साहित्य का उद्देश्य/2

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

[ ५१ ]
रूप मे इतना स्पष्ट न था । उसका रूपान्तर हुआ और उपन्यास का उदय हुआ, जो कथा और नाटक के बीच की वस्तु है। पुराने दृष्टान्त भी रूपान्तरित होकर कहानी बन गये।

मगर सौ बरस पहले यूरप भी इस कला से अनभिज्ञ था । बडे-बड़े उच्च कोटि के दार्शनिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक उपन्यास लिखे जाते थे; लेकिन छोटी-छोटी कहानियो की ओर किसी का ध्यान न जाता था। हॉ, परियो और भूतो की कहानियाँ लिखी जाती थीं। किन्तु इसी एक शताब्दी के अन्दर, या उससे भी कम मे समझिए, छोटी कहानियो ने साहित्य के और सभी अङ्गो पर विजय प्राप्त कर ली है, और यह कहना गलत न होगा कि जैसे किसी जमाने मे काव्य ही साहित्यिक अभिव्यक्ति का व्यापक रूप था, वैसे ही आज कहानी है । और उसे यह गौरव प्राप्त हुअा है यूरोप के कितने ही महान् कलाकारों की प्रतिभा से, जिनमे बाल- जक, मोपासॉ, चेखाफ, टॉल्स्टाय, मैक्सिम गोर्की आदि मुख्य हैं। हिन्दी मे पचीस-तीस साल पहले तक कहानी का जन्म न हुआ था । परन्तु अाज तो कोई ऐसी पत्रिका नहीं जिसमे दो-चार कहानियों न हो-यहाँ तक कि कई पत्रिकाओ मे केवल कहानियाँ ही दी जाती है।

कहानियों के इस प्राबल्य का मुख्य कारण आजकल का जीवन- संग्राम और समयाभाव है। अब वह जमाना नहीं रहा कि हम 'बोस्ताने खयाल' लेकर बैठ जाये और सारे दिन उसी की कुजो मे विचरते रहें । अब तो हम जीवन-सग्राम मे इतने तन्मय हो गये हैं कि हमे मनोरंजन के लिए समय ही नहीं मिलता, अगर कुछ मनोरञ्जन स्वास्थ्याके लिए अनिवार्य न होता, और हम विक्षिप्त हुए बिना नित्य अठारह घटे काम कर सकते, तो शायद हम मनोरञ्जन का नाम भी न लेते । लेकिन प्रकृति ने हमे विवश कर दिया है। हम चाहते है कि थोडे से थोड़े समय मे अधिक मनोरञ्जन हो जाय-इसीलिए सिनेमा-गृहो की संख्या दिन-दिन बढ़ती जाती है । जिस उपन्यास के पढने मे महीनों लगते, उसका अानद हम दो घटों में उठा लेते है। कहानी के लिए पन्द्रह-बीस मिनट ही काफी
[ ५२ ]
है । अतएव हम कहानी ऐसी चाहते हैं कि वह थोडे से थोड़े शब्दो मे कही जाय, उसमे एक वाक्य, एक शब्द भी अनावश्यक न आने पाये, उसका पहला ही वाक्य मन को आकर्षित कर ले और अन्त तक उसे मुग्ध किये रहे, और उसमे कुछ चटपटापन हो, कुछ ताजगी हो, कुछ विकास हो, और इसके साथ ही कुछ तत्व भी हो। तत्वहीन कहानी से चाहे मनोरञ्जन भले ही हो जाय, मानसिक तृप्ति नहीं होती । यह सच है कि हम कहानियो मे उपदेश नही चाहते; लेकिन विचारो को उत्तेजित करने के लिए, मन के सुन्दर भावो को जाग्रत करने के लिए, कुछ-न- कुछ अवश्य चाहते है । वही कहानी सफल होती है, जिसमे इन दोनो मे से-मनोरञ्जन और मानसिक तृप्ति मे से एक अवश्य उपलब्ध हो ।

सबसे उत्तम कहानी वह होती है, जिसका आधार किसी मनोवैज्ञा- निक सत्य पर हो । साधु पिता का अपने कुव्यसनी पुत्र की दशा मे दुःखी होना मनोवैज्ञानिक सत्य है । इस आवेग मे पिता के मनोवेगो को चित्रित करना और तदनुकूल उसके व्यवहारो को प्रदर्शित करना कहानी को अाकर्षक बना सकता है। बुरा आदमी भी बिलकुल बुरा नहीं होता, उसमे कही देवता अवश्य छिपा होता है-यह मनोवैज्ञानिक सत्य है। उस देवता को खोलकर दिखा देना सफल आख्यायिका-लेखक का काम है। विपत्ति पर विपत्ति पडने से मनुष्य कितना दिलेर हो जाता है-यहाँ तक कि वह बड़े से बडे संकट का सामना करने के लिए ताल ठोककर तैयार हो जाता है, उसकी दुर्वासना भाग जाती है, उसके हृदय के किसी गुप्त स्थान मे छिपे हुए जौहर निकल आते है और हमे चकित कर देते है- यह मनोवैज्ञानिक सत्य है । एक ही घटना या दुर्घटना भिन्न-भिन्न प्रकृति के मनुष्यो को भिन्न-भिन्न रूप से प्रभावित करती है-हम कहानी मे इसको सफलता के साथ दिखा सके, तो कहानी अवश्य आकर्षक होगी। किसी समस्या का समावेश कहानी को आकर्षक बनाने का सबसे उत्तम साधन है। जीवन मे ऐसी समस्याएँ नित्य ही उपस्थित होती रहती हैं और उनसे पैदा होनेवाला द्वन्द्व आख्यायिका को चमका
[ ५३ ]
देता है। सत्यवादी पिता को मालूम होता है कि उसके पुत्र ने हत्या की है। वह उसे न्याय की वेदी पर बलिदान कर दे, या अपने जीवन- सिद्धान्तो की हत्या कर डाले। कितना भीषण द्वन्द्व है! पश्चात्ताप ऐसे द्वन्द्वों का अखण्ड स्रोत है एक भाई ने अपने दूसरे भाई की सम्पत्ति छल-कपट से अपहरण कर ली है, उसे भिक्षा माँँगते देखकर क्या छली भाई को जरा भी पश्चात्ताप न होगा? अगर ऐसा न हो, तो वह मनुष्य नहीं है।

उपन्यासों की भॉति कहानियों भी कुछ घटना-प्रधान होती है, कुछ चरित्र प्रधान। चरित्र-प्रधान कहानी का पद ऊँचा समझा जाता है, मगर कहानी मे बहुत विस्तृत विश्लेषण की गुञ्जायश नही होती। यहाँ हमारा उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्य को चित्रित करना नहीं, वरन् उसके चरित्र का एक अग दिखाना है। यह परमावश्यक है कि हमारी कहानी से जो परिणाम या तत्व निकले, वह सर्वमान्य हो और उसमे कुछ बारीकी हो। यह एक साधारण नियम है कि हमे उसी बात मे आनन्द आता है जिससे हमारा कुछ सम्बन्ध हो। जूना खेलनेवालो को जो उन्माद और उल्लास हाता है, वह दर्शक को कदापि नहीं हो सकता। जब हमारे चरित्र इतने सजीव और इतने आकर्षक होते है कि पाठक अपने को उनके स्थान पर समझ लेता है, तभी उस कहानी मे आनन्द प्राप्त होता है। अगर लेखक ने अपने पात्रों के प्रति पाठक मे यह सहानुभूति नहीं उत्पन्न कर दी, तो वह अपने उद्देश्य मे असफल है।

पाठको से यह कहने की जरूरत नहीं है कि इन थोड़े ही दिनों में हिन्दी-कहानी-कला ने कितनी प्रौढ़ता प्राप्त कर ली है। पहले हमारे सामने केवल बॅगला कहानियो का नमूना था। अब हम संसार के सभी प्रमुख कहानी-लेखकों की रचनाएँ पढ़ते है, उन पर विचार और बहस करते हैं, उनके गुण-दोष निकालते हैं और उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। अब हिन्दी कहानी-लेखको मे विषय, दृष्टिकोण और शैली का अलग अलग विकास होने लगा है— कहानी जीवन [ ५४ ]से बहुत निकट आ गई है। उसकी जमीन अब उतनी लम्बी- चौड़ी नही है। उसमे कई रसो, कई चरित्रो और कई घटनाओ के लिए स्थान नहीं रहा । वह अब केवल एक प्रसग का, अात्मा की एक झलक का सजीव हृदय-स्पर्शी चित्रण है । इस एकतथ्यता ने उसमे प्रभाव, अाकस्मिकता और तीव्रता भर दी है। अब उसमे व्याख्या का अश कम, सवेदना का अंश अधिक हता है । उसकी शैली भी अब प्रभावमयी हो गई है। लेखक को जो कुछ कहना है, वह कम से कम शब्दो मे कह डालना चाहता है । वह अपने चरित्रों के मनोभावो की व्याख्या करने नहीं बैठता, केवल उसकी तरफ इशारा कर देता है । कभी-कभी तो सम्भाषणों मे एक दो शब्दों से ही काम निकाल देता है । ऐसे कितने ही अवसर होते है, जब पात्र के मुंह से एक शब्द सुनकर हम उसके मनोभावों का पूरा अनुमान कर लेते हैं, पूरे वाक्य की जरूरत ही नहीं रहती । अब हम कहानी का मूल्य उसके घटना-विन्यास से नही लगाते, हम चाहते हैं कि पात्रों की मनोगति स्वयं घटनाओ की सृष्टि करे। घटनाओ का स्वतन्त्र कोई महत्व ही नही रहा । उनका महत्व केवल पात्रो के मनोभावो को व्यक्त करने की दृष्टि से ही है- उसी तरह, जैसे शालिग्राम स्वतन्त्र रूप से केवल पत्थर का एक गोल टुकड़ा है, लेकिन उपासक की श्रद्धा से प्रतिष्ठित होकर देवता बन जाता है । खुलासा यह कि कहानी का आधार अब घटना नही, अनु- भूति है। आज लेखक केवल कोई रोचक दृश्य देखकर कहानी लिखने नहीं बैठ जाता । उसका उद्देश्य स्थूल सौन्दर्य नही है। वह तो कोई ऐसी प्रेरणा चाहता है, जिसमे सौन्दर्य की झलक हो, और इसके द्वारा वह पाठक की सुन्दर भावनाओं को स्पर्श कर सके।


______

[ ५५ ]
कहानी सदैव से जीवन का एक विशेष अंग रही है । हर एक बालक

को अपने बचपन की वे कहानियाँ याद होंगी, जो उसने अपनी माता या बहन से सुनी थीं। कहानियों सुनने को वह कितना लालायित रहता था, कहानी शुरू होते ही वह किस तरह सब-कुछ भूलकर सुनने मे तन्मय हो जाता था, कुत्ते और बिल्लियो की कहानियाँ सुनकर वह कितना प्रसन्न होता था-इसे शायद वह कभी नहीं भूल सकता । बाल-जीवन की मधुर स्मृतियो मे कहानी शायद सबसे मधुर है । वह खिलौने, मिठाइयाँ और तमाशे सब भूल गये; पर वे कहानियाँ अभी तक याद है और उन्ही कहानियों को आज उसके मुंह से उसके बालक उसी हर्ष और उत्सुकता से सुनते होगे। मनुष्य-जीवन की सबसे बड़ी लालसा यही है कि वह कहानी बन जाय और उसकी कीर्ति हर एक जबान पर हो।

कहानियों का जन्म तो उसी समय मे हुआ, जब आदमी ने बोलना सीखा; लेकिन प्राचीन कथा-साहित्य का हमे जो कुछ ज्ञान है, वह 'कथा- सरित्सागर,' 'ईसप की कहानियों' और 'अलिफ़-लैला' आदि पुस्तकों से हुआ है। ये सब उस समय के साहित्य के उज्ज्वल रत्न है। उनका मुख्य लक्षण उनका कथा-वैचित्र्य था। मानव-हृदय को वैचित्र्य से सदैव प्रेम रहा है। अनोखी घटनाश्रो और प्रसंगों को सुनकर हम, अपने बाप- दादा की भॉति ही, आज भी प्रसन्न होते है । हमारा ख्याल है कि जन- रुचि जितनी आसानी से अलिफ लैला की कथाओ का आनन्द उठाती
[ ५६ ]है, उतनी आसानी से नवीन उपन्यासो का आनन्द नहीं उठा सकती। और अगर काउट टॉल्सटॉय के कथनानुसार जनप्रियता ही कला का आदर्श मान लिया जाय, तो अलिफ-लैला के सामने स्वय टॉल्सटॉय के 'वार ऐड पोस' ओर ह्य गो के 'ले मिजरेबुल' की कोई गिनती नही । इस सिद्धान्त के अनुपार हमारी राग-रागिनियों, हमारी सुन्दर चित्रकारियाँ और कला के अनेक रूप, जिन पर मानव-जाति को गर्व है, कला के क्षेत्र से बाहर हो जायेंगे । जन-रुचि परज और बिहाग की अपेक्षा बिरहे और दादरे को ज्यादा पसन्द करती है । बिरहो और ग्रामगीतो मे बहुधा बडे ऊँचे दरजे की कविता होती है, फिर भी यह कहना असत्य नहीं है कि विद्वानों और प्राचार्यों ने कला के विकास के लिए जो मर्यादाएँ बना दी है, उनसे कला का रूप अधिक सुन्दर और अधिक संयत हो गया है । प्रकृति मे जो कला है, वह प्रकृति की है, मनुष्य की नहीं । मनुष्य को तो वही कला मोहित करती है, जिस पर मनुष्य की आत्मा की छाप हो, जो गीली मिट्टी की भॉति मानव-हृदय के साँचे मे पड़कर संस्कृत हो गयी हो । प्रकृति का सौन्दर्य हमे अपने विस्तार और वैभव से पराभूत कर देता है । उससे हमे आध्यात्मिक उल्लास मिलता है, पर वही दृश्य जब मनुष्य की तूलिका एव रगो और मनोभावो से रजित होकर हमारे सामने आता है, तो वह जैसे हमारा अपना हो जाता है । उसमे हमे श्रात्मीयता का सन्देश मिलता है।

लेकिन भोजन जहाँ थोडे-से मसाले से अधिक रुचिकर हो जाता है, वहाँ यह भी आवश्यक है कि मसाले मात्रा से बढने न पाये । जिस तरह मसालो के बाहुल्य से भोजन का स्वाद और उपयोगिता कम हो जाती है,उसी भॉति साहित्य भी अलकारो के दुरुपयोग से विकृत हो जाता है । जो कुछ स्वाभाविक है, वही सत्य है और स्वाभाविक से दूर होकर कला अपना अानन्द खो देती है और उसे समझनेवाले थोडे-से कलाविद् ही रह जाते है, उसमे जनता के मर्म को स्पर्श करने की शक्ति नहीं रह जाती। [ ५७ ]
पुरानी कथा-कहानियाँ अपने घटना-वैचित्र्य के कारण मनोरञ्जक तो है; पर उनमे उस रस की कमी है जो शिक्षित रुचि साहित्य मे खोजती है । अब हमारी साहित्यिक रुचि कुछ परिष्कृत हो गयी है । हम हर एक विषय को भॉति साहित्य मे भी बौद्धिकता की तलाश करते है । अब हम किसी राजा की अलौकिक वीरता या रानी के हवा में उड़कर राजा के पास पहुँचने, या भूत-प्रेतो के काल्पनिक चरित्रो को देखकर प्रसन्न नहीं होते। हम उन्हे यथार्थ के कॉटे पर तौलते है और जौ-भर भी इधर-उधर नहीं देखना चाहते । अाजकल के उपन्यासो और आख्यायिकाओ मे अस्वाभाविक बातो के लिए गुजाइश नही है । उसमे हम अपने जीवन का ही प्रतिबिम्ब देखना चाहते है । उसके एक-एक वाक्य को, एक-एक पात्र को यथार्थ क रूप में देखना चाहते है । उनमे जो कुछ भी हो, वह इस तरह लिखा जाय कि साधारण बुद्धि उसे यथार्थ समझे । घटना वर्तमान कहानी या उपन्यास का मुख्य अग नही है । उपन्यासो मे पात्रों का केवल बाह्य रूप देखकर हम सन्तुष्ट नहीं होते। हम उनके मनोगत भावो तक पहुंचना चाहते है और जो लेखक मानवी हृदय के रहस्यों को खोलने मे सफल होता है, उसी की रचना सफल समझी जाती है । हम केवल इतने ही से सन्तुष्ट नहीं हाते कि अमुक व्यक्ति ने अमुक काम किया । हम देखना चाहते है कि किन मनोभावो से प्रेरित होकर उसने यह काम किया, अतएव मानसिक द्वन्द्व वर्तमान उपन्यास या गल्प का खास अङ्ग है।

प्राचीन कलानो मे लेखक बिलकुल नेपथ्य मे छिपा रहता था । हम उसके विषय मे उतना ही जानते थे, जितना वह अपने को अपने पात्रों के मुख से व्यक्त करता था । जीवन पर उसके क्या विचार है, भिन्न-भिन्न परिस्थितियो मे उसके मनोभावो मे क्या परिवर्तन होते है, इसका हमे कुछ पता न चलता था, लेकिन आजकल उपन्यासो मे हमे लेखक के दृष्टिकोण का भी स्थल स्थल पर परिचय मिलता रहता है । हम उसके मनोगत विचारों और भावों द्वारा उसका रूप देखते रहते हैं और ये
[ ५८ ]भाव जितने व्यापक और गहरे तथा अनुभव-पूर्ण होते हैं, उतनी ही लेखक के प्रति हमारे मन मे श्रद्धा उत्पन्न होती है । यो कहना चाहिए कि वर्तमान आख्यायिका या उपन्यास का आधार ही मनोविज्ञान है । घटनाएं और पात्र तो उसी मनोवैज्ञानिक सत्य को स्थिर करने के निमित्त ही लाये जाते है । उनका स्थान बिलकुल गौण है। उदाहरणतः मेरी 'सुजान भगत,मुक्तिमार्ग','पञ्च-परमेश्वर', 'शतरज के खिलाड़ी' और 'महातीर्थ' नामक सभी कहानियो मे एक न एक मनोवैज्ञानिक रहस्य को खोलने की चेष्टा की गयी है।

"यह तो सभी मानते है कि आख्यायिका का प्रधान धर्म मनोरञ्जन है; पर साहित्यिक मनोरञ्जन वह है, जिससे हमारी कोमल और पवित्र भाव- नात्रों को प्रोत्साहन मिले-हममे सत्य, निःस्वार्थ सेवा, न्याय आदि देवत्व के जो अंश हैं, वे जागृत हो । वास्तव मे मानवीय आत्मा की यह वह चेष्टा है, जो उसके मन में अपने-आपको पूर्णरूप मे देखने की होती है । अभिव्यक्ति मानव-हृदय का स्वाभाविक गुण है । मनुष्य जिस समाज मे रहता है, उसमे मिलकर रहता है, जिन मनोभावों से वह अपने मेल के क्षेत्र का बढ़ा सकता है, अर्थात् जीवन के अनन्त प्रवाह मे सम्मिलित हो सकता है, वही सत्य है । जो वस्तुएँ भावनाप्रो के इस प्रवाह मे बाधक होती है, वे सर्वथा अस्वाभाविक है; परन्तु यदि स्वार्थ, अहङ्कार और ईर्षा की ये बाधाएँ न होती, तो हमारी आत्मा के विकास को शक्ति कहाँ से मिलती ? शक्ति तो संघर्ष मे है । हमारा मन इन बाधाओ का परास्त करके अपने स्वाभाविक कर्म का प्राप्त करने की सदैव चेष्टा करता रहता है। इसी सघर्ष से साहित्य की उत्पत्ति होती है। यही साहित्य की उपयागिता भी है । साहित्य मे कहानी का स्थान इसलिए ऊँचा है कि वह एक क्षण मे ही, बिना किसी घुमाव-फिराव के, श्रात्मा के किसी न किसी भाव को प्रकट कर देती है। और चाहे थोड़ी ही मात्रा मे क्यो न हो, वह हमारे परिचय का, दूसरो मे अपने को देखने का, दूसरो के हर्ष या शोक को अपना बना लेने का क्षेत्र बढ़ा देती है। [ ५९ ]हिन्दी में इस नवीन शैली की कहानियो का प्रचार अभी थोडे ही दिनो से हुआ है, पर इन थोडे ही दिनों मे इसने साहित्य के अन्य सभी अङ्गों पर अपना सिक्का जमा लिया है। किसी पत्र को उठा लीजिए, उसमे कहानियों ही की प्रधानता होगी । हाँ जो पत्र किसी विशेष नीति या उद्देश्य से निकाले जाते है उनमे कहानियो का स्थान नहीं रहता। जब डाकिया कोई पत्रिका लाता है, तो हम सबसे पहले उसकी कहानियाँ पढ़ना शुरू करते हैं। इनसे हमारी वह क्षुधा तो नही मिटती, जो इच्छा- पूर्ण भोजन चाहती है पर फलो और मिठाइयो की जो तुधा हमे सदैव बनी रहती है, वह अवश्य कहानियो से तृप्त हो जाती है। हमारा खयाल है कि कहानियों ने अपने सार्वभौम अाकर्षण के कारण, ससार के प्राणियो को एक दूसरे से जितना निकट कर दिया है, उनमे जो एकात्मभाव उत्पन्न कर दिया है, उतना और किसी चीज ने नहीं किया। हम आस्ट्रेलिया का गेहूँ खाकर, चीन की चाय पीकर, अमेरिका की मोटरों पर बैठकर भी उनको उत्पन्न करनेवाले प्राणियो से बिलकुल अपरिचित रहते है, लेकिन मोपासॉ, अनातोल फ्रान्स, चेखोव और टॉलस्टॉय की कहानियाँ पढकर हमने फ्रान्स और रूस से आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर लिया है। हमारे परिचय का क्षेत्र सागरो, द्वीपो और पहाडों को लॉचता हुआ फ्रान्स और रूस तक विस्तृत हो गया है । हम वहाँ भी अपनी ही आत्मा का प्रकाश देखने लगते है। वहाँ के किसान और मजदूर एवं विद्यार्थी हमे ऐसे लगते है, मानो उनसे हमारा घनिष्ट परिचय हो।

हिन्दी मे बीस-पच्चीस साल पहले कहानियों की कोई चर्चा न थी। कभी-कभी बॅगला या अँगरेजी कहानियों के अनुवाद छप जाते थे। परन्तु आज कोई ऐसा पत्र नहीं, जिसमे दो-चार कहानियाँ प्रतिमास न छपती हो । कहानियो के अच्छे-अच्छे संग्रह निकलते जा रहे हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए कि कहानियों का पढना समय का दुरुपयोग समझा जाता था। बचपन मे हम कभी कोई किस्सा पढ़ते पकड़ लिये जाते थे, [ ६० ]तो कडी डॉट पड़ती थी। यह ख्याल किया जाता था कि किस्सो से चरित्र भ्रष्ट हो जाता है। अोर उन 'फिसाना अजायब' और 'शुक- बहत्तरी' और 'ताता-मैना' के दिनो मे ऐसा ख्याल होना स्वाभाविक ही था। उस वक्त कहानियों कही स्कूल कैरिकुलम मे रख दो जाती, तो शायद पिताश्रा का एक डेपुटेशन इसके विरोध मे शिक्षा-विभाग के अध्यक्ष को सेवा मे पहुँचता । आज छोटे-बड़े सभी क्लासो मे कहानियाँ पढायी जाती है और परोक्षाओ मे उन पर प्रश्न किये जाते है। यह मान लिया गया है कि सास्कृतिक विकास के लिए सरस साहित्य से उत्तम कोई साधन नहीं है । अब लाग यह भी स्वीकार करने लगे है कि कहानी कोरी गप नही है, और उसे मिथ्या समझना भूल है। आज से दो हजार बरस पहले यूनान के विख्यात फिलासफर अफलातूं ने कहा था कि हर एक काल्पनिक रचना मे मौलिक सत्य मौजूद रहता है । रामायण, महा- भारत आज भी उतने ही सत्य है, जितने अाज से पाँच हजार साल पहले थे, हालॉ कि इतिहास, विज्ञान और दर्शन मे सदैव परिवर्तन होते रहते है । कितने ही सिद्धान्त, जो एक जमाने मे सत्य समझे जाते थे, अाज असत्य सिद्ध हो गये हैं, पर कथाएँ अाज भी उतनी ही सत्य हैं, क्योकि उनका सम्बन्ध मनोभावो से है और मनोभावों मे कभी परिवर्तन नहो होता । किसी ने बहुत ठीक कहा है, कि कहानो मे नाम और सन् के सिवा और सब कुछ सत्य है; और इतिहास मे नाम और सन् के सिवा कुछ भी सत्य नही। गल्पकार अपनी रचनात्रो को जिस साँचे मे चाहे ढाल सकता है: पर किसो दशा मे भी वह उस महान् सत्य की अवहेलना नहीं कर सकता, जो जीवन सत्य कहलाता है। [ ६१ ]
उपन्यास की परिभाषा विद्वानों ने कई प्रकार से की है, लेकिन यह कायदा है कि जो चीज जितनी ही सरल होती है, उसकी परिभाषा उतनी ही मुश्किल होती है। कविता की परिभाषा आज तक नहीं हो सकी। जितने विद्वान् हैं उतनी ही परिभाषाएँ है। किन्ही दो विद्वानो की राये नही मिलती । उपन्यास के विषय मे भी यही बात कही जा सकती है। इसकी कोई ऐसी परिभाषा नहीं है जिस पर सभी लोग सहमत हों।

मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र-मात्र समझता हूँ । मानव- चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यो को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है।

किन्ही भी दो आदमियो की सूरतें नहीं मिलती, उसी भॉति श्राद- मियो के चरित्र भी नहीं मिलते । जैसे सब आदमियों के हाथ, पॉव, ऑखे, कान, नाक, मुँह होते है पर उतनी समानता पर भी जिस तरह उनमे विभिन्नता मौजूद रहती है, उसी भॉति सब आदमियो के चरित्र मे भी बहुत कुछ समानता होते हुए कुछ विभिन्नताएँ होती हैं। यही चरित्र-सम्बन्धी समानता और विभिन्नता, अभिन्नत्व मे भिन्नत्व और विभि- न्नत्व मे अभिन्नत्व, दिखाना उपन्यास का मुख्य कर्तव्य है ।

सन्तान-प्रेम मानव-चरित्र का एक व्यापक गुण है। ऐसा कौन प्राणी होगा, जिसे अपनी सन्तान प्यारी न हो ? लेकिन इस सन्तान-प्रेम की मात्राएँ है, उसके भेद है। कोई तो सन्तान के लिए मर मिटता
[ ६२ ]
है, उसके लिए कुछ छोड जाने के लिए आप नाना प्रकार के कष्ट झेलता है, लेकिन धर्म-भीरुता के कारण अनुचित रीति से धन-सचय नहीं करता है । उसे शका होती है कि कही इसका परिणाम हमारी सन्तान के लिए बुरा न हो । कोई ऐसा होता है कि औचित्य का लेश-मात्र भी विचार नहीं करता—जिस तरह भी हो कुछ धन-संचय कर जाना अपना ध्येय समझता है, चाहे इसके लिए उसे दूसरो का गला ही क्यो न काटना पडे । वह सन्तान-प्रेम पर अपनी आत्मा को भी बलिदान कर देता है। एक तीसरा सन्तान-प्रेम वह है, जहाँ सन्तान का चरित्र प्रधान कारण होता है, जब कि पिता सन्तान का कुचरित्र देखकर उससे उदासीन हो जाता है उसके लिए कुछ छोड़ जाना व्यर्थ समझता है । अगर आप विचार करेगे तो इसी सन्तान-प्रेम के अगणित भेद आपको मिलेगे। इसी भो ति अन्य मानव-गुणों की भी मात्राएँ और भेद है। हमारा चरित्राध्ययन जितना ही सूक्ष्म, जितना ही विस्तृत होगा, उतनी ही सफलता से हम चरित्रो का चित्रण कर सकेगे । सन्तान-प्रेम की एक दशा यह भी है, जब पुत्र को कुमार्ग पर चलते देखकर पिता उसका घातक शत्रु हो जाता है । वह भी सन्तान-प्रेम ही है, जब पिता के लिए पुत्र घी का लड्डू होता है जिसका टेढापन उसके स्वाद मे बाधक नहीं होता। वह सन्तान-प्रेम भी देखने मे आता है जहाँ शराबी, जुआरी पिता पुत्र-प्रेम के वशीभूत होकर ये सारी बुरी आदते छोड़ देता है।

अब यहाँ प्रश्न होता है, उपन्यासकार को इन चरित्रो का अव्ययन करके उनको पाठक के सामने रख देना चाहिए, उसमे अपनी तरफ से काट छॉट कमी बेशी कुछ न करनी चाहिये, या किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए चरित्रो मे कुछ परिवर्तन भी कर देना चाहिए ?

यहीं से उपन्यासो के दो गिरोह हो गये है। एक आदर्शवादी, दूसरा यथार्थवादी।

यथार्थवादी चरित्रो को पाठक के सामने उनके यथार्थ नग्न रूप मे रख देता है । उसे इससे कुछ मतलब नहीं कि सच्चरित्रता का परिणाम
[ ६३ ]
बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा-उसके चरित्र अपनी कमजोरियॉ या खूबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन-लीला समाप्त करते हैं। संसार मे सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नही होता, बल्कि इसके विपरीत हुश्रा करता है, नेक आदमी धक्के खाते है, यातनाएं सहते है, मुसीबते झेलते है, अपमानित होते है, उनको नेकी का फल उलटा मिलता है, और बुरे आदमी चैन करते है, नामवर होते है, यशस्वी बनते है, उनको बदी का फल उलटा मिलता है । (प्रकृति का नियम विचित्र है !) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियो मे जकड़ा होता है और कि ससार मे बुरे चरित्रों की ही प्रधानता है-यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र मे भी कुछ न कुछ दाग-धब्बे रहते हैं, इस- लिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं और हमारी करताश्रो का नाम चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशा- वादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारो तरफ बुराई ही बुराई नजर आने लगती है ।

इसमे सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिए यथार्थवाद अत्यन्त उपयुक्त है, क्योकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने मे अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कही काला दिखायें जितना वह वास्तव मे है । लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने मे शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है। फिर मानव स्वभाव की विशेषता यह भी है कि वह जिस छल, क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नही कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे ससार मे उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले-वह भूल जाय कि मै चिन्ताओ के बन्धन मे पड़ा हुआ हूँ, जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हो; जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल मे ख्याल होता है कि जब हमे
[ ६४ ]
किस्से-कहानियो मे भी उन्ही लोगो से साबका है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढे ही क्यो ?

अँधेरी गर्म कोठरी मे काम करते-करते जब हम थक जाते है तब इच्छा होती है कि किसी बाग मे निकलकर निर्मल स्वच्छ वायु का अानद उठाये । इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमे ऐसे चरित्रो से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते है, जो स्वार्थ और वासना से रहित होते है, जो साधु प्रकृति के होते हैं । यद्यपि ऐसे चरित्र व्यवहार-कुशल नही होते, उनकी सरलता उन्हे सासारिक विषयो मे धोखा देती है, लेकिन कॉइएपन से ऊबे हुए प्राणियो को ऐसे सरल, ऐसे व्यावहारिक ज्ञान विहीन चरित्रों के दर्शन से एक विशेष आनन्द होता है।

यथार्थवाद यदि हमारी आँखें खोल देता है, तो आदर्शवाद हमे उठाकर किसी मनोरम स्थान मे पहुँचा देता है । लेकिन जहाँ आदर्शवाद मे यह गुण है, वहाँ इस बात की भी शका है कि हम ऐसे चरित्रो को न चित्रित कर बैठे जो सिद्धातो की मूर्तिमात्र हो-जिनमे जीवन न हो। किसी देवता की कामना करना मुश्किल नही है, लेकिन उस देवता मे प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।

इसलिए वही उपन्यास उच्चकोटि के समझे जाते हैं, जहाँ यथार्थ और आदर्श का समावेश हो गया हो । उसे आप 'आदर्शोन्मुख' यथार्थवाद' कह सकते है । श्रादर्श को सजीव बनाने ही के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिए और अच्छे उपन्यास की यही विशेषता है । उपन्यासकार की सबसे बडी विभूति ऐसे चरित्रों की सृष्टि है, जो अपने सद्व्यवहार और सद्विचार से पाठक को मोहित कर ले । जिस उपन्यास के चरित्रो मे यह गुण नहीं है, वह दो कौड़ी का है।

चरित्र को उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए यह जरूरी नहीं कि वह निदोष हो-महान् से महान् पुरुषो मे भी कुछ न कुछ कमजोरियाँ होती है । चरित्र को सजीव बनाने के लिए उसकी कमजोरियो का दिग्दर्शन
[ ६५ ]
राकने से कोई हानि नहीं होती। बल्कि यही कमजोरियों उस चरित्र को मनुष्य बना देती हैं । निदोष चरित्र तो देवता हो जायगा और हम उसे समझ ही न सकेगे। ऐसे चरित्र का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड सकता । हमारे प्राचीन साहित्य पर आदर्श की छाप लगी हुई है। वह केवल मनोरञ्जन के लिए न था। उसका मुख्य उद्देश्य मनोरञ्जन के साथ आत्मपरिष्कार भी था। साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है । यह तो भाटो और मदारियो, विदूषको और मसखरो का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममे सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है। कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिए । इस मनोरथ को सिद्ध करने के लिए जरूरत है कि उसके चरित्र Positive हो, जो प्रलोभनो के आगे सिर न झुकाये बल्कि उनको परास्त करे, जो वासनात्रो के पजे मे न फंसें बल्कि उनका दमन करें, जो किसी विजयी सेनापति की भॉति शत्रुश्रो का संहार करके विजय-नाद करते हुए निकले। ऐसे ही चरित्रो का हमारे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाय । 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियो पर अवलम्बित हो, ईर्षा और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और विराग, दुःख और लज्जा-ये सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ है, इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती ।।

जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है-इसमे कोई सन्देह नहीं । लेकिन आज-कल परिस्थितियों इतनी तीव्र गति से बदल रही है, इतने नये नये विचार पैदा हो रहे है, कि कदाचित्
[ ६६ ]
अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान मे रख ही नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियो का असर न पडे, वह उनसे अान्दोलित न हो । यही कारण है कि आज-कल भारतवर्ष के ही नही, यूरोप के बड़े बड़े विद्वान् भी अपनी रचना द्वारा किसी 'वाद' का प्रचार कर रहे है । वे इसकी परवा नहीं करते कि इससे हमारी रचना जीवित रहेगी या नहीं; अपने मत की पुष्टि करना ही उनका ध्येय है, इसके सिवाय उन्हे कोई इच्छा नहीं । मगर यह क्योकर मान लिया जाय कि जो उपन्यास किसी विचार के प्रचार के लिए लिखा जाता है, उसका महत्व क्षणिक होता है ? विक्टर ह्यू गो का 'ले मिजरेबुल', टालस्टाय के अनेक ग्रंथ, डिकेन्स की कितनी ही रचनाएँ विचार-प्रधान होते हुए उच्च कोटि की साहित्यिक कृतियाँ हैं और अब तक उनका आकर्षण कम नहीं हुआ । आज भी शॉ, वेल्स आदि बड़े बडे लेखकों के ग्रन्थ प्रचार ही के उद्देश्य से लिखे जा रहे है।

हमारा ख्याल है कि क्यो न कुशल साहित्यकार कोई विचार प्रधान रचना भी इतनी सुन्दरता से करे जिसमें मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों का सघर्ष निभता रहे ? 'कला के लिए कला' का समय वह हाता है जब देश सम्पन्न और सुखी हो । जब हम देखते है कि हम भॉति-भॉति के राजनीतिक और सामाजिक बन्धनो मे जकडे हुए है, जिधर निगाह उठती है दुःख और दरिद्रता के भीषण दृश्य दिखायी देते हैं, विपत्ति का करुण कदन सुनायी देता है, तो कैसे सभव है कि किसी विचार- शील प्राणी का हृदय न दहल उठे ? हॉ, उपन्यासकार को इसका प्रयत्न अवश्य करना चाहिए कि उसके विचार परोक्ष रूप से व्यक्त हो, उपन्यास की स्वाभाविकता मे उस विचार के समावेश से कोई विघ्न न पडने पाये, अन्यथा उपन्यास नीरस हो जायगा ।

डिकेस इगलैड का बहुत प्रसिद्ध उपन्यासकार हो चुका है। "पिक- विक पेपर्स' उसकी एक अमर हास्य-रस प्रधान रचना है । 'पिकविक' का नाम एक शिकरम गाड़ी के मुसाफिरो की जबान से डिकेस के कान में
[ ६७ ]
आया । बस, नाम के अनुरूप ही चरित्र, आकार, वेश-सबकी रचना हो गयी। 'साइलस मार्नर' भी अगरेजी का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। जार्ज इलियट ने, जो इसकी लेखिका है, लिखा है कि अपने बचपन मे उन्होंने एक फेरी लगानेवाले जुलाहे को पीठ पर कपडे के थान लादे हुए कई बार देखा था। वह तसवीर उनके हृदय-पट पर अकित हो गयी थी और समय पर इस उपन्यास के रूप मे प्रकट हुई । 'स्कारलेट लेटर' भी हॅथन की बहुत ही सुन्दर, मर्मस्पर्शिनी रचना है । इस पुस्तक का बीजाकुर उन्हे एक पुराने मुकद्दमे की मिसिल से मिला । भारतवर्ष मे अभी उपन्यासकारो के जीवन-चरित्र लिखे नही गये, इसलिए भारतीय उपन्यास-साहित्य से कोई उदाहरण देना कठिन है । 'रङ्गभूमि' का बीजा- कुर हमे एक अधे भिखारी से मिला जो हमारे गाँव मे रहता था। एक जरा-सा इशारा, एक जरा-सा बीज, लेखक के मस्तिष्क मे पहुंचकर इतना विशाल वृक्ष बन जाता है कि लोग उस पर आश्चर्य करने लगते है। 'एम० ऐड्र ज़ हिम' रडयार्ड किपलिग को एक उत्कृष्ट काव्य-रचना है। किपलिंग साहब ने अपने एक नोट मे लिखा है कि एक दिन एक इञ्जीनियर साहब ने रात को अपना जीवन-कथा सुनायी थी। वही उस काव्य का आधार थी । एक और प्रसिद्ध उपन्यासकार का कथन है कि उसे अपने उपन्यासो के चरित्र अपने पडासियो मे मिले। वह घण्टो अपनी खिडकी के सामने बैठे लोगो को अाते-जाते सूक्ष्म दृष्टि से देखा करते और उनकी बातों को व्यान से सुना करते थे । 'जेन श्रायर' भी उपन्यास के प्रेमियों ने अवश्य पढ़ी होगी । दो लेखिकात्रो मे इस विषय पर बहस हो रही थी कि उपन्यास की नायिका रूपवतो होनी चाहिये या नहीं। 'जेन आयर' की लेखिका ने कहा, 'मै ऐसा उपन्यास लिखूॅगी जिसकी नायिका रूपवती न होते हुए भी आकर्षक होगी।' इसका फल था 'जेन आयर' ।

बहुधा लेखको को पुस्तको से अपनी रचनाओ के लिए अकुर मिल जाते हैं । हाल केन का नाम पाठको ने सुना है। आपकी एक उत्तम
[ ६८ ]उसके विका हिन्दी अनुवाद हाल ही मे 'अमरपुरी' के नाम से हुआ है। मे नवीनलखते है कि मुझे बाइबिल से प्लाट मिलते है। मेटरलिंक

लेसयम के जगद्विख्यात नाटककार हैं। उन्हे बेलजियम का शेक्मपियर पक्तियो है। उनका 'मोमावोन' नामक ड्रामा ब्राउनिंग की एक कविता से स्वीकार हुअा था और 'मेरी मैगडालीन' एक जर्मन ड्रामा से । शेक्सपियर दृश्य नेटको का मूल स्थान खोज-खोजकर कितने ही विद्वानो ने 'डाक्टर' यूरोप उपाधि प्राप्त कर ली है । कितने वर्तमान औपन्यासिको और नाटक- उनका ने शेक्सपियर से सहायता ली है, इसकी खोज करके भी कितने ही अलग 'डाक्टर' बन सकते है । 'तिलिस्म होशरुबा' फारसी का एक वृहत् योग्या है जिसके रचयिता अकबर के दरबारवाले फैजी कहे जाते है, नोटलॉ कि हमे यह मानने मे सन्देह है । इस पोथे का उर्दू मे भी अनुवाद दृश्य गया है । कम-से-कम २०,००० पृष्ठो की पुस्तक होगी । स्व० बाबू कामकीनन्दन खत्री ने 'चन्द्रकान्ता' और 'चन्द्रकान्ता-सतति' का बीजाकुर नलिस्म होशरुबा' से ही लिया होगा,ऐसा अनुमान होता है ।

वर ससार-साहित्य मे कुछ ऐसी कथाएँ है, जिन पर हजारों बरसो से अाखकगण आख्यायिकाएँ लिखते आये है और शायद हजारों वर्षों तक दिलखते जायेंगे। हमारी पौराणिक कथाओ पर न जाने कितने नाटक और कितनी कथाएँ रची गयी है। यूरोप मे भी यूनान की पौराणिक गाथा कवि-कल्पना के लिए अशेष आधार है । 'दो भाइयो की कथा', जिसका पता पहले मिस्र देश के तीन हजार वर्ष पुराने लेखों से मिला था, फ्रान्स से भारतवर्ष तक की एक दर्जन से अधिक प्रसिद्ध भाषाओं के साहित्य मे समाविष्ट हो गयी है। यहाँ तक कि बाइबिल मे उस कथा की एक घटना ज्यो की त्यो मिलती है।

किन्तु यह समझना भूल होगी कि लेखकगण आलस्य या कल्पना- शक्ति के अभाव के कारण प्राचीन कथाओ का उपयोग करते है। बात यह है कि नये कथानक मे वह रस, वह आकर्षण नहीं होता जो पुराने कथानकों मे पाया जाता है। हॉ, उनका कलेवर नवीन होना चाहिए। [ ६९ ]
'शकुन्तला' पर यदि कोई उपन्यास लिखा जाय, तो वह कितना मर्म- स्पर्शी होगा, यह बताने की जरूरत नही ।

रचना-शक्ति थोडी-बहुत सभी प्राणियो मे रहती है। जो उसमें अभ्यस्त हा चुके है, उन्हे तो फिर झिझक नहीं रहती-कलम उठाया और लिखने लगे। लेकिन नये लेखको को पहले कुछ लिखते समय ऐसी झिझक होती है मानो वे दरिया मे कूदने जा रहे हो । बहुधा एक तुच्छ सी घटना उनके मस्तिष्क पर प्रेरक का काम कर जाती है । किसी का नाम सुनकर, काई स्वप्न देखकर, कोई चित्र देखकर, उनकी कल्पना जाग उठती है । किसी व्यक्ति पर किस प्रेरणा का सब से अधिक प्रभा पड़ता है, यह उस व्यक्ति पर निर्भर है । किसी की कल्पना दृश्य-विषय से उभरती है,किसा की गन्ध से, किसी की श्रवण से।किसी को नये,सुरम्य स्थान की सैर से इस विषय मे यथेष्ट सहायता मिलती है। नदी के तट पर अकेले भ्रमण करने से बहुवा नयी-नयी कल्पनाएँ जाग्रत होती हैं। ।

ईश्वरदत्त शक्ति मुख्य वस्तु है । जब तक यह शक्ति न होगी जप देश, शिक्षा, अभ्यास सभी निष्फल जायगा । मगर यह प्रकट कैसे हो कि किसमे यह शक्ति है, किसमे नही ? कभी इसका सबूत मिलने मे बरसो गुजर जाते है और बहुत परिश्रम नष्ट हो जाता है। अमेरिका के एक पत्र सपादक ने इसकी परीक्षा करने का नया ढग निकाला है। दल के दल युवको मे से कौन रत्न है और कौन पाषाण ? वह एक कागज के टुकडे पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम लिख देता है और उम्मेदवार को वह टुकड़ा देकर उस नाम के सम्बन्ध मे ताबड़तोड़ प्रश्न करना शुरू करता है-उसके बालो का रंग क्या है ? उसके कपड़े कैसे है ? कहाँ रहती है ? उसका बाप क्या काम करता है ?जीवन मे उसकी मुख्य अभिलाषा क्या है ? आदि । यदि युवक महोदय ने इन प्रश्नो के संतापजनक उत्तर न दिये, तो उन्हे अयोग्य समझकर बिदा कर देता है । जिसकी निरीक्षण-शक्ति इतनो शिथिल हो, वह
[ ७० ]
उसके विचार मे उपन्यास-लेखक नहीं बन सकता । इस परीक्षा-विभाग मे नवीनता तो अवश्य है पर भ्रामकता की मात्रा भी कम नही है।

लेखको के लिए एक नोटबुक का रहना आवश्यक है। यद्यपि इन पक्तियो के लेखक ने कभी नोटबुक नहीं रखी, पर इसकी जरूरत को वह स्वीकार करता है । काई नयी चीज, काई अनोखी सूरत, कोई सुरम्य दृश्य देखकर नाट बुक मे दर्ज कर लेने से बड़ा काम निकलता है। यूरोप मे लेखको के पास उस वक्त तक नोटबुक अवश्य रहती है जब-तक उनका मस्तिष्क इस योग्य नहीं बनता कि हर प्रकार की चीजो को वे अलग अलग खानो मे सगृहीत कर ले । बरसो के अभ्यास के बाद यह योग्यता प्राप्त हा जाती है, इसमे सन्देह नहीं, लेकिन प्रारम्भकाल मे तो नोटबुक का रखना परमावश्यक है । यदि लेखक चाहता है कि उसके दृश्य सजीव हो, उसके वर्णन स्वाभाविक हो, तो उसे अनिवार्यतः इससे काम लेना पडेगा । देखिये, एक उपन्यासकार की नोटबुक का नमूना-

'अगस्त २१, १२ बजे दिन, एक नौका पर एक आदमी, श्याम वर्ण, सुफेद बाल, ऑखे तिरछी, पलके भारी, आठ ऊपर का उठे हुए और माटे, मछे ऐठी हुई।

"सितम्बर १, समुद्र का दृश्य, बादल श्याम और श्वेत, णनी मे सर्य का प्रतिबिम्ब काला, हरा, चमकीला, लहरे फेनदार, उनका ऊपरी भाग उजला । लहरो का शोर, लहरो के छींटे से झाग उड़ती हुई ।' उन्ही महाशय से जब पूछा गया कि आपको कहानियो के प्लाट कहाँ मिलते है १ तो आपने कहा, 'चारो तरफ । अगर लेखक अपनी आँखे खुली रखे, तो उसे हवा मे से भी कहानियाँ मिल सकती है ।रेलगाडी मे, नौकात्रों पर, समाचार-पत्रो मे, मनुष्य के वार्तालाप मे और हजारो जगहो से सुन्दर कहानियाँ बनायी जा सकती है। कई सालों के अभ्यास के बाद देख-भाल स्वाभाविक हो जाती है, निगाह आप ही आप अपने मतलब की बात छॉट लेती है । दो साल हुए, मै एक मित्र के साथ
[ ७१ ]
सैर करने गया ।बातो ही बातों मे यह चर्चा छिड गयी कि यदि दो के सिवा ससार के और सब मनुष्य मार डाले जाये तो क्या हो ? इस अकुर से मैने कई सुन्दर कहानियाँ सोच निकाली।'

इस विषय मे तो उपन्यास-कला के सभी विशारद सहमत है कि उपन्यासा के लिए पुस्तको से मसाला न लेकर जीवन ही से लेना चाहिये। वालटर बेसेट अपनी 'उपन्यास कला' नामक पुस्तक मे लिखते है-

'उपन्यासकार को अपनी सामग्री, अाले पर रखी हुई पुस्तको से नहीं, उन मनुष्यो के जीवन से लेनी चाहिए जो उसे नित्य ही चारो तरफ मिलते रहते है । मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकाश लोग अपनी आँखो से काम नहीं लेते । कुछ लोगो को यह शका भी होती है कि मनुष्यो मे जितने अच्छे नमूने थे, वे तो पूर्वकालीन लेखको ने लिख डाले, अब हमारे लिए क्या बाकी रहा १ यह सत्य है । लेकिन अगर पहले किसी ने बूढे, कजूस, उडाऊ युवक, जुआरी, शराबी, रगीन युवती आदि का चित्रण किया है, तो क्या अब उसी वर्ग के दूसरे चरित्र नहीं मिल सकते ? पुस्तको मे नये चरित्र न मिले पर जीवन मे नवीनता का अभाव कभी नही रहा।

हेनरी जेम्स ने इस विषय मे जो विचार प्रकट किये है, वह भी देखिये-

'अगर किसी लेखक की बुद्धि कल्पना-कुशल है, तो वह सूक्ष्मतम- भावो से जीवन को व्यक्त कर देती है, वह वायु के स्पन्दन को भी जीवन प्रदान कर सकती है । लेकिन कल्पना के लिए कुछ प्राधार अवश्य चाहिए । जिस तरुणी लेखिका ने कभी सैनिक छावनियों नहीं देखीं, उससे यह कहने मे कुछ भी अनौचित्य नहीं है कि आप सैनिक-जीवन मे हाथ न डालें । मै एक अंग्रेज उपन्यासकार को जानता हूँ, जिसने अपनी एक कहानी मे फ्रान्स के प्रोटेस्टेट युवको के जीवन का अच्छा चित्र खीचा था। उस पर साहित्यिक ससार मे बड़ी चर्चा रही। उससे लोगों ने पूछा-आपको इस समाज के निरीक्षण करने का ऐसा अवसर कहाँ
[ ७२ ]
मिला? ( फ्रान्स रोमन कैथोलिक देश है और प्रोटेस्टेट वहाँ साधारणतः नहीं दिखायी पड़ते।) मालूम हुआ कि उसने एक बार, केवल एक बार, कई प्रोटेस्टेट युवकों को बैठे और बाते करते देखा था। बस, एक का देखना उसके लिए पारस हो गया । उसे वह आधार मिल गया जिसपर कल्पना अपना विशाल भवन निर्माण करती है। उसमे वह ईश्वरदत्त शक्ति मौजूद थी जो एक इञ्च से एक योजन की खबर लाती है और जो शिल्पी के लिए बडे महत्त्व की वस्तु है।'

मिस्टर जी० के० चेस्टरटन जासूसी कहानियाँ लिखने मे बडे प्रवीण हैं। आपने ऐसी कहानियों लिखने का जो नियम बताया है, वह बहुत शिक्षाप्रद है । हम उसका आशय लिखते है-

'कहानी मे जो रहस्य हो उसे कई भागो मे बॉटना चाहिए । पहले छोटी-सी बात खुले, फिर उससे कुछ बड़ी और अन्त मे रहस्य खुल जाय । लेकिन हरएक भाग मे कुछ न कुछ रहस्योद्घाटन अवश्य होना चाहिए जिसमे पाठक की इच्छा सब-कुछ जानने के लिए बलवती होती चली जाय । इस प्रकार की कहानियो मे इस बात का ध्यान रखना परमा- वश्यक है कि कहानी के अन्त मे रहस्य खोलने के लिए कोई नया चरित्र न लाया जाय । जासूसी कहानियो मे यही सबसे बड़ा दोष है । रहस्य के खुलने मे तभी मजा है जबकि वह चरित्र अपराधी सिद्ध हो, जिस पर कोई भूलकर भी सन्देह न कर सकता था ।'

उपन्यास कला मे यह बात भी बड़े महत्त्व की है कि लेखक क्या लिखे ओर क्या छोड़ दे। पाठक कल्पनाशील होता है, इसलिए वह ऐसो बाते पढ़ना पसन्द नहीं करता जिनकी वह आसानो से कल्पना कर सकता है । वह यह नहीं चाहता कि लेखक सब कुछ खुद कह डाले और पाठक की कल्पना के लिए कुछ भी बाकी न छोडे । वह कहानी का खाका-मात्र चाहता है, रंग वह अपनी अभिरुचि के अनुसार भर लेता है। कुशल लेखक वही है जो यह अनुमान कर ले कि कौन सी बात पाठक स्वय सोच लेगा और कौन-सी बात उसे लिखकर स्पष्ट कर देनी
[ ७३ ]
उपन्यास का क्षेत्र,अपने विषय के लिहाज मे,दूसरी ललित कलाओ से कहीं ज्यादा विस्तृत है।वाल्टर बेसेट ने इस विषय पर इन शब्दो मे विचार प्रकट किये हैं-

उपन्यास के विषय का विस्तार मानव चरित्र से फिसी कदर कम नहीं है । उसका सम्बन्ध अपने चरित्रों के कर्म और विचार, उनका देवत्व और पशुत्व, उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से है। मनोभाव के विभिन्न रूप और भिन्न-भिन्न दशाओ मे उनका विकास उपन्यास के मुख्य विपय है ।

इसी विषय-विस्तार ने उपन्यास को संसार-साहित्य का प्रधान अंग बना दिया है। अगर आपको इतिहास से प्रेम है, तो आप अपने उप- न्यास मे गहरे से गहरे ऐतिहासिक तत्वो का निरूपण कर सकते है । अगर आपको दर्शन से रुचि है, तो आप उपन्यास मे महान् दार्शनिक तत्वों का विवेचन कर सकते हैं। अगर आप मे कवित्व शक्ति है तो उपन्यास मे उसके लिए भी काफी गुञ्जाइश है। समाज, नीति, विज्ञान, पुरातत्व आदि सभी विषयों के लिए उपन्यास मे स्थान है । यहाँ लेखक को अपनी कलम का जौहर दिखाने का जितना अवसर मिल सकता है, उतना साहित्य के और किसी अंग मे नहीं मिल सकता। लेकिन इसका यह आशय नहीं कि उपन्यासकार के लिए कोई बन्धन ही नहीं है । उपन्यास का विषय-विस्तार ही उपन्यासकार को बेडियो मे जकड़ देता है । तंग सड़कों पर चलनेवालो के लिए अपने लक्ष्य पर पहुँचना उतना कठिन
[ ७४ ]
नहीं है,जितना एक लम्बे चौड़े मार्गहीन मैदान मे चलनेवालो के लिए।

"उपन्यासकार का प्रधान गुण उसकी सृजन-शक्ति है। अगर उसमे इसका अभाव है, तो वह अपने काम मे कभी सफल नहीं हो सकता। उसमे और चाहे जितने अभाव हों पर कल्पना-शक्ति की प्रखरता अनिवार्य है। अगर उसमे यह शक्ति मौजूद है तो वह ऐसे कितने ही दृश्यों, दशाओं और मनोभावों का चित्रण कर सकता है, जिनका उसे प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। अगर इस शक्ति की कमी है, तो चाहे उसने कितना ही देशाटन क्यो न किया हो, वह कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसके अनुभव का क्षेत्र कितना ही विस्तृत क्यो न हो, उसकी रचना मे सरसता नही पा सकती। ऐसे कितने ही लेखक है जिनमे मानव-चरित्र के रहस्यो का बहुत मनोरंजक, सूक्ष्म और प्रभाव डालनेवाली शैली मे बयान करने की शक्ति मौजूद है लेकिन कल्पना की कमी के कारण वे अपने चरित्रो मे जीवन का सञ्चार नही कर सकते, जीती-जागती तसवीरे नहीं खीच सकते। उनकी रचनात्रा को पढ़कर हमे यह ख्याल नहीं होता कि हम कोई सच्ची घटना देख रहे है।

इसमे सन्देह नहीं कि उपन्यास की रचना-शैली सजीव और प्रभावो- त्पादक होनी चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नही है कि हम शब्दो का गोरखधन्धा रचकर पाठक को इस भ्रम मे डाल दे कि इसमे जरूर कोई न कोई गूढ़ अाशय है । जिस तरह किसी आदमी का ठाट-बाट देखकर हम उसकी वास्तविक स्थिति के विषय मे गलत राय कायम कर लिया करते हैं, उसी तरह उपन्यासो के शाब्दिक आडम्बर देखकर भी हम ख्याल करने लगते है कि कोई महत्त्व की बात छिपी हुई है। सम्भव है, ऐसे लेखक का थोड़ी देर के लिए यश मिल जाय, किन्तु जनता उन्हीं उपन्यासो का आदर का स्थान देती है जिनकी विशेषता उनकी गूढ़ता नहीं, उनकी सरलता होती है।

उपन्यासकार को इसका अधिकार है कि वह अपनी कथा को घटना
[ ७५ ]
वैचित्र्य से रोचक बनाये, लेकिन शर्त यह है कि प्रत्येक घटना असली ढॉचे से निकट सम्बन्ध रखती हो। इतना ही नहीं, बल्कि उसमे इस तरह घुल मिल गई हो कि कथा का आवश्यक अग बन जाय, अन्यथा उपन्यास की दशा उस घर की-सी हो।जायगी जिसके हर एक हिस्से अलग-अलग हो । जब लेखक अपने मुख्य विषय से हटकर किसी दूसरे प्रश्न पर बहस करने लगता है, तो वह पाठक के उस आनन्द मे बाधक हो जाता है जो उसे कथा मे पा रहा था । उपन्यास मे वही घटनाएं, वही विचार लाना चाहिए जिनसे कथा का माधुर्य बढ जाय, जो प्लाट के विकास में सहायक हो अथवा चरित्रो के गुप्त मनाभावो का प्रदर्शन करते हो । पुरानी कथाश्रो मे लेखक का उद्देश्य घटना-वैचित्र्य दिखाना होता था; इसलिए वह एक कथा मे कई उपकथाएँ मिलाकर अपना उद्देश्य पूरा करता था । सम्प्रतिकालीन उपन्यासों मे लेखक का उद्देश्य मनोभावों और चरित्र के रहस्यों का खोलना होता है, अतएव यह श्रावश्यक है कि वह अपने चरित्रो को सूक्ष्म दृष्टि से देखे, उसके चरित्रो का कोई भाग उसकी निगाह से न बचने पाये । ऐसे उपन्यास मे उपकथाओ की गुञ्जाइश नहीं होती।

यह सच है कि ससार की प्रत्येक वस्तु उपन्यास का उपयुक्त विषय बन सकती है। प्रकृति का प्रत्येक रहस्य, मानव-जीवन का हर एक पहलू जब किसी सुयोग्य लेखक की कलम से निकलता है तो वह साहित्य का रत्न बन जाता है, लेकिन इसके साथ ही विषय का महत्त्व और उसकी गहराई भी उपन्यास के सफल होने में बहुत सहायक होती है । यह जरूरी नही कि हमारे चरित्रनायक ऊँची श्रेणी के ही मनुष्य हों। हर्ष और शोक, प्रेम और अनुराग, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य-मात्र मे व्यापक है। हमे केवल हृदय के उन तारों पर चोट लगानी चाहिए जिनकी झंकार से पाठकों के हृदय पर भी वैसा ही प्रभाव हो । सफल उपन्यासकार का सबसे बड़ा लक्षण है कि वह अपने पाठकों के हृदय मे उन्हीं भावो को जागरित कर दे जो उसके पात्रों मे हों । पाठक भूल जाय कि


PD-icon.svg This work is in the public domain in the United States because it was first published outside the United States (and not published in the U.S. within 30 days), and it was first published before 1989 without complying with U.S. copyright formalities (renewal and/or copyright notice) and it was in the public domain in its home country on the URAA date (January 1, 1996 for most countries).