विवेकानंद ग्रंथावली:ज्ञान-योग

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विवेकानंद ग्रंथावली : ज्ञान-योग  (1923) 
द्वारा स्वामी विवेकानंद, अनुवाद जगन्मोहन वर्मा
[ आवरण-पृष्ठ ]
 

सूर्यकुमारी पुस्तकमाला-

विवेकानंद ग्रंथावली

ज्ञान-योग।

दूसरा खंड।

अनुवादक—जगन्मोहन वर्म्मा।

विवेकानंद ग्रंथावली.djvu

प्रकाशक

काशी नागरीप्रचारिणी सभा।

संवत् १९८०
[मूल्य २॥)
 
[ मुद्रण ]






श्री गणपति कृष्ण गुर्जर द्वारा
श्री लक्ष्मीनारायण प्रेस काशी में मुद्रित। ७५१-२२
[ परिचय ]

जयपुर राज्य के शेखावाटी प्रांत में खेतड़ी राज्य है। वहाँ के राजा श्रीअजीतसिंहजी बहादुर बड़े यशस्वी और विधाप्रेमी हुए। गणितशास्त्र में उनकी अद्भुत गति थी। विज्ञान उन्हें बहुत प्रिय था। राजनीति में वह दक्ष और गुणग्राहिता में अद्वितीय थे। दर्शन और अध्यात्म की रुचि उन्हें इतनी थी कि विलायत जाने के पहले और पीछे स्वामी विवेकानंद उनके यहाँ महीनों रहे। स्वामीजी से घंटों शास्त्र-चर्चा हुआ करती। राजपूताने में प्रसिद्ध है कि जयपुर के पुण्यश्लोक महाराज श्रीरामसिंहजी को छोड़कर ऐसी सर्वतोमुख प्रतिभा राजा श्रीअजीतसिंहजी ही में दिखाई दी।

राजा श्रीअजीतसिंहजी की रानी आउआ (मारवाड़) चाँपावत- जी के गर्भ से तीन संतति हुई――दो कन्या, एक पुत्र। ज्येष्ठ कन्या श्रीमती सूरजकुँँवर थीं जिनका विवाह शाहपुरा के राजाधिराज सर श्रीनाहरसिंहजी के ज्येष्ठ चिरंजीव और युवराज राजकुमार श्रीउमेदसिंहजी से हुआ। छोटी कन्या श्रीमती चाँदकुँअर का विवाह प्रतापगढ़ के महारावल साहब के युवराज महाराजकुमार श्रीमानसिंहजी से हुआ। तीसरी संतान जयसिंहजी थे जो राजा श्रीअजीतसिंहजी और रानी चाँपावतजी के स्वर्गवास के पीछे खेतड़ी के राजा हुए।

इन तीनों के शुभचिंतकों के लिये तीनों की स्मृति संचित कर्मों के

परिणाम से दुःखमय हुई। जयसिंहजी का स्वर्गवास सत्रह वर्ष की अवस्था में हुआ और सारी प्रजा, सब शुभचिंतक, संबंधी, मित्र और गुरुजनों का हृदय आज भी उस आँच से जल ही रहा है। अश्वत्थामा के व्रण की तरह यह घाव कभी भरने का नहीं। ऐसे आशामय जीवन का ऐसा निराशात्मक परिणाम कदाचित ही हुआ हो। श्रीसूर्यकुँँवर बाईजी को एक मात्र भाई के वियोग की ऐसी ठेस लगी कि दो ही तीन वर्ष में उनका शरीरांत हुआ। श्रीचाँदकुँवर बाईजी को वैधव्य की विषम यातना भोगनी पड़ी और भाववियोग और पति-वियोग दोनों का असह्य दुःख वे झेल रही है। उनके [ परिचय ]
[ २ ]


एकमात्र चिरंजीव प्रतापगढ़ के कुँवर श्रीरामसिंहजी से मातामह राजा श्रीअजीतसिंहजी का कुल प्रजावान् है।

श्रीमती सूर्यकुमारीजी के कोई संतति जीवित न रही। उनके बहुत आग्रह करने पर भी राजकुमार श्रीउमेदसिंहजी ने उनके जीवन-काल में दूसरा विवाह नहीं किया। किंतु उनके वियोग के पीछे, उनके आज्ञानुसार कृष्णगढ़ में विवाह किया जिससे उनके चिरंजीव वंशांकुर विद्यमान हैं।

श्रीमती सूर्यकुमारीजी बहुत शिक्षिता थीं। उनका अध्ययन बहुत विस्तृत था। उनका हिंदी का पुस्तकालय परिपूर्ण था। हिंदी इतनी अच्छी लिखती थीं और अक्षर इतने सुंदर होते थे कि देखनेवाला चमत्कृत रह जाता। स्वर्गवास के कुछ समय के पूर्व श्रीमती ने कहा था कि स्वामी विवेकानंदजी के सब ग्रंथों, व्याख्यानों और लेखों का प्रामाणिक हिंदी अनुवाद मैं छपवाऊँगी। वाल्यकाल से ही स्वामीजी के लेखों और अध्यात्म, विशेषतः अद्वैतवेदांत, की ओर श्रीमती की रुचि थी। श्रीमती के निर्देशानुसार इसका कार्यक्रम बाँधा गया। साथ ही श्रीमती ने यह इच्छा प्रकट की कि इस संबंध में हिंदी में उत्तमोत्तम ग्रंथों के प्रकाशन के लिये एक अक्षय नीवी की व्यवस्था का भी सूत्रपात हो जाय। इसका व्यवस्थापत्र बनते न बनते श्रीमती का स्वर्गवास हो गया।

राजकुमार श्रीउमेदसिंहजी ने श्रीमती की अंतिम कामना के अनुसार

लगभग एक लाख रुपया श्रीमती के इस संकल्प की पूर्ति के लिये विनियोग किया। काशी नागरीप्रचारिणी सभा के द्वारा इस ग्रंथमाला के प्रकाशन की व्यवस्था हुई है। स्वामी विवेकानंदजी के यावत् निबंधों के अतिरिक्त और भी उत्तमोत्तम ग्रंथ इस ग्रंथमाला में छापे जायँगे और लागत से कुछ ही अधिक मूल्य पर सर्वसाधारण के लिये सुलभ होंगे। इस ग्रंथमाला की बिक्री की आय इसी अक्षय नीवी में जोड़ दी जायगी। यों श्रीमती सूर्य्यकुंभारी तथा श्रीमान् उमेदसिंहजी के पुण्य तथा यश की निरंतर वृद्धि होगी और हिंदी भाषा का अभ्युदय तथा उसके पाठकों को ज्ञान-लाभ। [ व्याख्यान-सूची ]

व्याख्यान-सूची

पृष्ठांक
(१७) कर्म-वेदांत ......... १-३०
(१८) कर्म-वेदांत ......... ३०-५९
(१९) कर्म-वेदांत ......... ६०-७९
(२०) कर्म-वेदांत ......... ७९-१०६
(२१) विश्वव्यापी धर्म की प्राप्ति का मार्ग ......... १०६-१३०
(२२) विश्वव्यापी धर्म का आदर्श ......... १३१-१६६
(२३) प्रकट-रहस्य ......... १६६-१७९
(२४) सुख का मार्ग ......... १७९-१९२
(२५) याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी ......... १९३-२०२
(२६) आत्मा और परमात्मा ......... २०३-२२०
(२७) जीवात्मा, प्रकृति और परमात्मा ......... २२०-२३१
(२८) विश्व-विधान ......... २३२-२४५
(२९) सांख्य-दर्शन ......... २४६-२६१
(३०) सांख्य और वेदांत ......... २६१-२७४
(३१) धर्म का लक्ष एकता वा अभेद है ......... २७४-२८१
(३२) मुक्त आत्मा ......... २८१-३००
(३३) एक ही अनेक भासमान है ......... ३००-३१५

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