प्रेमचंद रचनावली (खण्ड ५)/गबन/पैंतालीस

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १९९ ]
कितने दुश्मन हैं। मैं आप ही के फायदे के ख्याल से कह रहा हूं।

रमा ने होंठ चबाकर कहा-बेहतर हो कि आप मेरे फायदे का इतना खयाल न करें। आप लोगों ने मुझे मलियामेट कर दिया और अब भी मेरा गला नहीं छोड़ते। मुझे अब अपने हाल पर मरने दीजिए। मैं इस गुलामी से तंग आ गया हूं। मैं मां के पीछे-पीछे चलने वाला बच्चा नहीं बनना चाहता। आप अपनी मोटर चाहते हैं; शौक से ले जाइए। मोटर की सवारी और बंगले में रहने के लिए पंद्रह आदमियों को कुर्बान करना पड़ा है। कोई जगह पा जाऊं, तो शायद पंद्रह सौ आदमियों को कुर्बान करना पड़े। मेरी छाती इतनी मजबूत नहीं है। आप अपनी मोटर ले जाइए।

यह कहता हुआ वह मोटर से उतर पड़ा और जल्दी से आगे बढ़ गया। दारोगा ने कई बार पुकारा, जरा सुनिए, बात तो सुनिए, लेकिन उसने पीछे फिरकर देखा तक नहीं। जरा और आगे चलकर वह एक मोड़ से घूम गया। इसी सड़क पर जज का बंगला था। सड़क पर कोई आदमी न मिला। रमा कभी इस पटरी पर और कभी उसे पटरी पर जा-जाकर बंगलों के नंबर पढ़ता चला जाता था। सहसा एक नंबर देखकर वह रुक गया। एक मिनट तक खड़ा देखता रहा कि कोई निकले तो उससे पूछू साहब हैं या नहीं। अंदर जाने की उसकी हिम्मत न पड़ती थी। खयाल आया, जज ने पूछा, तुमने क्यों झूठी गवाही दी, तो क्या जवाब दूंगा। यह कहना कि पुलिस ने मुझसे अबस्ती गवाही दिलवाई, प्रलोभन दिया, मारने की धमकी दी, लज्जास्पद बात है। अगर वह पूछे कि तुमने केवल दो-तीन साल की सजा से बचने के लिए इतना बड़ी कलंक सिर पर ले लिया, इतने आदमियों की जान लेने पर उतारू हो गए, उस वक्त तुम्हारी बुद्धि कहां गई थी, तो उसका मेरे पास क्या जवाब है? ख्वामख्वाह लज्जित होना पड़ेगा। बेवकूफ बनाया जाऊंग; वह लौट पड़ा। इस लज्जा का सामना करने की उसमें सामर्थ्य न थी। लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है। जो काल से भी नहीं डरते, वे भी लज्जा के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते। आग में झुक जाना, तलवार के सामने खड़े हो जाना, इसकी अपेक्षा कहीं सहज है। लाज की रक्षा ही के लिए बड़े-बड़े राज्य मिट गए हैं, रक्त की नदियां बह गई हैं, प्राणों की होली खेल डाली गई है। उसी लाज ने आज रमा के पग भी पोछे हटा दिए। शायद जेल की सजा से वह इतना भयभीत न होता।

पैंतालीस

रमा आधी रात गए सोया, तो नौ बजे दिन तक नींद न खुली । वह स्वप्न देख रहा था—दिनेश को फांसी हो रही है। सहसा एक स्त्री तलवार लिए हुए फांसी की ओर दौड़ी और फांसी की रस्सी काट दी । चारों ओर हलचल मच गई । वह औरत जालपा थी । जालपा को लोग घेरकर पकड़ना चाहते थे; पर वह पकड़ में न आती थी। कोई उसके सामने जाने का साहस न कर सकता था। तब उसने एक छलांग मारकर रमा के ऊपर तलवार चलाई । रमा घबड़ाकर उठ बेता। देखा तो दारोगा और इंस्पेक्टर कमरे में खड़े हैं, और डिप्टी साहब आराम-कुर्सी पर लेटे हुए सिगार पी रहे हैं। [ २०० ] दारोगा ने कहा-आज तो आप खूब सोए बाबू साहब। कल कब लौटे थे?

रमा ने एक कुर्सी पर बैठकर कहा-जरा देर बाद लौट आया था। इस मुकदमे की अपील तो हाईकोर्ट में होगी न?

इंस्पेक्टर-अपील क्या होगी, जाब्ते की पाबंदी होगी। आपने मुकदमे को इतना मजबूत कर दिया है कि वह अब किसी के हिलाए हिल नहीं सकता। हलफ से कहता हूं, आपने कमाल कर दिया। अब आप उधर से बेफिक्र हो जाइए ! हां, अभी जब तक फैसला न हो जाय, यह मुनासिब होगा कि आपकी हिफाजत का खयाल रखा जाये। इसलिए फिर पहरे का इंतजाम कर दिया गया है। इधर हाईकोर्ट से फैसला हुआ, उधर आपको जगह मिली।

डिप्टी साहब ने सिगार का धुआं फेंककर कहा-यह डी० ओ० कमिश्नर साहब ने आपको दिया है, जिसमें आपको कोई तरह की शक न हो । देखिए, यू० पी० के होम सेक्रेटरी के नाम है । आप यहां ज्योंही यह डी० ओ० दिखाएंगे, वह आपको कोई बहुत अच्छी जगह दे देगा।

इंस्पेक्टर–कमिश्नर साहब आपसे बहुत खुश हैं, हलफ से कहता हूं।

डिप्टी-बहुत खुश हैं। वह यू० पी० को अलग डायरेक्ट भी चिट्ठी लिखेगा। तुम्हारा भाग्य खुल गया। | यह कहते हुए उसने डी. ओ. रमा की तरफ बढ़ा दिया। रमा ने लिफाफा खोलकर देखा और एकाएक उसको फाड़कर पुर्जे - पुर्जे कर डाला। तीनों आदमी विस्मय से उसका मुंह ताकने लगे । दारोगा ने कहा-रात बहुत पी गए थे क्या? आपके हक में अच्छा न होगा । इंस्पेक्टर-हलफ से कहता हूं, कमिश्नर साहब को मालूम हो जयगा, तो बहुत नाराज। होंगे। डिप्टी-इसका कुछ मतलब हमारे समझ में नहीं आया । इसका क्या मतलब है? रमानाथ-इसका यह मतलब है कि मुझे इस डी० ओ० की जरूरत नहीं है और न मै नौकरी चाहता हूं। मैं आज ही यहां से चला जाऊंगा। डिप्टी--जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जाय, तब तक आप कही नहीं जा सकता। रमानाथ-क्यों? डिप्टी - कमिश्नर साहब का यह हुक्म है। रमानाथ--मैं किसी का गुलाम नहीं हूँ। इंस्पेक्टर--बाबू रमानाथ, आप क्यों बना-बनाया खेल बिगाड़ रहे हैं? जो कुछ होना था, वह हो गया। दस-पांच दिन में हाईकोर्ट से फैसले की तसदीक हो जायगी आपकी बेहतरी इसी में है कि जो सिला मिल रहा है, उसे खुशी से लीजिए और आराम से जिंदगी के दिन बसर कीजिए। खुदा ने चाहा, तो एक दिन आप भी किसी ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाएंगे। इससे क्या फायदा कि अफसरों को नाराज कीजिए और कैद की मुसीबतें झेलिए। हलफ से कहता हूँ, अफसरों की जरा-सी निगाह बदल जाये, तो आपका कहीं पता न लगे। हलफ से कहता हूं, एक इशारे में आपको दस साल की सजा हो जाय। आप हैं किस ख्याल में? हम आपके साथ शरारत [ २०१ ]
नहीं करना चाहते। हां, अगर आप हमें सख्ती करने पर मजबूर करेंगे, तो हमें सख्ती करनी पड़ेगी। जेल को आसान न समझिएगा। खुदा दोजख में ले जाए; पर जेल की सजा न दे। मार- धाड़, गाली-गुफ्ता, वह तो वहां की मामूली सजा है। चक्की में जोत दिया तो मौत ही आ गई। हलफ से कहता हूं, दोजख से बदतर है जेल ।

दारोगा--यह बेचारे अपनी बेगम से माजूर हैं। वह शायद इनके जान की गाहक हो रही हैं। उनसे इनकी कोर दबती है।

इंस्पेक्टर-क्या हुआ, कल तो वह हार दिया था न? फिर भी राजी नहीं हुई?

रमा ने कोट की जेब से हार निकालकर मेज पर रख दिया और बोला-वह हार यह रक्खा हुआ है।

इंस्पेक्टर--अच्छा,इसे उन्होंने नहीं कबूल किया।

डिप्टी-कोई प्राउड लेडी है।

इंस्पेक्टर-कुछ उनकी भी मिजाज-पुरसी करने की जरूरत होगी ।

दारोगा--यह तो बाबू साहब के रंग-ढंग और सलीके पर मुनहसर है। अगर आप ख्वामख्वाह हमें मजबूर न करेंगे, तो हम आपके पीछे न पड़ेंगे।

डिप्टी--उस खटिक से भी मुचलका ले लेना चाहिए । । रमानाथ के सामने एक नई समस्या आ खड़ी हुई, पहली से कहीं जटिल, कहीं भीषण। संभव था, वह अपने को कर्तव्य की वेदी पर बलिदान कर देता, दो-चार साल की सजा के लिए अपने को तैयार कर लेता। शायद इस समय उसने अपने आत्म-समर्पण का निश्चय कर लिया था; पर अपने साथ जालपा को भी संकट में डालने की साहस वह किसी तरह न कर सकता था। वह पुलिस के शिकंजे में कुछ इस तरह दब गया था कि अब उसे बेदाग निकल जाने का कोई मार्ग दिखाई न देता था। उसने देखा कि इस लड़ाई में मैं पेश नहीं पा सकता। पुलिस सर्वशक्तिमान् है, वह मुझे जिस तरह चाहे दबा सकती है। उसके मिजाज की तेजी गायब हो गई । विवश होकर बोला-आखिर आप लोग मुझसे क्या चाहते हैं?

इंस्पेक्टर ने दारोगा की ओर देखकर आंखें मारीं मानो कह रहे हों, 'आ गया पंजे में', और बोले-बस इतना ही कि आप हमारे मेहमान बने रहें, और मुकदमे के हाईकोर्ट में तय हो जाने के बाद यहां से रुखसत हो जाएं। क्योंकि उसके बाद हम आपको हिफाजत के जिम्मेदार न होंगे। अगर आप कोई सर्टिफिकेट लेना चाहेंगे, तो वह दे दी जाएगी, लेकिन उसे लेने या न लेने का आपको पूरा अख्तियार है। अगर आप होशियार हैं, तो उसे लेकर फायदा उठाएंगे, नहीं इधर-उधर के धक्के खाएंगे। आपके ऊपर गुनाह बेलज्जत की मसल सादिक आयेगी। इसके सिवा हम आपसे और कुछ नहीं चाहते । हलफ से कहता हूँ, हर एक चीज जिसकी आपको ख्वाहिश हो, यहां हाजिर कर दी जाएगी, लेकिन जब तक मुकदमा खत्म हो जाए, आप आजाद नहीं हो सकते।

रमानाथ ने दीनता के साथ पूछा-सैर करने तो जा सकेगा, या वह भी नहीं?

इंस्पेक्टर ने सूत्र रूप से कहा-जी नहीं !

दारोगा ने उस सूत्र की व्याख्या की—आपको वह आजादी दी गई थी; पर आपने उसका [ २०२ ]
बेजा इस्तेमाल किया। जब तक इसका इत्मीनान न हो जाय कि आप उसको जायज इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं, आप उस हक से महरूम रहेंगे।

दारोगा ने इंस्पेक्टर की तरफ देखकर मानो इस व्याख्या की दाद देनी चाही, जो उन्हें सहर्ष मिल गई।

तीनों अफसर रुखसत हो गए और रमा एक सिगार जलाकर इस विकट परिस्थिति पर विचार करने लगा।

छियालीस


एक महीना और निकल गया। मुकदमे के हाईकोर्ट में पेश होने की तिथि नियत हो गई है। रमा के स्वभाव में फिर वही पहले की-सी भीरुता और खुशामद आ गई है। अफसरों के इशारे पर नाचता है। शराब की मात्रा पहले से बढ़ गई है, विलासिता ने मानो पंजे में दबा लिया है। कभी कभी उसके कमरे में एक वेश्या जोहरा भी आ जाती है, जिसका गाना वह बड़े शौक से सुनता है।

एक दिन उसने बड़ी हसरत के साथ जोहरा से कहा-मैं डरता हूं, कहीं तुमसे प्रेम न बढ़ जाय। उसका नतीजा इसके सिवा और क्या होगा कि रो-रोकर जिंदगी काटूं। तुमसे वफा की उम्मीद और क्या हो सकती है। जोहरा दिल में खुश होकर अपनी बड़ी-बड़ी रतनारी आंखों से उसकी ओर ताकती हुई बोली-हां साहब, हम वफा क्या जानें, आखिर वेश्या ही तो ठहरी। बेवफा वेश्या भी कहीं वफादार हो सकती है?

रमा ने आपत्ति करके पूछा-क्या इसमें कोई शक है?

जोहरा-नहीं, जरा भी नहीं। आप लोग हमारे पास मुहब्बत से लबालब भरे दिल लेकर आते हैं, पर हम उसकी जरा भी कद्र नहीं करतीं। यही बात है न?

रमानाथ-बेशक।

जोहरा-मुआफ कीजिएगा, आप मरदों की तरफदारी कर रहे हैं। हक यह है कि वहां आप लोग दिल-बहलाव के लिए जाते हैं, महज गम गलत करने के लिए, महज आनंद उठाने के लिए। जब आपको वफा की तलाश ही नहीं होती, तो वह मिले क्यों कर? लेकिन इतना मैं जानती हूं कि हममें जितनी बेचारियां मरदों की बेवफाई से निरास होकर अपना आराम-चैन खो बैठती हैं, उनका पता अगर दुनिया को चले, तो आंखें खुल जायं। यह हमारी भूल है कि तमाशबीनों से वफा चाहते हैं, चील के घोंसले में मांस ढूंढते हैं, पर प्यासा आदमी अंधे कुएं की तरफ दौड़े, तो मेरे खयाल में उसका कोई कसूर नहीं।

उस दिन रात को चलते वक्त जोहरा ने दारोगा को खुशखबरी दी, आज तो हजरत खूब मजे में आए। खुदा ने चाहा तो दो-चार दिन के बाद बीवी का नाम भी न लें।

दारोगा ने खुश होकर कहा-इसीलिए तो तुम्हें बुलाया था। मजा तो जब है कि बीवी यहां