प्रेमचंद रचनावली (खण्ड ५)/गबन/चौंतीस

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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एक मौलवी साहब ने कहा-कोई इश्तिहारी मुलजिम है।

जनता को अपने साथ देखकर सिपाहियों को और भी जोर हो गया। रमा को भी अब उनके साथ चुपचाप चले जाने ही में अपनी कुशल दिखाई दी। इस तरह सिर झुका लिया, मानो उसे इसकी बिल्कुल परवा नहीं है कि उस पर लाठी पड़ती है या तलवार। इतना अपमानित वह कभी न हुआ था। जेल की कठोरतम यातना भी इतनी ग्लानि न उत्पन्न करती।

थोड़ी देर में पुलिस स्टेशन दिखाई दिया। दर्शकों की भीड़ बहुत कम हो गई थी। रमा ने एक बार उनकी ओर लज्जित आशा के भाव से ताका। देवीदीन का पता न था। रमा के मुंह से एक लंबी सांस निकल गई। इस विपत्ति में क्या यह सहारा भी हाथ से निकल गया?

चौंतीस

पुलिस स्टेशन के दफ्तर में इस समय बड़ी मेज के सामने चार आदमी बैठे हुए थे। एक दारोगा थे, गोरे से, शौकीन, जिनकी बड़ी-बड़ी आंखों में कोमलता की झलक थी। उनकी बगल में नायब दारोगा थे। यह सिक्ख थे, बहुत हंसमुख, सजीवता के पुतले, गेहुआ रंग, सुडौल,सुगठित शरीर। सिर पर केश था, हाथों में कड़े; पर सिगार से परहेज न करते थे। मेज की दूसरी तरफ इंस्पेक्टर और डिप्टी सुपरिंटेंडेंट बैठे हुए थे। इंस्पेक्टर अधेड़, सांवला, लंबा आदमी था,कौड़ी की-सी आंखें, फूले हुए गाल और ठिगना कद। डिप्टी सुपरिटेंडेंट लंबा छरहरा जवान था,बहुत ही विचारशील और अल्पभाषी। इसकी लंबी नाक और ऊंचा मस्तक उसकी कुलीनता के साक्षी थे।

डिप्टी ने सिगार की एक कश लेकर कहा-बाहरी गवाहों से काम नहीं चल सकेगा। इनमें से किसी को एप्रूवर बनना होगा। और कोई अल्टरनेटिव नहीं है।

इंस्पेक्टर ने दारोगा की ओर देखकर कहा-हम लोगों ने कोई बात उठा तो नहीं रक्खी,हलफ से कहता हूं। सभी तरह के लालच देकर हार गए। सबों ने ऐसी गुट कर रखी है कि कोई टूटता ही नहीं। हमने बाहर के गवाहों को भी आजमाया, पर सब कानों पर हाथ रखते हैं।

डिप्टी-उस मारवाड़ी को फिर आजमाना होगा। उसके बाप को बुलाकर खूब धमकाइए। शायद इसका कुछ दबाव पड़े।

इंस्पेक्टर हलफ से कहता हूं, आज सुबह से हम लोग यही कर रहे हैं। बेचारी बाप लड़के के पैरों पर गिरा, पर लड़का किसी तरह राजी नहीं होता।

कुछ देर तक चारों आदमी विचारों में मग्न बैठे रहे। अंत में डिप्टी ने निराशा के भाव से कहा-मुकदमा नहीं चल सकता। मुफ्त की बदनामी हुई।

इंस्पेक्टर-एक हफ्ते की मुहलत और लीजिए, शायद कोई टूट जाय।

यह निश्चय करके दोनों आदमी यहां से रवाना हुए। छोटे दारोगा भी उसके साथ ही चले गए। दारोगाजी ने हुक्का मंगवाया कि सहसा एक मुसलमान सिपाही ने आकर कहा–दारोगाजी,लाइए कुछ इनाम दिलवाइए। एक मुलजिम को शुबहे पर गिरफ्तार किया है। इलाहाबाद का
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रहने वाला है, नाम है रमानाथ। पहले नाम और सकूनत दोनों गलत बतलाई थीं। देवीदीन खटिक जो नुक्कड़ पर रहता है, उसी के घर ठहरा हुआ है। जरा डांट बताइएगा तो सब कुछ उगल देगा।

दारोगा–देवीदीन वही है न जिसके दोनों लड़के।

सिपाही-जी हां, वही है।

इतने में रमानाथ भी दारोगा के सामने हाजिर किया गया। दारोगा ने उसे सिर से पांव तक देखा, मानो मन में उसका हुलिया मिला रहे हों। तब कठोर दृष्टि से देखकर बोले-अच्छा,यह इलाहाबाद का रमानाथ है। खूब मिले भाई। छ: महीने से परेशान कर रहे हो। कैसा साफ हुलिया है कि अंधा भी पहचान ले। यहां कब से आए हो?

कांस्टेबल ने रमा को परामर्श दिया-सब हाल सच-सच कह दो, तो तुम्हारे साथ कोई सख्ती न की जाएगी।

रमा ने प्रसन्नचित्त बनने की चेष्टा करके कहा-अब तो आपके हाथ में हूं, रियायत कीजिए या सख्ती कीजिए। इलाहाबाद की म्युनिसिपैलिटी में नौकर था। हिमाकत कहिए या बदनसीबी, चुंगी के चार सौ रुपये मुझसे खर्च हो गए। मैं वक्त पर रुपये जमा कर सका। शर्म के मारे घर के आदमियों से कुछ न कहा, नहीं तो इतने रुपये इंतजाम हो जाना कोई मुश्किल न था। जब कुछ बस न चला, तो वहां से भागकर यहां चला आया। इसमें एक हर्फ भी गलत नहीं है।

दारोगा ने गंभीर भाव से कहा- मामला कुछ संगीन है, क्या कुछ शराब का चस्का पड़ गया था?

'मुझसे कसम ले लीजिए, जो कभी शराब मुंह से लगाई हो।'

कांस्टेबल ने विनोद करके कहा-मुहब्बत के बाजार में लुट गए होंगे, हुजूर।

रमा ने मुस्कराकर कहा-मुझसे फाकेमस्तों का वहां कहां गुजर?

दारोगा—तो क्या जुआ खेल डाला? या, बीवी के लिए जेवर बनवा डाले !

रमा झेपकर रह गया। अपराधी मुस्कराहट उसके मुख पर रो पड़ी।

दारोगा—अच्छी बात है,तुम्हें भी यहां खासे मोटे जेवर मिल जायंगे।

एकाएक बूढ़ा देवीदीन आकर खड़ा हो गया।

दारोगा ने कठोर स्वर में कहा-क्या काम है यहां?

देवीदीन-हुजूर को सलाम करने चला आया। इन बेचारों पर दया की नजर रहे हुजूर,बेचारे बड़े सीधे आदमी हैं।

दारोगा-बचा सरकारी मुलजिम को घर में छिपाते हो, उस पर सिफारिश करने आए हो।


देवीदीन-मैं क्या सिफारिस करूंगा हुजूर, दो कौड़ी का आदमी।

दारोगा-जानता है,इन पर वारंट है,सरकारी रुपये गबन कर गए हैं।

देवीदीन-हुजूर, भूल-चूक आदमी से ही तो होती है। जवानी की उम्र है ही, खर्च हो गए होंगे। [ १५४ ]दारोगा ने तड़पकर कहा-यह क्या है?

देवीदीन-कुछ नहीं है, हुजूर को पान खाने को।

दारोगा-रिश्वत देना चाहता है!क्यों? कहो तो बचा, इसी इल्जाम में भेज दें।

देवीदीन-भेज दीजिए सरकार। घरवाली लकड़ी-कफन की फिकर से छूट जाएगी।

वहीं बैठा आपको दुआ दूंगा।

दारोगा—अबे इन्हें छुड़ाना है तो पचास गिन्नियां लाकर सामने रक्खो। जानते हो इनकी गिरफ्तारी पर पांच सौ रुपये का इनाम है।

देवीदीन-आप लोगों के लिए इतनी इनाम हुजूर क्या है। यह गरीब परदेसी आदमी हैं,जब तक जिएंगे आपको याद करेंगे।

दारोग–बक-बक मत कर, यहां धरम कमाने नहीं आया हूं।

देवीदीन-बहुत तंग हूं हुजूर। दुकान-दारी तो नाम की है।

कांस्टेबल- बुढ़िया से मांग जाके।

देवीदीन-कमाने वाला तो मैं ही हूं हुजूर, लड़कों का हाल जानते ही हो। तन-पेट काटकर कुछ रुपये जमा कर रखे थे, सो अभी सातों-धाम किए चला आता हूं। बहुत तंग हो गया है।

दारोगा- तो अपनी गिन्नियां उठा ले। इसे बाहर निकाल दो जी।

देवीदीन-आपका हुकुम है, तो लीजिए जाता हूँ। धक्के क्यों दिलवाइएगा । दारोगा—(कांस्टेबल से) इन्हें हिरासत में रखो। मुंशी से कहो इनका बयान लिख लें।

देवीदीन के होंठ आवेश से कांप रहे थे। उसके चेहरे पर इतनी व्यग्रता रमा ने कभी नहीं देखी, जैसे कोई चिड़िया अपने घोंसले में कौवे को घुसते देखकर विहल हो गई हो। वह एक मिनट तक थाने के द्वार पर खड़ा रहा, फिर पीछे फिरा और एक सिपाही से कुछ कहा, तब लपका हुआ सड़क पर चला गया, मगर एक ही पल में फिर लौय और दारोगा से बोला-हुजूर,दो घंटे की मुहलत न दीजिएगा?

रमा अभी वहीं खड़ा था। उसकी यह ममता देखकर रो पड़ा। बोला-दादा, अब तुम हैरान न हो, मेरे भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह होने दो। मेरे भी यहां होते, तो इससे ज्यादा और क्या करते । मैं मरते दम तक तुम्हारा उपकार देवीदीन ने आंखें पोंछते हुए कहा-कैसी बातें कर रहे हो, भैया | जब रुपये पर आई तो देवीदीन पीछे हटने वाला आदमी नहीं है। इतने रुपये तो एक-एक दिन जुए में हार-जीत गयो हूं। अभी घर बेच दें, तो दस हजार की मालियत है। क्या सिर पर लाद कर ले जाऊंगा। दारोगाजी, अभी भैया को हिरासत में न भेजो। मैं रुपये की फिकर करके थोड़ी देर में आता हूं।

देवीदीन चला गया तो दारोगाजी ने सहयता से भरे स्वर में कहा है तो खुर्राट, मगर बड़ा नेक। तुमने इसे कौन-सी बूटी सुंघा दी?

रमा ने कहा-गरीबों पर सभी को रहम आता है।

दारोगा ने मुस्कराकर कहा–पुलिस को छोड़कर; इतना और कहिए। मुझे तो यकीन नहीं कि पचास गिन्नियां लावे। [ १५५ ]

रमानाथ—अगर लाए भी तो उससे इतना बड़ा तावान नहीं दिलाना चाहता। आप मुझे शौक से हिरासत में ले लें।

दारोगा—मुझे पांच सौ के बदले साढे छ: सौ मिल रहे हैं, क्यों छोडूं। तुम्हारी गिरफ्तारी का इनाम मेरे किसी दूसरे भाई को मिल जाय, तो क्या बुराई है।

रमानाथ—जब मुझे चक्की पीसनी है, तो जितनी जल्द पीस लूं उतना ही अच्छा। मैंने समझा था, मैं पुलिस की नजरों से बचकर रह सकता हूं। अब मालूम हुआ कि यह बेकली और आठों पहर पकड़ लिए जाने का खौफ जेल से कम जानलेवा नहीं।

दारोगाजी को एकाएक जैसे कोई भूली हुई बात याद आ गई। मेज के दराज से एक मिसल निकाली, उसके पन्ने इधर-उधर उल्टे, तब नम्रता से बोले--अगर मैं कोई ऐसी तरकीब बतलाऊं कि देवीदीन के रुपये भी बच जाएं और तुम्हारे ऊपर भी हर्फ न आए तो कैसा?

रमा ने अविश्वास के भाव से कहा—ऐसी कोई तरकीब है, मुझे तो आशा नहीं।

दारोगा—अभी साईं के सौ खेल हैं। इसका इंतजाम मैं कर सकता हूं। आपको महज एक मुकदमे में शहादत देनी पड़ेगी?

रमानाथ—झूठी शहादत होगी।

दारोगा—नहीं; बिल्कुल सच्ची। बस समझ लो कि आदमी बन जाओगे। म्युनिसिपैलिटी के पंजे से तो छूट जाओगे, शायद सरकार परवरिश भी करे। यों अगर चालान हो गया तो पांच साल से कम की सजा न होगी। मान लो इस वक्त देवी तुम्हें बचा भी ले, तो बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। जिंदगी खराब हो जायगी। तुम अपना, नफा-नुकसान खुद समझ लो। मैं जबरदस्ती नहीं करता।

दारोगाजी ने डकैती का वृतांत कह सुनाया। रमा ऐसे कई मुकदमे समाचार-पत्रों में पढ़ चुका था। संशय के भाव से बोला--तो मुझे मुखबिर बनना पड़ेगा और यह कहना पड़ेगा कि मैं भी इन डकैतियों में शरीक था। यह तो झूठी शहादत हुई।

दारोगा—मुआमला बिल्कुल सच्चा है। आप बेगुनाहों को न फंसाएंगे। वही लोग जेल जाएंगे जिन्हें जाना चाहिए। फिर झूठ कहां रहा? डाकुओं के डर से यहां के लोग शहादत देने पर राजी नहीं होते। बस और कोई बात नहीं। यह मैं मानता हूं कि आपको कुछ झूठ बोलना पड़ेगा, लेकिन आपकी जिंदगी बनी जा रही है, इसके लिहाज से तो इतना झूठ कोई चीज नहीं। खूब सोच लीजिए। शाम तक जवाब दीजिएगा।

रमा के मन में बात बैठ गई। अगर एक बार झूठ बोलकर वह अपने पिछले कर्मों का प्रायश्चित् कर सके और भविष्य भी सुधार ले, तो पूछना ही क्या। जेल से तो बच जायगा। इसमें बहुत आगा-पीछा की जरूरत ही न थी। हां, इसका निश्चय हो जाना चाहिए कि उस पर फिर म्युनिसिपैलिटी अभियोग न चलाएगी और उसे कोई जगह अच्छी मिल जायगी। वह जानता था, पुलिस की गरज है और वह मेरी कोई वाजिब शर्त अस्वीकार न करेगी। इस तरह बोला, मानो उसकी आत्मा धर्म और अधर्म के संकट में पड़ी हुई है--मुझे यही डर है कि कहीं मेरी गवाही से बेगुनाह लोग न फंस जाएं।

दारोगा—इसका मैं आपको इत्मीनान दिलाता हूं। [ १५६ ]रमानाथ–लेकिन कल को म्युनिसिपैलिटी मेरी गर्दन नापे तो मैं किसे पुकारूंगा?

दारोगा–मजाल है, म्युनिसिपैलिटी चू कर सके। फौजदारी के मुकदमे में मुद्दई तो सरकार ही होगी। जब सरकार आपको मुआफ कर देगी, तो मुकदमा कैसे चलाएगी। आपको तहरीरी मुआफीनामा दे दिया जायगी, साहब।

रमानाथ-और नौकरी?

दारोग–वह सरकार आप इंतजाम करेगी। ऐसे आदमियों को सरकार खुद अपना दोस्त बनाए रखना चाहती है। अगर आपकी शहादत बढ़िया हुई और उस फरीक की जिरहों के जाल से आप निकल गए, तो फिर आप पारस हो जाएंगे !

दारोगा ने उसी वक्त मोटर मंगवाई और रमा को साथ लेकर डिप्टी साहब से मिलने चल दिए। इतनी बड़ी कारगुजारी दिखाने में विलंब क्यों करते? डिप्टी से एकांत में खूब जीट उड़ाई। इस आदमी का यों पता लगाया। इसकी सूरत देखते ही भांप गया कि मफरूर है, बस गिरफ्तार ही तो कर लिया ! बात सोलह आने सच निकली। निगाह कहीं चूक सकती है। हुजूर, मुजरिम की आंखें पहचानता हूं। इलाहाबाद की म्युनिसिपैलिटी के रुपये गबन करके भागी है। इस मामले में शहादत देने को तैयार है। आदमी पढ़ा-लिखा, सूरत का शरीफ और जहीन है।

डिप्टी ने सदग्ध भाव से कहा-हां, आदमी तो होशियार मालूम होता है।

'मगर मुआफीनामा लिए बगैर इसे हमारा एतबार न होगा। कहीं इसे यह शुबहा हुआ कि हम लोग इसके साथ कोई चाल चल रहे हैं, तो साफ निकल जाएगा।'

डिप्टी-यह तो होगा ही। गवर्नमेंट से इसके बारे में बातचीत करना होगा। आप टेलीफोन मिलाकर इलाहाबाद पुलिस से पूछिए कि इस आदमी पर कैसा मुकदमा है। यह सब तो गवर्नमेंट को बताना होगी। दारोगाजी ने टेलीफोन डाइरेक्टरी देखी, नंबर मिलाया और बातचीत शुरू हुई।

डिप्टी-क्या बोला?

दारोगा-कहता है, यहां इस नाम के किसी आदमी पर मुकदमा नहीं है।

डिप्टी-यह कैसा है भाई, कुछ समझ में नहीं आता। इसने नाम तो नहीं बदल दिया?

दारोगा- कहता है, म्युनिसिपैलिटी में किसी ने रुपये बिन नहीं किए। कोई मामला नहीं।

डिप्टी-ये तो बड़ा ताज्जुब का बात है। आदमी बोलता है हम रुपया लेकर भागा;म्युनिसिपैलिटी बोलता है कोई रुपया गबन नहीं किया। यह आदमी पागल तो नहीं?

दारोगा-मेरी समझ में कोई बात नहीं आती, अगर कह दें कि तुम्हारे ऊपर कोई इल्जाम नहीं है, तो फिर उसकी गर्द भी न मिलेगी।

'अच्छा, म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर से पूछिए।'

दारोगा ने फिरे नंबर मिलाया। सवाल-जवाब होने लगा।

दारोगा—आपके यहां रमानाथ कोई क्लॅक था?

जवाब-जी हां;था।

दारोगा-वह कुछ रुपये गबन करके भागा है? [ १५७ ]
जवाब-नहीं। वह घर से भागा है, पर गबन नहीं किया। क्या वह आपके यहां है?

दारोगा जी हां, हमने उसे गिरफ्तार किया है। वह खुद कहता है कि मैंने रुपये गबन किए। बात क्या है?

जवाब-पुलिस तो लाल बुझक्कड़ है। जरा दिमाग लड़ाइए।

दारोगा-यहां तो अक्ल काम नहीं करती।

जवाब-यहीं क्या, कहीं भी काम नहीं करती। सुनिए, रमानाथ ने मीजान लगाने में गलती की, डरकर भागा। बाद को मालूम हुआ कि तहबील में कोई कमी न थी। आई समझ में बात?

डिप्टी–अब क्या करना होगा खां, साहब। चिड़िया हाथ से निकल गया !

दारोगा-निकल कैसे जाएगी हुजूर। रमानाथ से यह बात कही ही क्यों जाए? बस उसे किसी ऐसे आदमी से मिलने न दिया जाय जो बाहर की खबरें पहुंचा सके। घरवालों को उसका पता अब लग जावेगा ही, कोई न कोई जरूर उसकी तलाश में आवेगा। किसी को न आने दें। तहरीर में कोई बात न लाई जाए। जबानी इत्मीनान दिला दिया जाय। कह दिया जाय,कमिश्नर साहब को मुआफीनामा के लिए रिपोर्ट की गई है। इंस्पेक्टर साहब से भी राय ले ली जाय।

इधर तो यह लोग सुपरिंटेंडेंट से परामर्श कर रहे थे, उधर एक घंटे में देवीदीन लौटकर थाने आया तो कांस्टेबल ने कहा-दारोगाजी तो साहब के पास गए।

देवीदीन ने घबड़ाकर कहा-तो बाबूजी को हिरासत में डाल दिया?

कांस्टेबल-नहीं, उन्हें भी साथ ले गये।

देवीदीन ने सिर पीटकर कहा-पुलिस वालों की बात का कोई भरोसा नहीं। कह गया कि एक घंटे में रुपये लेकर आता हूं, मगर इतना भी संबरे न हुआ। सरकार से पांच ही सौ तो मिलेंगे। मैं छ: सौ देने को तैयार हूं। हां, सरकार में कारगुजारी हो जायगी और क्या। वहीं से उन्हें परागराज़ भेज देंगे। मुझसे भेंट भी न होगी। बुढिया रो-रोकर मर जायग। यह कहता हुआ देवीदीन वहीं जमीन पर बैठ गया।

कांस्टेबल ने पूछा-तो यहां कब तक बैठे रहोगे?

देवीदीन ने मानो कोड़े की कार से आहत होकर कहा-अब तो दारोगाजी से दो-दो बातें करके ही जाऊंगा। चाहे जेहल ही जाना पड़े, पर फटकारूगा जरूर, बुरी तरह फटकारूंगा। आखिर उनके भी तो बाल-बच्चे होंगे । क्या भगवान् से जरा भी नहीं डरते ! तुमने बाबूजी को जाती बार देखा था? बहुत रंजीदा थे?

कांस्टेबल-रंजीदा तो नहीं थे, खासी तरह हंस रहे थे। दोनों जने मोटर में बैठकर गए हैं।

देवीदीन ने अविश्वास के भाव से कहा-हंस क्या रहे होंगे बेचारे। मुंह से चाहे हंस लें,दिल तो रोता ही होगा।

देवीदीन को यहां बैठे एक घंटा भी न हुआ था कि सहसा जग्गो आ खड़ी हुई। देवीदीन को द्वार पर बैठे देखकर बोली-तुम यहां क्या करने लगे? भैया कहां हैं?

देवीदीन ने मर्माहत होकर कहा-भैया को ले गए सुपरीडेंट के पास। न जाने भेंट होती है। [ १५८ ]
कि ऊपर ही ऊपर परागराज भेज दिए जाते हैं।

जग्गो-दारोगाजी भी बड़े वह हैं। कहां तो कहा था कि इतना लेंगे,कहां लेकर चल दिए

देवीदीन-इसीलिए तो बैठा हूं कि आवें तो दो-दो बातें कर लें।

जग्गो-हां,फटकारना जरूर। जो अपनी बात को नहीं, वह अपने बाप का क्या होगा। मैं तो खरी कहगी। मेरा क्या कर लेंगे !

देवीदीन-दुकान पर कौन है?

जग्गो–बंद कर आई हूं। अभी बेचारे ने कुछ खाया भी नहीं। सबेरे से वैसे ही हैं। चूल्हे में जाय वह तमासा। उसी के टिकट लेने तो जाते थे। न घर से निकलते तो काहे को यह बला सिर पड़ती।

देवीदीन-जो उधर ही से पराग भेज दिया तो?

जग्गो–तो चिट्ठी तो आवेगी ही। चलकर वहीं देख आयेंगे?

देवीदीन-(आंखों में आंसू भरकर) सजा हो जायगी?

जग्गो-रुपया जमा कर देंगे तब काहे को होगी। सरकार अपने रुपये ही तो लेगी?

देवीदीन–नहीं पगली, ऐसा नहीं होता। चोर माल लौटा दे तो वह छोड़ थोड़े ही दिया जाएगा।

जग्गो ने परिस्थिति की कठोरता अनुभव करके कहा-दारोगाजी।

वह अभी बात भी पूरी न करने पाई थी कि दारोगाजी की मोटर सामने आ पहुंची। इंस्पेक्टर साहब भी थे। रमा इन दोनों को देखते ही मोटर से उतरकर आया और प्रसन्न मुख से बोला-तुम यहां देर से बैठे हो क्या दादा?आओ,कमरे में चलो। अम्मां,तुम कब आईं?

दारोगाजी ने विनोद करके कहा-कहो चौधरी,'लाएं रुपये?

देवीदीन-जब कह गया कि मैं थोड़ी देर में आता हूं, तो आपको मेरी राह देख लेनी चाहिए थी। चलिए, अपने रुपये लीजिए।

दारोगा–खोदकर निकाले होंगे?

देवीदीन-आपके अकबाल से हजार-पांच सौ अभी ऊपर ही निकल सकते हैं। जमीन खोदने की जरूरत नहीं पड़ी। चलो भैया बुढ़िया कब से खड़ी है। मैं रुपये चुकाकर आता हूं। यह तो इंसपिट्टर साहब थे ? पहले इसी थाने में थे।

दारोगा-तो भाई, अपने रुपये ले जाकर उसी हांडी में रख दो। अफसरों की सलाह हुई कि इन्हें छोड़ना ने चाहिए। मेरे बस की बात नहीं है।

इंस्पेक्टर साहब तो पहले ही दफ्तर में चले गए थे। ये तीनों आदमी बातें करते उसके बगल वाले कमरे में गए। देवीदीन ने दरोगा की बात सुनी,तो भौहें तिरछी हो गई बोला-दारोगाजी,मरदों की बात होती है,मैं तो यही जानता हूं। मैं रूपये आपके हुक्म से लाया हूं। आपको अपना कौल पूरा करना पड़ेगा। कहके मुकर जाना नीचों का काम है।

इतने कठोर शब्द सुनकर दारोगाजी को भन्ना जाना चाहिए था; पर उन्होंने जरा भी बुरी [ १५९ ]
न माना। हंसते हुए बोले–भई अब चाहे, नीच कहो, चाहे दगाबाज कहो; पर हम इन्हें छोड़ नहीं सकते। ऐसे शिकार रोज नहीं मिलते। कौल के पीछे अपनी तरक्की नहीं छोड़ सकता।

दरोगा के हंसने पर देवीदीन और भी तेज हुआ—तो आपने कहा किस मुंह से था?

दारोगा-कहा तो इसी मुंह से था, लेकिन मुंह हमेशा एक-सा तो नहीं रहता। इसी मुंह से जिसे गाली देता हूं, उसकी इसी मुंह से तारीफ भी करता हूं।

देवीदीन-(तिनककर) यह मूंछे मुड़वा डालिए।

दारोगा-मुझे बड़ी खुशी से मंजूर है। नीयत तो मेरी पहले ही थी; पर शर्म के मारे न मुड़वाता था। अब तुमने दिल मजबूत कर दिया।

देवीदीन-हंसिए मत दारोगाजी, आप हंसते हैं और मेरा खून जला जाता है। मुझे चाहे जेहल ही क्यों न हो जाए, लेकिन मैं कप्तान साहब से जरूर कह दूंगा। हूं तो टके का आदमी पर आपके अकबाले से बड़े अफसरों तक पहुंच है।

दारोगा-अरे, यार तो क्या सचमुच कप्तान साहब से मेरी शिकायत कर दोगे?

देवीदीन ने समझा कि धमकी कारगर हुई। अकड़कर बोला-आप जब किसी की नहीं सुनते, बात कहकर मुकर जाते हैं, तो दूसरे भी अपने-सी करेंगे ही। मेम साहब तो रोज ही दुकान पर आती हैं।

दारोगा-कौन, देवी? अगर तुमने साहब या मेम साहब से मेरी कुछ शिकायत की,तो कसम खाकर कहता हूं, कि घर खुदवाकर फेंक दूंगा।

देवीदीन-जिस दिन मेरा घर खुदेगा, उस दिन यह पगड़ी और चपरास भी न रहेगी,हुजूर।

दारोगा-अच्छा तो मारो हाथ पर हाथ। हमारी तुम्हारी दो-दो चोटें हो जायं, यही सही।

देवीदीन-पछताओगे सरकार, कहे देता हूं पछताओगे।

रमा अब जब्त न कर सका। अब तक वह देवीदीन के बिगड़ने का तमाशा देखने के लिए भीगी बिल्ली बना खड़ा था। कहकहा मारकर बोला-दादा, दारोगाजी तुम्हें चिढ़ा रहे हैं। हम लोगों में ऐसी सलाह हो गई है कि मैं बिना कुछ लिए दिए ही छूजाऊंगा, ऊपर से नौकरी भी मिल जायगी। साहब ने पक्का वादा किया है। मुझे अब यहीं रहना होगा।

देवीदीन ने रास्ता भटके हुए आदमी की भांति कहा-कैसी बात है भैया, क्या कहते हो ! क्या पुलिस वालों के चकमे में आ गए? इसमें कोई न कोई चाल जरूर छिपी होगी।

रमा ने इत्मीनान के साथ कहा-और बात नहीं, एक मुकदमे में शहादत देनी पड़ेगी।

देवीदीन ने संशय से सिर हिलाकर कहा-झूठा मुकदमा होगा?

रमानाथ–नहीं दादा; बिल्कुल सच्चा मामला है। मैंने पहले ही पूछ लिया है।

देवीदीन की शंका शांत न हुई। बोला-मैं इस बारे में और कुछ नहीं कह सकता भैया, जरा सोच-समझकर काम करना। अगर मेरे रुपयों को डरते हो, तो यही समझ लो कि देवीदीन ने अगर रुपयों की परवा की होती, तो आज लखपति होता। इन्हीं हाथों से सौ-सौ रुपये रोज कमाए और सब-के-सब उड़ा दिए हैं। किस मुकदमे में सहादत देनी है? कुछ मालूम हुआ? [ १६० ]दारोगाजी ने रमा को जवाब देने का अवसर न देकर कहा-वही डकैतियों वाला मुआमला है जिसमें कई गरीब आदमियों की जान गई थी। इन डाकुओं ने सूबे भर में हंगामा मचा रखा था। उनके डर के मारे कोई आदमी गवाही देने पर राजी नहीं होता।

देवीदीन ने उपेक्षा के भाव से कहा-अच्छा तो यह मुखबिर बन गए? यह बात है। इसमें तो जो पुलिस सिखाएगी वही तुम्हें कहना पड़ेगा, भैया । मैं छोटी समझ का आदमी हूं, इन बातों का मर्म क्या जानू पर मुझसे मुखबिर बनने को कहा जाता, तो मैं न बनता, चाहे कोई लाख रुपया देता! बाहर के आदमी को क्या मालुम कौन अपराधी है, कौन बेकसूर है। दो-चार अपराधियों के साथ दो-चार बेकसूर भी जरूर ही होंगे।

दारोगा-हरगिज नहीं। जितने आदमी पकड़े गए हैं, सब पक्के डाकू हैं।

देवीदीन—यह तो आप कहते हैं न, हमें क्या मालूम।

दारोगा–हम लोग बेगुनाहों को फंसाएंगे ही क्यों? यह तो सोचो।

देवीदीन-यह सब भुगते बैठा हूँ, दारोगाजी ! इससे तो यही अच्छा है कि आप इनका चालान कर दें। साल-दो साल का जेहल ही तो होगा; एक अधरम के दंड से बचने के लिए बेगुनाहों का खून तो सिर पर न चढ़ेगा।

रमा ने भीरुता से कहा- मैंने खूब सोच लिया है दादा, सब कागज देख लिए हैं, इसमें कोई बेगुनाह नहीं है।

देवीदीन ने उदास होकर कहा-होगा भाई ! जान भी तो प्यारी होती है।

यह कहकर वह पीछे घूम पड़ा। अपने मनोभावों को इससे स्पष्ट रूप से वह प्रकट न कर सकता था।

एकाएक उसे एक बात याद आ गई। मुड़कर बोला-तुम्हें कुछ रुपये देता जाऊं।

रमा ने खिसियाकर कहा-क्या जरूरत है?

दारोगा—आज से इन्हें यहीं रहना पड़ेगा।

देवीदीन ने कर्कश स्वर में कहा-हां हुजूर, इतना जानता हूं। इनकी दावत होगी, बंगला रहने को मिलेगा,नौकर मिलेंगे,मोटर मिलेगी। यह सब जानता हूं। कोई बाहर की आदमी इनसे मिलने न पावेगा,न यह अकेले आ-जा सकेंगे,यह सब देख चुका हूं। यह कहता हुआ देवीदीन तेजी से कदम उठाता हुआ चल दिया, मानो वहां उसका दम घुट रहा हो। दारोगा ने उसे पुकारा,पर उसने फिरकर न देखा। उसके मुख पर पराभूत वेदना छाई हुई थी।

जग्गो ने पूछा-भैया नहीं आ रहे हैं?

देवीदीन ने सड़क की ओर ताकते हुए कहा- भैया अब नहीं आयेंगे। अब अपने ही अपने न हुए तो बेगाने तो बेगाने हैं ही ।

वह चला गया। बुढिया भी पीछे-पीछे भुनभुनाती चली। [ १६१ ]

पैंतीस

रुदन में कितना उल्लास,कितनी शांति,कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर,किसी की स्मृति में,किसी के वियोग में,सिसक-सिसक और बिलख-बिलख नहीं रोया,वह जीवन के ऐसे सुख से वंचित है, जिस पर सैकड़ों हँसिया न्योछावर हैं। उस मीठी वेदना का आनंद उन्हीं से पूछो,जिन्होंने यह सौभाग्य प्राप्त किया है। हंसी के बाद मन खिन्न हो जाता है,आत्मा क्षुब्ध हो जाती है, मानो हम थक गए हों, पराभूत हो गए हों। रुदन के पश्चात् एक नवीन स्फूर्ति,एक नवीन जीवन,एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है। जालपा के पास 'प्रजा-मित्र' कार्यालय का पत्र पहुंचा, तो उसे पढ़कर वह रो पड़ी। पत्र एक हाथ में लिए,दूसरे हाथ से चौखट पकड़े, वह खूब रोई। क्या सोचकर रोई,वह कौन कह सकता है। कदाचित् अपने उपाय की इस आशातीत सफलता ने उसकी आत्मा को विह्वल कर दिया,आनंद की उस गहराई पर पहुंचा दिया जहां पानी है,या उस ऊंचाई पर जहां उष्णता हिम बन जाती है। आज छः महीने के बाद यह सुख-संवाद मिला। इतने दिनों वह छलमयी आशा और कठोर दुराशा का खिलौना बनी रही। आह ! कितनी बार उसके मन में तरंग उठी कि इस जीवन को क्यों न अंत कर दें। कहीं मैंने सचमुच प्राण त्याग दिए होते तो उनके दर्शन भी न पाती। पर उनका हिया कितना कठोर है। छः महीने से वहां बैठे हैं, एक पत्र भी न लिखा,खबर तक नहीं ली। आखिर यही न समझ लिया होगा कि बहुत होगा रो-रोकर मर जायगी। उन्होंने मेरी परवाह ही कब की । दस-बीस रुपये तो आदमी यार-दोस्तों पर भी खर्च कर देता है। वह प्रेम नहीं है। प्रेम हृदय की वस्तु है, रुपये की नहीं। जब तक रमा का कुछ पता न था, जालपा सारा इल्जाम अपने सिर रखती थी, पर आज उनका पता पाते ही उसका मन अकस्मात् कठोर हो गया। तरह-तरह के शिकवे पैदा होने लगे। वहां क्या समझकर बैठे हैं? इसीलिए तो कि वह स्वाधीन हैं, आजाद हैं, किसी का दिया नहीं खाते। इसी तरह मैं कहीं बिना कहे-सुने चली जाती, तो वह मेरे साथ किस तरह पेश आते? शायद तलवार लेकर गर्दन पर सवार हो जाते या जिंदगी भर मुंह न देखते। वहीं खड़े-खड़े जालपा ने मन-ही-मन शिकायतों का दफ्तर खोल दिया।

सहसा रमेश बाबू ने द्वार पर पुकारा-गोपी, गोपी, जरा इधर आना। मुंशीजी ने अपने कमरे में पड़े-पड़े कराहकर कहा-कौन है भाई, कमरे में आ जाओ। अरे ! आप हैं रमेश बाबू ! बाबूजी, मैं तो मरकर जिया हूं। बस यही समझिए कि नई जिंदगी हुई। कोई आशा न थी। कोई आगे न कोई पीछे; दोनों लौंडे आवारा है, मैं मरू या जीऊ, उनसे मतलब नहीं। उनकी मां को मेरी सूरत देखते डर लगता है। बस बेचारी बहू ने मेरी जान बचाई। वह न होती तो अब तक चल बसा होता।

रमेश बाबू ने कृत्रिम संवेदना दिखाते हुए कहा-आप इतने बीमार हो गए और मुझे खबर तक न हुई। मेरे यहां रहते आपको इतना कष्ट हुआ ! बहू ने भी मुझे एक पुर्जा न लिख दिया। छुट्टी लेनी पड़ी होगी?

मुंशी–छुट्टी के लिए दरख्वास्त तो भेज दी थी; मगर साहब मैंने डाक्टरी सर्टिफिकेट