प्रेमाश्रम

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प्रेमाश्रम  (1919) 
द्वारा प्रेमचंद

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श्री प्रेमचंद

जन्म बनारस के पास लमही मे १८८० ई० मे। असली नाम श्री धनपतराय। आठ वर्ष की आयु मे माता और चौदह में पिता का निधन हो गया। अपने बल-बूते पर पढे। बी० ए० किया। १९०१ मे उपन्यास लिखना शुरू किया । कहानी १९०७ से। लिखने लगे। उर्दू मै नवावराय के नाम से लिखते थे। १९१० मे सोजेवतन जब्त की गयी, उसके बाद प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे। १९२० तक सरकारी नौकरी की। फिर सत्याग्रह से प्रभावित हो नौकरी छोड दी । १९२३ मे सरस्वती प्रेम और १९३० मे हस' की स्थापना की। ८ अक्तूबर १९३६ को निधन हुआ।

प्रेमाश्रम का रचना काल-१९१८-१९ ई० [  ]




प्रेमाश्रम





प्रेमचंद






सरस्वती प्रेस
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© सरस्वती प्रेस, इलाहाबाद

वर्तमान संस्करण १९७९





मूल्य- 50.00





मुद्रक.- प्रमात अफसेट प्रेस, दरिया गज विल्ली-2.'

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प्रेमा श्रम





रचना काल : १९१८-१९ ई०

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प्रेमाश्रम

सध्या हो गयी है। दिन भर के थके-मांँदे बैल खेत से,आ गये है। घरो से धुएंँ के काले बादल उठने लगे। लखनपुर मे आज परगने के हाकिम की परताल थी। गाँव के नेतागण दिन भर उनके घोडे के पीछे-पीछे दौड़ते रहे थे। इस समय वह अलाव के पास बैठे हुए नारियल पी रहे है और हाकिमो के चरित्र पर अपना-अपना मत प्रकट कर रहे है। लखनपुर बनारस नगर से बारह मील पर उत्तर की ओर एक बडा गाँव है। यहाँ अधिकाश कुर्मी और ठाकुरो की बस्ती है, दो-चार घर अन्य जातियो के भी है।

मनोहर ने कहा, भाई हाकिम तो अंँगरेज, अगर यह न होते तो इस देशवाले हाकिम हम लोगो को पीस कर पी जाते।

दुखरन भगत ने इस कथन का समर्थन किया--जैसा उनका अकबाल है, वैसा ही नारायण ने स्वभाव भी दिया है। न्याय करना यही जानते है, दूध का दूध और पानी का पानी, घूस-रिसवत से कुछ मतलब नहीं। आज छोटे साहब को देखो, मुंँह-अंधेरे घोडे पर सवार हो गये और दिन भर परताल की। तहसीलदार, पेसकार, कानूनगोय एक भी उनके साथ नहीं पहुंँचता था।

सुक्खू कुर्मी ने कहा--यह लोग अंँगरेजो की क्या बराबरी करेंगे? बस खाली गाली देना और इजलास पर गरजना जानते है। घर से तो निकलते ही नहीं। जो कुछ चपरासी या पटवारी ने कह दिया, वही मान गये। दिन भर पडे-पडे आलसी हो जाते हैं।

मनोहर--सुनते है अंँगरेज लोग घी नहीं खाते।

सुक्खू–-धी क्यो नही खाते? बिना घी-दूध के इतना बूता कहाँ से होगा वह मसक्कत करते हैं, इसी से उन्हे घी-दूध पच जाता है। हमारे देशी हाकिम खाते तो बहुत हैं पर खाट पर पड़े रहते है। इसी से उनका पेट बढ जाता है।

दुखरन भगत--तहसीलदार साहब तो ऐसे मालूम होते है जैसे कोहू। अभी पहले आये थे तो कैसे दुबले-पतले थे, लेकिन दो ही साल में उन्हे न जाने कहाँ की मोटाई लग गयी।

सुक्खू--रिसवत का पैसा देह फुला देता है।

मनोहर--यह कहने की बात है। तहसीलदार एक पैसा भी नहीं लेते।

सुक्खू--बिना हराम की कौडी खाये देह फूल ही नहीं सकती। [  ]

मनोहर ने हंस कर कहा--पटवारी की देह क्यो नही फूल जाती, चुचके आम बने हुए है।

सुक्खू-–पटवारी सैकडे-हजार की गठरी थोडे ही उड़ाता है। जब बहुत दांँव-पेच किया तो दो-चार रुपये मिल गये । उसकी तनकाह तो कानूनगोय ले लेते है । इसी छीनझपट पर निर्वाह करता है, तो देह कहाँ से फूलेगी? तकावी मे देखा नहीं, तहसीलदार माहब ने हजारो पर हाथ फेर दिया।

दुखरन--कहते हैं कि विद्या से आदमी की बुद्धि ठीक हो जाती है, पर यहाँ उलटा ही देखने में आता है। यह हाकिम और अमले तो पडे-लिखे विद्वान होते है, लेकिन किसी को दया-धर्म का विचार नहीं होता।

मुक्खू--जब देश के अभाग आते हैं तो सभी बाते उलटी हो जाती है। जब बीमार के मरने के दिन आ जाते है तो औषधि भी औगुन करती है।

मनोहर--हमी लोग तो रिसवत दे कर उनकी आदत बिगाड़ देते है। हम न दें तो वह कैसे पाये। बुरे तो हम हैं। लेने वाला मिलता हुआ धन थोडे ही छोड देगा? यहाँ तो आपस मे ही एक दूसरे को खाये जाते है। तुम हमे लूटने को तैयार, हम तुम्हे लूटने को तैयार! इसका और क्या फल होगा?

दुखरन--अरे तो हम मूरख, गँवार, अपढ़ है। वह लोग तो विद्यावान है। उन्हे न सोचना चाहिए कि यह गरीब लोग हमारे ही भाई बद है। हमे भगवान ने विद्या दी है, तो इन पर निगाह रखे। इन विद्यावानो से तो हम मूरख ही अच्छे। अन्याय सह लेना अन्याय करने से तो अच्छा है।

सुक्खू --यह विद्या का दोष नही, देश का अभाग है।

मनोहर-- विद्या का दोष है, न देश का अभाग; यह हमारी फूट का फल है। सब अपना दोष है। विद्या से और कुछ नहीं होता तो दूसरो का धन ऐठना तो आ जाता है । मूरख रहने से तो अपना धन गंँवाना पडता है।

सुक्खू --हाँ, तुमने यह ठीक कहा कि विद्या से दूसरो का धन लेना आ जाता है। हमारे बडे सरकार जब तक रहे दो साल की मालगुजारी बाकी पड़ जाती थी, तब भी डाँट-डपट कर छोड़ देते थे। छोटे सरकार जब से मालिक हुए है, देखते हो, कैमा उपद्रव कर रहे हैं। रात-दिन जाफा, बेदखली, अखराज की धूम मची हुई है !

दुखरन--कारिंदा साहब कल कहते थे कि अव की इस गांँव की बारी है, देखो क्या होता है?

मनोहर--होगा क्या, तुम हमारे खेत पर चढोगें, हम तुम्हारे खेत पर चढेगे, छोटे सरकार की चाँदी होगी। सरकार की आँखे तो तब खुलती जब कोई किसी के खेत पर दांँव न लगाता। सब कौल कर लेते। लेकिन यह कहाँ होनेवाला है। सव से पहले तो सुक्खू महतो दौडेंगे।

सुक्खू--कौन कहे कि मनोहर न दौड़ेगे।

मनोहर--मुझसे चाहे गगाजली उठवा लो, मैं खेत पर न जाऊँगा और जाऊँगा [  ]

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प्रेमाश्रम

कैसे, कुछ घर मे पूंँजी भी तो हो। अभी रब्बी मे महीनो की देर है और घर में अनाज का दाना नहीं है। गुड एक सौ रुपये से कुछ ऊपर ही हुआ है, लेकिन बैल बैठाऊँ हो गया है, डेढ़ सौ लगेगे तब कही एक बैल आयेगा।

दुखरन--क्या जाने क्या हो गया कि अब खेती मे बरक्कत ही नहीं रही। पॉच बीघे रवी बोयी थी, लेकिन दस मन की भी आशा नही है और गुड का तुम जानते ही हो,जो हाल हुआ। कोल्हाडे मे ही बिसेसर साह ने तौला लिया। बाल-बच्चो के लिए शीरा तक न बचा। देखें भगवान कैसे पार लगाते है।

अभी यही बातें हो रही थी कि गिरधर महाराज आते हुए दिखायी दिये। लम्बा डील था, भरा हुमा बदन, तनी हुई छाती, सिर पर एक पगडी, वदन पर एक चुस्त मिरजई। मोटा-सा लट्ठ कधे पर रखे हुए थे। उन्हे देखते ही सब लोग माँचो से उतर कर जमीन पर बैठ गये। यह महाशय जमीदार के चपरासी थे। जवान से सबके दोस्त, दिल से सब के दुश्मन थे। जमीदार के सामने जमीदार की-सी कहते थे, असामियो के सामने असामियो की-सी। इसलिए उनके पीठ पीछे लोग चाहे उनकी कितनी ही बुराइयांँ करें, मुंँह पर कोई कुछ न कहता था।

सुक्खू ने पूछा--कहो महाराज किधर से?

गिरधर ने इस ढग से कहा, मानो वह जीवन से असतुष्ट है-- किधर से वतायें, ज्ञान बाबू के मारे नाको दम है ! अब हुकुम हुआ है कि असामियो को धी के लिए रुपये दे दो। रुपये सेर का भाव कटेगा। दिन भर दौडते हो गया।

मनोहर--कितने का घी मिला?

गिरधार--अभी तो खाली रुपया बांट रहे है। बड़े सरकार की बरसी होनेवाली है। उसी की तैयारी है। आज कोई ५० रुपये बाँटे है।

मनोहर--लेकिन बाजार-भाव तो दस छटांँक का है।

गिरधर--भाई, हम तो हुक्म के गुलाम है। बाजार मे छटांँक भर बिके, हमको तो सेर भर लेने का हुक्म है। इस गांँव मे भी ५० रुपये देने हैं। बोलो सुक्खू महतो, कितना लेते हो?

सुक्खू ने सिर नीचा करके कहा, जितना चाहे दे दो, तुम्हारी जमीन मै बसे हुए है, भाग के कहाँ जायेगे?

गिरधर--तुम बड़े असामी हो । भला दस रुपये तो लो और दुखरन भगत, तुम्हे कितना है?

दुखरन--हमे भी पांँच रुपये दे दो।

मनोहर--मेरे घर तो एक ही भैस लगती है, उसका दूध वाल-बच्चो मे उठ जाता है, घी होता ही नहीं। अगर गाँव मे कोई कह दे कि मैने एक पैसे का भी घी बेचा है तो ५० रुपये लेने पर तैयार हूँ।

गिरधर--अरे क्या ५ रुपये भी न लोगे। भला भगत के बराबर तो हो जाओ।

मनोहर--भगत के घर मे भैस लगती है, पी बिकता है, वह जितना चाहे ले लें। [  ]

१२
प्रेमा‌श्रम

मैं रुपये ले लूंँ तो मुझे बाजार से दस छटॉक का मोल ले कर देना पड़ेगा।

गिरधर--जो चाहो करो, पर सरकार का हुक्म तो मानना ही पडेगा। लालगज में ३० रुपये दे आया हूँ। वहाँ गाँव मे एक भैस भी नहीं है। लोग बाजार से ही ले कर देगे। पडाव मे २० रुपये दिये है। वहाँ भी जानते हो किसी के भैस नही है।

मनोहर--भैस न होगी तो पास रुपये होगे। यहाँ तो गाँठ मे कौडी भी नहीं है।

गिरघर--जब जमीदार को जमीन जोतते हो तो उसके हुक्म के बाहर नहीं जा सकते।

मनोहर--जमीन कोई खैरात जोतते है। उसका लगान देते है। एक किस्त भी बाकी पड़ जाये तो नालिस होती है।

गिरधर--मनोहर, घी तो तुम दोगे दौडते हुए, पर चार बाते सुन कर। जमीदार के गाँव मे रहकर उससे हेकडी नही चल सकती। अभी कारिंदा साहबे बुलायेगे तो रुपये भी दोगे, हाथ-पैर भी पढोगे, मैं सीधे-सीधे कहता हूँ तो तेवर बदलते हो।

मनोहर ने गर्म हो कर कहा--कारिंदा कोई काटू है न जमीदार कोई हौवा है। यहाँ कोई दबेल नहीं है। जब कौडी-कौडी लगान चुकाते है तो धौस क्यो सहे? ।

गिरधर --सरकार को अभी जानते नहीं हो। बड़े सरकार का जमाना अब नही है। इनके चगुल मे एक बार आ जायोगे तो निकलते न बनेगा।

मनोहर की कोषाग्नि और भी प्रचड हुई। बोला, अच्छा जाओ, तोप पर उडवा देना। गिरधर महाराज उठ खडे हुए। सुक्खू और दुसरन ने अब मनोहर के साथ बैना उचित न समझा। वह भी गिरवर के साथ चले गये। मनोहर ने इन दोनो आदमियो को तीव्र दृष्टि से देखा और नारियल पीने लगा।

लखनपुर के जमीदारो का मकान काशी मे औरगाबाद के निकट या। मकान के दो खड आमने-सामने बने हुए थे। एक जनाना मकान था, दूसरी मरदानी बैठक। दोनो बडो के बीच की जमीन वेल-बूटे से सजी हुई थी, दोनो ओर ऊंँची दीवारे खीची हुई थी, लेकिन दोनो ही बड जगह-जगह टूट-फूट गये थे। कही कोई कडी टूट गयी थी और उसे थूनियो के सहारे रोका गया था, कही दीवार फट गयी थी और कही छन फँस पडी थी--एक वृद्ध रोगी की तरह जो लाठी के सहारे चलता हो। किसी समय यह परिवार नगर मे बहुत प्रतिष्ठित था, किन्तु ऐश्वर्य के अभिमान और कुल-मर्यादा-पालन ने उसे धीरे-धीरे इतना गिरा दिया कि अब मोहल्ले का वनिया पैसे-धेले की चीज भी उनके नाम पर उधार न देता था। लाला जटाशकर मरते-मरते मर गये, पर जब घर से निकले तो पालकी पर। लड़के-लडकियो के विवाह किये तो हौसले से। कोई उत्सव आता तो हृदय सरिता की भांँति उमड़ आता था, कोई मेहमान आ जाता तो उसे सर-आँखो पर बैठाते, साघु-सत्कार और अतिथि सेवा में उन्हे हार्दिक आनद होता था। इसी मर्यादा-रक्षा में जायदाद का बडा भाग बिक गया, कुछ रेहन हो गया [ १० ]

प्रेमाश्रम १३

और अब लखनपुर के सिवा चार और छोटे-छोटे गॉव रह गये थे जिनसे कोई चार हजार वार्षिक लाभ होता था।

लाला जटाशकर के एक छोटे भाई थे। उनका नाम प्रभाशकर था। यही सियाह और सफेद के मालिक थे। बडे लाला साव को अपनी भागवत और गीता से परमा-नुराग था। घर का प्रबध छोटे भाई के ही हाथो में था। दोनो भाइयो मे इतना प्रेम था कि उनके बीच मे कभी कटु वाक्यो की नौबत न भायी थी। स्त्रियो मे तू-तू, मैं-मै होती थी, किंतु भाइयो पर इसका असर न पड़ता था। प्रभाशकर स्वय कितना ही कष्ट उठाये अपने भाई से कभी भूल कर शिकायत न करते थे। जटाशकर भी उनके किसी काम मे हस्तक्षेप न करते थे।

लाला जटाशकर का एक साल पूर्व देहात हो गया था। उनकी स्त्री उनके पहले ही मर चुकी थी। उनके दो पुत्र थे, प्रेमशकर और ज्ञानशकर। दोनो के विवाह हो चुके थे। प्रेमशकर चार-पांँच वर्षों से लापता थे। उनकी पत्नी श्रद्धा घर में पड़ी उनके नाम को रोया करती थी। ज्ञानशकर ने गत वर्ष बी० ए० की उपाधि प्राप्त की थी और इस समय हारमोनियम बजाने मे मग्न रहते थे। उनके एक पुत्र था, मायाशकर। लाला प्रभाशकर की स्त्री जीवित थी। उनके तीन बेटे और दो बेटियौ । बड़े बेटे दयाशकर सब-इन्स्पेक्टर थे। विवाह हो चुका था। बाकी दोनो लडके अभी मदरसे में अँगरेजी पढ़ते थे। दोनो पुत्रियाँ भी कुंँवारी थी।

प्रेमशकर ने वी० ए० की डिग्री लेने के बाद अमेरिका जा कर आगे पढने की इच्छा की थी, पर जब अपने चाचा को इसका विरोध करते देखा तो एक दिन चुपके से भाग निकले। घरवालो से पत्र-व्यवहार करना भी बद कर दिया। उनके पीछे ज्ञानशकर ने बाप और चाचा से लडाई ठानी। उनकी फजूलम्बचियो की आलोचना किया करते। कहते, क्या आप लोग हमारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ जायेगे? क्या आपकी यही इच्छा है कि हम रोटियो को मोहताज हो जायें ? किन्तु इसका जवाब यही मिलता, भाई हम लोग तो जिस प्रकार अब तक निभाते आये है उसी प्रकार निभायेगे। यदि तुम इससे उत्तम प्रबध कर सकते हो तो करो, जरा हम भी देखे । ज्ञानशकर उस समय कालेज मे थे, यह चुनौती सुन कर चुप हो जाते थे। पर जब से वह डिग्री ले कर आये थे और इधर उनके पिता का देहात हो चुका था, उन्होने घर के प्रवध मे सशोधन करने का यत्न करना शुरू किया था, जिसका फल यह हुआ था कि उस मेल-मिलाप मे बहुत कुछ अतर पड चुका था, जो पिछले साठ वर्षों से चला आता था । न चाचा का प्रबध भतीजे को पसद था, न भतीजे का चाचा को। आये दिन शाब्दिक सग्राम होते रहते । ज्ञानशकर कहते, आपने सारी जायदाद चौपट कर दी, हम लोगो को कही का न रखा। सारा जीवन खाट पर पड़े-पडे पूर्वजो की कमाई खाने मे काट दिया । मर्यादा-रक्षा की तारीफ तो तब थी जब अपने बाहुबल से कुछ करने, या जायदाद को बचा कर करते। घर बैच कर तमाशा देखना कोन-सा मुश्किल काम हे ? लाला प्रभाशकर यह कटु वाक्य सुन कर अपने भाई को याद करते और उनका नाम ले कर रोने लगते । यह चोटे उनसे सही न जाती थी।


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