रंगभूमि/३६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
[ ४२७ ]

[३६]

मिस्टर जॉन सेवक ने ताहिरअली की मेहनत और ईमानदारी से प्रसन्न होकर खालों पर कुछ कमीशन नियत कर दिया था। इससे अब उनकी आय अच्छी हो गई थी, जिससे मिल के मजदूरों पर उनका रोब था, ओवरसियर और छोटे-मोटे क्लार्क भी उनका लिहाज करते थे। लेकिन आय-वृद्धि के साथ उनके व्यय में भी खासी वृद्धि हो गई थी। जब यहाँ अपने बराबर के लोग न थे, फटे जूतों पर ही बसर कर लिया करते, खुद बाजार से सौदा-सुलफ लाते, कभी-कभी पानी भी खींच लेते थे। कोई हँसनेवाला न था! अब मिल के कर्मचारियों के सामने उन्हें ज्यादा शान से रहना पड़ता था और कोई मोटा काम अपने हाथ से करते हुए शर्म आती थी। इसलिए विवश होकर एक बुढ़िया मामा रख ली थी। पान-इलायची आदि का खर्च कई गुना बढ़ गया था। उस पर कभी-कभी मित्रों की दावत भी करनी पड़ती थी। अकेले रहनेवाले से कोई दावत की इच्छा नहीं करता। जानता है, दावत फीकी होगी। लेकिन सकुटुंब रहनेवालों के लिए भागने का कोई द्वार नहीं रहता। किसी ने कहा-"खाँ साहब, आज जरा जरदे पकवाइए, बहुत दिन हुए, रोटी-दाल खाते-खाते जबान मोटी पड़ गई।" ताहिरअली को इसके जवाब में कहना ही पड़ता-"हाँ-हाँ, लीजिए, आज ही बनवाता हूँ।" घर में एक ही स्त्री होती, तो उसकी बीमारी का बहाना करके टालते, लेकिन यहाँ तो एक छोड़ तीन-तीन महिलाएँ थीं। फिर ताहिरअली रोटी के चोर न थे। दोस्तों के आतिथ्य में उन्हें आनंद आता था। सारांश यह कि शराफत के निबाह में उनकी बधिया बैठी जाती थी। बाजार में तो अब उनकी रत्ती-भर भी साख न रही थी, जमामार प्रसिद्ध हो गये थे, कोई धेले की चीज को भी न पतियाता, इसलिए मित्रों से हथफेर रुपये लेकर काम चलाया करते। बाजारवालों ने निराश होकर तकाजा करना ही छोड़ दिया, समझ गये कि इसके पास है ही नहीं, देगा कहाँ से। लिपि-बद्ध ऋण अमर होता है, वचन बद्ध ऋण निर्जीव और नश्वर। एक अरबी घोड़ा है, जो एड़ नहीं सह सकता; या तो सवार का अंत कर देगा या अपना। दूसरा लद्दू टट्टू है, जिसे उसके पैर नहीं, कोड़े चलाते हैं; कोड़ा टूटा या सवार का हाथ रुका, और टट्टू बैठा, फिर नहीं उठ सकता।

लेकिन मित्रों के आतिथ्य-सत्कार ही तक रहता, तो शायद ताहिरअली किसी तरह खींच-तानकर दोनों चूल बराबर कर लेते। मुसीबत यह थी कि उनके छोटे भाई माहिरअली इन दिनों मुरादाबाद के पुलिस-ट्रेनिंगस्कूल में भरती हो गये थे। वेतन पाते ही उसका आधा आँखें बंद करके मुरादाबाद भेज देना पड़ता था। ताहिरअली खर्च से डरते थे, पर उनकी दोनों माताओं ने उन्हें ताने देकर घर में रहना मुश्किल कर दिया। दोनों ही की यह हार्दिक लालसा थी कि माहिरअली पुलिस में जाय और दारोगा बने। बेचारे ताहिरअली महीनों तक हुकाम के बँगलों की खाक छानते रहे; यहाँ जा, वहाँ जा;
[ ४२८ ]
इन्हें डाली दे, उन्हें नजराना पेश कर; इनकी सिफारिश करवा, उनकी चिट्ठी ला। बारे मिस्टर जॉन सेवक की सिफारिश काम कर गई। ये सब मोरचे तो पार हो गये। अंतिम मोरचा डॉक्टरी परीक्षा थी। यहाँ सिफारिश और खुशामद की गुजर न थी। ३२) सिविल सर्जन के लिए, १६) असिस्टेंट सर्जन के लिए और ८) क्लर्क तथा चपरासियों के लिए, कुल ५६) का जोड़ था। ये रुपये कहाँ से आयें चारों ओर से निराश होकर ताहिरअली कुल्सूम के पास आये और बोले-"तुम्हारे पास कोई जेवर हो, तो दे दो, मैं बहुत जल्द छुड़ा दूंगा।" उसने तिनककर संदूक उनके सामने पटक दिया और कहा-“यहाँ गहनों की हबस नहीं, सब आस पूरी हो चुकी। रोटी-दाल मिलती जाय, यही गनीमत है। तुम्हारे गहने तुम्हारे सामने हैं, जो चाहो, करो।" ताहिरअली कुछ देर तक तो शर्म से सिर न उठा सके। फिर संदूक की ओर देखा। ऐसी एक भी वस्तु न थी, जिससे इसकी चौथाई रकम भी मिल सकती। हाँ, सब चीजों को कूड़ा कर देने पर काम चल सकता था। सकुचाते हुए सब चीजें निकालकर रूमाल में बाँधी और बाहर आकर इस सोच में बैठे ही थे कि इन्हें क्यों कर ले जाऊँ कि इतने में मामा आई। ताहिरअली को सूझी, क्यों न इसकी मारफत रुपये मँगवाऊँ। मामाएँ इन कामों में निपुण होती हैं। धीरे से बुलाकर उससे यह समस्या कही। बुढ़िया ने कहा-"मियाँ, यह कौन-सी बड़ी बात है, चीज तो रखनी है, कौन किसी से खैरात माँगते हैं। मैं रुपये ला दूँगो, आप निसाखातिर रहें।' गहनों की पोटली लेकर चली, तो जैनब ने देखा। बुलाकर बोलीं-"तू कहाँ लिये-लिये फिरेगी, मैं माहिरअली से रुपये मँगवाये देती हूँ, उनका एक दोस्त साहूकारी का काम करता है।" मामा ने पोटली उसे दे दी। दो घंटे बाद अपने पास से ५६) निकालकर दे दिये। इस भाँति यह कठिन समस्या हल हुई। माहिरअली मुरादाबाद सिधारे और तब से वहीं पढ़ रहे थे। वेतन का आधा भाग वहाँ निकल जाने के बाद शेष आधे में घर का खर्च बड़ी मुश्किल से पूरा पड़ता। कभी-कभी उपवास करना पड़ जाता। उधर माहिरअली आधे ही पर संतोष न करते। कभी लिखते, कपड़ों के लिए रुपये भेजिए; कभी टेनिस खेलने के लिए सूट की फरमाइश करते। ताहिरअली को कमीशन के रुपयों में से भी कुछ-न-कुछ वहाँ भेज देना पड़ता था।

एक दिन रात-भर उपवास करने के बाद प्रातःकाल जैनब ने आकर कहा—"आज रुपयों की कुछ फिक्र की, या आज भी रोजा रहेगा?"

ताहिरअली ने चिढ़कर कहा—"मैं अब कहाँ से लाऊँ? तुम्हारे सामने कमीशन के रुपये मुरादाबाद नहीं भेज दिये थे? बार-बार लिखता हूँ कि किफायत से खर्च करो, मैं बहुत तंग हूँ; लेकिन वह हजरत फरमाते हैं, यहाँ एक-एक लड़का घर से सैकड़ों मँगवाता है और बेदरेग खर्च करता है, इससे ज्यादा किफायत मेरे किये नहीं हो सकती। जब उधर का यह हाल है, इधर का यह हाल, तो रुपये कहाँ से लाऊँ? दोस्तों में भी तो कोई ऐसा नहीं बचा, जिससे कुछ माँग सकूँ।" [ ४२९ ]जैनब-"सुनती हो रकिया, इनकी बातें? लड़के को खर्च क्या दे रहे हैं, गोया मेरे ऊपर कोई एहसान कर रहे हैं। मुझे क्या, तुम उसे खर्च भेजो या बुलाओ। उसके वहाँ पढ़ने से यहाँ पेट थोड़े ही भर जायगा। तुम्हारा भाई है, पढ़ाओ या न पढ़ाओ, मुझ पर क्या एहसान!"

ताहिर-"तो तुम्ही बताओ, रुपये कहाँ से लाऊँ?"

जैनब--"मरदों के हजार हाथ होते हैं। तुम्हारे अब्बाजान दस ही रुपये पाते थे कि ज्यादा? २०) तो मरने के कुछ दिन पहले हो गये थे। आखिर कुनबे को पालते थे कि नहीं। कभी फाके की नौबत नहीं आई। मोटा-महीन दिन में दो बार जरूर मयस्सर हो जाता था। तुम्हारी तालीम हुई, शादी हुई, कपड़े-लत्ते भी आते थे। खुदा के करम से बिसात के मुआफिक गहने भी बनते थे। वह तो मुझसे कभी न पूछते थे, कहाँ से रुपये लाऊँ? आखिर कहीं से लाते ही तो थे!"

ताहिर-"पुलिस के मुहकमे में हर तरह की गुंजाइश होती है। यहाँ क्या है? गिनी बोटियाँ, नपा शोरबा।"

जैनब-"मैं तुम्हारी जगह होती, तो दिखा देती कि इसी नौकरी में कैसे कंचन बरसता है। सैकड़ों चमार हैं। क्या कहो, तो सब एक-एक गटठा लकड़ी न लायें? सबों के यहाँ छान छप्पर पर तरकारियाँ लगी होंगी। क्यों नहीं तुड़वा मँगाते? खालों के दाम में भी कमी-बेशी करने का तुम्हें अख्तियार है। कोई यहाँ बैठा देख नहीं रहा है। दत के पौने दस लिख दो, तो क्या हरज हो? रुपये की रसीदों पर अंगूठे का निशान ही न बनवाते हो? निशान पुकारने जाता है कि मैं दस हूँ या पौने दस? फिर अब तुम्हारा एतबार जम गया। साहब को सुभा भी नहीं हो सकता। आखिर इस एतबार से कुछ अपना फोयदा भी तो हो कि सारी जिंदगी दूसरों ही का पेट भरते रहोगे? इस वक्त मी तुम्हारी रोकड़ में सैकड़ों रुपये होंगे। जितनी जरूरत समझो, इस वक्त निकाल लो। जब हाथ में रुपये आयें, रख देना। रोज की आमदनी-खर्च का मीजान ही मिलना चाहिए न? यह कौन-सी बड़ी बात है? आज खाल का दाम न दिया, कल दिया, इसमें क्या तरद्दुद है? चमार कहीं फरियाद करने न जायगा। सभी ऐसा करते हैं, और इसी तरह दुनिया का काम चलता है। ईमान दुरुस्त रखना हो, तो इंसान को चाहिए कि फकीर हो जाय।"

रकिया-"बहन, ईमान है कहाँ, जमाने का काम तो इसी तरह चलता है।"

ताहिर-"भई, जो लोग करते हों, वे जानें, मेरी तो इन हथकंडों से रूह फना होती है। अमानत में हाथ नहीं लगा सकता। आखिर खुदा को भी तो मुँह दिखाना है। उसकी मरजी हो, जिंदा रखे या मार डाले।"

जैनब-“वाह रे मरदुए, कुरबान जाऊँ तेरे ईमान पर। तेरा ईमान सलामत रहे, चाहे घर के आदमी भूखों मर जायँ। तुम्हारी मंशा यही है कि ये सब मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जायँ। बस, और कुछ नहीं। फिक्र तो आदमी को अपने बीबी-
[ ४३० ]
बच्चों की होती है। उनके लिए बाजार मौजूद है। फाका तो हमारे लिए है। उनका फाका तो महज दिखावा है!"

ताहिरअली ने इस मिथ्या आक्षेप पर क्षुब्ध होकर कहा-"क्यों जलाती हो अम्मी-जान! खुदा गवाह है, जो बच्चे के लिए धेले की भी कोई चीज ली हो। मेरी नीयत तो कभी ऐसी न थी, न है, न होगी, यों तुम्हारी तबीयत है, जो चाहो, समझो।"

रकिया--"दोनों बच्चे रात-भर तड़पते रहे, 'अम्माँ रोटी, अम्माँ रोटी! पूछो, अम्माँ क्या आप रोटी हो जाय! तुम्हारे बच्चे और नहीं तो ओवरसियर के घर चले जाते हैं, वहाँ से कुछ-न-कुछ खा-पी आते हैं। यहाँ तो मेरी ही जान खाते हैं।"

जैनब-"अपने बाल-बच्चों को खिलाने-न खिलाने का तुम्हें अख्तियार है। कोई तुम्हारा हिसाबिया तो है नहीं, चाहे शीरमाल खिलाओ या भूखों रखो। हमारे बच्चों को तो घर की रूखी रोटियों के सिवा और कहीं ठिाकना नहीं। यहाँ कोई वली नहीं है, जो फाकों से जिंदा रहे। जाकर कुछ इंतजाम करो।"

ताहिरअली बाहर आकर बड़ी देर तक घोर चिंता में खड़े रहे। आज पहली बार उन्होंने अमानत के रुपये को हाथ लगाने का दुस्साहस किया। पहले इधर-उधर देखा, कोई खड़ा तो नहीं है, फिर बहुत धीरे से लोहे का संदूक खोला। यो दिन में सैकड़ों बार वही संदूक खोलते, बंद करते थे, पर इस वक्त उनके हाथ थर-थर काँप रहे थे। आखिर उन्होंने रुपये निकाल लिये, तब सेफ बंद किया। रुपये लाकर जैनब के सामने फेंक दिये और बिना कुछ कहे-सुने बाहर चले गये। दिल को यों समझाया-"अगर खुदा को मंजूर होता कि मेरा ईमान सलामत रहे, तो क्यों इतने आदमियों का बोझ मेरे सिर डाल देता। यह बोझ सिर पर रखा था, तो उसके उठाने की ताकत भी तो देनी चाहिए थी! मैं खुद फाके कर सकता हूँ, पर दूसरों को तो मजबूर नहीं कर सकता। अगर इस मजबूरी की हालत में खुदा मुझे सजा के काबिल समझे, तो वह मुंसिफ नहीं है।" इस दलील से उन्हें कुछ तस्कीन हुई। लेकिन मि० जॉन सेवक तो इस दलील से माननेवाले आदमी न थे। ताहिरअली सोचने लगे, कौन चमार सबसे मोटा है, जिसे आज रुपये न दूं, तो ची-चपड़ न करे। नहीं, मोटे आदमी के रुपये रोकना मुनासिब नहीं, मोटे आदमी निडर होते हैं। कौन जाने, किसी से कह ही बैठे। जो सबसे गरीब, सबसे सीधा हो, उसी के रुपये रोकने चाहिए। इसमें कोई डर नहीं। चुपके से बुलाकर अँगूठे के निशान बनवा लूँगा। उसकी हिम्मत ही न पड़ेगी कि किसी से कहे। उस दिन से उन्हें जब, जरूरत पड़ती, रोकड़ से रुपये निकाल लेते, फिर रख देते। धीरे-धीरे रुपये पूरे कर देने की चिंता कम होने लगी। रोकड़ के रुपयों में कमी पड़ने लगी। दिल मजबूत होता गया। यहाँ तक कि छठा महीना जाते-जाते वह रोकड़ के पूरे डेढ़ सौ रुपये खर्च कर चुके थे।

अब ताहिरअली को नित्य यही चिंता सवार रहती कि कहीं बात खुल न जाय। चमारों से ललो-चप्पो की बातें करते। कोई ऐसा उपाय सोच निकालना चाहते थे कि
[ ४३१ ]
रोकड़ में इन रुपयों का पता न चले। लेकिन बही-खाते में हेर-फेर करने की हिम्मत न पड़ती थी। घर में भी किसी से यह बात न कहते। बस, खुदा से यही दुआ करते थे कि माहिरअली आ जायँ। उन्हें १००) महीना मिलेंगे। दो महीने में अदा कर दूंगा। इतने दिन साहब हिसाब की जाँच न करें, तो बेड़ा पार है।

उन्होंने दिल में निश्चय किया, अब कुछ ही हो, और रुपये न निकालूँगा। लेकिन सातवें महीने में फिर २५) निकालने पड़ गये। अब माहिरअली का साल भी पूरा हो चला था। थोड़े ही दिनों की और कसर थी। सोचा, आखिर मुझे उसी की बदौलत तो यह जेरबारी हो रही है। ज्योंही आया, मैंने घर उसे सौंपा। कह दूँगा, भाई, इतने दिनों तक मैंने सँभाला। अपने से जो कुछ बन पड़ा, तुम्हारी तालीम में खर्च किया, तुम्हारा रोजगार लगा दिया। अब कुछ दिनों के लिए मुझे इस फिक्र से नजात दो। उसके आने तक यह परदा ढका रह जाय, तो दुम झाड़कर निकल जाता। पहले यह ऐसी ही कोई जरूरत पड़ने पर साहब के पास जाते थे। अब दिन में एक बार जरूर मिलते। मुलाकातों से संदेह को शांत रखना चाहते थे। जिस चीज से टक्कर लगने का भय होता है, उससे हम और भी चिमट जाते हैं। कुल्सूम उनसे बार-बार पूछती कि आजकल तुम इतने रुपये कहाँ पा जाते हो? समझाती-“देखो, नीयत न खराब करना। तकलीफ और तंगी से बसर करना इतना बुरा नहीं, जितना खुदा के सामने गुनहगार बनना।" लेकिन ताहिरअली इधर-उधर की बातें करके उसे बहला दिया करते थे।

एक दिन सुबह को ताहिरअली नमाज अदा करके दफ्तर में आये, तो देखा, एक चमार खड़ा रो रहा है। पूछा, क्या बात है? बोला-"क्या बताऊँ खाँ साहब, रात घर वाली गुजर गई। अब उसका किरिया-करम करना है, मेरा जो कुछ हिसाब हो, दे दीजिए, दौड़ा हुआ आया हूँ, कफन के रुपये भी पास नहीं हैं।" ताहिरअली की तहवील में रुपये कम थे। कल स्टेशन से माल भेजा था, महसूल देने में रुपये खर्च हो गये थे। आज साहब के सामने हिसाब पेश करके रुपये लानेवाले थे। इस चमार को कई खालों के दाम देने थे। कोई बहाना न कर सके। थोड़े-से रुपये लाकर उसे दिये।

चमार ने कहा-"हजूर, इतने में तो कफन भी पूरा न होगा। मरनेवाली अब फिर तो आयेगी नहीं, उसका किरिया-करम तो दिल खोलकर कर दूं। मेरे जितने रुपये आते हैं, सब दे दीजिए। यहाँ तो जब तक दस बोतल दारू न होगी, लाश दरवज्जे से न उठेगी।"

ताहिरअली ने कहा—"इस वक्त रुपये नहीं हैं, फिर ले जाना",

चमार—“वाह खाँ साहब, वाह! अँगूठे का निशान कराये तो महीनों हो गये; अब कहते हो, फिर ले जाना। इस बखत न दोगे, तो क्या आकबत में दोगे? चाहिए तो यह था कि अपनी ओर से कुछ मदद करते, उलटे मेरे ही रुपये बाकी रखते हो।"

ताहिरअली कुछ रुपये और लाये। चमार ने सब रुपये जमीन पर पटक दिये और बोला—"आप थूक से चुहिया जिलाते हैं! मैं आपसे उधार नहीं माँगता हूँ, और आप यह कटूसी कर रहे हैं, जानो घर से दे रहे हों।" [ ४३२ ]ताहिरअली ने कहा---'इस वक्त इससे ज्यादा मुमकिन नहीं।"

चमार था तो सीधा, पर उसे कुछ संदेह हो गया, गर्म पड़ गया।

सहसा मिस्टर जान सेवक आ पहुँचे। आज झल्लाये हुए थे। प्रभु सेवक की उद्दडता ने उन्हें अव्यवस्थित-सा कर दिया था। यह झमेला देखा, तो कठोर स्वर से बोले- "इसके रुपये क्यों नहीं दे देते? मैंने आपसे ताकोद कर दी थी कि सब आदमियों का हिसाब रोज साफ कर दिया कीजिए। आप क्यों बाकी रखते हैं? क्या आपको तहवील में रुपये नहीं हैं?"

ताहिरअली रुपये लाने चले, तो कुछ ऐसे घबराये हुए थे कि साहब को तुरंत संदेह हो गया। रजिस्टर उठा लिया और हिसाब देखने लगे। हिसाब साफ था। इस चमार के रुपये अदा हो चुके थे। उसके अंगूठे का निशान मौजूद था। फिर यह बकाया कैसा? इतने में और कई चमार आ गये। इस चमार को रुपये लिये जाते देखा, तो समझे, आज हिसाब चुकता किया जा रहा है। बोले-“सरकार, हमारा भी मिल जाय।"

साहब ने रजिस्टर जमीन पर पटक दिया और डपटकर बोले- "यह क्या गोलमाल है? जब इनसे रसीद ली गई, तो इनके रुपये क्यों नहीं दिये गये?"

ताहिरअली से और कुछ तो न बन पड़ा, साहब के पैरों पर गिर पड़े और रोने लगे। सेंद में बैठ कर घूरने के लिए बड़े घुटे हुए आदमी की जरूरत होती है।

चमारों ने परिस्थिति को ताड़कर कहा-"सरकार, हमारा पिछला कुछ नहीं है, हम तो आज के रुपयों के लिए कहते थे। जरा देर हुई, माल रख गये थे। खाँ साहब उस बखत नमाज पढ़ते थे।"

साहब ने रजिस्टर उठाकर देखा, तो उन्हें किसी-किसी नाम के सामने एक हलका-सा x का चिह्न दिखाई दिया। समझ गये, हजरत ने ये ही रुपये उड़ाये हैं। एक चमार से, जो बाजार से सिगरेट पीता आ रहा था, पूछा—"तेरा नाम क्या है?"

चमार—"चुनकू।”

साहब—'तेरे कितने रुपये बाकी हैं?"

कई चमारों ने उसे हाथ के इशारे से समझाया कि कह दे, कुछ नहीं। चुनकू इशारा न समझा बोला—“१७) पहले के थे, ९) आज के।"

साहब ने अपनी नोटबुक पर उसका नाम टाँक लिया। ताहिरअली को कुछ कहा न सुना, एक शब्द भी न बोले। जहाँ कानून से सजा मिल सकती थी, वहाँ डाँट-फटकार की जरूरत क्या? सब रजिस्टर उठाकर गाड़ी में रखे, दफ्तर में ताला बंद किया; सेफ में दोहरे ताले लगाये, तालियाँ जेब में रखी और फिटन पर सवार हो गये। ताहिरअली "की इतनी हिम्मत भी न पड़ी कि कुछ अनुनय-विनय करें। वाणी ही शिथिल हो गई। स्तंभित-से खड़े रह गये। चमारों के चौधरी ने दिलासा दिया-"आप क्यों डरते हो खाँ साहब, आपका बाल तो बाँका होने न पायेगा। हम कह देंगे, अपने रुपये भर पाये हैं। क्यों है चुनकुआ, निरा गँवार ही है, इसारा भी नहीं समझता?" [ ४३३ ]चुनकू ने लजित होकर कहा-"चौधरी, भगवान जानें, जो मैं जरा भी इसारा पा जाता, तो रुपये का नाम ही न लेता।"

चौधरी-"अपना बयान बदल देना; कह देना, मुझे जबानी हिसाब याद नहीं था।" चुनकू ने इसका कुछ जवाब न दिया। बयान बदलना साँप के मुँह में उँगली डालना था। ताहिरअली को इन बातों से जरा भी तस्कीन नहीं हुई। वह पछता रहे थे। इसलिए नहीं कि मैंने रुपये क्यों खर्च किये, बल्कि इसलिए कि नामों के सामने x के निशान क्यों लगाये। अलग किसी कागज पर टाँक लेता, तो आज क्यों यह नौबत आती? अब खुदा ही खैर करे। साहब मुआफ करनेवाले आदमी नहीं हैं। कुछ सूझ ही न पड़ता था कि क्या करें। हाथ-पाँव फूल गये थे।

चौधरी बोला-"खाँ साहब, अब हाथ-पर-हाथ धरकर बैठने से काम न चलेगा। यह साहब बड़ा जल्लाद आदमी है। जल्दी रुपये जुटाइए। आपको याद है, कुल कितने रुपये निकलते होंगे?"

ताहिर-"रुपयों की कोई फिक्र नहीं है जी, यहाँ तो दाग लग जाने का अफसोस है। क्या जानता था कि आज यह आफत आनेवाली है, नहीं तो पहले से तैयार न हो जाता। जानते हो, यहाँ कारखाने का एक-न-एक आदमी कर्ज माँगने को सिर पर सवार रहता है। किस-किससे हीला करूँ? और फिर मुरौबत में हीला करने से भी तो काम नहीं चलता। रुपये निकालकर दे देता हूँ। यह उसी शराफत की सजा है। १५०) से कम न निकलेंगे, बल्कि चाहे २००) हो गये हों।"

चौधरी-"भला, सरकारी रकम इस तरह खरच की जाती है! आपने खरच को या किसी को उधार दे दी, बात एक ही है। वे लोग रुपये दे देंगे?"

ताहिर-"ऐसा खरा तो एक भी नहीं। कोई कहेगा, तनख्वाह मिलने पर दूंगा। कोई कुछ बहाना करेगा। समझ में नहीं आता, क्या करूँ?"

चौधरी-“घर में तो रुपये होंगे?"

ताहिर-"होने को क्या दो-चार सौ रूपये न होंगे; लेकिन जानते हो, औरतों का रुपया जान के पीछे रहता है। स्तुदा को जो मंजूर है, वह होगा।"

यह कहकर ताहिरअली अपने दो-चार दोस्तों की तरफ चले कि शायद यह हाल सुनकर लोग मेरी कुछ मदद करें, मगर कहीं न जाकर एक दरख्त के नीचे नमाज पढ़ने लगे। किसी से मदद की उम्मीद न थी।

इधर चौधरी ने चमारों से कहा-'भाइयो, हमरे मुंसीजी इस बखत तंग हैं। सत्र लोग थोड़ी-थोड़ी मदद करो, तो उनकी जान बच जाय। साहब अपने रुपये ही न लेंगे कि किसी की जान लेंगे। समझ लो, एक दिन नसा नहीं खाया।"

चौधरी तो चमारों से रुपये बटोरने लगा। ताहिर अली के दोस्तों ने यह हाल सुना, तो चुपके से दबक गये कि कहीं ताहिरअली कुछ माँग न बैठे। हाँ, जब तीसरे पहर दारोगा ने आकर तहकीकात करनी शुरू की और ताहिरअली को हिरासत में ले लिया,
[ ४३४ ]
तो लोग तमाशा देखने आ पहुँचे। घर में हाय-हाय मच गई। कुल्सूम ने जाकर जैनब से कहा-"लीजिए, अब तो आपका अरमान निकला!"

जैनब ने कहा-"तुम मुझसे क्या बिगड़ती हो बेगम! अरमान निकले होंगे, तो तुम्हारे, न निकले होंगे, तो तुम्हारे। मैंने थोड़े ही कहा था कि जाकर किसी के घर में डाका मारो। गुलछरें तुमने उड़ाये होंगे, यहाँ तो रोटी-दाल के सिवा और किसी का कुछ नहीं जानते।"

कुल्सूम के पास तो कफन को कौड़ी भी न थी, जैनब के पास रुपये थे, पर उसने दिल जलाना ही काफी समझा। कुल्सूम को इस समय ताहिरअली से सहानुभूति न थी। उसे उन पर क्रोध आ रहा था, जैसे किसी को अपने बच्चे को चाकू से उँगली काटते देखकर गुस्सा आये।

संध्या हो रही थी। ताहिरअली के लिए दारोगा ने एक इक्का मँगवाया। उस पर चार कांस्टेबिल उन्हें लेकर बैठे। दारोगा जानता था कि यह माहिरअली के भाई हैं, कुछ लिहाज करता था। चलते वक्त बोला, अगर आपको घर में किसी से कुछ कहना हो, तो आप जा सकते हैं; औरतें घबरा रही होंगी, उन्हें जरा तस्कीन देते आइए। पर ताहिरअली ने कहा, मुझे किसी से कुछ नहीं कहना है। वह कुल्सूम को अपनी सूरत न दिखाना चाहते थे, जिसे उन्होंने जान-बूझकर गारत किया था और निराधार छोड़े जाते थे। कुल्सूम द्वारी पर खड़ी थी। उसका क्रोध प्रतिक्षण शोक की सूरत पकड़ता जाता था, यहाँ तक कि जब इक्का चला, तो वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी। बच्चे 'अब्बा, अब्बा' करते इक्के के पीछे दौड़े। दारोगा ने उन्हें एक-एक चवन्नी मिठाई खाने को देकर फुसला दिया। ताहिर अली तो उधर हिरासत में गये, इधर घड़ी रात जाते-जाते चमारों का चौधरी रुपये लेकर मिस्टर सेवक के पास पहुँचा। साहब बोले-'ये रुपये तुम उनके घरवालों को दे दो, तो उनका गुजर हो जाय। मुआमला अब पुलिस के हाथ में है, मैं कुछ नहीं कर सकता।"

चौधरी—"हजूर, आदमी से खता हो ही जाती है, इतने दिनों तक आपकी चाकरी की, हजूर को उन पर कुछ दया करनी चाहिए। बड़ा भारी परिवार है सरकार, बाल-बच्चे भूखों मर जायेंगे।"

जॉन सेवक—"मैं यह सब जानता हूँ, बेशक उनका खर्च बहुत था। इसीलिए मैंने माल पर कटौती दे दी थी। मैं जानता हूँ कि उन्होंने जो कुछ किया है, मजबूर होकर किया है। लेकिन विष 'किसी नीयत से खाया जाय, विष ही का काम करेगा, कभी अमृत नहीं हो सकता। विश्वासघात विष से कम घातक नहीं होता। तुम ये रुपये ले जाकर उनके घरवालों को दे दो। मुझे खाँ साहब से कोई बिगाड़ नहीं है, लेकिन अपने धर्म को नहीं छोड़ सकता। पाप को क्षमा करना पाप करना है।"

चौधरी यहाँ से निराश होकर चला गया। दूसरे दिन अभियोग चला। ताहिरअली दोषी पाये गये। वह अपनी सफाई न पेश कर सके। छ महीने की सजा हो गई। [ ४३५ ]
जब ताहिरअली कांस्टेबिलों के साथ जेल की तरफ जा रहे थे, तो उन्हें माहिर अली ताँगे पर सवार आता हुआ दिखाई दिया। उनका हृदय गद्गद् हो गया। आँखों से आँसू की झड़ी लग गई। समझे, माहिर मुझसे मिलने दौड़ा चला आता है। शायद आज ही आया है, और आते-ही-आते यह खबर पाकर बेकरार हो गया है। जब ताँगा समीप आ गया, तो वह चिल्लाकर रोने लगे। माहिरअली ने एक बार उन्हें देखा, लेकिन न सलाम-बंदगी की, न ताँगा रोका, न फिर इधर दृष्टिपात किया, मुँह फेर लिया, मानों देखा ही नहीं। ताँगा ताहिरअली की बगल से निकल गया। उनके मर्मस्थल से एक सर्द आह निकल गई। एक बार फिर चिल्लाकर रोये। वह आनंद की ध्वनि थी, यह शोक का विलाप; वे आँसू की बूंदें थीं, ये खून की।

किंतु एक ही क्षण में उनकी आत्मवेदना शांत हो गई-"माहिर ने मुझे देखा ही न होगा। उसकी निगाह मेरी तरफ उठी जरूर थी, लेकिन शायद वह किसी खयाल में डूबा हुआ था। ऐसा होता भी तो है कि जब हम किसी खयाल में होते हैं, तो न सामने की चीजें दिखाई देती हैं, न करीब की बातें सुनाई देती हैं। यही सबब है। अच्छा ही हुआ कि उसने मुझे न देखा, नहीं तो इधर मुझे नदामत होती, उधर उसे रंज होता।"

उधर माहिरअली मकान पर पहुंचे, तो छोटे भाई आकर लिपट गये। ताहिर अली के दोनों बच्चे भी दौड़े, और "माहिर चाचा आये' कहकर उछलने-कूदने लगे। कुल्सूम भी रोती हुई निकल आई। सलाम-बंदगी के पश्चात् माहिर अपनी माता के पास गये। उसने उन्हें छाती से लगा लिया।

माहिर-"तुम्हारा खत न जाता, तो अभी मैं थोड़े ही आता। इम्तहान के बाद ही तो वहाँ मजा आता है, कभी मैच, कभी दावत, कभी सैर, कभी मुशायरे। भाई साहब को यह क्या हिमाकत सूझी!"

जैनब-"बेगम साहब की फरमाइशें कैसे पूरी होती! जेवर चाहिए, जरदा चाहिए, जरी चाहिए, कहाँ से आता! उस पर कहती हैं, तुम्हीं लोगों ने उन्हें मटियामेट किया। पूछो, रोटी-दाल में ऐसा कौन-सा छप्पन टके का खर्च था। महीनों सिर में तेल डालना नसीब न होता था। अपने पास से पैसे निकालो, तो पान खाओ। उस पर इतने ताने!"

माहिर-"मैंने तो स्टेशन से आते हुए उन्हें जेल जाते देखा। मैं तो शर्म के मारे उनसे कुछ न बोला, बंदगी तक न की। आखिर लोग यही न कहते कि इनका भाई जेलखाने जा रहा है! मुँह फेरकर चला आया। भैया रो पड़े। मेरा दिल भी मसोस उठा, जी चाहता था, उनके गले लिपट जाऊँ; लेकिन शर्म आ गई। थानेदार कोई मामूली आदमी नहीं होता। उसका शुमार हुक्काम में होता है। इसका खयाल न करूँगा, तो बदनाम हो जाऊँगा।"

जैनब—"छ महीने की सजा हुई है।"

माहिर—"जुर्म तो बड़ा था, लेकिन शायद हाकिम ने रहम किया।"

२८ [ ४३६ ]जैनब-"तुम्हारे अब्बा का लिहाज किया होगा; नहीं तो तीन साल से कम के लिए न जाते।"

माहिर—"खानदान में दाग लगा दिया। बुजुर्गों की आबरू खाक में मिला दी।"

जैनब—"नुदा न करे कि कोई मर्द औरत का कलमा पढ़े।"

इतने में मामा नाश्ते के लिए मिठाइयाँ लाई। माहिरअली ने एक मिटाई जाहिर को दी, एक जाबिर को। इन दोनों ने जाकर साबिर और नसीमा को दिखाई। वे दोनों भी दौड़े। जैनब ने कहा-“जाओ, खेलते क्यों नहीं! क्या सिर पर डट गये? न जाने कहाँ के मरभुखे छोकरे हैं। इन सबों के मारे कोई चीज मुँह में डालनी मुश्किल है। बला की तरह सिर पर सवार हो जाते हैं। रात-दिन खाते ही रहते हैं, फिर भी जी नहीं भरता।"

रकिया—"छिछोरी माँ के बच्चे और क्या होंगे!"

माहिर ने एक-एक मिठाई उन दोनों को भी दी। तब बोले-"अब गुजर-बसर की क्या सूरत होगी? भाभी के पास तो रुपये होंगे न?”

जैनव-"होंगे क्यों नहीं। इन्हीं रुपयों के लिए तो खसम को जेल भेजा। देखती हूँ, क्या इंतजाम करती हैं। यहाँ किसी को क्या गरज पड़ी है कि पूछने जाय।"

माहिर-"मुझे अभी न जाने कितने दिनों में जगह मिले। महीना-भर लग जाय, दो महीने लग जायँ। तब तक मुझे दिक मत करना।"

जैनब-"तुम इसका गम न करो बेटा! वह अपना सँभालें, हमारा भी खुदा हाफिज है। वह पुलाव खाकर सोयेंगी, तो हमें मी रूखी रोटियाँ मयस्सर हो ही जायँगी।"

जब शाम हो गई, तो जैनब ने मामा से कहा- “जाकर बेगम साहब से पूछो, कुछ सौदा-सुलफ आयेगा, या आज मातम मनाया जायगा।"

मामा ने लौट आकर कहा-"वह तो बैठी रो रही हैं। कहती हैं, जिसे भूख हो, खाय; मुझे नहीं खाना है।"

जैनब-"देखा! यह तो मैं पहले ही कहती थी कि साफ जवाब मिलेगा। जानती है कि लड़का परदेस से आया है, मगर पैसे न निकलेंगे। अपने और अपने बच्चों के लिए बाजार से खाना मँगवा लेगी, दूसरे खाये या मरें, उसकी बला से। खैर, उन्हें उनके मीठे टुकड़े मुबारक रहें, हमारा भी अल्लाह मालिक है।"

कुल्सुम ने जब से सुना था कि ताहिरअली को छ महीने की सजा हो गई, तभी से उसकी आँखों में अँधेरा-सा छाया हुआ था। मामा का संदेश सुना, तो जल उठी। बोली-“उनसे कह दो, पकायें-खाये, यहाँ भूख नहीं है। बच्चों पर रहम आये, तो दो नेवाले इन्हें भी दे दें।"

मामा ने इसी वाक्य का अन्वय किया था, जिसने अर्थ का अनर्थ कर दिया।

रात के नौ बज गये कुल्सूम देख रही थी कि चूल्हा गर्म है। मसाले की सुगंध
[ ४३७ ]
नाक में आ रही थी, बघार को आवाज भी सुनाई दे रही थी, लेकिन बड़ी देर तक कोई उसके बच्चों को बुलाने न आया, तो वह बैन कर-करके रोने लगी। उसे मालूम हो गया कि घरवालों ने साथ छोड़ दिया और अब मैं अनाथ हूँ, संसार में कोई मेरा नहीं। दोनों बच्चे रोते-रोते सो गये थे। उन्हीं के पैताने वह भी पड़ रही। भगवान्, ये दो-दो बच्चे, पास फूटी कौड़ी नहीं, घर के आदमियों का यह हाल, यह नाव कैसे पार लगेगी!

माहिरअली भोजन करने बैठे, तो मामा से पूछा—"भाभी ने भी कुछ बाजार से मँगवाया है कि नहीं?"

जैनब—"मामा से मँगवायेंगी, तो परदा न खुल जायगा! खुदा के फजल से साबिर सयाना हुआ। गुपचुप सौदे वही लाता है, और इतना घाघ है कि लाख फुसलाओ, पर मुँह नहीं खोलता।"

माहिर—“पूछ लेना। ऐसा न हो कि हम लोग खाकर सोयें, और वह बेचारी रोजे से रह जायँ।"

जैनब—"ऐसी अनीली नहीं हैं, वह हम-जैसों को चरा लायें। हाँ, पूछना मेरा फर्ज है, पूछ लूंँगी।"

रकिया—"सालन और रोटी किस मुंँह से खायेंगी, उन्हें तो जरदा-शीरमाल चाहिए।"

दूसरे दिन सबेरे दोनों बच्चे बावर्चीखाने में गये, तो जैनब ने ऐसी कड़ी निगाहों से देखा कि दोनों रोते हुए लौट आये। अब कुल्सूम से न रहा गया। वह झलाकर उठी और बावर्चीखाने में जाकर मामा से बोली—“तूने बच्चों को खाना क्यों नहीं दिया रे? क्या इतनी जल्द काया-पलट हो गई ? इसी घर के पीछे हम मिट्टी में मिल गये और मेरे लड़के भूखों तड़पें, किसी को दर्द न आये?"

मामा ने कहा —"तो आप मुझसे क्या बिगड़ती है, मैं कौन होती हूँ, जैसा हुक्म पाती हूँ, वैसा करती हूँ।"

जैनब अपने कमरे से बोली—"तुम मिट्टी में मिल गई, तो यहाँ किमने घर भर लिया? कल तक कुछ नाता निभा जाता था, वह भी तुमने तोड़ दिया। बनियें के यहाँ से कर्ज जिंस आई, तो मुँह में दाना गया। सौ कोस से लड़का आया, तुमने बात तक न पूछी। तुम्हारी नेकी कोई कहाँ तक गाये।"

आज से कुल्सूम को रोटियों के लाले पड़ गये। माहिरअली कभी दोनों भाइयों को लेकर नानबाई की दूकान से भोजन कर आते, कभी किसी इष्ट-मित्र के मेहमान हो जाते। जैनब और रकिया के लिए मामा चुपके चुपके अपने घर से खाना बना लाती। घर में चूल्हा न जलता। नसीमा और साबिर प्रातःकाल घर से निकल जाते। कोई कुछ दे देता, तो खा लेते। जैनब और रकिया की सूरत से ऐसे डरते थे, जैसे चूहा बिल्ली से। माहिर के पास भी न जाते। बच्चे शत्रु और मित्र को खूब पहचानते हैं। अब वे प्यार के भूखे नहीं, दया के भूखे थे । रही कुल्सूम, उसके लिए गम ही काफी था। वह सीना-
[ ४३८ ]
पिरोना जानती थी, चाहती, तो सिलाई करके अपना निर्वाह कर लेती; पर जलन के मारे कुछ न करती थी। वह माहिर के मुँह में कालिख लगाना चाहती थी, चाहती थी कि दुनिया मेरी दशा देखे और इन पर थूके। उसे अब ताहिरअली पर भी क्रोध आता था-"तुम इसी लायक थे कि जेल में पड़े-पड़े चक्की पीसो। अब आँखें खुलेंगी। तुम्हें दुनिया के हँसने की फिक्र थी। अब दुनिया किसी पर नहीं हँसती! लोग मजे से मीठे लुकमे उड़ाते और मीठी नींद सोते हैं। किसी को तो नहीं देखती कि झूठ भी इन मतलब के बंदों की फजीहत करे। किसी को गरज ही क्या पड़ी है कि किसी पर हँसे। लोग समझते होंगे, ऐसे कमसमझों, लाज पर मरनेवालों की यही सजा है।"

इस भाँति एक महीना गुजर गया। एक दिन सुभागी कुल्सूम के यहाँ साग-भाजी लेकर आई। वह अब यही काम करती थी। कुल्सूम की सूरत देखी, तो बोली-"बहूजी, तुम तो पहचानी ही नहीं जातीं। क्या कुढ़-कुढ़कर जान दे दोगी? बिपत तो पड़ ही गई है, कुढ़ने से क्या होगा? मसल है, आँधी आये, बैठ गँवाये। तुम न रहोगी, तो बच्चों को कौन पालेगा? दुनिया कितनी जल्द अंधी हो जाती है! बेचारे खाँ साहब इन्हीं लोगों के लिए मरते थे। अब कोई बात भी नहीं पूछता। घर-घर यही चर्चा हो रही है कि इन लोगों को ऐसा न करना चाहिए था। भगवान् को क्या मुँह दिखायेंगे!"

कुल्सूम—"अब तो भाड़ लीपकर हाथ काला हो गया।"

सुभागी—"बहू, कोई मुँह पर न कहे, लेकिन सब थुड़ी-थुड़ी करते हैं। बेचारे नन्हे-नन्हे बालक मारे-मारे फिरते हैं, देखकर कलेजा फट जाता है। कल तो चौधरी ने माहिर मियाँ को खूब आड़े हाथों लिया था।"

कुसूम को इन बातों से बड़ी तस्कीन हुई। दुनिया इन लोगों को थूकती तो है, इनकी निंदा तो करती है, इन बेहयाओं को लाज ही न हो, तो कोई क्या करे। बोली- "किस बात पर?”

सुभागी कुछ जवाब न देने पाई थी कि बाहर से चौधरी ने पुकारा। सुभागी ने जाकर पूछा—"क्या कहते हो?"

चौधरी—"बहूजी से कुछ कहना है। जरा परदे की आड़ में खड़ी हो जायँ।" दोपहर का समय था। घर में सन्नाटा छाया हुआ था। जैनब और रकिया किसी औलिया के मजार पर शीरीनी चढ़ाने गई थीं। कुल्सूम परदे की आड़ में आकर खड़ी हो गई।

चौधरी—"बहूजी, कई दिन से आना चाहता था, पर मौका ही न मिलता था। जब आता, तो माहिर मियाँ को बैठे देखकर लौट जाता था। कल माहिर मियाँ मुझसे कहने लगे, तुमने भैया की मदद के लिए जो रुपये जमा किये थे, वे मुझे दे दो, भाभी ने माँगे हैं। मैंने कहा, जब तक बहूजी से खुद न पूछ लूँगा, आपको न दूंँगा। इस पर बहुत बिगड़े। कच्ची-पक्की मुँह से निकालने लगे—समझ लूँगा, बड़े घर भिजवा
[ ४३९ ]
दूंँगा। मैंने कहा, जाइए, समझ लीजिएगा। तो अब आपका क्या हुकुम है? ये सब रुपये अभी तक मेरे पास रखे हुए हैं, आपको दे दूँ न? मुझे तो आज मालूम हुआ कि वे लोग आपके साथ दगा कर गये!"

कुल्सूम ने कहा—"नुदा तुम्हें इस नेकी का सवाब देगा। मगर ये रुपये जिसके हों, उन्हें लौटा दो। मुझे इनकी जरूरत नहीं है।"

चौधरी—"कोई न लौटायेगा।"

कुल्सूम—"तो तुम्ही अपने पास रखो।"

चौधरी—"आप लेती क्यों नहीं? हम कोई औसान थोड़े ही जताते हैं। खाँ साहब की बदौलत बहुत कुछ कमाया है, दूसरा मुंसी होता, तो हजारों रुपये नजर ले लेता।

यह उन्हीं की नजर समझी जाय।”

चौधरी ने बहुत आग्रह किया, पर कुल्सूम ने रुपये न लिये। वह माहिरअली को दिखाना चाहती थी कि जिन रुपयों के लिए तुम कुत्तों की भाँति लपकते थे, उन्हीं रुपयों को मैंने पैर से ठुकरा दिया। मैं लाख गई-गुजरी हूँ, फिर भी मुझमें कुछ गैरत बाकी है, तुम मर्द होकर बेहयाई पर कमर बाँधे हुए हो।

चौधरी यहाँ से चला, तो सुभागी से बोला-"यही बड़े आदमियों की बातें हैं। चाहे टुकड़े-टुकड़े उड़ जायँ, मुदा किसी के सामने हाथ न पसारेंगी। ऐसा न होता, तो छोटे-बड़े में फरक ही क्या रहता! धन से बड़ाई नहीं होती, धरम से होती है।"

इन रुपयों को लौटाकर कुल्सूम का मस्तक गर्व से उन्नत हो गया। आज उसे पहली बार ताहिरअली पर अभिमान हुआ-"यह इज्जत है कि पीठ-पीछे दुनिया बड़ाई करती रहे। उस बेइज्जती से तो मर जाना ही अच्छा कि छोटे-छोटे आदमी मुँह पर लताड़ सुनायें। कोई लाख उनके एहसान को मिटाये, पर दुनिया तो इंसाफ करती है। रोज ही तो अमले सजा पाते रहते हैं। कोई तो उनके बाल-बच्चों की बात नहीं पूछता। बल्कि उलटे और लोग ताने देते हैं। आज उनकी नेकनामी ने मेरा सिर ऊँचा कर दिया।"

सुभागी ने कहा—"बहुजी, बहुत औरतें देखीं, लेकिन तुम-जैसी धीरजवाली बिरली ही कोई होगी। भगवान तुम्हारा संकट हरें।"

वह चलने लगी, तो कई अमरूद बच्चों के लिये रख दिये।

कुल्सूम ने कहा—'मेरे पास पैसे नहीं हैं।"

सुभागी मुस्किराकर चली गई।


_______