रंगभूमि/१४

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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सोफिया को होश आया, तो वह अपने कमरे में चारपाई पर पड़ी हुई थी। उसके कानों में रानी के अंतिम शब्द गूंज रहे थे-"क्या यही सत्य की मीमांसा है?" वह अपने को इस समय इतनी नीच समझ रही थी कि घर का मेहतर भी उसे गालियाँ देता, तो शायद सिर न उठाती। वह वासना के हाथों इतनी परास्त हो चुकी थी कि अब उसे अपने सँभलने की कोई आशा न दिखाई देती थी। उसे भय होता था कि मेरा मन मुझसे वह सब कुछ करा सकता है, जिसकी कल्पना-मात्र से मनुष्य का सिर लज्जा से झुक जाता है। मैं दूसरों पर कितना हँसती थी, अपनी धार्मिक प्रवृत्ति पर कितना अभिमान करती थी, मैं पुनर्जन्म और मुक्ति-पुरुष और प्रकृति-जैसे गहन विषयों पर विचार करती थी, और दूसरों को इच्छा तथा स्वार्थ का दास समझकर उनका अनादर करती थी, मैं समझती थी, परमात्मा के समीप पहुँच गई हूँ, संसार की उपेक्षा करके अपने को जीवन्मुक्त समझ रही थी; पर आज मेरी सद्भक्ति का परदा फास हो गया। आह! विनय को ये बातें मालूम होंगी, तो वह अपने मन में क्या समझेंगे? कदाचित् मैं उनकी निगाहों में इतनी गिर जाऊँगी कि वह मुझसे बोलना भी पसंद न करें। मैं अभागिनी हूँ, मैंने उन्हें बदनाम किया, अपने कुल को कलंकित किया, अपनी आत्मा की हत्या की, अपने आश्रय-दाताओं की उदारता को कलुषित किया। मेरे कारण धर्म भी बदनाम हो गया, नहीं तो क्या आज मुझसे यह पछा जाता-"क्या यही सत्य की मीमांसा है?"

उसने सिरहाने की ओर देखा। अलमारियों पर धर्म-ग्रन्थ सजे हुए रखे थे। उन ग्रन्थों की ओर ताकने की उसकी हिम्मत न पड़ी। यही मेरे स्वाध्याय का फल है! मैं सत्य की मीमांसा करने चली थी और इस बुरी तरह गिरी कि अब उठना कठिन है।

सामने दीवार पर बुद्ध भगवान् का चित्र लटक रहा था। उनके मुख पर कितना तेज था। सोफिया की आँखें झुक गई। उनकी ओर ताकते हुए उसे लज्जा आती थी। बुद्ध के अमरत्व का उसे कभी इतना पूर्ण विश्वास न हुआ था। अंधकार में लकड़ी का कुंदा भी सजीव हो जाता है। सोफो के हृदय पर ऐसा ही अंधकार छाया हुआ था।

अभी नौ बजे का समय था, पर सोफिया को भ्रम हो रहा था कि संध्या हो रही है। वह सोचती थी—क्या मैं सारे दिन सोती रह गई, किसी ने मुझे जगाया भी नहीं! कोई क्यों जगाने लगा? यहाँ अब मेरी परवा किसे है, ओर क्यों हो! मैं कुलक्षणा हूँ, मेरी जात से किसी का उपकार न होगा, जहाँ रहूँगी, वहीं आग लगाऊँगी। मैंने बुरी साइत में इस घर में पाँव रखे थे। मेरे हाथों यह घर वीरान हो जायगा, मैं विनय को अपने साथ डुबो दूँगी, माता का शाप अवश्य पड़ेगा। भगवन्, आज मेरे मन में ऐसे विचार क्यों आ रहे हैं?

सहसा मिसेज सेवक कमरे में दाखिल हुई। उन्हें देखते ही सोफया को अपने हृदय
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में एक जलोद्गार-सा उठता हुआ जान पड़ा। वह दौड़कर माता के गले से लिपट गई। यही अब उसका अंतिम आश्रय था। यहीं अब उसे वह सहानुभूति मिल सकती थी, जिसके बिना उसका जीना दूभर था; यहीं अब उसे वह विश्राम, वह शांति, वह छाया मिल सकती थी, जिसके लिए उसकी संतप्त आत्मा तड़प रही थी। माता की गोद के सिवा यह सुख-स्वर्ग और कहाँ है? माता के सिवा कौन उसे छाती से लगा सकता है, कौन उसके दिल पर मरहम रख सकता है? माँ के कटु शब्द और उसका निष्ठुर व्यवहार, सब कुछ इस सुख-लालसा के आवेग में विलुप्त हो गया। उसे ऐसा जान पड़ा, ईश्वर ने मेरी दीनता पर तरस खाकर मामा को यहाँ भेजा है। माता की गोद में अपना व्यथित मस्तक रखकर एक बार फिर उसे उस बल और धैर्य का अनुभव हुआ, जिसकी याद अभी तक दिल से न मिटी थी। वह फूट-फूट रोने लगी। लेकिन माता की आँखों में आँसू न थे। वह तो मिस्टर क्लार्क के निमंत्रण का सुख-संवाद सुनाने के लिए अधीर हो रही थीं। ज्यों ही सोफिया के आँसू थमे, मिसेज सेवक ने कहा-"आज तुम्हें मेरे साथ चलना होगा। मिस्टर क्लार्क ने तुम्हे अपने यहाँ निमंत्रित किया है।"

सोफिया ने कुछ उत्तर न दिया। उसे माता की यह बात भद्दी मालूम हुई।

मिसेज सेवक ने फिर कहा-"जब से तुम यहाँ आई हो, वह कई बार तुम्हारा कुशल-समाचार पूछ चुके हैं। जब मिलते हैं, तुम्हारी चर्चा जरूर करते हैं। ऐसा सज्जन सिविलियन मैंने नहीं देखा। उनका विवाह किसी अँगरेज के खानदान में हो सकता है, और यह तुम्हारा सौभाग्य है कि वह अभी तक तुम्हें याद करते हैं।"

सोफिया ने घृणा से मुँह फेर लिया। माता की सम्मान-लोलुपता असह्य थी। न मुहब्बत की बातें हैं, न आश्वासन के शब्द, न ममता के उद्गार। कदाचित् प्रभु मसीह ने भी निमंत्रित किया होता, तो वह इतनी प्रसन्न न होतीं। मिसेज सेवक बोलीं-"अब तुम्हें इनकार न करना चाहिए। विलंब से प्रेम ठंडा हो जाता है और फिर उस पर कोई चोट नहीं पड़ सकती। ऐसा स्वर्ण-सुयोग फिर न हाथ आयेगा। एक विद्वान् ने कहा है-'प्रत्येक प्राणी को जीवन में केवल एक बार अपने भाग्य की परीक्षा का अवसर मिलता है, और वही भविष्य का निर्णय कर देता है।" तुम्हारे जीवन में यह वही अवसर है। इसे छोड़ दिया, तो फिर हमेशा पछताओगी।"

सोफिया ने व्यथित होकर कहा—"अगर मिस्टर क्लार्क ने मुझे निमंत्रित न किया होता, तो शायद आप मुझे याद भी न करतीं!”

मिसेज सेवक ने अवरुद्ध कंठ से कहा—"मेरे मन में जो कुछ है, वह तो ईश्वर ही जनता है; पर ऐसा कोई दिन नहीं जाता कि मैं तुम्हारे और प्रभु के लिए ईश्वर से प्रार्थना न करती होऊँ। यह उन्हीं प्रार्थनाओं का शुभ फल है कि तुम्हें यह अवसर मिला है।"

यह कहकर मिसेज सेवक जाह्नवी से मिलने गई। रानी ने उनका विशेष आदर न किया। अपनी जगह पर बैठे-बैठे बोली—"आपके दर्शन तो बहुत दिनों के बाद हुए।" [ १७१ ]मिसेज सेवक ने सूखी हँसी हँसकर कहा—“अभी मेरी वापसी की मुलाकात आपके जिम्मे बाकी है।"

रानी—“आप मुझसे मिलने आई ही कब? पहले भी सोफिया से मिलने आई थीं, और आज भी। मैं तो आज आपको एक खत लिखनेवाली थी, अगर बुरा न मानिए, तो एक बात पूछूँ?"

मिसेज सेवक—"पूछिए, बुरा क्यों मानूँगी।"

रानी-“मिस सोफिया की उम्र तो ज्यादा हो गई, आपने उसकी शादी की कोई फिक्र की या नहीं? अब तो उसका जितनी जल्दी विवाह हो जाय, उतना ही अच्छा। आप लोगों में लड़कियाँ बहुत सयानी होने पर ब्याही जाती हैं।"

मिसेज सेबक-"इसकी शादी कब की हो गई होती, कई अँगरेज बेतरह पीछे पड़े, लेकिन यह राजी ही नहीं होती। इसे धर्म-ग्रंथों से इतनी रुचि है कि विवाह को जंजाल समझती है। आजकल जिलाधीश मिस्टर क्लार्क के पैगाम आ रहे हैं। देखूँ, अब भी राजी होती है या नहीं। आज मैं उसे ले जाने ही के इरादे से आई हूँ। मैं हिंदोस्तानी ईसाइयों से नाते नहीं जोड़ना चाहती। उनका रहन-सहन मुझे पसंद नहीं है, और सोफी-जैसी सुशिक्षिता लड़की के लिए कोई अँगरेज पति मिलने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती।"

जाह्नवी-“मेरे विचार में विवाह सदैव अपने स्त्रजातियों में करना चाहिए। योरपियन लोग हिंदुस्थानी ईसाइयों का बहुत आदर नहीं करते, और अनमेल विवाहों का परिणाम अच्छा नहीं होता।"

मिसेज सेवक—(गर्व के साथ) “ऐसा कोई योरपियन नहीं है, जो मेरे खानदान में विवाह करना मर्यादा के विरुद्ध समझे। हम और वे एक हैं। हम और वे एक ही खुदा को मानते हैं, एक ही गिरजा में प्रार्थना करते हैं और एक ही नबी के अनुचर हैं। हमारा और उनका रहन-सहन, खान-पान, रीति-व्यवहार एक है। यहाँ अँगरेजों के समाज में, क्लब में, दावतों में हमारा एक-सा सम्मान होता है। अभी तीन-चार दिन हुए, लड़कियों को इनाम देने का जलसा था। मिस्टर क्लार्क ने खुद मुझे उस जलसे का प्रधान बनाया और मैंने ही इनाम बाँटे। किसी हिंदू या मुसलमान लेडी को यह सम्मान न प्राप्त हो सकता था।"

रानी-"हिंदू या मुसलमान, जिन्हें कुछ भी अपने जातीय गौरव का खयाल है, अँगरेजों के साथ मिलना-जुलना अपने लिए सम्मान की बात नहीं समझते। यहाँ तक कि हिंदुओं में जो लोग अँगरेजों से खान-पान रखते हैं, उन्हें लोग अपमान की दृष्टि से देखते हैं, शादी-विवाह का तो कहना ही क्या! राजनीतिक प्रभुत्व की बात और है। डाकुओं का एक दल विद्वानों की एक सभा को बहुत आसानी से परास्त कर सकता है। लेकिन इससे विद्वानों का महत्त्व कुछ कम नहीं होता। प्रत्येक हिंदू जानता है कि मसीह बौद्धकाल में यहाँ आये थे, यहीं उनकी शिक्षा हुई थी और जो ज्ञान उन्होंने यहाँ प्राप्त किया, उसी का पच्छिम में प्रचार किया। फिर कैसे हो सकता है कि हिंदू अँगरेजों को श्रेष्ठ समझे?” [ १७२ ]
दोनों महिलाओं में इसी तरह नोक-झोंक होती रही। दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहती थीं; दोनों एक दूसरे के मनोभावों को समझती थीं। कृतज्ञता या धन्यवाद के शब्द किसी के मुँह से न निकले। यहाँ तक कि जब मिसेज सेवक बिदा होने लगी, तो रानी उनको पहुँचाने के लिए कमरे के द्वार तक भी न आई। अपनी जगह पर बैठे-बैठे हाथ बढ़ा दिया और अभी मिसेज सेवक कमरे ही में थीं कि अपना समाचार-पत्र पढ़ने लगीं।

मिसेज सेवक सोफिया के पास आई, तो वह तैयार थी। किताबों के गट्ठर बँधे हुए थे। कई दासियाँ इधर-उधर इनाम के लालच में खड़ी थीं। मन में प्रसन्न थीं, किसी तरह यह बला टली। सोफिया बहुत उदास थी। इस घर को छोड़ते हुए उसे दुःख हो रहा था। उसे अपने उद्दिष्ट स्थान का पता न था। उसे कुछ मालूम न था कि तकदीर कहाँ ले जायगी, क्या-क्या विपत्तियाँ झेलनी पड़ेंगी, जीवन-नौका किस घाट लगेगी। उसे ऐसा मालूम हो रहा था कि विनय सिंह से फिर न मुलाकात होगी, उनसे सदा के लिए बिछुड़ रही हूँ। रानी की अपमान-भरी बातें, उनकी भर्त्सना और अपनी भ्रांति, सब कुछ भूल गई। हृदय के एक-एक तार से यही ध्वनि निकल रही थी-"अब विनय से फिर भेंट न होगी।"

मिसेज सेवक बोलीं-"कुँवर साहब से भी मिल लूँ।"

सोफिया डर रही थी कि कहीं मामा को रात की घटना की खबर न मिल जाय, कुँवर साहब कहीं दिल्लगी-ही-दिल्लगी में कह न डाले। बोली-"उनसे मिलने में देर होगी, फिर मिल लीजिएगा।"

मिसेज सेवक-"फिर किसे इतनी फुर्सत है!"

दोनों कुँवर साहब के दीवानखाने पहुँची। यहाँ इस वक्त स्वयंसेवकों की भीड़ लगी हुई थी। गढ़वाल-प्रांत में दुर्भिक्ष का प्रकोप था। न अन्न था, न जल। जानवर मरे जाते थे, पर मनुष्यों को मौत भी न आती थी; एड़ियाँ रगड़ते थे, सिमकते थे। यहाँ से पचास स्वयंसेवकों का एक दल पीड़ितों का कष्ट निवारण करने के लिए जाने वाला था। कुँवर साहब इस वक्त उन लोगों को छाँट रहे थे; उन्हें जरूरी बातें समझा रहे थे। डॉक्टर गंगुली ने इस वृद्धावस्था में भी इस दल का नेतृत्व स्वीकार कर लिया था। दोनों आदमी इतने व्यस्त थे कि मिसेज सेवक की ओर किसी ने ध्यान न दिया। आखिर वह बोलीं-"डॉक्टर साहब, आपका कब जाने का विचार है?"

कुँवर साहब ने मिसेज सेवक की तरफ देखा और बड़े तपाक से आगे बढ़कर हाथ मिलाया, कुशल-समाचार पूछा और ले जाकर एक कुर्सी पर बैठा दिया। सोफिया माँ के पीछे जाकर खड़ी हो गई।

कुँवर साहब—"ये लोग गढ़वाल जा रहे हैं। आपने पत्रों में देखा होगा, वहाँ लोगों पर कितना घोर संकट पड़ा हुआ है!” [ १७३ ]मिसेज सेवक-"खुदा इन लोगों का उद्योग सफल करे। इनके त्याग को जितनी प्रशंसा की जाय, कम है। मैं देखती हूँ, यहाँ इनकी खासी तादाद है।"

कुँवर साहब-"मुझे इतनी आशा न थी, विनय की बातों पर विश्वास न होता था, सोचता था, इतने वालंटियर कहाँ मिलेंगे। सभी को नवयुवकों के निरुत्साह का रोना रोते हुए देखता था। इनमें जोश नहीं है, त्याग नहीं है, जान नहीं है, सब अपने स्वार्थ-चिंतन में मतवाले हो रहे हैं। कितनी ही सेवा-समितियाँ स्थापित हुई; पर एक भी पनप न सकी। लेकिन अब मुझे अनुभव हो रहा है कि लोगों को हमारे नवयुवकों के विषय में कितना भ्रम हुआ था। अब तक तीन सौ नाम दर्ज हो चुके हैं। कुछ लोगों ने आजीवन सेवा-धर्म पालन करने का व्रत लिया है। इनमें कई आदमी तो हजारों रुपये माहवार की आय पर लात मारकर आये हैं। इन लोगों का सत्साहस देखकर मैं बहुत आशावादी हो गया हूँ।"

मिसेज सेवक-"मिस्टर क्लार्क कल आपकी बहुत प्रशंसा कर रहे थे। ईश्वर ने चाहा, तो आप शीघ्र ही सी० आई० ई० होंगे और मुझे आपको बधाई देने का अवसर मिलेगा।"

कुँवर साहब- (लजाते हुए) "मैं इस सम्मान के योग्य नहीं हूँ। मिस्टर क्लार्क मुझे इस योग्य समझते हैं, तो वह उनकी कृपा-दृष्टि है। मिस सेवक, तैयार रहना, कल ३ बजे के मेल से ये लोग सिधारेंगे। प्रभु ने भी आने का वादा किया है।"

मिसेज सेवक—"सोफी तो आज घर जा रही है। (मुस्किराकर).शायद आपको जल्द ही इसका कन्यादान देना पड़े। (धीरे से) मिस्टर क्लार्क जाल फैला रहे हैं।"

सोफिया शर्म से गड़ गई। उसे अपनी माता के ओछेपन पर क्रोध आ रहा था—"इस बात का ढिंढोरा पीटने की क्या जरूरत है? क्या यह समझती हैं कि मि० क्लार्क का नाम लेने से कुँवर साहब रोब में आ जायेंगे?"

कुँवर साहब—"बड़ी खुशी की बात है। सोफी, देखो, हम लोगों को और विशेषतः अपने गरीब भाइयों को भूल न जाना। तुम्हें परमात्मा ने जितनी सहृदयता प्रदान की है, वैसा ही अच्छा अवसर भी मिल रहा है। हमारी शुभेच्छाएँ सदैव तुम्हारे साथ रहेंगी। तुम्हारे एहसान से हमारी गरदन सदा दबी रहेगी। कभी-कभी हम लोगों को याद करती रहना। मुझे पहले न मालूम था; नहीं तो आज इन्दु को अवश्य बुला भेजता। खैर देश की दशा तुम्हें मालूम है। मिस्टर क्लार्क बहुत ही होनहार आदमी हैं। एक दिन जरूर यह इस देश के किसी प्रांत के विधाता होंगे। मैं विश्वास के साथ यह भविष्यवाणी कर सकता हूँ। उस वक्त तुम अपने प्रभाव, योग्यता और अधिकार से देश को बहुत कुछ लाभ पहुँचा सकोगी। तुमने अपने स्वदेशवासियों की दशा देखी है, उनकी दरिद्रता का तुम्हें पूर्ण अनुभव है। इस अनुभव का उनकी सेवा और सुधार में सद्व्यय करना।" [ १७४ ]
सोफिया मारे शर्म के कुछ बोल न सकी। म ने कहा-"आप रानीजी को जरूर साथ लाइएगा। मैं कार्ड भेजूँगी।"

कुँवर साहब-"नहीं मिसेज सेवक, मुझे क्षमा कीजिएगा। मुझे खेद है कि मैं उस उत्सव में सम्मिलित न हो सकूँगा। मैंने व्रत कर लिया है कि राज्याधिकारियों से कोई संपर्क न रखूँगा। हाकिमों की कृपा-दृष्टि, ज्ञात या अज्ञात रूप से, हम लोगों को आत्मसेवी और निरंकुश बना देती है। मैं अपने को इस परीक्षा में नहीं डालना चाहता; क्योंकि मुझे अपने ऊपर विश्वास नहीं है। मैं अपनी जाति में राजा और प्रजा तथा छोटे और बड़े का विभेद नहीं करना चाहता। सब प्रजा हैं, राजा है वह भी प्रजा है, रंक है वह भी प्रजा है। झूठे अधिकार के गर्व से अपने सिर को नहीं फिराना चाहता।"

मिसेज सेवक-"खुदा ने आपको राजा बनाया है। राजों ही के साथ तो राजा का मेल हो सकता है। अँगरेज लोग बाबुओं को मुँह नहीं लगाते; क्योंकि इससे यहाँ के राजों का अपमान होता है।"

डॉ० गंगुली-“मिसेज सेवक, यह बहुत दिनों तक राजा रह चुका है, अब इसका जी भर गया है। मैं इसका बचपन का साथी हूँ। हम दोनों साथ-साथ पढ़ते थे। देखने में यह मुझसे छोटा मालूम होता है, पर कई साल बड़ा है।"

मिसेज सेवक-(हँसकर) "डॉक्टर के लिए यह तो कोई गर्व की बात नहीं है।"

डॉ० गंगुली-“हम दूसरों का दवा करना जानता है, अपना दवा करना नहीं जानता। कुँवर साहब उसी बखत से pessimist है। उसी pessimism ने इसकी शिक्षा में बाधा डाली। अब भी इसका वही हाल है। हाँ, अब थोड़ा फेरफार हो गया है। पहले कर्म से भी निराशावादी था और वचन से भी। अब इसके वचन और कर्म में सादृश्य नहीं है। वचन से तो अब भी pessimist है; पर काम वह करता है, जिसे कोई पक्का optimist ही कर सकता है।"

कुँबर साहब-"गंगुली, तुम मेरे साथ अन्याय कर रहे हो। मुझमें आशावादिता के गुण ही नहीं हैं। आशावादी परमात्मा का भक्त होता है, पका ज्ञानी, पूर्ण ऋषि। उसे चारों ओर परमात्मा ही की ज्योति दिखाई देती है। इसी से उसे भविष्य पर अविश्वास नहीं होता। मैं आदि से भोग-विलास का दास रहा हूँ; वह दिव्य ज्ञान न प्राप्त कर सका, जो आशावादिता की कुंजी है। मेरे लिए Pessimism के सिवा और कोई मार्ग नहीं है। मिसेज सेवक, डॉक्टर महोदय के जीवन का सार है-'आत्मोत्सर्ग।' इन पर जितनी विपत्तियाँ पड़ीं, वे किसी ऋषि को भी नास्तिक बना देती। जिस प्राणी के सात बेटे जवान हो-होकर दगा दे जायँ, पर वह अपने कर्तव्य-मार्ग से जरा भी विचलित न हो, ऐसा उदाहरण विरला ही कहीं मिलेगा। इनकी हिम्मत तो टूटना जानती ही नहीं, आपदाओं की चोटें इन्हें और भी ठोस बना देती हैं। मैं साहस-हीन, पौरुष-हीन प्राणी हूँ। मुझे यकीन नहीं आता कि कोई शासक जाति शासितों के साथ न्याय और साम्य का व्यवहार कर सकती है। मानव-चरित्र को मैं किसी देश में, किसी
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काल में, इतना निष्काम नहीं पाता। जिस राष्ट्र ने एक बार अपनी स्वाधीनता खो दी, वह फिर उस पद को नहीं पा सकता। दासता ही उसकी तकदीर हो जाती है। किंतु हमारे डॉक्टर बाबू मानव-चरित्र को इतना स्वार्थी नहीं समझते। इनका मत है कि हिंसक पशुओं के हृदय में भी अनंत ज्योति की किरणें विद्यमान रहती हैं, केवल परदे को हटाने की जरूरत है। मैं अँगरेजों की तरफ से निराश हो गया हूँ, इन्हें विश्वास है कि भारत का उद्धार अँगरेज—जाति ही के द्वारा होगा।"

मिसेज सेवक—(रुखाई से) "तो क्या आप यह नहीं मानते कि अँगरेजों ने भारत के लिए जो कुछ किया है, वह शायद ही किसी जाति ने किसी जाति या देश के साथ- किया हो?"

कुँवर साहब—"नहीं, मैं यह नहीं मानता।"

मिसेज सेवक—(आश्चर्य से) “शिक्षा का इतना प्रचार और भी किसी काल में हुआ था?"

कुँवर साहब—“मैं उसे शिक्षा ही नहीं कहता, जो मनुष्य को स्वार्थ का पुतला बना दे।"

मिसेज सेवक—“रेल, तार, जहाज, डाक, ये सब विभूतियाँ अँगरेजों ही के साथ आई!"

कुँवर साहब—"अँगरेजों के बगैर भी आ सकती थीं, और अगर आई भी हैं, तो अधिकतर अँगरेजों ही के लाभ के लिए।"

मिसेज सेवक—"ऐसा न्याय-विधान पहले कभी न था।"

कुँवर साहब—"ठीक है, ऐसा न्याय-विधान कहाँ था, जो अन्याय को न्याय और असत्य को सत्य सिद्ध कर दे! यह न्याय नहीं, न्याय का गोरखधंधा है।"

सहसा रानी जाह्नवी कमरे में आई। सोफिया का चेहरा उन्हें देखते ही सूख गया। वह कमरे के बाहर निकल आई, रानी के सामने खड़ी न रह सकी। मिसेज सेवक को भी शंका हुई कि कहीं चलते-चलते रानी से फिर न विवाद हो जाय। वह भी बाहर चली आई। कुँवर साहब ने दोनों को फिटन पर सवार कराया। सोफिया ने सजल नेत्रों से कर जोड़कर कुँवरजी को प्रणाम किया। फिटन चली। आकाश पर काली घटा छाई हुई थी, फिटन सड़क पर तेजी से दौड़ी चली जाती थी और सोफिया बैठी रो रही थी।

उसकी दशा उस बालक की सी थी, जो रोटी खाता हुआ मिठाईवाले की आवाज सुनकर उसके पीछे दौड़े, ठोकर खाकर गिर पड़े, पैसा हाथ से निकल जाय और वह रोता हुआ घर लौट आवे।

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