प्रेमचंद रचनावली (खण्ड ५)/गबन/उनतालीस

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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से कह दे। एक आदमी उनसे मिलने आया ।

यह कहकर देवीदीन ने फिर रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला-चलो, अब सरकारमें तुम्हारी पेसी होगी। बहुत भागे थे। बिना वारंट के पकड़े गए। इतनी आसानी से पुलिस भी न पकड़ सकती।

रमा का मनोल्लास द्रवित हो गया था। लज्जा से गड़ा जाता था। जालपा के प्रश्नों का उसके पास क्या जवाब था। जिस भय से वह भागा था, उसने अंत में उसका पीछा करके उसेपरास्त ही कर दिया। वह जालपा के सामने सीधी आंखें भी तो न कर सकता था। उसने हाथछुड़ा लिया और जीने के पास ठिठक गया।

देवीदीन ने पूछा-क्यों रुक गए?

रमा ने सिर खुजलाते हुए कहा-चलो, मैं आता हूं।

बुढ़िया ने ऊपर ही से कहा-पूछो, कौन आदमी है, कहां से आया है?

देवीदीन ने विनोद किया-कहता है, मैं जो कुछ कहूंगा, बहू से ही कहूंगा।

'कोई चिठी लाया है?'

'नहीं।

सन्नाटा हो गया। देवीदीन ने एक क्षण के बाद पूछा-कह दूं, लौट जाय?

जालपा जीने पर आकर बोली-कौन आदमी है, पूछती तो हूं।

'कहता है, बड़ी दूर से आया हूं।'

'है कहां?'

'यह क्या खड़ा है।'

"अच्छा, बुला लो।

रमा चादर ओढ़े, कुछ झिझकता, कुछ झेंपता, कुछ डरता, जीने पर चढ़ा। जालपा ने उसेदेखते ही पहचान लिया। तुरंत दो कदम पीछे हट गई। देवीदीन वहां न होता तो वह दो कदम और आगे बढ़ी होती।

उसकी आंखों में कभी इतना नशा न था, अंगों में कभी इतनी चपलता न थी, कपोलकभी इतने न दमके थे, हृदय में कभी इतना मृदु कंपन न हुआ था। आज उसकी तपस्या सफल हुई।

उनतालीस

वियोगियों के मिलन की रात बटोहियों के पड़ाव की रात है, जो बातों में कट जाती है। रमा औरजालपा, दोनों ही को अपनी छ: महीने की कथा कहनी थी। रमा ने अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपने कष्टों को खूब बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया। जालपा ने अपनी कथा में कष्टों की चर्चा तक न आने दी। वह डरती थी इन्हें दुःख होगा, लेकिन रमा को उसे रुलाने में विशेष आनंद आ रहा था। वह क्यों भागा, किसलिए भागा, कैसे भागा, यह सारी गाथा उसने करुण शब्दों में कही और जालपा ने सिसक-सिसककर सुनी। वह अपनी बातों से उसे प्रभावित करना चाहता था। [ १७९ ]अब तक सभी बातों में उसे परास्त होना पड़ा था। जो बात उसे असूझ मालूम हुई, उसे जालपा ने चुटकियों में पूरा कर दिखाया। शतरंज वाली बात को वह खूब नमक-मिर्च लगाकर बयान कर सकता था; लेकिन वहां भी जालपा ही ने नीचा दिखाया। फिर उसकी कीर्ति-लालसा को इसके सिवा और क्या उपाय था कि अपने कष्टों की राई को पर्वत बनाकर दिखाए।

जालपा ने सिसककर कहा-तुमने यह सारी आफतें झेली, पर हमें एक पत्र तक न लिखा। क्यों लिखते, हमसे नाता ही क्या था ! मुंह देखे की प्रीति थी ! आंख ओट पहाड़ ओट।

रमा ने हसरत से कहा-यह बात नहीं थी जालपा, दिल पर जो कुछ गुजरती थी दिल ही जानता है, लेकिन लिखने का मुंह भी तो हो। जब मुंह छिपाकर घर से भाग्म,तो अपनी विपत्ति-कथा क्या लिखने बैठता ! मैंने तो सोच लिया था, जब तक खूब रुपये न कमा लेगा, एक शब्द भी न लिखेगा।

जालपा ने आंसू-भरी आंखों में व्यंग्य भरकी कहा–ठीक ही था, रुपये आदमी से ज्यादा प्यारे होते ही हैं ! हम तो रुपये के यार हैं, तुम चाहे चोरी करो, डाका मारो, जाली नोट बनाओ, झूठी गवाही दो या भीख मांगो,किसी उपाय से रुपये लाओ। तुमने हमारे स्वभाव को कितना ठीक समझा है, के वाह ! गोसाईं जी भी तो कह गए हैं-स्वारथ लाइ करहिं सब प्रीतिः ।

रमा ने झेंपते हुए कहा-नहीं-नहीं प्रिये, यह बात न थी। मैं यही सोचता था कि इन फटे-हालों जाऊंगा कैसे। सच कहता हूं, मुझे सबसे ज्यादा डर तुम्हीं से लगता था। सोचता था, तुम मुझे कितना कपटी, झूठा, कायर समझ रही होगी। शायद मेरे मन में यह पाया था कि रुपये की थैली देखकर तुम्हारी हदय कुछ तो नर्म होगा।

जालपा ने व्यथित कंठ से कहा- मैं शायद उस थैली को हाथ से छूती भी नहीं। आज मालूम हो गया, तुम मुझे कितनी नीच, कितनी स्वार्थिनी, कितनी लोभिन समझते हो! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, सरासर मेरा दोष है। अगर मैं भली होती, तो अन यह दिन ही क्यों आता। जो पुरुष तीस-चालीस रुपये का नौकर हो, उसकी स्त्री अगर दो-चार रुपये रोज खर्च करे, हजार-दो हजार के गहने पहनने की नीयत रक्खे, तो वह अपनी और उसकी तबाही का सामान कर रही है। अगर तुमने मुझे इतना धनलोलुप समझा, तो कोई अन्याय नहीं किया। मगर एक बार जिस आग में जल चुकी, उसमें फिर न कूदेंगी। इन महीनों में मैंने उन पापों का कुछ प्रायश्चित किया है और शेष जीवन के अंत समय तक करूंगी। यह मैं नहीं कहती कि भोग-विलास से मेरा जी भर गया, या गहने-कपड़े से मैं ऊब गई, या सैर-तमाशे से मुझे घृणा हो गई। यह सब अभिलाषाएं ज्यों की त्यों है। अगर तुम अपने पुरुषार्थ से, अपने परिश्रम से, अपने सदुद्योग से उन्हें पूरा कर सको तो क्या कहना; लेकिन नीयत खोटी करके, आत्मा को कलुषित करके एक लाख भी लाओ, तो मैं उसे ठुकरा दूंगी। जिस · क्त मुझे मालूम हुआ कि तुम पुलिस के गवाह बन गए हो, मुझे इतना दुःख हुआ कि मैं उसी वक्त दादा को साथ लेकर तुम्हारे बंगले तक गई; मगर उसी दिन तुम बाहर चले गए थे और आज लौटे हो। मैं इतने आदमियों का खून अपनी गर्दन पर नहीं लेना चाहती। तुम अदालत में साफ-साफ कह दो कि मैंने पुलिस के चकमे में आकर गवाही दी थी. मेरा इस मुआमले से कोई संबंध नहीं है।

रमा ने चिंतित होकर कहा--जब से तुम्हारा खत मिला, तभी से मैं इस प्रश्न पर विचार [ १८० ]
कर रहा हूं, लेकिन समझ में नहीं आता क्या करू। एक बात कहकर मुकर जाने का साहस मुझमें नहीं है।

'बयान तो बदलना ही पड़ेगा।'

‘आखिर कैसे?'

‘मुश्किल क्या है। जब तुम्हें मालूम हो गया कि म्युनिसिपैलिटी तुम्हारे ऊपर कोई मुकदमा नहीं चला सकती, तो फिर किस बात का डर ?'

'डर न हो, झेंप भी तो कोई चीज है। जिस मुंह से एक बात कही, उसी मुंह से मुकर जाऊ, यह तो मुझसे न होगा। फिर मुझे कोई अच्छी जगह मिल जाएगी। आराम से जिंदगी बसर होगी। मुझमें गली-गली ठोकर खाने का बूता नहीं है।

जालपा ने कोई जवाब न दिया। वह सोच रही थी, आदमी में स्वार्थ की मात्रा कितनी अधिक होती है।

रमा ने फिर धृष्टता से कहा-और कुछ मेरी ही गवाही पर तो सारा फैसला नहीं हुआ जाता। मैं बदल भी जाऊं, तो पुलिस कोई दूसरा आदमी खड़ा कर देगी। अपराधियों की जान तो किसी तरह नहीं बच सकती। हां, मैं मुफ्त में मारा जाऊंगा।

जालपा ने त्योरी चढ़ाकर कहा–कैसी बेशर्मी की बातें करते हो जी क्या तुम इतने गए बीते हो कि अपनी रोटियों के लिए दूसरों का गला काटो। मैं इसे नहीं सह सकती। मुझे मजदूरी करना, भूखों मर जाना मंजूर है, बड़ी-से-बड़ी विपत्ति जो संसार में है, वह सिर पर ले सकती हूं, लेकिन किसी का अनभल करके स्वर्ग का राज भी नहीं ले सकती।

रमा इस आदर्शवाद से चिढ़कर बोला-तो क्या तुम चाहती कि मैं वहां कुलीगीरी करूं?

जालपा नहीं, मैं यह नहीं चाहती, लेकिन अगर कुलीगीरी भी करनी पड़े तो यह खून से तर रोटियां खाने से कहीं बढ़कर है।

रमा ने शांत भाव से कहा-जालपा, तुम मुझे जितना नीच समझ रही हो, मैं उतना नीच नहीं हैं। बुरी बात सभी को बुरी लगती है। इसका दु:ख मुझे भी है कि मेरे हाथों इतने आदमियो का खून हो रहा है, लेकिन परिस्थिति ने मुझे लाचार कर दिया है। मुझमें अब ठोकरें खाने की शक्ति नहीं है। न मैं पुलिस से रार मोल ले सकता हूं। दुनिया में सभी थोड़े ही आदर्श पर चलते हैं। मुझे क्यों उस ऊंचाई पर चढ़ाना चाहती हो, जहां पहुंचने की शक्ति मुझमें नहीं है।

जालपा ने तीक्ष्ण स्वर में कहा—जिस आदमी में हत्या करने की शक्ति हो, उसमें हत्या न करने की शक्ति का न होना अचंभे की बात है। जिसमें दौड़ने की शक्ति हो, उसमें खड़े रहने की शक्ति न हो इसे कौन मानेगा। जब हम कोई काम करने की इच्छा करते हैं, तो शक्ति आप ही आप आ जाती है। तुम यह निश्चय कर लो कि तुम्हें बयान बदलना है, बस और बातें आप आ जायेगी। रमा सिर झुकाए हुए सुनता रहा।

जालपा ने और आवेश में आकर कहा–अगर तुम्हें यह पाप की खेती करनी है, तो मुझे आज ही यहां से विदा कर दो। मैं मुंह में कालिख लगाकर यहां से चली जाऊंगी और फिर तुम्हें दिक करने में आऊंगी। तुम आनंद से रहा। मैं अपना पेट मेहनत-मजूरी करके भर लेगी। अभी [ १८१ ]
प्रायश्चित पूरा नहीं हुआ है, इसीलिए यह दुर्बलता हमारे पीछे पड़ी हुई है। मैं देख रही हूं, यह हमारा सर्वनाश करके छोड़ेगी।

रमा के दिल पर कुछ चोट लगी। सिर खुजलाकर बोला-चाहता तो मैं भी हूं कि किसी तरह इस मुसीबत से जान बचे।।

‘तो बचाते क्यों नहीं। अगर तुम्हें कहते शर्म आती हो, तो मैं चलें। यही अच्छा होगा। मैं भी चली चलेंगी और तुम्हारे सुपरंडंट साहब से सारा वृत्तांत साफ-साफ कह दूंगी।'

रमा का सारा पसोपेश गायब हो गया। अपनी इतनी दुर्गति वह न कराना चाहता था कि उसकी स्त्री जाकर उसकी वकालत करे। बोला-तुम्हारे चलने की जरूरत नहीं है जालपा, मैं उन लोगों को समझा दूंगा।

जालपा ने जोर देकर कहा-साफ बताओ, अपना बयान बदलोगे या नहीं? रमा ने मानो कोने में दबकर कहा-कहता तो हूं, बदल दूंगा।

'मेरे कहने से या अपने दिल से?'

'तुम्हारे कहने से नहीं, अपने दिल से। मुझे खुद ही ऐसी बातों से घृणा है। सिर्फ जरा हिचक थी, वह तुमने निकाल दी।'

फिर और बातें होने लगीं। कैसे पता चला कि रमा ने रुपये उड़ा दिए हैं? रुपये अदा कैसे हो गए? और लोगों को गबन की खबर हुई या घर ही में दबकर रह गई? रतन पर क्या गुजरी? गोपी क्यों इतनी जल्द चला गया? दोनों कुछ पढ़ रहे हैं या उसी तरह आवारा फिरा करते हैं? आखिर में अम्मां और दादा का जिक्र आया। फिर जीवन के मनसुबे बांधे जाने लगे। जालपा ने कहा-घेरे चलकर रतन से थोड़ी-जमीन ले लें और आनंद से खेती-बारी करें। रमा ने कहा-कहीं उससे अच्छा है कि यहां चाय की दुकान खोलें। इस पर दोनों में मुबहसा हुआ। आखिर रमा को हार माननी पड़ी। यहां रहकर वह घर की देखभाल न कर सकता था, भाइयों को शिक्षा न दे सकता था और न माता-पिता का सेवा-सत्कार कर सकता था। उधर घरवालों के प्रति भी तो उसका कुछ कर्तव्य है। रमा निरुत्तर हो गया।

चालीस

रमा मुंह-अंधेरे अपने बंगले जा पहुंचा। किसी को कानों-कान खबर न हुई। | नाश्ता करके रमा ने खत साफ किया, कपड़े पहने और दारोगा के पास जा पहुंचा। त्योरियां चढ़ी हुई थीं। दारोगा ने पूछा-खैरियत तो है, नौकरों ने कोई शरारत तो नहीं की।

रमा ने खड़े-खड़े कहा–नौकरों ने नहीं, आपने शरारत की है, आपके मातहतों,अफसरों और सब ने मिलकर मुझे उल्लू बनाया है।

दारोगा ने कुछ घबड़ाकर पूछा-आखिर बात क्या है,कहिए तो? ।

रमानाथ–बात यही है कि इस मुआमले में अब कोई शहादत न दूंगा। उससे मेरा ताल्लुक नहीं। आप लोगों ने मेरे साथ चाल चली और वारंट की धमकी देकर मुझे शहादत देने पर मजबूर