विकिस्रोत:सप्ताह की पुस्तक/१

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चन्द्रकान्ता सन्तति 5 बाबू देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित उपन्यास है जिसका प्रकाशन सन् १८९६ ई॰ में दिल्ली के भारती भाषा प्रकाशन द्वारा किया गया था।


"लीला को जमानिया की खबरदारी पर मुकर्रर करके मायारानी काशी वाले नागर के मकान में चली गई थी और वहाँ दारोगा के आ जाने पर उसके साथ इन्द्रदेव के यहाँ चली गई। जब इन्द्रदेव के यहाँ से भी वह भाग गई और दारोगा तथा शेरअली खाँ की मदद से रोहतासगढ़ के अन्दर घुसने का प्रबन्ध किया गया, जैसा कि सन्तति के बारहवें भाग के तेरहवें बयान में लिखा गया है उस समय लीला भी मायारानी के साथ थी, मगर रोहतासगढ़ में जाने के पहले मायारानी ने उसे अपनी हिफाजत का जरिया बनाकर पहाड़ के नीचे ही छोड़ दिया था। मायारानी ने अपना तिलिस्मी तमंचा, जिससे बेहोशी बारूद की गोली चलाई जाती थी, लीला को देकर कह दिया था कि मैं शेरअली खाँ की मदद से और उन्हीं के भरोसे पर रोहतासगढ़ के अन्दर जाती हूँ मगर ऐयारों के हाथ मेरा गिरफ्तार हो जाना कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के ऐयार बड़े ही चालाक हैं। यद्यपि उनसे बचे रहने की पूरी-पूरी तरकीब की गई है मगर फिर भी मैं बेफिक्र नहीं रह सकती, अस्तु, यह तिलिस्मी तमंचा तू अपने पास रख और इस पहाड़ के नीचे ही रहकर हम लोगों के बारे में टोह लेती रह। अगर हम लोग अपना काम करके राजी-खुशी के साथ लौट आये तब तो कोई बात नहीं। ईश्वर न करे यदि मैं गिरफ्तार हो जाऊँ तो तू मुझे छुड़ाने का बन्दोबस्त करना और इस तमंचे से काम निकालना। इसमें चलाने वाली गोलियाँ और वह ताम्र-पत्र भी मैं तुझे दिए जाती हूँ जिसमें गोली बनाने की तरकीब लिखी हुई है।..."(पूरा पढ़ें)