साहित्य का उद्देश्य/12

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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मि० जेम्स अोपेनहाइम अंग्रेज़ी के अच्छे कहानी-लेखक है । हाल मे एक अंग्रेजी पत्रिका के सम्पादक ने कहानी-कला पर मि० अोपेनहाइम से कुछ बातचीत की थी। उनमे जो प्रश्नोत्तर हुआ, उसका साराश हम पाठको के मनोरजन के लिए यहाँ देते है। पत्रिकाओं मे जितनी कहानियाँ आती है, उतने और किसी विषय के लेख नही आते । यहाँ तक कि उन सबा को पढना मुश्किल हो जाता है। अधिकाश तो युवको की लिखी होती है, जिनके कथानक, भाव, भाषा, शैली मे कोई मौलिकता नही होती और ऐसा प्रतीत होता है कि कहानी लिखने के पहले उन्होने कहानी कला के मूल तत्वो को समझने की चेष्टा नही की । यह बिलकुल सच है कि सिद्धान्तो को पढ़ लेने से ही कोई अच्छा कहानी-लेखक नही हो जाता, उसी तरह जैसे छन्द-शास्त्र पढ लेने से कोई अच्छा कवि नहीं हो जाता। साहित्य-रचना के लिए कुछ न कुछ प्रतिभा अवश्य होनी चाहिए। फिर भी सिद्धान्तो को जान लेने से अपने मे विश्वास आ जाता है और हम जान जाते है, कि हमे किस ओर जाना चाहिए। हमे विश्वास है, इस कहानी-लेखक के विचारों से उन पाठको को विशेष लाभ होगा, जो कहानी लिखना और कहानी के गुण-दोष समझना चाहते है-

प्रश्न-पहले आपके मन मे किसी कहानी का विचार कैसे उत्पन्न होता है ?

उत्तर-तीन प्रकार से । पहला, किसी चरित्र को देखकर । किसी व्यक्ति मे कोई असाधारणता पाकर मै उस पर एक कहानी की कल्पना
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कर लेता हूँ। दूसरे, किसी नाटकीय घटना-द्वारा।जब कोई रोधक और विचित्र घटना हो जाती है, ता उसमे कुछ उलझाव और नवीनता लाकर एक प्लाट बना लेता हूँ । तीमरे, किसी समस्या या सामाजिक प्रश्न द्वारा । समाचार-पत्रो मे तरह-तरह के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक प्रश्नो पर आलोचनाएँ होती रहती है। उनमे से कोई प्रश्न लेकर, जैसे बालको क परिश्रम और मजूरी का प्रश्न, उन, पर कहानी का डॉत्रा खडा कर लेता हूँ।

प्रश्न-जब आप किसी चरित्र का चित्रण करने लगते है, तो क्या उसमे वास्तविक जीवन की बाते लिखते है ?

उत्तर-कभी नही । वास्तविक जीवन की बातो और कृत्यों से कहानी नही बनती । वह तो केवल कहानी के लिये ईट-मसाले का काम दे सकते है । वास्तविक जीवन की नीरसताआ और बाधाआ से कुछ देर तक मुक्ति पाने के लिये ता लाग कहानियाँ पढते है। जब तक कहानी मे मनोरजकता न रहेगी, तो उससे पाठको का क्या यानन्द मिलेगा? जीवन मे बहुत-सी बाते इतनी मनारजक और विस्मयकारी होती है, जिनकी कोई बडे से बड़ा कलाकार भी कल्पना नही कर सकता । पुरानी कहावत है -सत्य कथा से कही विचित्र होता है। कलाकार जो कुछ करता है, वह यही है कि उन अनुभूतियो पर अपने मनोभावो का, अपने दृष्टिकोण का रंग चढा दे।

प्रश्न-क्या एक कल्पित चरित्र की सृष्टि करने की अपेक्षा ऐसे चरित्र का निर्माण करना ज्यादा महत्वपूर्ण नही है, जो सजीव प्राणी की भॉति हॅसता-बोलता, जीता-जागता दिखाई दे?

उत्तर-हॉ, यह बिलकुल ठीक है । इसलिए जब तक मै चरित्र- नायक को अच्छी तरह जान नहीं लेता, उसके विषय मे एक शब्द भी नहीं लिखता । इससे मुझे बड़ी मदद मिलती है। मै हीरो के विषय मे पहले यह जानना चाहता हूँ कि उसके मॉ-बाप कौन है ? वह कहाँ पैदा हुआ था ? उसकी बाल्यावस्था किन लोगो की सगत मे गुजरी ? उसने
[ २७० ]कितनी और कैसी शिक्षा पाई ? उसके भाई-बहन हैं या नहीं ? उसके मित्र किस तरह के लोग है ? सम्भव है, मै इन गौण बातो को अपनी कहानी मे न लिखू ; लेकिन इनका परिचय होना आवश्यक है। इन ब्योरो से चरित्र-चित्रण सजीव हो जाता है । जब तक लेखक को ये बाते न मालम हों, वह चरित्र के विषय मे कोई दृढ़ कल्पना नही कर सकता, न उसको भिन्न भिन्न परिस्थितियों मे रखकर स्वाभाविक रूप से उसका सचालन कर सकता है । वह हमेशा दुबधे मे पडा रहेगा।

प्रश्न-चरित्रों के वर्णन मे आप किस तरह की बाते लिखना अनुकूल समझते है ?

उत्तर-मै उसकी वेश-भूषा, रग-रूप, आकार-प्रकार आदि गौण बातो का लिखना अनावश्यक समझता हूँ। मै केवल ऐसी स्पष्ट और प्रत्यक्ष बाते लिखता हूँ, जिनसे पाठक के सामने एक चित्र खड़ा हो सके । बहुत-सी गौण बातें लिखने से चित्र स्पष्ट होने की जगह और धुंधला हो जाता है। मुझे खूब याद है कि बालजक ने अपने एक उपन्यास मे एक चचल रमणी के विषय मे लिखा था, कि 'वह तीतरी की भॉति कमरे मे आई। उसके सॉवले रग पर लाल कपडे खूब खिलते थे। इस वाक्य से उस स्त्री का चित्र मेरी आँखों के सामने फिरने लगाः लेकिन बालजक को इतने ही से सन्तोष न हुआ। उसने डेढ़ पृष्ठ उस चरित्र के विषय मे छोटी-छोटी बाते लिखने मे रॅग दिये । फल यह हुआ कि जो चित्र मेरी कल्पना मे खडा हुआ था, वह धुंधला होते-होते बिलकुल गायब हो गया । वास्तव मे किसी चरित्र का परिचय कराने के लिए केवल एक विशेष लक्षण काफी है । दूसरी बाते अवसर पड़ने पर आगे चलकर बयान की जा सकती हैं।

प्रश्न-एक बात और । क्या आप अपनी गल्पो मे दृष्टिकोण का परिवर्तन भी कभी करते हैं ? अर्थात्-कथा के विकास और प्रगति पर कभी एक चरित्र की दृष्टि से और कभी दूसरे चरित्र की दृष्टि से नजर डालते हैं या नहीं ? [ २७१ ]उत्तर-नही, मुझे यह पसन्द नहीं है। मै फ्रासीसी शैली को अच्छा समझता हूँ। किसी एक चरित्र को अपना मुख-पात्र बना कर लिखता है और जो कुछ सोचता या अनुभव करता हूँ सब उसी के मुख से कहला देता हूँ। इससे कहानी मे यथार्थता आ जाती है ।

प्रश्न-लेखको के विषय मे, अन्त:प्रेरणा के विषय मे आपका क्या विचार है ?

उत्तर-मै तो अन्तःप्रेरणा को मानसिक दशा समझता हूँ । प्रत्येक कहानी, लेखक के मन का ही प्रतिबिम्ब होती है । भावो मे तीव्रता और गहराई पैदा करने के लिए प्रबल भावावेश होना चाहिए। यदि ऐसा आवेश न हो, तो भी गल्प के विषय को बार-बार सोचकर मन मे उन्हीं बातों की निरन्तर कल्पना करके हम अपने भावो मे तोव्रता उत्पन्न कर सकते है। मुझे किसी कहानी का शुरू करना बहुत कठिन मालूम होता है; लेकिन एक बार शुरू कर देने के बाद उसे अधूरा नहीं छोडता ।

इसके बाद और भी कुछ सवाल-जवाव हुए, जिनमे मि० ओपेन- हाइम ने बताया कि वह कहानी लिखने के पहले उसका कोई खाका नहीं तैयार करते, केवल उसका अन्त और उसका उद्देश्य सोच लेते है। गल्प के प्रारभ मे आप ने बताया कि उसे चाहे जिस रूप मे रखिए- वाक्य हो या सभाषण, कोई घटना हो या कल्पना, चाहे कोई अनुभूति या विचार हो-जो कुछ हो, ससमे मौलिकता, नवीनता और अनोखापन हो। वह सामान्य, लचर, सौ बार की दुहराई हुई बात न हो । अन्त मे आपने कहा कि गल्प-रचना में भी अन्य कलाओ की भाँति अभ्यास से सिद्धि प्राप्त हो सकती है।

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जहाँ विदेश से निकलनेवाले पत्रों के लाखों ग्राहक होते हैं वहाँ

हमारे अच्छे से अच्छे भारतीय पत्र के ग्राहको की संख्या कुछ हजारों से अधिक नहीं होती । यह एक विचारणीय बात है । जापान का ही एक उदाहरण लीजिये । यह तो सबको मालूम है कि जापान भारतवर्ष का षष्टमाश ही है, फिर भी जहाँ भारत से कुल ३५०० पत्र प्रकाशित होते हैं, वहाँ जापान से ४५००, और यह ४५०० भी ऐसे पत्र है जिनके प्रकाशन की संख्या हजारो नहीं लाखों की है । 'ओसाका मेनीची' नाम का एक दैनिक पत्र है। उसके कार्यालय की इमारत ही तैतीस लाख रुपये की है। 'ओसाका ओसाही' और 'टोकियो नीची' नामक दो पत्र भी इसी कोटि के हैं । एक-एक पत्र के कार्यालय मे दो तीन हजार तक आदमी काम करते हैं और उनका जाल संसार भर में फैला हुआ है । जिस पत्र के कार्यालय मे चार छः सौ आदमी काम करते है, उसकी तो वहाँ कोई गणना ही नहीं होती। कई पत्र तो वहाँ ऐसे हैं जो पचास लाख तक छापे जाते है और दिन मे जिनके पाठ-पाठ संस्करण निकलते है और जिनको वितरण करने के लिए हवाई जहाजो से काम लिया जाता है। यह है जापानी पत्रो का वैभव । और इस वैभव का कारण है वहाँ की शिक्षित जनता का पठन प्रेम और सहयोग । वहाँ के प्रत्येक पॉच आदमियो मे आपको एक आदमी अखबार पढ़ने वाला अवश्य मिलेगा। पूंजीपति से लेकर मजदूर तक, बूढे से लेकर छोटे बच्चे तक, पत्रों को स्वयं खरीद कर पढ़ते हैं। फुरसत के समय को वे लोग
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बेकार के हसी-मजाक, खिलवाड़ या गाली-गलौज मे नहीं,अखबारों के पढ़ने मे बिताते है । जिस प्रकार वे अपनी शारीरिक भूख के लिए अन्न को आवश्यक समझते है, उसी प्रकार वे अपनी आत्मा की भूख के लिए पत्रों को खरीदकर पढना जरूरी समझते है। उन्होने पत्रो का पढना अपना एक अटल नियम बना रखा है। जो मनुष्य जिस रुचि का होता है, अपनी रुचि के पत्र का ग्राहक बन जाता है और उस पत्र से अपना ज्ञान-वर्द्धन और मनोरजन करता है। वहाँ के लोग पत्रो को खरीद कर पढ़ते है। कहीं से मागकर नहीं लाते । वे दूसरो के अखबार को जूठन समझते हैं। यही कारण है कि वहाँ के पत्रो के ग्राहको की संख्या पचास लाख तक है। जब हम यह समाचार पढ़ते हैं और भारतीय पत्रो की ओर दृष्टिपात करते हैं तो दाॅतों तले उँगली दबाने लगते हैं । कहते हैं विदेश के लोग पत्र निकालना जानते है । वे लोग शिक्षा मे और सभी बातो मे हमसे आगे बढ़े हुए है। उनके पास पैसा है। यह सभी बातें सही हो सकती है। किन्तु भारतीय पत्रों की प्रकाशन सख्या न बढ़ने का केवल यही कारण नहीं है कि भारतीय विद्वान पत्र निकालना नही जानते, वे शिक्षा मे पिछडे हुए है और पत्रो को खरीदने के लिए भारतीय जनता के पास पैसा नहीं है । यह दलीले कुछ अशो में ठीक हो भी सकती है; पर भारतीय पत्रो के न पनपने का एक और भी प्रबल कारण है।

हमारे यहाँ ऐसे लाखो मनुष्य हैं, जो पैसे वाले है, जिनकी अार्थिक स्थिति अच्छी है, जो शिक्षित है, और जिन्हे पत्रो को पढते रहने का शौक भी है । पर वे लोग मुफ्तखोर हैं । पत्रो के लिए पैसा खर्च करना वे पाप समझते है । या तो पत्रो को खोज-खाजकर अपने मित्रो और परिचित लोगों के यहाँ से ले आयेंगे, या लाइब्रेरियो मे जाकर देख आयेगे। लेकिन उनके लिए पैसा कभी न खर्च करेंगे । सोचते है जब तिकड़मबाजी से ही काम चल जाता है तो व्यर्थ पैसा कौन खर्च करे। यह दशा ऐसे लोगों की है जो हजारो का व्यवसाय करते हैं और व्याह
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शादी या अोसर मोसर मे अधे बनकर धन व्यय करते रहते है। ये लोग बीड़ी और सिगरेट मे, पान और तम्बाकू मे, नाटक और सिनेमा मे, लाटरी और जुए मे, चाय और काफी मे और विविध प्रकार के दुर्व्यसनो मे अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा फूक सकते है, किन्तु पत्रों के लिए एक पाई भी खर्च नही कर सकते । जीभ के स्वाद के लिए बाजारो मे मीठी और नमकीन चीजो पर ये लोग रुपये खर्च कर सकते है पर पत्रो को भूलकर भी नहीं खरीद सकते। इसके विपरीत, खरीदनेवालो को मूर्ख समझते है, यद्यपि उन्हीं की जूठन से इनका काम चलता है। अगर बहुत हिम्मत की तो किसी लाइब्रेरी के मेम्बर बन गये और लाइब्र रियन को अपनी मीठी बातो मे फंसाकर नियम के विरुद्ध अनेक पुस्तके और पत्र पढने के लिए ले गये । और भाग्यवश यदि किसी लेखक से परिचय हो गया, या अपनी तिकडम से किसी पत्र सम्पादक को साध लिया तो कहना ही क्या, कालं का खजाना उन्हे मिल गया। इस प्रकार ये लोग अपना मतलब निकाल लेते है। इससे आगे बढ़ना ये लोग मूर्खता समझते है । भारतीय पत्रों के प्रति इन लोगो के प्रेम, कर्तव्य पालन और सहानुभूति का कितना सुन्दर उदाहरण है ! क्या ऐसा सुन्दर उदाहरण आपको ससार के किसी भी देश मे मिल सकेगा ? धन्य हैं ये लोग और धन्य है अपनी भाषा के प्रति इनका अनुराग!

इन लोगो की यही दुवृत्ति भारतीय पत्रो के जीवन को सदैव सकट मे डाले रहती है। यह लोग जरा भी नहीं सोचते कि यह प्रवृत्ति समाचार पत्रो के लिए कितनी भयानक और हानिकर सिद्ध हो सकती है। इनकी इस प्रवृत्ति के कारण ही भारतीय पत्र पनपने नहीं पाते। जहाँ विदेशी पत्रो की निजी इमारतें लाखो रुपयो की होती हैं और उनके कार्यालयों मे हजारो आदमी काम करते हैं, वहाँ हमारे भारतीय पत्रों के कार्यालय किराये के, साधारण, या टूटे-फूटे मकानों में होते हैं और कहीं कहीं तो उनमे काम करने वाले मनुष्यो की संख्या एक दर्जन भी नहीं होती । नाम मात्र के लिए कुछ इने गिने पत्र ही ऐसे है जिनके कार्यालय
[ २७५ ]मे काम करने वाले दो सौ के लगभग या कुछ ही अधिक हो। ऐसे लोगो की कृपा के कारण हो भारतीय पत्रो का यह हाल है। कही-कहीं तो बेचारा एक ही आदमी सम्पादक, मुद्रक, व्यवस्थापक, प्रकाशक और प्रूफरीडर है। ससार के लिए यह बात नयी और आश्चर्यजनक है। यह सब इन भारतीय मुफ्तखोर पाठको की कुवृत्ति का ही परिणाम है, लेकिन अब इन मुफ्तखोर तथा अपनी भाषा के साथ अन्याय करने वालों को कुछ लज्जा आनी चाहिए। उन्हें मालूम होना चाहिए कि वे लोग भारतीय पत्रो का गला घोट रहे है और उन्हे ससार के उपहास और व्यग की एक वस्तु बना रहे है । जब कि ये लोग बडी-बड़ी रकमे व्यर्थ के कामो मे फूॅक सकते है तो कोई कारण नहीं कि ये अपने देशीय पत्रो के लिए एक छोटी सी रकम खर्च करके उनके प्राणा की रक्षा न कर सके।

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मि० ग्लिन शा ने जापानी साहित्य के अनक ग्रन्थ अंग्रेजी भाषा मे

अनुवाद किये हैं। आपने हिसाब लगाया है कि जापान इस समय संसार मे सबसे अधिक पुस्तके प्रकाशित करने वाला देश है । जापान के बाद सोवियट रूस, जर्मनी, फ्रान्स, इंगलैंड, पोलैण्ड और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का क्रम से नम्बर आता है । जापान की आबादी अमेरिका की आधी से ज्यादा नहीं पर हर साल वह अमेरिका से दुगुनी किताबे छापता है।

इस समय जापानी साहित्य की रुचि राष्ट्रीयता की ओर विशेष रूप से हो रही है। इतिहास, साहित्य, धर्म, युद्धनीति आदि सभी अंगों मे यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि बौद्ध धर्म विषय की ओर यकायक लोगों मे बड़ी दिलचस्पी हो गई है। हालाकि यह किसी धार्मिक अनुराग का नतीजा नहीं, केवल राष्ट्र आन्दोलन का ही एक भाग है।

गत वर्ष जापान मे दस हजार से ज्यादा पुस्तकें निकलीं। इनमें से २७०० शिक्षा विषयक, २५०० साहित्य, १६०० अर्थनीति, २०० पाठ्य, और १००० गृह प्रबन्ध विषय की थीं । शिक्षा विषयक पुस्तकों की संख्या ही सबसे ज़्यादा थी। इससे मालूम होता है जापान अपने राष्ट्र के निर्माण मे कितना उद्योगशील है; क्योंकि शिक्षा ही राष्ट्र की जड़ है । गृह प्रबन्ध की ओर भी उनका ध्यान कितना ज्यादा है। भारत मे तो इस विषय की पुस्तकें निकलती ही नहीं, और निकलती भी हैं, तो बिकती नहीं। इस विषय मे भी कुछ नई बात कही जा सकती है, कुछ नई अनुभूतियों संग्रह की जा सकती हैं-यह शायद हम सम्भव नहीं समझते । जो घर सम्पन्न कहलाते
[ २७७ ]हैं, उनमे भी पहुँच जाइए तो आपको मालूम होगा कि एक हजार माह- वार खर्च करके भी यह लोग रहना नही जानते। न कोई बजट है, न कोई व्यवस्था । अललटप्पू खर्च हो रहा है । जरूरी चीजो की अोर किसी का ध्यान नहीं है, बिना जरूरत की चीजे ढेरो पड़ी हुई हैं। कपड़े कीड़े खा रहे है, फर्नीचर मे दीमक लग रही है, किताबो मे नमी के कारण फफूदी लग गई है। किसी की निगाह इन बातो की तरफ नहीं जाती। नौकरो का वेतन नहीं दिया जाता । मगर कपडे बेजरूरत खरीद लिये जाते है। यह कुव्यवस्था इसीलिए है कि इस विषय मे हम उदासीन है।

जापान के अधिकाश साहित्यकार टोकियो में रहते है। उसमे छः सौ से अधिक ऐसे है जिनके नाम जापान भर मे प्रसिद्ध हैं। मगर जापान मे लेखकों को ज्यादा पुरस्कार नहीं मिलता।

जापान मे साहित्य रचना के भिन्न-भिन्न आदर्श हैं। कोई स्कूल जन-साधारण की रुचि की पूर्ति करना ही अपना ध्येय मानता है। तीश् बंगी स्कूल सबसे प्रसिद्ध है। ये लोग पुरानी कथाआ को नई शैली मे लिख रहे हैं, यहाँ तक कि विश्वविद्यालयो मे भी इसी रंग के अनुयायी अधिक हैं।

एक दूसरा स्कूल है जो कहता है, हम जन साधारण के लिए पुस्तकें नहीं लिखते, हमारा ध्येय साहित्य की सेवा है। इनका आदर्श है कला कला के लिए।

एक तीसरा दल है जो केवल दार्शनिक विषयो का ही भवन है। यह लोग अपनी गल्पों के प्लाट भी दर्शन और विज्ञान के तत्वो से बनाते हैं। उनके चरित्र भी प्रायः वास्तविक जीवन से लिये जाते है।

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[ २७८ ]इस विषय मे पुस्तक-विक्रेताओ ने बडे महत्व की बात कही है।

जिससे भिन्न-भिन्न श्रेणियों और जातियो की साहित्यिक प्रवृत्ति का ठीक पता चल जाता है। उनका कहना है कि स्त्रियों को सरस साहित्य से विशेष प्रेम है, और मदो को गम्भीर साहित्य से । नये पुस्त- कालयो मे नये-से-नये उपन्यासो ही की प्रधानता होती है और ये पुस्तकालय स्त्रियो की ही कृपा दृष्टि पर चलते है । पुराने ढग के पुस्तकालयो के ग्राहक अधिकतर पुरुष होते हैं, और उनमे भिन्न-भिन्न विषयों की पुस्तके सग्रह की जाती हैं । हिन्दुस्तानी और युरोपियन महिलाओं की रुचि मे भी बड़ा अन्तर है । यहाँ की देवियों उपयोगी विषयों की पुस्तके पढ़ती हैं, जैसे पाकशास्त्र या गृह विज्ञान या शिशु-पालन आदि । इसके खिलाफ यूरोपियन स्त्रिया कथा कहानी, श्रृंगार और फैशन की पुस्तकों से ज्यादा प्रेम रखती है। दोनो जातियों के मनुष्यो की रुचि मे भी अतर है । युरोपियनो को मामूली तौर से कथा अधिक प्रिय है, हिन्दुस्तानियो को अर्थशास्त्र, जीवन-चरित्र, नीति विज्ञान आदि विषयो से ज्यादा प्रेम है। कुछ नवीनता के परम भक्त युवको को छोड़कर हिन्दुस्तानियो मे शायद ही कोई उपन्यास मोल लेता हो।

युरोपियन स्त्री पुरुषों का किस्से कहानी से प्रेम होना इसका प्रमाण है कि वह सम्पन्न हैं और उन्हे अब उपयोगी विषयों की आवश्यकता नहीं रही। जिसके सामने जीवन का प्रश्न इतना चिन्ताजनक नहीं है, वह क्यों न प्रेम और विलास की कथाएँ पढ़कर मन बहलाये । यह देख[ २७९ ]कर कि हिन्दुस्तानियो को गम्भीर विषया से अधिक रुचि है, यह कहा जा सकता है कि हमारी रुचि अव प्रौढ हो रही है । लेकिन हिन्दी के प्रका- शकों से पूछा जाय, तो शायद वे कुछ और ही कहे । हिन्दी मे गम्भीर साहित्य की पुस्तके बहुत कम बिकती है। इसका कारण यही हो सकता है कि चिन्हे गम्भीर साहित्य से प्रेम है, वे अग्रेजी पुस्तके खरीदते हैं । कथा-कहानियाँ कुछ ज्यादा बिक जाती है शायद इसलिए कि भारतीय जीवन का चित्रण हमे अग्रेजी पुस्तको मे नही मिलता, नही शायद कोई हमारे हिन्दी उपन्यास और कहानियो को भी न पूछता । एक कारण यह भी हो सकता है कि उपन्यास और कहानियो के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नही समझी जाती । जिसके हाथ मे कलम है वही उपन्यास लिख सकता है। लेकिन दर्शन या अर्थशास्त्र या ऐतिहासिक विवेचन पर कलम उठाने के लिए विद्वत्ता चाहिए । और जो लोग विद्वान हैं, वे अंग्रेजी मे लिखना ज्यादा पसन्द करते है, क्योकि अग्रेजी का क्षेत्र विस्तृत है । वहा यश भी अधिक मिलता है और धन भी।

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जनता की साहित्यिक रुचि के विषय मे बुकसेलरो से अच्छी जान-

कारी शायद ही किसी को होती हो । और लोग अकलीगद्दा लगाते हैं, बुकसेलर को इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है । अभी थोडे दिन हुए एक समाचार पत्र ने कई बडे-बड़े बुकसेलरों से पूछा था कि आजकल आप लोगों के यहाँ किस विषय की पुस्तकों की ज्यादा माँग है । इसका बुकसेलरों ने जो उत्तर दिया, उसका साराश यों है :

'जहाँ तक पुस्तकों की बिक्री का सम्बन्ध है, कल्पना साहित्य बड़ी आसानी से प्रथम स्थान ले लेता है। कहानियों के सग्रह, उपन्यास, नाटक और कई विख्यात लेखको के निबन्ध-यह सब इसी श्रेणी मे आ जाते हैं। लेकिन प्रेम-विषयक और शृङ्गारपूर्ण रचनात्रों की अब उतनी खपत नहीं रही, जितनी कई साल पहले थी। क्या इसका मतलब यह है कि प्रेम-कथाओं और कामोत्तेजक विषयों में लोगों की दिलचस्पी कम होती जा रही है ? नहीं । प्रेम और काम सम्बन्धी साहित्य मे लोगों की रुचि बढ़ रही है । हाँ, अब जनता को केवल भावुकता और विकलता से सन्तोष नहीं होता, प्रेम और विवाह आदि का वह वास्तविक और तात्विक ज्ञान प्राप्त करना चाहती है, और इस तरह के साहित्य की मॉग बढ़ रही है। उपन्यासों में भी 'सेक्स' सम्बन्धी समस्याओं की चर्चा केवल विरह और मिलन तक नहीं रहती, गृहस्थी और विवाह पर एक नवीन और विचार-पूर्ण ढंग से विचार किया जाने लगा है। प्रेम की मधुर कल्पनाओं से हटकर जन-रुचि विवाह और घर और नर-नारी के
[ २८१ ]असली जीवन की ओर अधिक झुका हुआ है । जनता केवल कविता नहीं चाहती, गम्भीर-विचार और वैज्ञानिक प्रकाश चाहती है। विनोद- पूर्ण साहित्य और रोमाचकारी जासूसी कहानियों की ओर जनता का प्रेम ज्यो-का-त्यो बना हुआ है । पी० जी० वुडहाउस और थान स्मिथ की हास्य कथाओ का बहुत अच्छा प्रचार है। आम तौर पर जो यह ख्याल है कि ऊँची श्रेणी के लोगो मे घासलेटी साहित्य और रक्त और हत्या से भरी हुई कथाओं का विशेष प्रचार है-कम-से-कम हिन्दुस्तान में उसकी पुष्टि नहीं होती।'


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[ २८२ ]
रूस मे हाल मे साहित्यकारो मे एक बड़े मजे की बहस छिड़ी थी।

विषय था-साहित्य का उद्देश्य क्या है ? लोग अपनी अपनी गा रहे थे । कोई कहता था-साहित्य सत्य की खोज का नाम है। कोई साहित्य को सुन्दर की खोज कहता था । कोई कहता था--वह जीवन की आलो- चना है । कोई उसे जीवन का चित्रण मात्र बतलाता था । आखिर जब यह झगड़ा न तय हुआ तो सलाह हुई कि किसी गंवार से पूछा जाय कि वह साहित्य को क्या समझता है । आखिर यह जत्था मजदूर की खोज मे निकला । दूर न जाना पड़ा । चन्द ही कदम पर एक मजदूर कन्धे पर फावडा रखे, पसीने मे तर आता हुआ दिखाई दिया। एक साहित्य महारथी ने उससे पूछा-क्यो भाई तुम साहित्य किस लिए पढते हो ? मजदूर ने उन विद्वज्जनो की ओर विस्मय दृष्टि से देखा। ऐसी मोटी-सी बात भी इन लोगो को नहीं मालूम । देखने मे तो सभी पढे-लिखे से लगते हैं । समझा, शायद यह लोग उसका मजाक उड़ा रहे है। बिना कुछ जवाब दिये आगे बढा । तुरन्त फिर वही प्रश्न हुआ-क्यो भाई, तुम साहित्य किस लिए पढ़ते हो ?

मजदूर ने अबकी कुछ जवाब देना आवश्यक समझा । कहीं यह लोग उसकी परीक्षा न ले रहे हो । तैयार छात्र की भाति तत्परता से बोला-जीवन की सच्ची विधि जानने के लिए । इस उत्तर ने विवाद को समाप्त कर दिया । साहित्य का उद्देश्य जीवन के अादर्श को उपस्थित करना है, जिसे पढ़कर हम जीवन मे कदम-कदम पर आने
[ २८३ ]वाली कठिनाइयो का सामना कर सके। अगर साहित्य से जीवन का सही रास्ता न मिले, तो ऐसे साहित्य से लाभ ही क्या । जीवन की आलोचना कीजिए चाहे चित्र खींचिए आर्ट के लिए लिखिए चाहे ईश्वर के लिए, मनोरहस्य दिखाइए चाहे विश्वव्यापी सत्य की तलाश कीजिए-अगर उससे हमे जीवन का अच्छा मार्ग नहीं मिलता, तो उस रचना से हमारा कोई फायदा नही । साहित्य न चित्रए का नाम है, न अच्छे शब्दो को चुनकर सजा देने का, अलंकारो से वाणी को शोभायमान बना देने का । ऊँचे और पवित्र विचार ही साहित्य की जान है।

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[ २८४ ]
उपन्यास और गल्प के क्षेत्र मे, जो गद्य-साहित्य के मुख्य अग हैं,

समस्त ससार ने रूस का लोहा मान लिया है, और फ्रान्स के सिवा और कोई ऐसा राष्ट्र नहीं है, जो इस विषय मे रूस का मुकाबला कर सके। फ्रान्स में बालजाक, अनातोल फ्रान्स, रोमा रोलॉ, मोपासाँ आदि संसार प्रसिद्ध नाम हैं, तो रूस मे टालस्टाय, मैक्सिम गोर्की, तुर्गनीव, चेखाव, डास्टावेस्की श्रादि भी उतने ही प्रसिद्ध हैं, और संसार के किसी भी साहित्य मे इतने उज्ज्वल नक्षत्रों का समूह मुशकिल से मिलेगा । एक समय था कि हिन्दी मे रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी । हिन्दी और उर्दू दोनो ही रेनाल्ड की पुस्तकों का अनुवाद करके अपने को धन्य समझ रहे थे । डिकेंस, थैकरे, लैम्ब, रस्किन आदि को किसी ने पूछा तक नहीं । पर अब जनता की रुचि बदल गई, और यद्यपि अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो चोरी, जिना और डाके आदि के वृत्तान्तो मे अानन्द पाते हैं लेकिन साहित्य की रुचि में कुछ परिष्कार अवश्य हुआ है और रूसी साहित्य से लोगो को कुछ रुचि हो गई है । आज चेखाव की कहानियाँ पत्रों मे बड़े आदर से स्थान पाती हैं और कई बड़े-बड़े रूसी उपन्यासों का अनुवाद हो चुका है । टालस्टाय का तो शायद कोई बड़ा उपन्यास ऐसा नहीं रहा, जिसका अनुवाद न हो गया हो । गोर्की की कम से कम दो पुस्तको का अनुवाद निकल चुका है। तुर्गनीव के Father & Son का 'पिता और पुत्र' के नाम से अभी हाल मे दिल्ली से अनुवाद प्रकाशित हुआ है । टालस्टाय की 'अन्ना' का अनुवाद काशी
[ २८५ ]से प्रकाशित हुआ है । डाटावेस्की की एक पुस्तक का अनुवाद निकल चुका है। इस बीच मे अंग्रेजी या फ्रेच साहित्य की कदाचिन् एक भी पुस्तक का अनुवाद नहीं हुआ । जिन लेखको ने रूस को उस मार्ग पर लगाया, जिस पर चलकर आज वह दुखी संसार के लिए आदर्श बना हुआ है, उनकी रचनाएँ क्यों न आदर पाये ?

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[ २८६ ]नागरी लिपि समिति ने जितने उत्साह और योग्यता के अपनी कठिन

जिम्मेदारियो को पूरा करना शुरू किया है. उससे अाशा होती है कि निकट भविष्य मे ही शायद हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर ले। और हर्ष की बात है, कि समिति के प्रस्तावो और आदेशो का उतना विरोध नही हुआ, जितनी कि शका थी । राष्ट्रीय एकीकरण हमे इतना प्रिय हो गया है कि उसके लिए हमसे जो कोई भी माकूल बात कही जाय, उसे मानने के लिए हम तैयार हैं । शिरोरेखा के प्रश्न को भी समिति ने जिस खूबसूरती से हल किया है, उसे प्रायः स्वीकार कर लिया गया है । शिरो- रेखा नागरी अक्षरो का कोई आवश्यक अग नहीं। जिन ब्राह्मी अक्षरो से नागरी का विकास हुआ है, उन्हीं से बंगला, तामिल, गुजराती आदि का भी विकास हुआ है; मगर शिरोरेखा नागरी के सिवा और किसी लिपि मे नहीं। हम बचपन से शिरोरेखा के आदी हो गये हैं और हमारी कलम जबर्दस्ती, अनिवार्य रूप से ऊपर की लकीर खींच देती है, लेकिन अभ्यास से यह कलम काबू में की जा सकती है । इसमे तो कोई सन्देह नहीं कि शिरोरेखा का परित्याग करके हम अपने लेखक की चाल बहुत तेज कर सकेंगे और उसकी मन्द गति की शिकायत बहुत कुछ मिट जायगी और छपाई में तो कहीं ज्यादा सहूलियत हो जायगी। रही यह बात कि बिना शिरोरेखा के अक्षर मुंडे और सिर-कटे से लगेगे, तो यह केवल भावुकता है । जब आखें बेरेखा के अक्षरों की आदी हो जायॅगी, तो वही अक्षर सुन्दर लगेंगे और हमे आश्चर्य होगा कि हमने इतनी सदियों तक क्यो अपनी लिपि के सिर पर इतना बड़ा व्यर्थ का बोझ लादे रखा।


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