अच्छा, बुला लो।

रमा चादर ओढ़े, कुछ झिझकता, कुछ झेंपता, कुछ डरता, जीने पर चढ़ा। जालपा ने उसेदेखते ही पहचान लिया। तुरंत दो कदम पीछे हट गई। देवीदीन वहां न होता तो वह दो कदम और आगे बढ़ी होती।

उसकी आंखों में कभी इतना नशा न था, अंगों में कभी इतनी चपलता न थी, कपोलकभी इतने न दमके थे, हृदय में कभी इतना मृदु कंपन न हुआ था। आज उसकी तपस्या सफल हुई।

उनतालीस

वियोगियों के मिलन की रात बटोहियों के पड़ाव की रात है, जो बातों में कट जाती है। रमा औरजालपा, दोनों ही को अपनी छ: महीने की कथा कहनी थी। रमा ने अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपने कष्टों को खूब बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया। जालपा ने अपनी कथा में कष्टों की चर्चा तक न आने दी। वह डरती थी इन्हें दुःख होगा, लेकिन रमा को उसे रुलाने में विशेष आनंद आ रहा था। वह क्यों भागा, किसलिए भागा, कैसे भागा, यह सारी गाथा उसने करुण शब्दों में कही और जालपा ने सिसक-सिसककर सुनी। वह अपनी बातों से उसे प्रभावित करना चाहता था।