साहित्य का उद्देश्य/1

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है। जिज्ञासा का सम्बन्ध विचार से है, प्रयोजन का सम्बन्ध स्वार्थ-बुद्धि से। आनन्द का सम्बन्ध मनोभावों से है। साहित्य का विकास मनोभावों द्वारा ही होता है । एक दृश्य या घटना या काड को हम तीनो ही भिन्न- भिन्न नजरो से देख सकते है । हिम से ढंके हुए पर्वत पर ऊषा का दृश्य दार्शनिक के गहरे विचार की वस्तु है, वैज्ञानिक के लिए अनुसन्धान की, और साहित्यिक के लिए विह्वलता की। विह्वलता एक प्रकार का आत्म-समर्पण है। यहाँ हम पृथक्ता का अनुभव नही करते । यहाँ ऊँच-नीच, भले-बुरे का भेद नहीं रह जाता। श्रीरामचन्द्र शवरी के जूठे बेर क्यो प्रेम से खाते है, कृष्ण भगवान विदुर के शाक को क्यो नाना व्यञ्जनो से रुचिकर समझते है ? इसीलिए कि उन्होंने इस पार्थक्य को मिटा दिया है। उनकी आत्मा विशाल है। उसमे समस्त जगत् के लिए स्थान है । आत्मा अात्मा से मिल गयी है। जिसकी आत्मा जितनी ही विशाल है, वह उतना ही महान पुरुष है। यहाँ तक कि ऐसे महान् पुरुष भी हो गये हैं, जो जड जगत् से भी अपनी आत्मा का मेल कर सके है।

आइये देखें, जीवन क्या है ? जीवन केवल जीना, खाना, सोना और मर जाना नहीं है । यह तो पशुत्रो का जीवन है। मानव-जीवन मे भी यह सभी प्रवृत्तियाँ होती हैं , क्योकि वह भी तो पशु है। पर इनके उपरान्त कुछ और भी होता है। उनमे कुछ ऐसी मनोवृत्तियाँ होती हैं, जो प्रकृति के साथ हमारे मेल मे बाधक होती है, कुछ ऐसी होती हैं, जो इस मेल मे सहायक बन जाती है। जिन प्रवृत्तियो मे प्रकृति के साथ हमारा सामजस्य बढ़ता है, वह वाछनीय होती है, जिनसे सामंजस्य मे बाधा उत्पन्न होती है, वे दूषित है। अहङ्कार, क्रोध या द्वेष हमारे मन की बाधक प्रवृत्ति है । यदि हम इनको बेरोक-टोक चलने दे, तो निस्सदेह वह हमे नाश और पतन की ओर ले जायेंगी, इसलिए हमे उनकी लगाम रोकनी पड़ती है, उन पर संयम रखना पड़ता है, जिसमे वे अपनी
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सीमा से बाहर न जा सके । हम उन पर जितना कठोर सयम रख सकते हैं, उतना ही मगलमय हमारा जीवन हो जाता है ।

किन्तु नटखट लड़को से डॉटकर कहना-तुम बडे बदमाश हो, हम तुम्हारे कान पकड़कर उखाड लेगे-अक्सर व्यर्थ ही होता है, बल्कि उस प्रवृत्ति को और हठ की ओर ले जाकर पुष्ट कर देता है। जरूरत यह होती है, कि बालक मे जो सवृत्तियाँ है उन्हे ऐसा उत्तेजित किया जाय, कि दूषित वृत्तियों स्वाभाविक रूप से शान्त हो जायें। इसी प्रकार मनुष्य को भी आत्मविकास के लिए सयम की आवश्यकता होती है। साहित्य ही मनोविकारो के रहस्य खोलकर सदवृत्तियो को जगाता है । सत्य को रसो-द्वारा हम जितनी आसानी से प्राप्त कर सकते है, ज्ञान और विवेक द्वारा नही कर सकते, उसी भाँति जैसे दुलार-चुमकारकर बच्चो को जितनी सफलता से वश मे किया जा सकता है, डॉट-फटकार से सम्भव नहीं। कौन नहीं जानता कि प्रेम से कठोर-से-कठोर प्रकृति को नरम किया जा सकता है । साहित्य मस्तिष्क की वस्तु नहीं, हृदय की वस्तु है । जहाँ ज्ञान और उपदेश असफल होता है, वहाँ साहित्य बाजी ले जाता है । यही कारण है, कि हम उपनिपदो और अन्य धर्म-ग्रथो को साहित्य की सहायता लेते देखते है। हमारे धर्माचार्यों ने देखा कि मनुष्य पर सबसे अधिक प्रभाव मानव-जीवन के दुःख-सुख के वर्णन से ही हो सकता है और उन्होने मानव-जीवन की वे कथाएँ रची,जो आज भी हमारे आनंद की वस्तु है । बौद्धो की जातक-कथाएँ, तौरेह, कुरान, इखील ये सभी मानवी कथात्रो के सग्रहमात्र है। उन्हीं कथानो पर हमारे बडे-बडे धर्म स्थिर है । वही कथाएँ धर्मों की आत्मा है । उन कथाओ को निकाल दीजिए, तो उस धर्म का अस्तित्व मिट जायगा । क्या उन धर्म-प्रवर्तकों ने अकारण ही मानवी जीवन की कथाओ का आश्रय लिया १ नहीं, उन्होंने देखा कि हृदय द्वारा ही जनता की आत्मा तक अपना सन्देशा पहुँचाया जा सकता है। वे स्वय विशाल हृदय के मनुष्य थे। उन्होने मानव जीवन
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से अपनी आत्मा का मेल कर लिया था। समस्त मानवजाति से उनके जीवन का सामञ्जस्य था, फिर वे मानव-चरित्र की उपेक्षा कैसे करते ?

अादि काल से मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य है । हम जिसके सुख दुःख, हंसने-रोने का मर्म समझ सकते है, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है । विद्यार्थी को विद्यार्थी-जीवन से,कृषक को कृषक- जीवन से जितनी रुचि है, उतनी अन्य जातियों से नहीं, लेकिन साहित्य- जगत् मे प्रवेश पाते ही यह भेद, यह पार्थक्य मिट जाता है। हमारी मानवता जैसे विशाल और विराट् होकर समस्त मानव-जाति पर अधि- कार पा जानी है। मानव-जाति ही नही, चर और अचर, जड़ और चेतन सभी उसके अधिकार में आ जाते हैं । उसे मानो विश्व की आत्मा पर साम्राज्य प्राप्त हो जाता है। श्री रामचन्द्र राजा थे; पर आज रंक भी उनके दुःख से उतना ही प्रभावित होता है, जितना कोई राजा हो सकता है । साहित्य वह जादू की लकड़ी है, जो पशुश्रो मे, ईट-पत्थरों मे, पेड-पौधों मे विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है । मानव हृदय का जगत् , इस प्रत्यक्ष जगत् जैसा नही है । हम मनुष्य होने के कारण मानव-जगत् के प्राणियो मे अपने को अधिक पाते है, उनके सुख-दु:ख, हर्ष और विषाद से ज्यादा विचलित होते है । हम अपने निकटतम बन्धु- बाधवों से अपने को इतना निकट नहीं पाते, इसलिए कि हम उनके एक एक विचार, एक-एक उद्गार को जानते हैं, उनका मन हमारी नजरो के सामने आईने की तरह खुला हुआ है । जीवन मे ऐसे प्राणी हमे कहाँ मिलते हैं, जिनके अन्तःकरण मे हम इतनी स्वाधीनता से विचर सकें। सच्चे साहित्यकार का यही लक्षण है कि उसके भावो मे व्यापकता हो, उसने विश्व की आत्मा से ऐसी Harmony प्राप्त कर ली हो कि. उसके भाव प्रत्येक प्राणी को अपने ही भाव मालूम हो ।

साहित्यकार बहुधा अपने देश काल से प्रभावित होता है । जब कोई लहर देश मे उठती है, तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है और उसकी विशाल आत्मा अपने देश-बन्धुओं के
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कष्टो से विकल हो उठती है और इस तीव्र विकलता मे वह रो उठता है,पर उसके रुदन मे भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक रहता है । 'टाम काका की कुटिया' गुलामी की प्रथा से व्यथित हृदय की रचना है; पर आज उस प्रथा के उठ जाने पर भी उसमे वह व्यापकता है कि हम लोग भी उसे पढकर मुग्ध हो जाते है। सच्चा साहित्य कभी पुराना नही होता । वह सदा नया बना रहता है । दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदले रहते हैं, पर साहित्य तो हृदय की वस्तु है और मानव हृदय मे तबदीलियों नहीं होतीं । हर्ष और विस्मय, क्रोध और द्वेष, श्राशा और भय, आज भी हमारे मन पर उसी तरह अधिकृत हैं, जैसे आदिकवि वाल्मीकि के समय मे थे और कदाचित् अनन्त तक रहेगे । रामायण के समय का समय अब नहीं है। महाभारत का समय भी अतीत हो गया: पर ये ग्रन्थ अभी तक नये है। साहित्य ही सच्चा इतिहास है क्योंकि उसमे अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है, वैसा कोरे इतिहास में नहीं हो सकता । घटनाप्रो की तालिका इतिहास नही है और न राजाश्रो की लडाइयाँ ही इतिहास है। इतिहास जीवन के विभिन्न अङ्गों की प्रगति का नाम है, और जीवन पर साहित्य से अधिक प्रकाश और कौन वस्तु डाल सकती है क्योंकि साहित्य अपने देश काल का प्रतिबिम्ब होता है ।

जीवन मे साहित्य की उपयोगिता के विषय मे कभी-कभी सन्देह किया जाता है। कहा जाता है, जो स्वभाव से अच्छे है, वह अच्छे ही रहेगे, चाहे कुछ भी पढ़ें । जो स्वभाव के बुरे हैं, वह बुरे ही रहेंगे, चाहे कुछ भी पढ़े। इस कथन मे सत्य की मात्रा बहुत कम है । इसे सत्य मान लेना मानव-चरित्र को बदल लेना होगा । जो सुन्दर है, उसकी अोर मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण होता है ।हम कितने ही पतित हो जायँ पर असुन्दर की ओर हमारा आकर्षण नहीं हो सकता । हम कर्म चाहे कितने ही बुरे करे पर यह असम्भव है कि करुणा और दया और प्रेम और भक्ति का हमारे दिलो पर असर न हो । नादिरशाह से ज्यादा निर्दयी मनुष्य और
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कौन हो सकता है-हमारा आशय दिल्ली मे कतलाम करानेवाले नादिरशाह से है। अगर दिल्ली का कतलाम सत्य घटना है, तो नादिरशाह के निर्दय होने मे कोई सन्देह नही रहता । उस समय आपको मालूम है, किस बात से प्रभावित होकर उसने कतलाम को बन्द करने का हुक्म दिया था ? दिल्ली के बादशाह का वजीर एक रसिक मनुष्य था । जब उसने देखा कि नादिरशाह का क्रोध किसी तरह नही शान्त होता और दिल्लीवालो के खून की नदी बहती चली जाती है, यहाँ तक कि खुद नादिरशाह के मुंहलगे अफसर भी उसके सामने आने का साहस नहीं करते, तो वह हथेलियो पर जान रखकर नादिर- शाह के पास पहुंचा और यह शेर पढ़ा-

'कसे न मॉद कि दीगर ब तेगे नाज़ कुशी।

मगर कि जिन्दा कुनी खल्क रा व बाज़ कुशी।'

इसका अर्थ यह है कि तेरे प्रेम की तलवार ने अब किसी को जिन्दा न छोडा। अब तो तेरे लिए इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है कि तू मुर्दो को फिर जिला दे और फिर उन्हे मारना शुरू करे । यह फारसी के एक प्रसिद्ध कवि का शृङ्गार-विषयक शेर है; पर इसे सुनकर कातिल के दिल मे मनुष्य जाग उठा । इस शेर ने उसके हृदय के कोमल भाग को स्पर्श कर दिया और कतलाम तुरन्त बन्द करा दिया गया । नेपोलियन के जीवन की यह घटना भी प्रसिद्ध है, जब उसने एक अंग्रेज मल्लाह को झाऊ की नाव पर कैले का समुद्र पार करते देखा । जब फ्रासीसी अपराधी मल्लाह को पकड़कर, नेपोलियन के सामने लाये और उससे पूछा-तू इस भगुर नौका पर क्यो समुद्र पार कर रहा था, तो अपराधी ने कहा-इसलिए कि मेरी वृद्धा माता घर पर अकेली है, मै उसे एक बार देखना चाहता था । नेपोलियन की ऑखो मे ऑसू छलछला आये। मनुष्य का कोमल भाग स्पन्दित हो उठा। उसने उस सैनिक को फ्रासीसी नौका पर इगलैड भेज दिया। मनुष्य स्वभाव से देव तुल्य है। जमाने के छल प्रपञ्च और परिस्थितियो के वशीभूत
[ ३४ ]होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है । साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है-उपदेशो से नहीं, नसी- हतो से नहीं, भावो को स्पन्दित करके, मन के कोमल तारो पर चोट लगाकर, प्रकृति से सामजस्य उत्पन्न करके। हमारी सभ्यता साहित्य पर ही अाधारित है । हम जो कुछ है, साहित्य के ही बनाये है। विश्व की आत्मा के अन्तर्गत भी राष्ट्र या देश की एक श्रात्मा होती है । इसी श्रात्मा की प्रतिध्वनि है-साहित्य । योरप का साहित्य उठा लीजिए। श्राप वहाँ सघर्ष पायेगे । कही खूनी काडो का प्रदर्शन है, कही जाससी कमाल का । जैसे सारी संस्कृति उन्मत्त होकर मरु मे जल खोज रही है । उस साहित्य का परिणाम यही है कि वैयक्तिक स्वार्थ-परायणता दिन दिन बढती जाती है, अर्थ-लोलुपता की कही सीमा नहीं, नित्य दगे, नित्य लडाइयाँ । प्रत्येक वस्तु स्वार्थ के कॉटे पर तौली जा रही है । यहाँ तक कि अब किसी युरोपियन महात्मा का उपदेश सुनकर भी सन्देह होता है कि इसके परदे मे स्वार्थ न हो । साहित्य सामाजिक श्रादों का स्रष्टा है । जब अादर्श ही भ्रष्ट हो गया, तो समाज के पतन मे बहुत दिन नहीं लगते । नयी सभ्यता का जीवन डेढ सौ साल से अधिक नहीं पर अभी से संसार उससे तग आ गया है। पर इसके बदले मे उसे कोई ऐसी वस्तु नही मिल रही है, जिसे वहाँ स्थापित कर सके । उसकी दशा उस मनुष्य की-सी है, जो यह तो समझ रहा है कि वह जिस रास्ते पर जा रहा है, वह ठीक रास्ता नही है ; पर वह इतनी दूर पा चुका है, कि अब लौटने की उसमे सामर्थ्य नहीं है। वह आगे ही जायगा । चाहे उधर कोई समुद्र ही क्यो न लहरे मार रहा हो। उसमे नैराश्य का हिंसक बल है, अाशा की उदार शक्ति नहीं । भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत्सर्ग है। योरप का कोई व्यक्ति लखपती होकर, जायदाद खरीदकर, कम्पनियो मे हिस्से लेकर, और ऊँची सोसायटी मे मिलकर अपने को कृतकार्य समझता है। भारत अपने को उस समय कृतकार्य समझता है, जब वह इस माया-बन्धन से मुक्त हो जाता है, [ ३५ ]
जब उसमे भोग और अधिकार का मोह नही रहता। किसी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान् सम्पत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं। व्यास और चाल्मीकि ने जिन आदर्शों की सृष्टि की, वह आज भी भारत का सिर ऊँचा किये हुए हैं। राम अगर वाल्मीकि के साँचे मे न ढलते, तो राम न रहते । सीता भी उसी सॉचे मे ढलकर सीता हुई। यह सत्य है कि हम सब ऐसे चरित्रो का निर्माण नही कर सकते; पर एक धन्वन्तरि के होने पर भी संसार मे वैद्यो की आवश्यकता रही है और रहेगी।

ऐसा महान् दायित्व जिस वस्तु पर है, उसके निर्माताओं का पद कुछ कम जिम्मेदारी का नहीं है । कलम हाथ मे लेते ही हमारे सिर बड़ी भारी जिम्मेदारी आ जाती है । साधारणतः युवावस्था मे हमारी निगाह पहले विध्वंस करने की अोर उठ जाती है। हम सुधार करने की धुन मे अंधाधुंध शर चलाना शुरू करते है । खुदाई फौजदार बन जाते है । तुरन्त अॉखे काले धब्बो की अोर पहुँच जाती है। यथार्थवाद के प्रवाह मे बहने लगते हैं। बुराइयों के नग्न चित्र खींचने मे कला की कृतकार्यता समझते है । यह सत्य है कि कोई मकान गिराकर ही उसकी जगह नया मकान बनाया जाता है। पुराने ढकोसलों और बन्धनो को तोड़ने की जरूरत है; पर इसे साहित्य नही कह सकते । साहित्य तो वही है, जो साहित्य की मर्यादात्रों का पालन करे । हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते है । शायद हम समझते है कि मजेदार, चटपटी और ओजपूर्ण भाषा लिखना ही साहित्य है। भाषा भी साहित्य का एक अंग है; पर साहित्य विश्वस नहीं करता, निर्माण करता है। वह मानव-चरित्र की कालिमाएँ नहीं दिखाता, उसकी उज्ज्वलताएँ दिखाता है । मकान गिरानेवाला इन्जीनियर नही कहलाता । इन्जीनियर तो निर्माण ही करता है। हममे जो युवक साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते है, उन्हें बहुत अात्म संयम की आवश्यकता है, क्योकि वह अपने
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[ ३७ ]साहित्य का सम्बन्ध बुद्धि से उतना नही जितना भावों से है। बुद्धि

के लिए दर्शन है, विज्ञान है, नीति है । भावो के लिए कविता है,उपन्यास है, गद्यकाव्य है।

आलोचना भी साहित्य का एक अंग मानी जाती है, इसीलिए कि वह साहित्य को अपनी सीमा के अन्दर रखने की व्यवस्था करती है ।साहित्य मे जब कोई ऐसी वस्तु सम्मिलित हो जाती है,जो उसके रस प्रवाह मे बाधक होती है, तो वहीं साहित्य मे दोष का प्रवेश हो जाता है । उसी तरह जैसे संगीत मे कोई बेसुरी ध्वनि उसे दूषित कर देती है । बुद्धि और मनोभाव का भेद काल्पनिक ही समझना चाहिए। आत्मा मे विचार, तुलना, निर्णय का अंश, बुद्धि और प्रेम, भक्ति, आनन्द, कृतज्ञता आदि का अश भाव है। ईर्ष्या, दम्भ, द्वेष, मत्सर आदि मनोविकार हैं । साहित्य का इनसे इतना ही प्रयोजन है कि वह भावो को तीव्र और आनन्दवर्द्धक बनाने के लिए इनकी सहायता लेता है, उसी तरह, जैसे कोई कारीगर श्वेत को और श्वेत बनाने के लिए श्याम की सहायता लेता है। हमारे सत्य भावो का प्रकाश ही अानन्द है । असत्य भावो मे तो दुःख का ही अनु- भव होता है । हो सकता है कि किसी व्यक्ति को असत्य भावो मे भी आनन्द का अनुभव हो । हिंसा करके, या किसी के धन का अपहरण करके या अपने स्वाथ के लिए किसी का अहित करके भी कुछ लोगो को आनन्द प्राप्त होता है, लेकिन यह मन की स्वाभाविक वृत्ति नही है । चोर को प्रकाश से अँधेरा कही अधिक प्रिय है। इससे प्रकाश की श्रेष्ठता मे काई बाधा नही पड़ती । हमारा जैसा मानसिक सगठन है, [ ३८ ]
उसमे असत्य भावो के प्रति घृणामय दया ही का उदय होता है । जिन भावो द्वारा हम अपने को दूसरो मे मिला सकते है, वही सत्य भाव है, प्रेम हमे अन्य वस्तुओं से मिलाता है, अहङ्कार पृथक् करता है । जिसमे अहङ्कार की मात्रा अधिक है वह दूसरो से कैसे मिलेगा ? अतएव प्रेम सत्य भाव है, अहङ्कार असत्य भाव है। प्रकृति से मेल रखने मे ही जीवन है । जिसके प्रेम की परिधि जितनी ही विस्तृत है, उसका जीवन उतना ही महान है।

जब साहित्य की सृष्टि भावोत्कर्ष द्वारा होती है, तो यह अनिवार्य है कि उसका कोई आधार हो । हमारे अन्तःकरण का सामञ्जस्य जब तक बाहर के पदार्थों या वस्तुप्रो या प्राणियो से न होगा, जागृति हो ही नहीं सकती । भक्ति करने के लिए कोई प्रत्यक्ष वस्तु चाहिए। दया करने के लिए भी किसी पात्र की आवश्यकता है। धैर्य और साहस के लिए भी किसी सहारे की जरूरत है। तात्पर्य यह है कि हमारे भावों को जगाने के लिए उनका बाहर की वस्तुओ मे सामञ्जस्य होना चाहिए। अगर बाह्य प्रकृति का हमारे ऊपर कोई असर न पड़े, अगर हम किसी को पुत्र शोक मे विलाप करते देखकर ऑसू की चार बूंदें नहीं गिरा सकते, अगर हम किसी अानन्दोत्सव मे मिलकर आनन्दित नही हो सकते, तो यह सम- झना चाहिए कि हम निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं। उस दशा के लिए साहित्य का कोई मूल्य नहीं। साहित्यकार तो वही हो सकता है जो दुनिया के सुख-दुःख से सुखी या दुखी हो सके और दूसरो मे सुख या दुःख पैदा कर सके । स्वय दुःख अनुभव कर लेना काफी नहीं है। कलाकार मे उसे प्रकट करने का सामर्थ्य होना चाहिए। लेकिन परि- स्थितियों मनुष्य को भिन्न दिशाओ मे डालती है। मनुष्य मात्र मे भावों की समानता होते हुए भी परिस्थिातयों मे भेद होता ही है। हमे तो मिठास से काम है, चाहे वह ऊख में मिले या खजूर मे या चुकन्दर मे । अगर हम किसानो में रहते है या हमे उनके साथ रहने के अवसर मिले
[ ३९ ]है, तो स्वभावतः हम उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझने लगते है और उससे उसी मात्रा मे प्रभावित होते है जितनी हमारे भावो मे गहराई है । इसी तरह अन्य परिस्थितियो को भी समझना चाहिए। अगर इसका अर्थ यह लगाया जाय कि अमुक प्राणी किसानों का, या मजदूरो का या किसी आन्दोलन का प्रोपागेंडा करता है, तो यह अन्याय है । साहित्य और प्रोपागेंडा मे क्या अन्तर है, इसे यहाँ प्रकट कर देना जरूरी मालूम होता है। प्रोपागेंडे मे अगर अात्म-विज्ञापन न भी हो तो एक विशेष उद्देश्य को पूरा करने की वह उत्सुकता होती है जो साधनो की परवा नहीं करती । साहित्य शीतल, मन्द समीर है, जो सभी को शीतल और श्रानदित करती है । प्रोपागेंडा ऑधी है, जो ऑखो में धूल झोंकती है, हरे-भरे वृक्षो को उखाड उखाड़ फेकती है, और झोपडे तथा महल दोनो को ही हिला देती है । वह रस-विहीन होने के कारण अानन्द की वस्तु नहीं । लेकिन यदि कोई चतुर कलाकार उसमे सौन्दर्य और रस भर सके, तो वह प्रोपागेंडा की चीज न होकर सद्साहित्य की वस्तु बन जाती है । 'अकिल टॉम्स केबिन" दास प्रथा के विरुद्ध प्रोपागेडा है, लेकिन कैसा प्रोपागेडा है ? जिसके एक एक शब्द मे रस भरा हुआ है। इसलिए वह प्रोपागेंडा की चीज नहीं रहा । बर्नार्ड शा के ड्रामे, वेल्स के उपन्यास, गाल्सवर्दी के ड्रामे और उपन्यास, डिकेन्स, मेरी कारेली, रोमा रोला, टाल्स्टाय, चेस्टरटन, डास्टावेस्की, मैक्सिम गोर्की, सिंक्लेयर, कहाँ तक गिनाये । इन सभी की रचनाओ मे प्रोपागेडा और साहित्य का सम्मिश्रण है। जितना शुष्क विषय-प्रतिपादन है वह प्रोपागेडा है, जितनी सौन्दर्य की अनुभूति है, वह सच्चा साहित्य है। हम इसलिए किसी कलाकार से जवाब तलब नहीं कर सकते कि वह अमुक प्रसग से ही क्यो अनुराग रखता है । यह उसकी रुचि या परि- स्थितियो से पैदा हुई परवशता है। हमारे लिए तो उसकी परीक्षा की एक ही कसौटी है : वह हमे सत्य और सुन्दर के समीप ले जाता है या नही ? यदि ले जाता है तो वह साहित्य है, नही ले जाता तो प्रोपागेंडा या उससे भी निकृष्ट है। [ ४० ]हम अकसर किसी लेखक की आलोचना करते समय अपनी रुचि से पराभूत हो जाते हैं । ओह, इस लेखक की रचनायें कौड़ी काम की नहीं, यह तो प्रोपागेन्डिस्ट है, यह जो कुछ लिखता है, किसी उद्देश्य से लिखता है, इसके यहाँ विचारो का दारिद्रय है। इसकी रचनाओं में स्वानुभूत दर्शन नही, इत्यादि । हमे किसी लेखक के विषय मे अपनी राय रखने का अधिकार है, इसी तरह औरो को भी है, लेकिन ससाहित्य की परख वही है जिसका हम उल्लेख कर आये है । उसके सिवा कोई दूसरी कसौटी हो ही नहीं सकती । लेखक का एक एक शब्द दर्शन मे डूबा हो, एक एक वाक्य मे विचार भरे हो, लेकिन उसे हम उस वक्त तक सद्साहित्य नहीं कह सकते, जब तक उसमे रस का स्रोत न बहता हो, उसमे भावों का उत्कर्ष न हो, वह हमे सत्य की ओर न ले जाता हो, अर्थात् ..बाह्य प्रकृति से हमारा मेल न कराता हो। केवल विचार और दर्शन का आधार लेकर वह दर्शन का शुष्क ग्रन्थ हो सकता है, सरस साहित्य नहीं हो सकता । जिस तरह किसी आन्दोलन या किसी सामा- जिक अत्याचार के पक्ष या विपक्ष मे लिखा गया रसहीन साहित्य प्रोपा- गेडा है, उसी तरह किसो तात्विक विचार या अनुभूत दर्शन से भरी हुई रचना भी प्रोपागेडा है । साहित्य जहाँ रसो से पृथक् हुआ, वहीं वह साहित्य के पद से गिर जाता है और प्रोपागेडा के क्षेत्र में जा पहुँचता है। भास्कर वाइल्ड या शा आदि की रचनायें जहाँ तक विचार प्रधान हो, वहाँ तक रसहीन है। हम रामायण को इसलिए साहित्य नहीं सम- झते कि उसमे विचार या दर्शन भरा हुआ है, बल्कि इसलिए कि उसका एक एक अक्षर सौन्दर्य के रस मे डूबा हुआ है, इसलिए कि उसमे त्याग और प्रेम और बन्धुत्व और मैत्री और साहस आदि मनोभावों की पूर्णता का रूप दिखाने वाले चरित्र है । हमारी आत्मा अपने अन्दर जिस अपूर्णता का अनुभव करती है, उसकी पूर्णता को पाकर वह मानो अपने को पा जाती है और यही उसके आनन्द की चरम सीमा है। [ ४१ ]इसके साथ यह भी याद रखना चाहिए कि बहुधा एक लेखक की कलम से जो चीज प्रोपागेडा होकर निकलती है, वही दूसरे लेखक की कलम से सद्साहित्य बन जाती है । बहुत कुछ लेखक के व्यक्तित्व पर मुनहसर है। हम जो कुछ लिखते है, यदि उसमे रहते भी है, तो हमारा शुष्क विचार भी अपने अन्दर आत्म प्रकाश का सन्देश रखता है और पाठक को उसमें अानन्द की प्राप्ति होती है। वह श्रद्धा जो हममे है,मानो अपना कुछ अंश हमारे लेखो मे भी डाल देती है। एक ऐसा लेखक विश्व बन्धुत्व की दुहाई देता हो, पर तुच्छ स्वार्थ के लिये लडने पर कमर कस लेता हो, कभी अपने ऊँचे आदर्श की सत्यता से हमे प्रभावित नहीं कर सकता। उसकी रचना मे तो विश्व बन्धुत्व की गन्ध आते ही हम ऊब जाते हैं, हमे उसमे कृत्रिमता की गन्ध आती है। और पाठक सब कुछ क्षमा कर सकता है, लेखक मे बनावट या दिखावा या प्रशंसा की लालसा को क्षमा नहीं कर सकता । हॉ, अगर उसे लेखक मे कुछ श्रद्धा है, तो वह उसके दर्शन, विचार, उप- देश, शिक्षा, सभी असाहित्यिक प्रसंगो मे सौन्दर्य का आभास पाता है । अतएव बहुत कुछ लेखक के व्यक्तित्व पर निर्भर है। लेकिन हम लेखक से परिचित हो या न हों, अगर वह सौन्दर्य की सृष्टि कर सकता है, तो हम उसकी रचना मे आनन्द प्राप्त करने से अपने को रोक नहीं सकते । साहित्य का आधार भावों का सौन्दर्य है, इससे परे जो कुछ है वह साहित्य नहीं कहा जा सकता। [ ४२ ]
गल्प, आख्यायिका या छोटी कहानी लिखने की प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। धर्म-ग्रन्थो मे जो दृष्टान्त भरे पडे है, वे छोटी कहा- नियाँ ही है, पर कितनी उच्च-कोटि की । महाभारत,उपनिषद्, बुद्ध जातक, बाइबिल, सभी सद्ग्रथों मे जन-शिक्षा का यही साधन उपयुक्त समझा गया है । ज्ञान और तत्व की बाते इतनी सरल रीति से और क्योकर समझायी जाती ? किन्तु प्राचीन ऋषि इन दृष्टान्तों द्वारा केवल आध्यात्मिक और नैतिक तत्वो का निरूपण करते थे। उनका अभिप्राय केवल मनोरञ्जन न होता था । सद्ग्रथो के रूपको और बाइबिल के Parables देखकर तो यही कहना पड़ता है कि अगले जो कुछ कर गये, वह हमारी शक्ति से बाहर है, कितनी विशुद्ध कल्पना, कितना मौलिक निरूपण, कितनी अोजस्विनी रचना-शैली है कि उसे देखकर वर्तमान साहित्यिक की बुद्धि चकरा जाती है । आजकल आख्यायिका का अर्थ बहुत व्यापक हो गया है। उसमे प्रेम की कहानियॉ, जासूसी किस्से, भ्रमण-वृत्तान्त, अद्भुत घटना, विज्ञान की बातें, यहाँ तक कि मित्रों की गप-शप भी शामिल कर दी जाती हैं। एक अंगरेजी समालोचक के मतानुसार तो कोई रचना, जो पन्द्रह मिनटो मे पढ़ी जा सके, गल्प कही जा सकती है । और तो और, उसका यथार्थ उद्देश्य इतना अनिश्चित हो गया है कि उसमे किसी प्रकार का उपदेश होना दूषण समझा जाने लगा है। वह कहानी सबसे नाकिस समझी जाता है, जिसमे उपदेश की छाया भी पड़ जाय ।

आख्यायिकाओं द्वारा नैतिक उपदेश देने की प्रथा धर्मग्रंथों ही मे नहीं, साहित्य-ग्रंथो मे भी प्रचलित थी । कथा-सरित्सागर इसका उदाहरण
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है।इसके पश्चात् बहुत-सी आख्यायिकाश्रो को एक शृङ्खला मे बाँधने की प्रथा चली । बैताल-पचीसी और सिंहासन-बत्तीसी इसी श्रेणी की पुस्तकें हैं। उनमे कितनी नैतिक और धार्मिक समस्याएँ हल की गयी है, यह उन लोगो से छिपा नही है, जिन्होने उनका अध्ययन किया है। अरबी मे सहस्र-रजनी-चरित्र इसी भॉति का अद्भुत संग्रह है; किन्तु उसमे किसी प्रकार का उपदेश देने की चेष्टा नहीं की गयी है। उसमे सभी रसो का समावेश है, पर अद्भुत रस ही की प्रधानता है, और अद्भुत रस मे उपदेश की गुञ्जाइश नहीं रहती। कदाचित् उसी आदर्श को लेकर इस देश मे शुक बहत्तरी के ढग की कथाएँ रची गयीं, जिनमे स्त्रियो की बेवफाई का राग अलापा गया है । यूनान मे हकीम ईसप ने एक नया ही ढङ्ग निकाला । उन्होने पशुपक्षियो की कहानियो द्वारा उपदेश देने का आविष्कार किया।

मध्यकाल काव्य और नाटक-रचना का काल था ; आख्यायिकाओं की ओर बहुत कम व्यान दिया गया । उस समय कहीं तो भक्ति-काव्य की प्रधानता रही, कही राजाश्रा के कीर्तिगान की । हॉ, शेखसादी ने फारसी मे गुलिस्तॉ-बोस्तॉ की रचना करके आख्यायिकाो की मर्यादा रखी । यह उपदेश-कुसुम इतना मनोहर और सुन्दर है कि चिरकाल तक प्रेमियो के हृदय इसके सुगन्ध से रञ्जित होते रहेगे। उन्नीसवीं शताब्दी मे फिर आख्यायिकानो की अोर साहित्यकारो की प्रवृत्ति हुई; और तभी से सभ्य-साहित्य मे इनका विशेष महत्व है। योरप की सभी भाषाश्रो मे गल्पो का यथेष्ट प्रचार है; पर मेरे विचार मे फ्रान्स और रूस के साहित्य मे जितनी उच्च-कोटि की गल्पे पायी जाती है, उतनी अन्य योरपीय भाषाओ मे नही । अगरेजी में भी डिकेस, वेल्स, हार्डी, किल्लिङ्ग, शालेंट ब्राटी आदि ने कहानियाँ लिखी है, लेकिन इनकी रचनाएँ गी द भोपासा, बालजक या पियेर लोती के टक्कर की नहीं । फ्रान्सीसी कहा- नियो मे सरसता की मात्रा बहुत अधिक रहती है । इसके अतिरिक्त
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मोपासों और बालजक ने आख्यायिका के आदर्श को हाथ से नहीं जाने दिया है। उनमे आध्यात्मिक या सामाजिक गुत्थियों अवश्य सुलझायी गयी है । रूस मे सबसे उत्तम कहानियाँ काउंट टालस्टाय की है । इनमे कई तो ऐसी है, जो प्राचीन काल के दृष्टान्तो की कोटि की है । चेकाफ ने बहुत कहानियाँ लिखी है, और योरप मे उनका प्रचार भी बहुत है; किन्तु उनमे रूस के विलास प्रिय समाज के जीवन-चित्रों के सिवा और कोई विशेषता नही । डास्टावेस्की ने भी उपन्यासो के अतिरिक्त कहानियाँ लिखी है, पर उनमे मनोभावो की दुर्बलता दिखाने ही की चेष्टा की गयी है । भारत मे बंकिमचन्द्र और डाक्टर रवीन्द्रनाथ ने कहानियाँ लिखी हैं, और उनमे से कितनी ही बहुत उच्च-कोटि की है।

प्रश्न यह हो सकता है कि आख्यायिका और उपन्यास मे आकार के अतिरिक्त और भी कोई अन्तर है ? हॉ, है और बहुत बड़ा अन्तर है । उपन्यास घटनाओं, पात्रों और चरित्रों का समूह है, आख्यायिका केवल एक घटना है-अन्य बाते सब उसी घटना के अन्तर्गत होती है। इस विचार से उसकी तुलना ड्रामा से की जा सकती है । उपन्यास मे आप चाहे जितने स्थान लाये, चाहे जितने दृश्य दिखाये, चाहे जितने चरित्र खींचें, पर यह कोई आवश्यक बात नहीं कि वे सब घटनाएँ और चरित्र एक ही केन्द्र पर मिल जाये । उनमे कितने ही चरित्र तो केवल मनोभाव दिखाने के लिए ही रहते हैं, पर आख्यायिका मे इस बाहुल्य की गुञ्जाइश नहीं, बल्कि कई सुविज्ञ जनो की सम्मति तो यह है कि उसमे केवल एक ही घटना या चरित्र का उल्लेख होना चाहिए । उप- न्यास मे आपकी कलम मे जितनी शक्ति हो उतना जोर दिखाइये, राजनीति पर तर्क कीजिए, किसी महफिल के वर्णन मे दस-बीस पृष्ठ लिख डालिये; (भाषा सरस होनी चाहिए ) ये कोई दूषण नहीं । श्राख्यायिका मे श्राप महफिल के सामने से चले जायेंगे, और बहुत उत्सुक होने पर भी आप उसकी ओर निगाह नही उठा सकते । वहाँ तो एक शब्द, एक वाक्य भी ऐसा न होना चाहिए, जो गल्प के उद्देश्य को
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स्पष्ट न करता हो । इसके सिवा,कहानी की भाषा बहुत ही सरल और सुबोध होनी चाहिए । उपन्यास वे लोग पढ़ते हैं, जिनके पास रुपया है; और समय भी उन्हों के पास रहता है, जिनके पास धन होता है। आख्यायिका साधारण जनता के लिए लिखी जाती है, जिनके पास न धन है, न समय । यहाँ तो सरलता पैदा कीजिए, यही कमाल है । कहानी वह ध्रुपद की तान है जिसमे गायक महफिल शुरू होते ही अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूरित कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।

हम जब किसी अपरिचित प्राणी से मिलते है, तो स्वभावतः यह जानना चाहते है कि यह कौन है । पहले उससे परिचय करना आवश्यक समझते हैं। पर अाजकल कथा भिन्न-भिन्न रूप से प्रारम्भ को जाती है। कहीं दो मित्रो की बातचीत से कथा प्रारम्भ हो जाती है, कहीं पुलिस- कोर्ट के एक दृश्य से। परिचय पीछे आता है। यह अँग्रेजी श्राख्यायिकानो की नकल है । इनसे कहानी अनायास ही जटिल और दुर्बोध हो जाती है। योरपवालों की देखा-देखी यन्त्रो-द्वारा, डायरी या टिप्पणियों द्वारा भी कहानियाँ लिखी जाती हैं। मैने स्वयं इन सभी प्रथाओं पर रचना की है; पर वास्तव मे इससे कहानी की सरलता मे बाधा पड़ती है । योरप के विज्ञ समालोचक कहानियो के लिए किसी अन्त की भी जरूरत नहीं समझते । इसका कारण यही है कि वे लोग कहानियाँ केवल मनोरंजन के लिए पढते है। आपको एक लेडी लन्दन के किसी होटल मे मिल जाती है। उसके साथ उसकी वृद्धा माता भी है। माता कन्या से किसी विशेष पुरुष से विवाह करने के लिए आग्रह करती है। लडकी ने अपना दूसरा वर ठीक कर रखा है। माँ बिगड़कर कहती है, मै तुझे अपना धन न दूंगी। कन्या कहती है, मुझे इसकी परवा नहीं। अन्त मे माता अपनी लड़की से रूठकर चली जाती है। लड़की निराशा की दशा मे बैठी है कि उसका अपना पसन्द किया युवक आता है। दोनों में बातचीत होती है। युवक का प्रेम सच्चा है। वह बिना धन के ही
[ ४६ ]विवाह करने पर राजी हो जाता है। विवाह होता है। कुछ दिनो तक स्त्री-पुरुष सुख-पूर्वक रहते है । इसके बाद पुरुष धनाभाव से किसी दूसरी धनवान् स्त्री की टोह लेने लगता है। उसकी स्त्री को इसकी खबर हो जाती है, और वह एक दिन घर से निकल जाती है। बस, कहानी समाप्त कर दी जाती है । क्योकि realists अर्थात् यथार्थवादियो का कथन है कि ससार मे नेकी-बदी का फल कहीं मिलता नजर नहीं आता; बल्कि बहुधा बुराई का परिणाम अच्छा और भलाई का बुरा होता है । आदर्शवादी कहता है, यथार्थ का यथार्थ रूप दिखाने से फायदा ही क्या, वह तो अपनी आँखों से देखते ही है। कुछ देर के लिए तो हमे इन कुत्सित व्यवहारो से अलग रहना चाहिए, नहीं तो साहित्य का मुख्य उद्देश्य ही गायब हो जाता है । वह साहित्य को समाज का दर्पण-मात्र नहीं मानता, बल्कि दीपक मानता है, जिसका काम प्रकाश फैलाना है। भारत का प्राचीन साहित्य आदर्शवाद ही का समर्थक है। हमे भी आदर्श ही की मर्यादा का पालन करना चाहिए । हॉ, यथार्थ का उसमे ऐसा सम्मिश्रण होना चाहिए कि सत्य से दूर न जाना पड़े । [ ४७ ]'एक आलोचक ने लिखा है कि इतिहास मे सब-कुछ यथार्थ होते हुए भी वह असत्य है, और कथा-साहित्य मे सब-कुछ काल्पनिक होते हुए भी वह सत्य है।

इस कथन का आशय इसके सिवा और क्या हो सकता है कि इति- हास आदि से अन्त तक हत्या, संग्राम और धोखे का ही प्रदर्शन है, जो असुन्दर है, इसलिए असत्य है । लोभ की कर से क्रूर, अहङ्कार की नीच से नीच, ईर्ष्या की अधम से अधम घटनाएँ आपको वहाँ मिलेगी, और आप सोचने लगेंगे, 'मनुष्य इतना अमानुष है ! थोड़े-से स्वार्थ के लिए भाई भाई की हत्या कर डालता है, बेटा बाप की हत्या कर डालता है और राजा असंख्य प्रजा की हत्या कर डालता है !'उसे पढ़कर मन मे ग्लानि होती है, अानन्द नहीं। और जो वस्तु अानन्द नहीं प्रदान कर सकती वह सुन्दर नहीं हो सकती, और जो सुन्दर नहीं हो सकती वह सत्य भी नहीं हो सकती। जहाँ अानन्द है, वही सत्य है । साहित्य काल्पनिक वस्तु है; पर उसका प्रधान गुण है आनन्द प्रदान करना, और इसीलिए वह सत्य है ।

मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुन्दर पाया है और पा रहा है उसी को साहित्य कहते है, और कहानी भी साहित्य का एक भाग है।

"मनुष्य-जाति के लिए मनुष्य ही सबसे विकट पहेली है। वह खुद अपनी समझ में नहीं आता। किसी-न-किसी रूप मे वह अपनी ही बालो[ ४८ ]
चना किया करता है-अपने ही मनोरहस्य खोला करता है । मानव- सस्कृति का विकास ही इसलिए हुअा है कि मनुष्य अपने को समझे । अध्यात्म और दर्शन की भॉति साहित्य भी इसी सत्य की खोज मे लगा हुआ है-अन्तर इतना ही है कि वह इस उद्योग मे रस का मिश्रण करके उसे अानन्दप्रद बना देता है, इसीलिए अध्यात्म और दर्शन केवल ज्ञानियों के लिए है, साहित्य मनुष्य-मात्र के लिए ।

जैसा हम ऊपर कह चुके है, कहानी या आख्यायिका साहित्य का एक प्रधान अग है, आज से नही, आदि काल से ही । हाँ, आजकल की आख्यायिका और प्राचीन काल की आख्यायिका मे समय की गति और रुचि के परिवर्तन से, बहुत-कुछ अन्तर हो गया है। प्राचीन आख्यायिका कुतूहल-प्रधान होती थी या अध्यात्म-विषयक । उपनिषद् और महाभारत मे आध्यात्मिक रहस्यों को समझाने के लिए आख्या- यिकात्रो का आश्रय लिया गया है । बौद्ध-जातक भी आख्यायिका को सिवा और क्या है ? बाइबिल मे भी दृष्टान्तो और आख्यायिकानो के द्वार ही धर्म के तत्व समझाये गये हैं। सत्य इस रूप मे श्राकर साकार हो जाता है और तभी जनता उसे समझती है और उसका व्यवहार करती है।

वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण को अपना ध्येय समझती है । उसमे कल्पना की मात्रा कम और अनुभूतियो की मात्रा अधिक होती है। इतना ही नहीं बल्कि अनुभूतियाँ ही रचनाशील भावना से अनुरञ्जित होकर कहानी बन जाती है।

मगर यह समझना भूल होगी कि कहानी जीवन का यथार्थ चित्र है । यथार्थ जीवन का चित्र तो मनुष्य स्वयं हो सकता है; मगर कहानी के पात्रो के सुख-दुःख से हम जितना प्रभावित होते है, उतना यथार्थ जीवन से नहीं होते-जब तक वह निजत्व की परिधि मे न आ जाय । कहानियों मे पात्रो से हमे एक ही दो मिनट के परिचय मे निजत्व हो
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जाता है और हम उनके साथ हॅसने और रोने लगते है। उनका हर्ष और विषाद हमारा अपना हर्ष और विषाद हो जाता है। इतना ही नहीं, बल्कि कहानी पढ़कर वे लोग भी रोते या हॅसते देखे जाते है, जिन पर साधारणतः सुख-दुःख का कोई असर नही पडता । जिनकी ऑखे श्मशान मे या कब्रिस्तान मे भी सजल नहीं होतीं, वे लोग भी उपन्यास के मर्म- स्पर्शी स्थलो पर पहुँचकर रोने लगते है ।

शायद इसका यह भी कारण हो कि स्थूल प्राणी सूक्ष्म मन के उतने समीप नहीं पहुँच सकते, जितने कि कथा के सूक्ष्म चरित्र के । कथा के चरित्रो और मन के बीच मे जड़ता का वह पर्दा नहीं होता, जो एक मनुष्य के हृदय को दूसरे मनुष्य के हृदय से दूर रखता है और अगर हम यथार्थ को हूबहू खींचकर रख दे, तो उसमे कला कहाँ है ? कला केवल यथार्थ की नकल का नाम नहीं है।

कला दीखती तो यथार्थ है; पर यथार्थ होती नहीं। उसकी खूबी यही है कि वह यथार्थ न होते हुए भी यथार्थ मालूम हो । उसका माप- दण्ड भी जीवन के माप-दण्ड से अलग है। जीवन मे बहुधा हमारा अन्त उस समय हो जाता है जब यह वाछनीय नहीं होता । जीवन किसी का दायी नही है; उसके सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरण मे कोई क्रम, कोई सम्बन्ध नहीं ज्ञात होता–कम से कम मनुष्य के लिए वह अज्ञेय है । लेकिन कथा-साहित्य मनुष्य का रचा हुआ जगत् है और परिमित होने के कारण सम्पूर्णतः हमारे सामने आ जाता है, और जहाँ वह हमारी मानवी न्याय बुद्धि या अनुभूति का अतिक्रमण करता हुआ पाया जाता है, हम उसे दण्ड देने के लिए तैयार हो जाते हैं। कथा मे अगर किसी को सुख प्राप्त होता है तो इसका कारण बताना होगा, दुख भी मिलता है तो उसका कारण बताना होगा। यहाँ कोई चरित्र मर नहीं सकता, जब तक कि मानव-न्यायबुद्धि उसकी मौत न मोंगे। स्रष्टा को जनता की अदालत मे अपनी हर एक कृति के लिए जवाब
[ ५० ]देना पड़ेगा। कला का रहस्य भ्रान्ति है, जिस पर यथार्थ का आवरण पड़ा हो ।

हमे यह स्वीकार कर लेने मे सकोच न होना चाहिए कि उपन्यासों ही की तरह आख्यायिका की कला भी हमने पच्छिम से ली है-कम-से- कम इसका आज का विकसित रूप तो पच्छिम का है ही। अनेक कारणों से जीवन की अन्य धाराप्रो की तरह ही साहित्य में भी हमारी प्रगति रुक गयी और हमने प्राचीन से जौ-भर भी इधर-उधर हटना निषिद्ध समझ लिया। साहित्य के लिए प्राचीनो ने जो मर्यादाएँ बाँध दी थीं, उनका उल्लंघन करना वर्जित था । अतएव, काव्य, नाटक, कथा, किसी मे भी हम आगे कदम न बढ़ा सके । कोई वस्तु बहुत सुन्दर होने पर भी अरुचिकर हो जाती है, जब तक उसमे कुछ नवीनता न लायी जाय । एक ही तरह के नाटक, एक ही तरह के काव्य पढते-पढते आदमी ऊब जाता है और वह कोई नयी चीज चाहता है-चाहे वह उतनी सुन्दर और उत्कृष्ट न हो । हमारे यहाँ या तो यह इच्छा उठी ही नहीं, या हमने उसे इतना कुचला कि वह जड़ीभूत हो गयी। पश्चिम प्रगति करता रहा-उसे नवीनता की भूख थी, मर्यादाओं की बेडियों से चिढ़ । जीवन के हर एक विभाग मे उसकी इस अस्थिरता तथा असन्तोष की बेडियो से मुक्त हो जाने की छाप लगी हुई है । साहित्य मे भी उसने क्रान्ति मचा दी।

शेक्सपियर के नाटक अनुपम है; पर आज उन नाटकों का जनता के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं । अाज के नाटक का उद्देश्य कुछ और है, आदर्श कुछ और है, विषय कुछ और है, शैली कुछ और है । कथा- साहित्य मे भी विकास हुआ और उसके विषय मे चाहे उतना बड़ा परि- वर्तन न हुआ हो; पर शैली तो बिलकुल ही बदल गयी । अलिफलैला उस वक्त का आदर्श था उसमे बहुरूपता थी, वैचित्र्य था, कुतूहल था, रोमान्स था—पर उसमे जीवन की समस्याएँ न थी, मनोविज्ञान के रहस्य न थे, अनुभूतियों की इतनी प्रचुरता न थी, जीवन अपने सत्य[ ५१ ]
रूप मे इतना स्पष्ट न था । उसका रूपान्तर हुआ और उपन्यास का उदय हुआ, जो कथा और नाटक के बीच की वस्तु है। पुराने दृष्टान्त भी रूपान्तरित होकर कहानी बन गये।

मगर सौ बरस पहले यूरप भी इस कला से अनभिज्ञ था । बडे-बड़े उच्च कोटि के दार्शनिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक उपन्यास लिखे जाते थे; लेकिन छोटी-छोटी कहानियो की ओर किसी का ध्यान न जाता था। हॉ, परियो और भूतो की कहानियाँ लिखी जाती थीं। किन्तु इसी एक शताब्दी के अन्दर, या उससे भी कम मे समझिए, छोटी कहानियो ने साहित्य के और सभी अङ्गो पर विजय प्राप्त कर ली है, और यह कहना गलत न होगा कि जैसे किसी जमाने मे काव्य ही साहित्यिक अभिव्यक्ति का व्यापक रूप था, वैसे ही आज कहानी है । और उसे यह गौरव प्राप्त हुअा है यूरोप के कितने ही महान् कलाकारों की प्रतिभा से, जिनमे बाल- जक, मोपासॉ, चेखाफ, टॉल्स्टाय, मैक्सिम गोर्की आदि मुख्य हैं। हिन्दी मे पचीस-तीस साल पहले तक कहानी का जन्म न हुआ था । परन्तु अाज तो कोई ऐसी पत्रिका नहीं जिसमे दो-चार कहानियों न हो-यहाँ तक कि कई पत्रिकाओ मे केवल कहानियाँ ही दी जाती है।

कहानियों के इस प्राबल्य का मुख्य कारण आजकल का जीवन- संग्राम और समयाभाव है। अब वह जमाना नहीं रहा कि हम 'बोस्ताने खयाल' लेकर बैठ जाये और सारे दिन उसी की कुजो मे विचरते रहें । अब तो हम जीवन-सग्राम मे इतने तन्मय हो गये हैं कि हमे मनोरंजन के लिए समय ही नहीं मिलता, अगर कुछ मनोरञ्जन स्वास्थ्याके लिए अनिवार्य न होता, और हम विक्षिप्त हुए बिना नित्य अठारह घटे काम कर सकते, तो शायद हम मनोरञ्जन का नाम भी न लेते । लेकिन प्रकृति ने हमे विवश कर दिया है। हम चाहते है कि थोडे से थोड़े समय मे अधिक मनोरञ्जन हो जाय-इसीलिए सिनेमा-गृहो की संख्या दिन-दिन बढ़ती जाती है । जिस उपन्यास के पढने मे महीनों लगते, उसका अानद हम दो घटों में उठा लेते है। कहानी के लिए पन्द्रह-बीस मिनट ही काफी


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