रंगभूमि/१३

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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विनयसिंह के जाने के बाद सोफिया को ऐसा प्रतीत होने लगा कि रानी जाह्नवी मुझसे खिंची हुई हैं। वह अब उसे पुस्तकें तथा पत्र पढ़ने या चिट्टियाँ लिखने के लिए बहुत कम बुलाती, उसके आचार-व्यवहार को संदिग्ध दृष्टि से देग्वतीं। यद्यपि अपनी बदगुमानी को वह यथासाध्य प्रकट न होने देतीं, पर सोफी को ऐसा खयाल होता कि मुझ पर अविश्वास किया जा रहा है। वह जब कभी बाग में सैर करने चली जाती, या कहीं घूमने निकल जाती, तो लौटने पर उसे ऐसा मालूम होता कि मेरी किताबें उलट- पलट दी गई है। यह बदगुमानी उस वक्त और भी असह्य हो जाती, जब डाकिये के आने पर रानीजी स्वयं उसके हाथ से पत्र आदि लेती और बड़े ध्यान से देखती कि सोफिया का कोई पत्र तो नहीं है। कई बार सोफिया को अपने पत्रों के लिफाफे फटे हुए मिले। वह इस कूट नीति का रहस्य खूब समझती थी। यह रोक-थाम केवल इसलिए है कि मेरे और विनयसिंह के बीच में पत्र-व्यवहार न होने पाये। पहले रानीजी सोफिया से विनय और इन्दु की चर्चा अक्सर किया करतीं। अब भूलकर भी विनय का नाम न लेती। यह प्रेम की पहली परीक्षा थी।

किंतु आश्चर्य यह था कि सोफिया में अब वह आत्माभिमान न था; जो नाक पर मक्खी न बैठने देती थी, वह अब अत्यन्त सहनशील हो गई थी। रानीजी से द्वेप करने के बदले वह उनकी संशय-निवृत्ति के लिए अवसर खोजा करती थी। उसे रानीजी का बर्ताव सर्वथा न्याय-संगत मालूम होता था। वह सोचती---इनकी परम अभिलाया है कि विनय का जीवन आदर्श हो और मैं उनके आत्मसंयम में बाधक न बनूँ। मैं इन्हें कैसे समझाऊँ कि आपकी अभिलाषा को मेरे हाथों जरा-सा भी झोका न लगेगा। मैं तो स्वयं अपना जीवन एक ऐसे उद्देश्य पर समर्पित कर चुकी हूँ, जिसके लिए वह काफी नहीं। मैं स्वयं किसी इच्छा को अपने उद्देश्य-मार्ग का काँटा न बनाऊँगी। लेकिन उसे यह अवसर न मिलता था। जो बातें जबान पर नहीं आ सकतीं, उनके लिए कभी अवसर नहीं मिलता।

सोफी को बहुधा अपने मन की चंचलता पर स्वेद होना। वह मन को इधर से हटाने के लिए पुस्तकावलोकन में मग्न हो जाना चाहती; लेकिन जब पुस्तक मामने रवली रहती और मन कहीं और जा पहुँचता, तो वह झुंझलाकर पुस्तक बन्द कर देती और सोचती-यह मेरी क्या दशा है! क्या माया यह कपट-रूप धारण करके मुझे सन्मार्ग से विचलित करना चाहती है? मैं जानकर क्यों अनजान बनी जाती हूँ? तब वह प्रतिज्ञा करती कि मैं इस काँटे को हृदय से निकाल डालूँगी।

लेकिन प्रेम-ग्रस्त प्राणियों की प्रतिज्ञा कायर की समर-लालसा है, जो द्वद्वी की ललकार सुनते ही विलुप्त हो जाती है। सोफिया विनय को तो भूल जाना चाहती थी; पर
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इसके साथ ही शंकित रहती थी कि कहीं वह मुझे भूल न जाय। जब कई दिनों तक उनका कोई समाचार नहीं मिला, तो उसने समझा—मुझे भूल गये, जरूर भूल गये। मुझे उनका पता मालूम होता, तो कदाचित् रोज एक पत्र लिखती, दिन में कई-कई पत्र भेजती; पर उन्हें एक पत्र लिखने का भी अवकाश नहीं! वह मुझे भूल जाने का उद्योग कर रहे हैं। अच्छा ही है। वह एक क्रिश्चियन स्त्री से क्यों प्रेम करने लगे? उनके लिए क्या एक-से-एक परम सुन्दरी, सुशिक्षिता, प्रेमपरायणा राजकुमारियाँ नहीं हैं?

एक दिन इन भावनाओं ने उसे इतना व्याकुल किया कि वह रानी के कमरे में जाकर विनय के पत्रों को पढ़ने लगी और एक क्षण में जितने पत्र मिले, सब पढ़ डाले। देखूँ, मेरी ओर कोई संकेत है या नहीं; कोई वाक्य ऐसा है, जिसमें से प्रेम की सुगंध आये? किंतु ऐसा एक शब्द भी न मिला, जिससे वह खींच-तानकर भी कोई गुप्त आशय निकाल सकती। हाँ, उस पहाड़ी देश में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, उनका विस्तार से उल्लेख किया गया था। युवावस्था को अतिशयोक्ति से प्रेम है। हम बाधाओं पर विजय पाकर नहीं, उनकी विषद व्याख्या करके अपना महत्त्व बढ़ाना चाहते हैं। अगर सामान्य ज्वर है, तो वह सन्निपात कहा जाता है। एक दिन पहाड़ों में चलना पड़ा, तो वह नित्य पहाड़ों से सिर टकराना कहा जाता है। विनयसिंह के पत्र ऐसी ही वीर-कथाओं से भरे हुए थे। सोफिया यह हाल पढ़कर विकल हो गई। वह इतनी विपत्ति झेल रहे हैं. और मैं यहाँ आराम से पड़ी हूँ! वह इसी उद्वेग में अपने कमरे में आई और विनय को एक लंबा पत्र लिखा, जिसका एक-एक शब्द प्रेम में डूबा हुआ था। अंत में उसने बड़े प्रेम-विनीत शब्दों में प्रार्थना की कि मुझे अपने पास आने की आज्ञा दीजिए, मैं अब यहाँ नहीं रह सकती। उसकी शैली अज्ञात रूप से कवित्वमय हो गई। पत्र समाप्त करके वह उसी वक्त पास ही के लेटरबॉक्स में डाल आई।

पत्र डाल आने के बाद जब उसका उद्वेग शांत हुआ, तो उसे विचार आया कि मेरा रानीजी के कमरे में छिपकर जाना और पत्रों को पढ़ना किसी तरह उचित न था। वह सारे दिन इसी चिंता में पड़ी रही। बार-बार अपने को धिक्कारती। ईश्वर! मैं कितनी अभागिनी हूँ! मैंने अपना जीवन सच्चे धर्म की जिज्ञासा पर अर्पण कर दिया था, बरसों से सत्य की मीमांसा में रत हूँ; पर वासना की पहली ही ठोकर में नीचे गिर पड़ी। मैं क्यों इतनी दुर्बल हो गई हूँ? क्या मेरा पवित्र उद्देश्य वासनाओं के भँवर में पड़कर डूब जायगा? मेरी आदत इतनी बुरी हो जायगी कि मैं किसी की वस्तुओं की चोरी करूँगी, इसकी मैंने कभी कल्पना भी न की थी। जिनका मुझ पर इतना विश्वास, इतना भरोसा, इतना प्रेम, इतना आदर है, उन्हीं के साथ मेरा यह विश्वासघात! अगर अभी यह दशा है, तो भगवान् ही जाने, आगे चलकर क्या दशा होगी। इससे तो यह कहीं अच्छा है कि जीवन का अंत हो जाय। आह! वह पत्र, जो मैं अभी छोड़ आई हूँ, वापस मिल जाता, तो मैं फाड़ डालती। [ १५८ ]वह इसी चिंता और ग्लानि में बैठी हुई थी कि रानीजी कमरे में आई। सोफिया उठ खड़ी हुई और अपनी आँखें छिपाने के लिए जमीन की ओर ताकने लगी। किंतु आँसू पी जाना आसान नहीं है। रानी ने कठोर स्वर में पूछा- "सोफी, क्यों रोती हो?"

जब हम अपनी भूल पर लजित होते हैं, तो यथार्थ बात आप-ही-आप हमारे मुँह से निकल पड़ती है। सोफी हिचकती हुई बोली-"जी, कुछ नहीं...मुझसे एक अपराध हो गया है, आपसे क्षमा माँगती हूँ।"

रानी ने और भी तीव्र स्वर में पूछा-"क्या बात है?"

सोफी-"आज जब आप सैर करने गई थीं, तो मैं आपके कमरे में चली गाई थी।"

रानी-"क्या काम था?"

सोफी लज्जा से आरक्त होकर बोली-“मैंने आपकी कोई चीज नहीं छुई।"

रानी-"मैं तुम्हें इतना नीच नहीं समझती।"

सोफी-“एक पत्र देखना था।”

रानी-"विनयसिंह का?"

सोफिया ने सिर झुका लिया। वह अपनी दृष्टि में स्वयं इतनी पतित हो गई थी कि जी चाहता था, जमीन फट जाती और मैं उसमें समा जाती। रानी ने तिरस्कार के भाव से कहा-"सोफी, तुम मुझे कृतघ्न समझोगी, मगर मैंने तुम्हें अपने घर में रखकर बड़ा भूल की। ऐसी भूल मैंने कभी न की थी। मैं न जानती थी कि तुम आस्तीन का साँप बनोगी। इससे बहुत अच्छा होता कि विनय उसी दिन आग में जल गया होता। तब मुझे इतना दुःख न होता। मैं तुम्हारे आचरण को पहले न समझी। मेरी आँखों पर परदा पड़ा था। तुम जानती हो, मैंने क्यों विनय को इतनी जल्द यहाँ से भगा दिया? तुम्हारे कारण, तुम्हारे प्रेमाघातों से बचाने के लिए। लेकिन अब भी तुम भाग्य की भाँति उसका दामन नहीं छोड़ती। आखिर तुम उससे क्या चाहती हो? तुम्हें मालूम है, तुममे उसका विवाह नहीं हो सकता। अगर मैं हैसियत और कुल-मर्यादा का विचार न करूँ, तो भी तुम्हारे और मारे बीच में धर्म की दीवार खड़ी है। इस प्रेम का फल इसके सिवा और क्या होगा कि तुम अपने माथ उसे भी ले डूबोगी और मेरी चिर-संचित अभिलाषाओं को मिट्टी में मिला दोगी? म विनय को ऐसा मनुष्य बनाना चाहती हूँ, जिस पर समाज को गर्व हो, जिसके हृदय में अनुराग हो, साहस हो, धैर्य हो, जो संकों के सामने मुँह न मोड़े, जो सेवा के इंतु सदैव सिर को हथेली पर लिये रहे, जिसमें विलासिता का लेश भी न हो, जो धर्म और अपने को मिटा दे। मैं उसे सपूत बेटा, निश्छल मित्र और निस्वार्थ सेवक बनाना चाहती हूँ। मुझे उसके विवाह की लालसा नहीं, अपने पोतों को गोद में खेलाने की अनिवाया नहीं। देश में आत्मसेत्री पुरुषों और संतान-सेवी माताओं का अभाव नहीं है। वरती उनके बोझ से दबी जाती है। मैं अपने बेटे को सच्चा राजपूत
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बनाना चाहती हूँ। आज वह किसी की रक्षा के निमित्त अपने प्राण दे दे, तो मुझसे अधिक भाग्यवती माता संसार में न होगी। तुम मेरे इस स्वर्ण-स्वप्न को विच्छिन्न कर रही हो। मैं तुमसे सत्य कहती हूँ सोफी, अगर तुम्हारे उपकार के बोझ से दबी न होती, तो तुम्हें इस दशा में विष देकर मार्ग से हट देना अपना कर्तव्य समझती। मैं राजपूतनी हूँ, मरना भी जानती हूँ और मारना भी जानती हूँ। इसके पहले कि तुम्हें विनय से पत्र- व्यवहार करते देखूँ, मैं तुम्हारा गला घोट दूँगी। तुमसे भिक्षा माँगती हूँ, विनय को अपने प्रेम-पाश में फँसाने की चेष्टा न करो; नहीं तो इसका फल बुरा होगा। तुम्हें ईश्वर ने बुद्धि दी है, विवेक दिया है। विवेक से काम लो। मेरे कुल का सर्वनाश न करो।"

सोफी ने रोते हुए कहा— "मुझे आज्ञा दीजिए, आज चली जाऊँ।" रानी कुछ नर्म होकर बोलीं-मैं तुम्हें जाने को नहीं कहतो। तुम मेरे सिर और आँखों पर रहो, (लजित होकर) मेरे मुँह से इस समय जो कटु शब्द निकाले हैं, उनके लिए क्षमा करो। वृद्धावस्था बड़ी अविनयशील होती है। यह तुम्हारा घर है। शौक से रहो। विनय अब शायद फिर न आयेगा। हाँ, वह शेर का सामना कर सकता है; पर मेरे क्रोध का सामना नहीं कर सकता। वह वन वन की पत्तियाँ तोड़ेगा; पर घर न आयेगा। अगर तुम्हें उससे प्रेम है, तो अपने को उसके हित के लिए बलिदान करने को तैयार हो जाओ। अब उसकी जीवन-रक्षा का केवल एक ही उपाय है। जानती हो, वह क्या है?"

सोफ़ी ने सिर हिलाकर कहा—"नहीं।"

रानी—"जानना चाहती हो?"

सोफी ने सिर हिलाकर कहा—"हाँ।”

रानी—"आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो?”

सोफी ने फिर सिर हिलाकर कहा—"हाँ।"

रानी—"तो तुम किसी सुयोग्य पुरुष से विवाह कर लो। विनय को दिखा दो कि तुम उसे भूल गई, तुम्हें उसकी चिंता नहीं है। यही नैराश्य उसको बचा सकता है। हो सकता है कि यह नैराश्य उसे जीवन से विरक्त कर दे, वह ज्ञान-लाभ का आश्रय ले, जो नैराश्य का एकमात्र शरणस्थल है, पर संभावना होने पर भी इस उपाय के सिवा दूसरा अवलंब नहीं है। स्वीकार करती हो?”

सोफी रानी के पैरों पर गिर पड़ी और रोतो हुई बोली---"उनके हित के लिए......कर सकती हूँ"

रानी ने सोफी को उठाकर गले लगा लिया और करुण स्वर में बोलीं-मैं जानती हूँ, तुम उसके लिए सब कुछ कर सकती हो। ईश्वर तुम्हें इस प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल प्रदान करें।"

यह कहकर जाह्नवी वहाँ से चली गई। सोफी एक कोच पर बैठ गई और दोनों हाथों से मुँह छिपाकर फूट-फूटकर ने लगी। उसका रोम-रोम ग्लानि से पीड़ित हो रहा
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था। उसे जाह्नवी पर क्रोध न था। उसे उन पर असीम श्रद्धा हो रही थी। कितना उच्च और पवित्र उद्देश्य है! वास्तव में मैं ही दूध की मची हूँ, मुझको निकल जाना चाहिए। लेकिन रानी का अंतिम आदेश उसके लिए सबसे कड़वा ग्रास था। वह योगिनी बन सकती थी; पर प्रेम को कलंकित करने की कल्पना ही से उसे घणा होती थी। उसकी दशा उस रोगी की-सी थी, जो किसी बाग में सैर करने जाब और फल तोड़ने के आपराध में पकड़ लिया जाय। विनय के त्याग ने उसे उनका भक्त बना दिया, भक्ति ने शीघ्र ही प्रेम का रूप धारण किया और वही प्रेम उसे बलात् नारकीय अंधकार की ओर खींचे लिये जता था। अगर वह हाथ-पैर छुड़ाती है, तो भव है-वह इसके आगे कुछ न सोच सकी। विचार-शक्ति शिथिल हो गई। अंत में सारी चिताएँ, सारी ग्लानि, सारा नैराश्य, सारी विडंबना एक ठंडो मॉल में मिलीन हो गई।

शाम हो गई थी। सोफिया मन-मारे उदाम बैठी बाग की तरफ टकटकी लगाये ताक रही थी, मानों कोई विधवा पति-शोक में मग्न हो। सहमा प्रभु सेवक ने कमरे में प्रवेश किया।

फया ने प्रभु सेवक से कोई बात न की। चुपचाप अपनी जगह पर मर्तिवत् बैठी रही। वह उस दशा को पहुंच गई थी, जब सहानुभूति से भी अरुचि हो जाती है। नैराश्य की अंतिम अवस्था विरक्ति होती है।

लेकिन प्रभु सेवक अपनी नई रचना सुनाने के लिए इतने उत्सुक हो रहे थे कि सोफी के चेहरे की ओर उनका ध्यान ही न गया। आते-ही-आने बोले-“सोफी, देखो, मैंने आज रात को यह कविता लिखो है। जरा ध्यान देकर सुनना। मैंने अभी कुँवर साहब को सुनाई है। उन्हें बहुत आनंद आया।”

यह कहकर प्रभु सेवक ने मयुर स्वर में अपनी कला सुनानी शुरू की। कवि ने मृत्युलोक के एक दुःखी प्राणी के हृदय के वे भाव व्यक्त किये थे, जा नारागण को देखकर उठे थे। बह एक-एक चरण झूम-झूमकर पढ़ते थे और उसे दे-दो, तीन-तीन बार दुहराते थे; किंतु सोफिया ने एक बार भी दाद न दी, मानों वह काव्य-रस-शून्य हो गई थी। जब पूरी कविता समाप्त हो गई, तो प्रभु सेवक ने पूछा—"इसके विषय में तुम्हारा क्या विचार है?"

सोफिया ने कहा—"अच्छी तो है।"

प्रभु से एक-"मेरी सूक्तियों पर तुमने ध्यान नहीं दिया। तारागण की आज तक किसी कवि ने देवात्माओं से उपमा नहीं दी है। मुझे तो विश्वास है कि इस कविता के प्रकाशित होते ही कवि-समाज में हलचल मच जायगी।"

सोफिया—"मुझे तो याद आता है कि शेली और वई सवर्थ इस उपमा को पहले ही बाँध चुके हैं। यहाँ के कवियों ने भी कुछ ऐसा ही वर्णन किया है। कदाचित् ह्यूगा की एक कविता का शीर्षक भी यही है। संभव है, तुम्हारी कन्चना उन कत्रियों से लड़ गई हो।" [ १६१ ]प्रभु सेवक-"मैंने काव्य-साहित्य तुमसे बहुत ज्यादा देखा है; पर मुझे कहीं यह उपमा नहीं दिखाई दी।"

सोफिया--"खैर, हो सकता है, मुझी को याद न होगा। कविता बुरी नहीं है।"

प्रभु सेवक-"अगर कोई दूसरा कवि यह चमत्कार दिखा दे, तो उसकी गुलामी करूँ।”

सोफिया-"तो मैं कहूँगी, तुम्हारी निगाह में अपनी स्वाधीनता का मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है।"

प्रभु सेवक-"तो में भी यही कहूँगा कि कवित्व के रसास्वादन के लिए अभी तुम्हें बहुत अभ्यास करने की जरूरत है।”

सोफिया--"मुझे अपने जीवन में इससे अधिक महत्त्व के काम करने हैं। आजकल घर के क्या समाचार हैं?"

प्रभु सेवक-"वही पुरानी दशा चली आती है। मैं तो आजिज आ गया हूँ। पापा को अपने कारखाने की धुन लगी हुई है, और मुझे उस काम से घृणा है। पापा और मामा, दोनों हरदम भुनभुनाते रहते हैं। किसी का मुँह ही नहीं सीधा होता। कहीं ठिकाना नहीं मिलता, नहीं तो इस मामा के घोंसले में एक दिन भी न रहता। कहाँ जाऊँ, कुछ समझ में नहीं आता।”

सोफिया-"बड़े आश्चर्य की बात है कि इतने गुणी और विद्वान् होकर भी तुम्हें अपने निर्वाह का कोई उपाय नहीं सूझता! क्या कल्पना के संसार में आत्मसम्मान का कोई स्थान नहीं है?"

प्रभु सेवक-"सोफी, मैं और सब कुछ कर सकता हूँ, पर गृह-चिंता का बोझ नहीं उठा सकता। मैं निर्द्वन्द्व, निश्चित, निर्लिप्त रहना चाहता हूँ। एक सुरम्य उपवन में, किसी सघन वृक्ष के नीचे, पक्षियों का मधुर कलरव सुनता हुआ, काव्य-चिंतन में मन पड़ा रहूँ, यही मेरे जीवन का आदर्श है।"

सोफिया--"तुम्हारी जिंदगी इसी भाँति स्व न देखने में गुजरेगी।"

प्रभु सेवक-"कुछ हो, चिंता से तो मुक्त हूँ, स्वच्छंद तो हूँ!"

सोफिया-"जहाँ आत्मा और सिद्वांतों की हत्या होती हो, वहाँ से स्वच्छंदता कोसों भागती है। मैं इसे स्वच्छंदता नहीं कहती, यह निर्लजता है। माता-पिता की निर्दयता कम पीड़ाजनक नहीं होतो, बालक दूसरों का अत्याचार इतना असह्य नहीं होता, जितना माता-पिता का।"

प्रभु सेवक-"उँह, देखा जायगा, सिर पर जो आ जायगी, झेल लूँगा, मरने के पहले ही क्यों रोऊँ?"

यह कहकर प्रभु सेवक ने पाँडेपुर की घटना बयान की और इतनी डोंगें मारी कि सोफी चिढ़कर बोली- "रहने भी दो, एक गँवार को पोट लिया, तो कौन-सा बड़ा काम
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किया। अपनी कविताओं में तो अहिंसा के देवता बन जाते हो, वहाँ जरा-सी बात पर इतने जामे से बाहर हो गये!”

प्रभु सेवक-"गाली सह लेता?"

सोफिया--"जब तुम मारनेवाले को मारोगे, गाली देनेवाले को भी मारोगे, तो अहिंसा का निर्वाह कब करोगे? राह चलते तो किसी को कोई नहीं मारता। वास्तव में किसी युवक को उपदेश करने का अधिकार नहीं है, चाहे उसकी कवित्व-शक्ति कितनी ही विलक्षण हो। उपदेश करना सिद्ध पुरुपों ही का काम है। यह नहीं कि जिसे जरा तुकबंदी आ गई, वह लगा शांति, संतोप और अहिंसा का पाठ पढ़ाने। जो बात दूसरों को सिखलाना चाहते हो, वह पहले स्वयं सीख लो।"

प्रभु सेवक-"ठीक यही बात विनय ने भी अपने पत्र में लिखी है। लो, याद आ गया। यह तुम्हारा पत्र है। मुझे याद ही न रही थी। यह प्रसंग न आ जाता, तो जेब में रखे ही लौट जाता।"

यह कहकर प्रभु सेवक ने एक लिफाफा निकालकर सोफिया के हाथ में रख दिया।

सोफिया ने पूछा- “आजकल कहाँ हैं?"

प्रभु सेवक-"उदयपुर के पहाड़ी प्रांतों में घूम रहे हैं। मेरे नाम जो पत्र आया है, उसमें तो उन्होंने साफ लिखा है कि मैं इस सेवा-कार्य के लिए सर्वथा अयोग्य हूँ। मुझमें उतनी सहनशीलता नहीं, जितनी होनी चाहिए। युवावस्था अनुभव-लाभ का समय है। अवस्था प्रौढ़ हो जाने पर ही सार्वजनिक कार्यों में सम्मिलित होना चाहिए। किसी युवक को सेवा-कार्य करने को भेजना वैसा ही है, जैसे किसी बच्चे वैद्य को रोगियों के कष्ट-निवारण के लिए भेजना।”

प्रभु सेवक चले गये, नो माफिया सोचने लगी --"यह पत्र पद या न पद? विनय इसे रानीजी से गुप्त रखना चाहते है, नहीं तो यहीं के पते से न भेजते? मैंने अभी रानीजी को वचन दिया है, उनसे पत्र-व्यवहार न करूँगी। इस पत्र को खोलना उचित नहीं। रानीजी को दिग्वा दूँ। इससे उनके मन में मुझ पर जो संदेह है, वह दूर हो जायगा। मगर न जाने क्या बात लिखी है। संभव है, कोई ऐसी बात हो, जो रानी के क्रोध को ओर मी उत्तेजित कर दे। नहीं, इस पत्र को गुप्त ही रखना चाहिए। रानी को दिखाना मुनामिव नहीं।"

उसने फिर सोचा-"पढ़ने से क्या फायदा, न जाने मेरे चित्त की क्या दशा हो। मुझे अब अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा। जब इम प्रेमांकुर को जड़ से उखाड़ना ही है, तो उसे क्यों सींचूँ ? इस पत्र को रानी के हवाले कर देना ही उचित है।"

सोफिया ने और ज्यादा सोच-विचार न किया। शंका हुई, कहीं मैं बिचलित न हो नाऊँ। चलनी में पानी नहीं ठहरता।

उसने उसी वक्त वह पत्र में जाकर रानी को दे दिया। उन्होंने पृछा---"किसका
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पत्र है? यह तो विनय की लिखावट जान पड़ती है। तुम्हारे नाम आया है न? तुमने लफाफा खोला नहीं!"

सोफिया-"जी नहीं।"

रानी ने प्रसन्न होकर कहा-"मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ, पढ़ो। तुमने अपना वचन पालन किया, इससे मैं बहुत खुश हुई।"

सोफिया-"मुझे क्षमा कीजिए।"

रानी-'मैं खुशी से कहती हूँ, पढ़ो; देखो, क्या लिखते हैं?"

सोफिया-“जी नहीं।"

रानी ने पत्र ज्यों-का-त्यों संदूक में बंद कर दिया। खुद भी नहीं पढ़ा। कारण, यह नीति-विरुद्व था। तब सोफिया से बोलीं-"बेटी, अब मेरी तुमसे एक और याचना है। विनय को एक पत्र लिखो और उसमें स्पष्ट लिख दो, हमारा और तुम्हारा कल्याण इमी में है कि हममें केवल भाई और बहन का सम्बन्ध रहे। तुम्हारे पत्र से यह प्रकट होना चाहिए कि तुम उनके प्रेम की अपेक्षा उनके जातीय भावों की ज्यादा कद्र करती हो। तुम्हारा यह पत्र मेरे और उनके पिता के हजारों उपदेशों से अधिक प्रभावशाली होगा। मुझे विश्वास है, तुम्हारा पत्र पाते ही उनकी चेष्टाएँ बदल जायँगी और वह कर्तव्य-मार्ग पर सुदृढ़ हो जायँगे। मैं इस कृपा के लिए जीवन-पर्यन्त तुम्हारी आभारी रहूँगी।"

सोफी ने कातर स्वर में कहा-"आपकी आज्ञा पालन करूँगी।"

रानी-'नहीं, केवल मेरी आज्ञा का पालन करना काफी नहीं है। अगर उससे यह भासित हुआ कि किसी की प्रेरणा से लिखा गया है, तो उसका असर जाता रहेगा।"

सोफिया-"आपको पत्र लिखकर दिखा दूँ?"

रानी-"नहीं, तुम्हीं भेज देना।"

सोफिया जब वहाँ से आकर पत्र लिखने बैठी, तो उसे सूझता ही न था कि क्या लिखूँ। सोचने लगी-“वह मुझे निर्मम समझेंगे; अगर लिख दूँ, मैंने तुम्हारा पत्र पढ़ा ही नहीं, तो उन्हें कितना दुःख होगा! कैसे कहूँ कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करती"वह मेज पर से उठ खड़ी हुई और निश्चय किया, कल लिखू गी। एक किताब पढ़ने लगी। भोजन का समय हो गया। नौ बज गये। अभी वह मुँह-हाथ धोकर बैठी ही थी कि उसने रानी को द्वार से अन्दर की ओर झाँकते देखा। समझी, किसी काम से जा रही होंगी, फिर किताब देखने लगी। पंद्रह मिनट भी न गुजरे थे कि रानी फिर दूसरी तरफ से लौटीं और कमरे में झाँका।

सोफी को उनका यों मँडलाना बहुत नागवार मालूम हुआ। उसने समझा-यह मुझे बिलकुल काठ की पुतली बनाना चाहती हैं। बस, इनके इशारों पर नाचा करूँ। इतना तो नहीं हो सका कि जब मैंने बंद लिफाफा उनके हाथ में रख दिया, तो मुझे खत पढ़कर सुना देतीं। आखिर मैं लिखू क्या? नहीं मालूम, उन्होंने अपने खत में क्या
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लिखा है? सहसा उसे ध्यान आया कि कहीं मेरा पत्र उपदेश के रूप में न हो जाय। वह इसे पढ़कर शायद मुझसे चिढ़ जायें। अपने प्रेमियों से हम उपदेश और शिक्षा की बातें नहीं, प्रेम और परितोप की बातें सुनना चाहते हैं। बड़ी कुशल हुई, नहीं तो वह मेरा उपदेश-पत्र पढ़कर न जाने दिल में क्या समझते। उन्हें खयाल होता, गिरजा में उपदेश सुनते-सुनते इसकी प्रेम-भावनाएँ निर्जीव हो गई हैं। अगर वह मुझे ऐसा पत्र लिखते, तो मुझे कितना बुरा मालूम होता! आह! मैंने बड़ा धोखा खाया। पहले मैंने समझा था, उनसे केवल आध्यात्मिक प्रेम करूँगी। अब विदित हो रहा है कि आध्यात्मिक प्रेम या भक्ति केवल धर्म-जगत् ही की वस्तु है। स्त्री और पुरुष में पवित्र प्रेम होना असंभव है। प्रेम पहले उँगली पकड़कर तुरंत ही पहुँचा पकड़ता है। यह भी जानती हूँ कि यह प्रेम मुझे ज्ञान के ऊँचे आदर्श से गिरा रहा है। हमें जीवन इसलिए प्रदान किया गया है कि सद्विचारों और सत्कार्यों से उसे उन्नत करें और एक दिन अनन्त ज्योति में विलीन हो जायँ। यह भी जानती हूँ कि जीवन नश्वर है, अनित्य है और संसार के सुख भी अनित्य और नश्वर हैं। यह सब जानते हुए भी पतंग की भाँति दीपक पर गिर रही हूँ। इसीलिए तो कि प्रेम में वह विस्मृति हैं, जो संयम, ज्ञान और धारणा पर परदा डाल देती है। भक्तजन भी, जो आध्यात्मिक आनन्द भोगते रहते हैं, वासनाओं से मुक्त नहीं हो सकते। जिसे कोई बलात् खींचे लिये जाता हो, उससे कहना कि तू मत जा, कितना बड़ा अन्याय है!

पीड़ित प्राणियों के लिए रात एक कठिन तपस्या है। ज्यों-ज्यों रात गुजरती थी, सोफी की उद्विग्नता बढ़ती जाती थी। आधी रात तक मनो-भावों से निरंतर संग्राम करने के बाद अंत को उसने विवश होकर हृदय के द्वार प्रेम-क्रीड़ाओं के लिए उन्मुक्त कर दिये, जैसे किसी रंगशाला का व्यवस्थापक दर्शकों की रेट-पेल से तंग आकर शाला का पट सर्व साधारण के लिए खोल देता है। बाहर का शेर भीतर के मधुर स्वर-प्रवाह में बाधक होता है। सोफी ने अपने को प्रेम-कल्पनाओं की गोद में डाल दिया। अबाध रूप से उनका आनन्द उठाने लगी-

"क्यों विनय, तुम मेरे लिए क्या-क्या मुसीबत झेलोगे? अपमान, अनादर, द्वेष, माता-पिता का विरोध, तुम मेरे लिए यह सब विपत्ति सह लोगे? लेकिन धम? वह देखो, तुम्हारा मुख उदास हो गया। तुम सब कुछ करोगे; पर धर्म नहीं छोड़ सकते। मेरी भी यही दशा है। मैं तुम्हारे साथ उपवास कर सकती हूँ; तिरस्कार, अपमान, निंदा, सब कुछ भोग सकती हूँ, पर धर्म को कैसे त्याग दूँ? ईसा का दामन कैसे छोड़ दूँ? ईमा- इयत की मुझे परवा नहीं, यह केवल स्वार्थो का रघटन है। लेकिन उस पवित्र आत्मा से क्योंकर मुँह मोड़ें, जो क्षमा और दया का अवतार थी? क्या यह संभव नहीं कि मैं ईसा के दामन से लिपटी रहकर भी अपनी प्रेमाकांक्षाओं को तृप्त करूँ? हिंदू-धर्म की उदार छाया में किसके लिए शरण नहीं? आस्तिक भी हिंदू है, नास्तिक भी हिंदू है, ३३ करोड़ देवतों को माननेवाला भी हिंदू है। जहाँ महावीर के भक्तों के लिए स्थान है,
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बुद्धदेव के भक्तों के लिए स्थान है, वहाँ क्या ईसू के भक्त के लिए स्थान नहीं है? तुमने मुझे अपने प्रेम का निमंत्रण दिया है, मैं उसे अस्वीकार क्यों करूँ? मैं भी तुम्हारे साथ सेवा-कार्य में रत हो जाऊँगी, तुम्हारे साथ वनों में विचरूँगी, झोपड़ों में रहूँगी।

“आह, मुझसे बड़ी भूल हुई। मैंने नाहक वह पत्र रानीजी को दे दिया। मेरा पत्र था, मुझे उसके पढ़ने का पूरा अधिकार था। मेरे और उनके बीच प्रेम का नाता है, जो संसार के और सभी सम्बन्धों से पवित्र और श्रेष्ठ है। मैं इस विषय में अपने अधिकार को त्यागकर विनय के साथ अन्याय कर रही हूँ। नहीं, मैं उनसे दगा कर रही हूँ। मैं प्रेम को कलंकित कर रही हूँ। उनके मनोभावों का उपहास कर रही हूँ। यदि वह मेरा पत्र बिना पढ़े ही फाड़कर फेक देते, तो मुझे इतना दुःख होता कि उन्हें कभी क्षमा न करती। क्या करूँ? जाकर रानीजी से वह पत्र माँग लूँ? उसे देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। मन में चाहे कितना ही बुरा माने? पर मेरी अमानत मुझे अवश्य दे देंगो। वह मेरी मामा की भाँति अनुदार नहीं हैं। मगर मैं उनसे माँगूँ क्यों? वह मेरो चीज है, किसी अन्य प्राणी का उस पर कोई दावा नहीं। अपनी चीज ले लेने के लिए मैं किसी दूसरे का एहसान क्यों उठाऊँ?"

ग्यारह बज रहे थे। भवन में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। नौकर-चाकर सब सो गये थे। सोफिया ने खिड़की से बाहर बाग की ओर देखा। ऐसा मालूम होता था कि आकाश से दूध की वर्षा हो रही है। चाँदनी खूब छिटकी हुई थी। संगमरमर की दोनों परियाँ, जो हौज के किनारे खड़ी थीं, उसे निस्स्वर संगीत की प्रकाशमयी प्रतिमाओं- सी प्रतीत होती थी; जिससे सारी प्रकृति उल्लसित हो रही थी।

सोफिया के हृदय में प्रबल उत्कंठा हुई कि इसी क्षण चलकर अपना पत्र लाऊँ। वह दृढ़ संकल्प करके अपने कमरे से निकली और निर्भय होकर रानीजी के दीवानखाने की ओर चली। वह अपने हृदय को बार-बार समझा रही थी-"मुझे भय किसका है, अपनी चीज लेने जा रही हूँ; कोई पूछे, तो उससे साफ-साफ कह सकती हूँ। विनयसिंह का नाम लेना कोई पाप नहीं है।”

किंतु निरंतर यह आश्वासन मिलने पर भी उसके कदम इतनी सावधानी से उठते थे कि बरामदे के पक्के फर्श पर भी कोई आहट न होती थी। उसकी मुखाकृति से वह अशांति झलक रही थी, जो आंतरिक दुश्चिता का चिह्न है। वह सहमी हुई आँखों से दाहने-बायें, आगे-पीछे ताकती जाती थी। जरा-सा भी कोई खटका होता, तो उसके पाँव स्वतः रुक जाते थे और वह बरामदे के खंभों की आड़ में छिप जाती थी। रास्ते में कई कमरे थे। यद्यपि उनमें अँधेरा था, रोशनी गुल हो चुकी थी, तो भी वह दरवाजे पर एक क्षण के लिए रुक जाती थी कि कोई उनमें बैठा न हो। सहसा एक टेरियर कुत्ता, जिसे रानीजी बहुत प्यार करती थीं, सामने से आता हुआ दिखाई दिया। सोफी के रोय खड़े हो गये। इसने जरा भी मुँह खोला, और सारे घर में हलचल हुई। कुत्ते ने उसकी ओर सशंक नेत्रों से देखा और अपने निर्णय की सूचना देना ही चाहता था कि सोफिया
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ने धीरे से उसका नाम लिया और उसे गोद में उठाकर उसकी पीठ सुहलाने लगी। कुत्ता दुम हिलाने लगा, लेकिन अपनी राह जाने के बदले वह सोफिया के साथ हो लिया। कदाचित् उसकी पशु-चेतना ताड़ रही थी कि कुछ दाल में काला जरूर है। इस प्रकार पाँच कमरों के बाद रानीजी का दीवानखाना मिला। उसके द्वार खुले हुए थे, लेकिन अंदर अँधेरा था। कमरे में बिजली के बटन लगे हुए थे। उँगलियों की एक अति सूक्ष्म गति से कमरे में प्रकाश हो सकता था। लेकिन इस समय बटन का दबाना उसे बारूद के ढेर में दियासलाई लगाने से कम भयकारक न था। प्रकाश से वह कभी इतनी भयभीत न हुई थी। मुश्किल तो यह थी कि प्रकाश के बगैर वह सफल-मनोरथ भी न हो सकती थी। यही अमृत भी था और विष भी। उसे क्रोध आ रहा था कि किवाड़ों में शीशे क्यों लगे हुए हैं? परदे हैं, वे भी इतने बारीक कि आदमी का मुँह दिखाई देता है। घर न हुआ, कोई सजी हुई दूकान हुई। बिलकुल अँगरेजी नकल है। और रोशनी ठंडी करने की जरूरत ही क्या थी? इससे तो कोई बहुत बड़ी किफायत नहीं हो जाती।

हम जब किसी तंग सड़क पर चलते हैं, तो हमें सवारियों का आना-जाना बहुत ही कष्टदायक जान पड़ता है। जी चाहता है कि इन रास्तों पर सवारियों के आने की रोक होनी चाहिए। हमारा अख्तियार होता, तो इन सड़कों पर कोई सवारी न आने देते, विशेषतः मोटरों को। लेकिन उन्हीं सड़कों पर जब हम किसी सवारी पर बैठकर निकलते हैं, तो पग-पग पर पथिकों को हटाने के लिए रुकने पर झुँझलाते हैं कि ये सब पटरी पर क्यों नहीं चलते, ख्वामख्वाह बीच में धंसे पड़ते हैं। कठिनाइयों में पड़कर परिस्थिति पर क्रुद्ध होना मानव-स्वभाव है।

सोफ़िया कई मिनट तक बिजली के बटन के पास खड़ी रही। बटन दबाने की हिम्मत न पड़ती थी। सारे आँगन में प्रकाश फैल जायगा, लोग चौंक पड़ेंगे। अँधेरे में सोता हुआ मनुष्य भी उजाला फैलते ही जाग पड़ता है। विवश होकर उसने मेज को टटोलना शुरू किया। दावात लुढ़क गई, स्याही मेज पर फैल गई और उसके कपड़ों पर दाग पड़ गये। उसे विश्वास था कि रानी ने पत्र अपने हैंडबैग में रखा होगा। जरूरी चिट्ठियाँ उसी में रखती थीं। बड़ी मुश्किल से उसे बैग मिला। वह उसमें से एक-एक पत्र निकालकर अँधेरे में देखने लगो। लिफाफे अधिकांश एक ही आकार के थे, निगाहें कुछ काम न कर सकी। आखिर इस तरह मनोरथ पूरा न होते देखकर उसने हैंडबैग उठा लिया और कमरे से बाहर निकली। सोचा, मेरे कमरे में अभी तक रोशनी है, वहाँ वह पत्र सहज ही में मिल जायगा। इसे लाकर फिर यहीं रख देंगी। लेकिन लौटती बार वह इतनी सावधानी से पाँव न उठा सकी। आती बार वह पग-पग पर इधर-उधर देखती हुई आई थी। अब बड़े वेग से चली जा रही थी, इधर-उधर देखने की फुरसत न थी। खाली हाथ उज्र की गुंजाइश थी। रंगे हुए हाथों के लिए कोई उन, कोई बहाना नहीं है।

अपने कमरे में पहुँचते ही सोफिया ने द्वार बंद कर दिया और परदे डाल दिये। [ १६७ ]
गरमी के मारे सारी देह पसीने से तर थी, हाथ इस तरह काँप रहे थे, मानों लकवा गिर गया हो। वह चिट्ठियों को निकाल-निकालकर देखने लगी। और, पत्रों को केवल देखना ही न था, उन्हें अपनी जगह सावधानी से रखना भी था। पत्रों का एक दफ्तर सामने था, बरसों की चिट्ठियाँ वहाँ निर्वाण-सुख भोग रही थीं। सोफिया को उनकी तलाशी लेते घंटों गुजर गये, दफ्तर समाप्त होने को आ गया, पर वह चीज न मिली। उसे अब कुछ-कुछ निराशा होने लगी; यहाँ तक कि अंतिम पत्र भी उलट-पलटकर रख दिया गया। तब सोफिया ने एक लंबी साँस ली। उसकी दशा उस मनुष्य की-सी थी, जो किसी मेले में अपने खोये हुए बंधु को ढूँढ़ता हो; वह चारों ओर आँखें फाड़-फाड़कर देखता है, उसका नाम लेकर जोर जोर से पुकारता है, उसे भ्रम होता है; वह खड़ा है, लपककर उसके पास जाता है, और लजित होकर लौट आता है। अंत में वह निराश होकर जमीन पर बैठ जाता और रोने लगता है।

सोफिया भी रोने लगी। वह पत्र कहाँ गया? रानी ने तो उसे मेरे सामने ही इसी बैग में रख दिया था? उनके और सभी पत्र यहाँ मौजूद हैं। क्या उसे कहीं और रख दिया? मगर आशा उस घास की भाँति है, जो ग्रीष्म के ताप से जल जाती है, भूमि पर उसका निशान तक नहीं रहता, धरती ऐसी उज्ज्वल हो जाती है, जैसे टकसाल का नया रुपया; लेकिन पावस की बूंद पड़ते ही फिर जली हुई जड़ें पनपने लगती हैं और उसी शुष्क स्थल पर हरियाली लहराने लगती है।

सोफिया की आशा फिर हरी हुई। कहीं मैं कोई पत्र छोड़ तो नहीं गई? उसने दुबारा पत्रों को पढ़ना शुरू किया, और ज्यादा ध्यान देकर। एक-एक लिफाफे को खोलकर देखने लगी कि कहों रानी ने उसे किसी दूसरे लिफाफे में रख दिया हो। जब देखा कि इस तरह तो सारी रात गुजर जायगो, तो उन्हीं लिफाफों को खोलने लगी, जो भारी मालूम होते थे। अंत को यह शंका भी मिट गई। उस लिफाफे का कहीं पता न था। अब आशा की जड़ें भी सूख गई, पावस की बूंद न मिली।

सोफिया चारपाई पर लेट गई, मानों थक गई हो। सफलता में अनंत सजीवता होती है, विफलता में असह्य अशक्ति। आशा मद है, निराशा मद का उतार। नशे में हम मैदान की तरफ दौड़ते हैं, सचेत होकर हम घर में विश्राम करते हैं। आशा जड़ की ओर ले जाती है, निराशा चैतन्य की ओर। आशा आँखें बंद कर देती है, निराशा आँखें खोल देती है। आशा सुलानेवाली थपकी है, निराशा जगानेवाला चाबुक।

सोफिया को इस वक्त अपनी नैतिक दुर्बलता पर क्रोध आ रहा था—"मैंने व्यर्थ ही अपनी आत्मा के सिर पर यह अपराध मढ़ा। क्या मैं रानी से अपना पत्र न माँग सकती थी? उन्हें उसके देने में जरा भी बिलंब न होता। फिर मैंने वह पत्र उन्हें दिया ही क्यों? रानीजी को कहीं मेरा यह कपट-व्यवहार मालूम हो गया, और अवश्य ही मालूम हो जायगा, तो वह मुझे अपने मन में क्या समझेंगी! कदाचित् मुझसे नीच और निकृष्ट कोई प्रापी न होगा।" [ १६८ ]
सहसा सोफिया के कानों में झाड़ू लगने की आवाज आई। वह चौंकी, क्या सबेरा हो गया? परदा उठाकर द्वार खोला, तो दिन निकल आया था। उसकी आँखों में अँधेरा छा गया। उसने बड़ी कातर दृष्टि से हैंडबैग की ओर देखा और मूर्ति के समान खड़ी रह गई। बुद्धि शिथिल हो गई। अपनी दशा और अपने कृत्य पर उसे ऐसा क्रोध आ रहा था कि गरदन पर छुरी फेर लूँ। कौन-सा मुँह दिखाऊँगी? रानी बहुत तड़के उठती हैं, मुझे अवश्य ही देख लेंगी। किंतु अब और हो ही क्या सकता है? भगवन्! तुम दीनों के आधार-स्तंभ हो, अब लाज तुम्हारे हाथ है। ईश्वर करे, अभी रानी न उठी हो। उसकी इस प्रार्थना में कितनी दीनता, कितनी विवशता, कितनी व्यथा, कितनी श्रद्धा और कितनी लजा थी! कदाचित् इतने शुद्ध हृदय से उसने कभी प्रार्थना न की होगी!

अब एक क्षण भी विलंब करने का अवसर न था। उसने बैग उठा लिया और बाहर निकली। आत्म-गौरव कभी इतना पद-दलित न हुआ होगा! उसके मुँह में कालिख लगी होती, तो शायद वह इस भाँति आँखें चुराती हुई न जाती! कोई भद्र पुरुष अपराधी के रूप में बेड़ियाँ पहने जाता हुआ भी इतना लजित न होगा! जब वह दीवानखाने के द्वार पर पहुँची, तो उसका हृदय यों धड़कने लगा, मानों कोई हथौड़ा चला रहा हो। वह जरा देर ठिठकी, कमरे में झाँककर देखा, रानी बैठी हुई थीं। सोफिया की इस समय जो दशा हुई, उसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। वह गड़ गई, कट गई, सिर पर बिजली गिर पड़ती, नीचे की भूमि फट जाती, तो भी कदाचित् वह इस महान् संकट के सामने उसे पुष्प-वर्षा या जल-विहार के समान सुग्वद प्रतीत होती। उसने जमीन की ओर ताकते हुए हैंडबैग चुपके से ले जाकर मेज पर रख दिया। रानी ने उसकी ओर उस दृष्टि से देखा, जो अंतस्तल पर शर के समान लगती है। उसमें अपमान भरा हुआ था; क्रोध न था, दया न थी, ज्वाला न थी, तिरस्कार था-विशुद्ध, सजीव और सशब्द।

सोफिया लौटना ही चाहती थी कि रानी ने पूछा-"विनय का पत्र ढूँढ़ रही थीं?"

सोफिया अवाक रह गई। मालम हुआ, किसी ने कलेजे में बर्थी मार दी।

रानी ने फिर कहा-"उसे मैंने अलग रख दिया है, मँगवा दूँ?"

सोफिया ने उत्तर न दिया। उसके सिर में चक्कर-सा आने लगा। मालूम हुआ, कमरा घूम रहा है।

रानी ने तीसरा बाण चलाया-"क्या यही सत्य की मीमांसा है?"

सोफिया मूञ्छित होकर फर्श पर गिर पड़ी।

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