साहित्य का उद्देश्य/11

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साहित्य का उद्देश्य
द्वारा प्रेमचंद

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'हंस' के लिए यह परम सौभाग्य की बात है, कि उसका जन्म ऐसे शभ अवसर पर हुआ है, जब भारत में एक नए युग का आगमन हो रहा है, जब भारत पराधीनता की बेडियों से निकलने के लिए तड़पने लगा है। इस तिथि की यादगार एक दिन देश में कोई विशाल रूप धारण करेगी । बहुत छोटो-छोटो, तुच्छ विजयों पर बड़ी-बड़ी शानदार यादगारें बन चली हैं। इस महान् विजय की यादगार हम क्या और कैसे बनावेगे, यह तो भविष्य की बात है पर यह विजय एक ऐसी विजय है, जिसकी नज़ीर ससार में नहीं मिल सकती और उसकी यादगार भी वैसी ही शानदार होगी । हम भी उस नये देवता की पूजा करने के लिये, उस विजय की यादगार कायम करने के लिये, अपना मिट्टी का दीपक लेकर खडे होते हैं । और हमारी बिसात ही क्या है। शायद आप पूछे, सग्राम शुरू होते ही विजय का स्वप्न देखने लगे! उसकी यादगार बनाने की भी सूझ गई ! मगर स्वाधीनता केवल मन की एक वृत्ति है। इस वृत्ति का जागना ही स्वाधीन हो जाना है । अब तक इस विचार ने जन्म ही न लिया था। हमारी चेतना इतनी मंद, शिथिल और निर्जीव हो गई थी कि उसमे ऐसी महान कल्पना का आविर्भाव ही न हो सकता था; पर भारत के कर्णधार महात्मा गाधी ने इस विचार की सृष्टि कर दी। अब वह बढ़ेगा, फूले-फलेगा। अब से पहले हमने अपने उद्धार के जों उपाय सोचे, वह व्यर्थ सिद्ध हुए, हालों कि उनके प्रारम्भ में भी सत्ताधारियों की ओर से ऐसा ही विरोध हुआ था। इसी भाॅति इस संग्राम
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मे भी एक दिन हम विजयी होगे । वह दिन देर मे आयेगा या जल्द, यह हमारे पराक्रम, बुद्धि अोर साहस पर मुनहसर है । हॉ, हमारा यह धर्म है कि उस दिन को जल्द से जल्द लाने के लिये तपरया करते रहे। यही 'हस' का व्येय होगा, और इसी ध्येय के अनुकूल उसकी नीति होगी।

हंस की नीति
 

कहते हैं, जब श्रीरामचद्र समुद्र पर पुल बॉध रहे थे, उस वह वक्त छोटे-छोटे पशु-पक्षियों ने मिट्टी ला लाकर समुद्र के पाटने मे मदद दो थी। इस समय देश मे उससे कही विकट संग्राम छिडा हुआ है । भारत ने शान्तिमय समर की भेरी बजा दी है । हस भी मानसरोवर की शान्ति छोड़कर, अपनी नन्ही-सी चोच मे चुटकी-भर मिट्ठी लिये हुए, समुद्र पाटने-अाजादी के जग मे योग देने-चला है । समुद्र का विस्तार देखकर उसकी हिम्मत छूट रही है; लेकिन सत्र शक्ति ने उसका दिल मजबूत कर दिया है । समुद्र पटने के पहले ही उसकी जीवन-लीला समाप्त हो जायगी, या वह अन्तातक मैदान मे डटा रहेगा, यह तो कोई ज्योतिषी ही जाने, पर हमे ऐसा विश्वास है कि हस की लगन इतनी कच्ची न होगी। यह तो हुई उसकी राजनीति | साहित्य और समाज मे वह उन गुणों का परिचय देगा, जो परम्परा ने उसे प्रदान कर दिये हैं ।

डोमिनियन और स्वराज्य
 

न डोमिनियन मॉगे से मिलेगा, न स्वराज्य । जो शक्ति डोमिनियन छीनकर ले सकती है, वह स्वराज्य भी ले सकती है। इग्लैण्ड के लिये दोनों समान हैं । डोमिनियस स्टेटस में गोलमेज-कान्फ्रस का उलझावा है, इसलिये वह भारत को इस उलझावे मे डाल कर भारत पर बहुत दिनो तक राज्य कर सकता है । फिर उसमे किस्तो की गुजायश है और किस्तो की अवधि एक हज़ार वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है । इसलिए इग्लैण्ड का डोमिनियम स्टेटस के नाम से न घबड़ाना समझ मे आता है । स्वराज्य मे किस्तों की गुजायश नहीं, न गोलमेज़ का उलझावा
[ २४४ ]है, इसलिए वह स्वराज्य के नाम से कानो पर हाथ रखता है। लेकिन हमारे ही भाइयो मे इस प्रश्न पर क्यो मतभेद है, इसका रहस्य आसानी से समझ मे नही पाता । वे इतने बेसमझ तो है नही कि इग्लैण्ड की इस चाल को न समझते हों । अनुमान यही होता है कि इस चाल को समझकर भी वे डोमिनियन के पक्ष में हैं, तो इसका कुछ और आशय है। डोमिनियन पक्ष को गौर से देखिए, तो उसमे हमारे राजे-महाराजे, हमारे जमींदार, हमारे धनी-मानो भाई ही ज्यादा नजर आते है । क्या इसका यह कारण है कि वे समझते है कि स्वराज्य की दशा मे उन्हे बहत कुछ दबकर रहना पडेगा ? स्वराज्य मे मजदूरो और किसानो की आवाज इतनी निर्बल न रहेगी ? क्या यह लोग उस आवाज के भय से थरथरा रहे है ? हमे तो ऐसा ही जान पडता है । वह अपने दिल मे समझ रहे है कि उनके हितों की रक्षा अग्रेजी-शासन ही से हो सकती है । स्वराज्य कभी उन्हे गरीबा को कुचलने और उनका रक्त चूसने न देगा । डोमि- नियम का अर्थ उनके लिये यही है कि दो-चार गवर्नरियों दो-चार बड़े- बड़े पद, उन्हे और मिल जायेंगे । इनका डोमिनियन स्टेटस इसके सिवा और कुछ नहीं है । ताल्लुकेदार और राजे इसी तरह गरीबो को चूसते चले जायेंगे । स्वराज्य गरीबों को आवाज है, डोमिनियन गरीबो की कमाई पर मोटे होनेवालो की । सम्भव है, अभी अमीरो की आवाज कुछ दिन अोर गरीबो को दबाये रक्खे । गरीबों के सब्र का प्याला अब भर गया है । इग्लैण्ड को अगर अपना रोजगार प्यारा है, अगर अपने मज- दूगे की प्राण-रक्षा करनी है; तो उसे गरीबो को आवाज को ठुकराना नहीं चाहिए, वरना भारत के राजों और शिक्षित-समाज के ऊँचे ओहदेदारो के सँभाले उसका रोजगार न सँभलेगा । जब एक बार गरीब समझ जायेंगे कि इंग्लैण्ड उनका दुशमन है, तो फिर इग्लैण्ड की खैरियत नही । इग्लैण्ड अपनी सगठित शक्ति से उनका सगठित होना रोक सकता

है लेकिन बहुत दिनों तक नहीं। [ २४५ ]
युवकों का कर्तव्य
 

अब युवकों का क्या कर्तव्य है ? युवक नई दशाओं का प्रवर्तक हुआ करता है । संसार का इतिहास युवकों के साहस और शौर्य का इतिहास है। जिसके हृदय मे जपानी का जोश है, यौवन की उमग है, जो अभी दुनिया के धक्के खा-खाकर हतोत्साह नहीं हुआ, जो अभी बाल-बच्चों की फिक्र से आजाद है अगर वही हिम्मत छोड़कर बैठ रहेगा, तो मैदान मे आयेगा कौन 'फिर, क्या उसका उदासीन होना इसाफ की बात है ? अाखिर यह सग्राम किस लिए छिड़ा है ? कौन इससे ज्यादा फायदा उठावेगा ? कौन इस पौधे के फल खावेगा ? बूढे चंद दिनों के मेहमान हैं। जब युवक ही स्वराज्य का सुख भोगेगे, तो क्या यह इंसाफ की बात होगी, कि वह दुबके बैठे रहे । हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, कि वह गुलामी मे खुश है और अपनी दशा को सुधारने की लगन उन्हें नहीं है । यौवन कहीं भी इतना बेजान नहीं हुआ करता । तुम्हारी दशा देखकर ही नेताओं को स्वराज्य की फिक्र हुई है। वह देख रहे हैं कि तुम जी तोड़कर डिग्रियाँ लेते हो पर तुम्हें कोई पूछता नही, जहाँ तुम्हे होना चाहिए, वहाँ विदेशी लोग डटे हुए हैं। स्वराज्य वास्तव मे तुम्हारे लिए है, और तुम्हे उसके आन्दोलन मे प्रमुख भाग लेना चाहिए । गवर्नर और चासेलर तुम्हे तरह-तरह के स्वार्थमय उपदेश देकर, तुम्हें अपने कर्तव्य से हटाने की कोशिश करेंगे, पर हमे विश्वास है, तुम अपना नफा-नुकसान समझते हो और अपने जन्म-अधिकार को एक ग्याले-भर दूध के लिये न बेचोगे । लेकिन यह न समझो, कि केवल स्वराज्य का झंडा गाड़कर, और 'इन्कलाब' की हॉक लगाकर तुम अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हो। तुम्हे मिशनरी जोश और धैर्य के साथ इस काम में जुट जाना चाहिए । संसार के युवको ने जो कुछ किया है, वह तुम भी कर सकते हो । क्या तुम स्वराज्य का संदेश गॉव मे नहीं पहुंचा सकते ? क्या तुम गाँवों के संगठन में योग नहीं दे सकते ? हम सच कहते है, एल-एल० बी०, या एम० ए० हो जाने के बाद यह अमली तालीम, [ २४६ ]
वह अनुभव तुम्हें इतना हितकर होगा, जितना पुस्तक-ज्ञान उम्र-भर भी नहीं हो सकता । तुम मर्द हो जानोगे।

सरल जीवन स्वाधीनता के संग्राम की तैयारी हो
 

लेकिन जब हम अपने छात्रों का विलास-प्रेम देखते हैं, तो हमे उनके विषय मे बडी चिन्ता होती है । वह रोज अपनी जरूरते बढाते जाते हैं. विदेशी चीजो की चमक-दमक ने उन्हे अपना गुलाम बना लिया है। वे चाय और काफी के, साबुन और सेट के और न जाने कितनी अल्लम- गल्लम चीजों के दास हो गये हैं। बाजार में चले जाइए, आप युवको और युवतियों को शौक और विलास की चीजें खरीदने में रत पाएँगे। वह यह समझ रहे हैं, कि विलास की चीजे बढ़ा लेने से ही जीवन का आदर्श ऊँचा हो जाता है । युनिवर्सिटियो में अपने अध्यापको का विलास- प्रेम देखकर यदि उन्हे ऐसा विचार होता है, तो उनका दोष नहीं । यहाँ तो आवें का आवाँ बिगड़ा हुआ है । सादे और सरल जीवन से उन्हें घणा सी होती है। अगर उनका कोई महपाठी सीधा-सादा हो, तो वे उसकी हँसी उड़ाते हैं, उस पर तालियाँ बजाते हैं । अग्रेज अगर इन चीजों के शौकीन हैं, तो इसलिए कि इस तरह वे अपने देश के व्यव- साय की मदद करते है । फिर, वह सम्पन्न हैं, हमारी और उनकी बराबरी ही क्या ? उन्होंने फसल काट ली है, अब मजे से बैठे खा रहे हैं। हमने तो अभी फ़सल बोई भी नहीं, हम अगर उनकी नकल करे, तो इसके सिवा कि बीज खा डालें, और क्या कर सकते हैं। और यही हो रहा है। जिस गाढ़ी कमाई को देशी व्यवसाय और धधे मे खर्च होना चाहिए था, वह यूरोप चली जा रही है और हम उन आदतो के गुलाम होकर अपना भविष्य खाक मे मिला रहे हैं । शौक और सिगार के बन्दे जिन्दगी मे कभी स्वाधीनता का अनुभव कर सकते हैं, हमे इसमे सन्देह है । विद्या- लय से निकलते ही उन्हें नौकरी चाहिए-इसके लिये वह हर तरह की खुशामद और नकघिसनी करने के लिये तैयार है । नौकरी मिल गई, तो उन्हे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये ऊपरी आमदनी की फिक्र
[ २४७ ]होती है । उनकी आत्मा की स्वतन्त्रता, शौक की वेदी पर चढा दी जाती है । दुनिया के जितने बडे-से-बडे महापुरुष हो गये हैं, और है, वे जीवन की सरलता का उपदेश देते आये है और दे रहे है, मगर हमारे छात्र है, कि हैट और कालर की फिक्र मे अपना भविष्य बिगाड रहे हैं।

शांति-रक्षा
 

हिज एक्सेलेन्सी वाइसराय से लेकर सूबो के हिज एक्सेलेन्सियो तक सभी कानून और शाति की रक्षा की धमकियाँ दे रहे है, जिसका अर्थ यह है, कि इस वक्त कानून और शाति की रक्षा के लिये, जो कुछ किया जा रहा है, उससे ज्यादा और भीषण रीति से किया जायगा । और, उधर महात्मा गांधी है कि किसी दशा मे भी शाति को हाथ से नहीं छोड़ना चाहते, यहाँ तक कि अवज्ञा का साग भार उन्होने अपने सिर ले लिया है।

जहाँ तक शाति-रक्षा का सबध है, ऐसा कौन आदमी होगा, जो सरकार से इस विषय मे सहयोग न करे और मुल्क मे बदअमली हो जाने दे। मगर मुशकिल यह है, कि सरकार ने जिस चीज का नाम शाति रख छोड़ा है, वह हमारे लिये न शाति है, न कानून । जो कानून राष्ट्र बनाता है, उसका पालन वह स्वय शाति-पूर्वक करता है, लेकिन जो कानून दूसरे लोग उसके लिए बना देते हैं, उसकी पाबदी वह करती तो है पर सगीनो और मशीनगनो के जोर से, और ऐसी शाति को कौन शाति कहेगा, जिसका अाधार तलवारो की झकार और तोपो की गरज है ! जहाँ तक हमे याद है, सरकार ने और चाहे जितनी गलतियों की हो, शाति की रक्षा मे उसने कभी गलती नहीं की । यह दूसरी बात है, कि हिन्दू मुसलमान आपस मे लड-लडकर एक दूसरे के प्राण ले, एक- दूसरे की जायदाद लूटें, घर मे आग लगावे, औरतो की आबरू बिगाडे ! न जाने सरकार की शाति-रक्षिणी शक्ति ऐसे नाजुक मौको पर क्यों नहीं

काम करती ! [ २४८ ]
जेल-सुधार
 

जिस तरह किसी व्यक्ति के चरित्र का अन्दाजा उसके मित्रो को देखकर किया जा सकता है, उसी तरह किसी राज्य की सुव्यवस्था का अन्दाजा, उसके जेलो की दशा से हो सकता है । रूस के जेल भारत के जेलो को देखते स्वर्ग है । यहाँ तक कि ईरान जैसे देश के जेल भी बहत कुछ सुधर चुके है। हमारे जेलों की दशा जितनी खराब है,शायद ससार मे, इस बात मे कोई उसका सानी न मिलेगा । जतीन्द्रनाथ दास के उत्सर्ग का कुछ फल उस सुधार के रूप मे निकला है, जो अभी किये गये है; मगर कैदियों का कई दरजो मे विभाजित किया जाना और हरेक कक्षा के साथ अलग-अलग व्यवहार करना, उन बुराइयों की दवा नही है । जेल ऐसे होने चाहिए, कि कैदी उसमे से मन और विचार मे कुछ सुधरकर निकले, यह नहीं कि उसके पतन की क्रिया वहाँ जाकर और भी पूरी हो जाय । इस सुधार से यह फल न होगा, हॉ जो धनी हैं, उन्हे वहाँ कुछ अाराम हो जायगा । गरीब की सब जगह मौत है, जेल मे भी । मालूम नहीं ईश्वर के घर भी यही भेद-भाव है, या इससे कुछ अच्छी दशा है।

जापान के लोग लम्बे हो रहे हैं
 

हिन्दुस्तान के लोग दिन-दिन दुर्बल होते जाते है। लेकिन जापान के एक पत्र ने लिखा है-जापानियों का डील धीरे-धीरे ऊँचा हो रहा है। बलिष्ठ तो वे पहले भी होते थे; लेकिन अब वे ऊँचे भी हो रहे हैं । इसका कारण है, रहन-सहन मे सुधार । अब वे पहले से अच्छा और पुष्टिकारक भोजन पाते है, ज्यादा साफ और हवादार घरो मे रहते है, आर्थिक चिन्ताओ का भार भी कम हो गया है । जहाँ अस्सी फी सैकडे आदमी आधे पेट भोजन भी नहीं पाते, वे क्या बढ़ेगे और क्या मोटाएँगे ? शायद सौ वर्ष के बाद हिन्दुस्तानियो की कहानी रह

जायगी। [ २४९ ]
राजनीति और रिशवत
 

वर्तमान राजनीति मे रिशवत भी एक जरूरी मद है । क्या इंग्लैण्ड, क्या फ्रास, क्या जापान, सभी सभ्य और उन्नत देने में यह मरज दिन- दिन बढता जा रहा है। चुनाव लड़ने के लिए बडे-बडे लोग जमा किये जाते है और बोटरो से वोट लेने के लिए सभी तरह के प्रलोभनो से काम लिया जाता है। जब देश के शासक खुद ऐसे काम करते है, तो उसे रोके कौन ? शैतान ही जानता है चुनाव के लिए कैसी-कैसी चाले चली जाती है, कैसे-कैसे दॉव खेले जाते है । अपने प्रतिद्वन्द्वी को नीचा दिखाने के लिए बुरे से बुरे साधन काम मे लाये जाते हैं। जिस दल के पास धन ज्यादा हो, और कार्यकर्ता-कनवैसर-अच्छे हो, उसकी जीत होती है । यह वर्तमान शासन-पद्धति का कलंक है । इसका फल यह होता है कि सबसे योग्य व्यक्ति नहीं, सबसे चालबाज़ लोग ही चुनाव के सग्राम में विजयी होते है । ऐसे ही स्वार्थी, आदर्थ-हीन, विवेकहीन मनुष्यों के हाथ मे ससार का शासन है। फिर अगर मसार में स्वार्थ का राज्य है, तो क्या आश्चर्य !

पहले हिन्दुस्तानी, फिर और कुछ
 

हिन्दू तो हमेशा से यही रट लगाते चले आ रहे हैं लेकिन मुसल- मान इस आवाज़ मे शरीक न थे । बीच मे एक बार मौ० मुहम्मदअली या शायद उनके बड़े भाई साहब ने यह आवाज मुंह से निकालने का साहस किया था; मगर थोडे दिनो के बाद उन्होंने फिर पहलू बदला और "पहले मुसलमान फिर और कुछ' का नारा बलन्द किया। फिर क्या था, मुसलिम दल मे उनका जितना सम्मान कम हो गया था, उससे कई गुना ज्यादा मिल गया । अाज अगर कोई मुसलमान 'पहले हिन्दुस्तानी' होने का दावा करे, तो उस पर चारो तरफ से बौछारे होने लगेगी। 'पहले मुसलमान' बनकर धर्मान्ध जनता की निगाह मे गौरव प्राप्त कर लेना तो आसान है; पर उसका मुसलमानो की मनोवृत्ति पर जो बुरा [ २५० ]असर पडता है, वह देश-हित के लिए घातक है। मुसलमान किसी प्रश्न पर राष्ट्र की आँखो से नहीं देखता, वह उसे मुसलिम ऑखो से देखता है। वह अगर कोई प्रश्न पूछता है, तो मुसलिम दृष्टि से, किसी बात का विरोध करता है, तो वह मुसलिम दृष्टि से । लाखों मसलमान बाढ और सूखे के कारण तवाह हो रहे है। उनकी तरफ किसी मुसलिम मेम्बर की निगाह नहीं जाती। आज तक कोई ऐसा मुसलिम संघटन नहीं हुआ, जो मुसलिम जनता की सासारिक दशा को सुधारने का प्रयत्न करता। हॉ, उनकी धार्मिक मनोवृत्ति से फायदा उठानेवालों की कमी नहीं है । महात्मा गाँधी खद्दर का प्रचार दिलोजान से कर रहे हैं। इससे मुसलमान जुलाहों का फायदा अगर हिन्दू कोरियो से ज्यादा नहीं, तो कम भी नहीं है । लेकिन जहाँ इस सूने के छोटे-से-छोटे शहर ने महात्माजी को थैलियों भेंट की, अलीगढ़ ने केवल सूखा ऐड्रेस देना ही काफी समझा । यह मुसलिम मनोवृत्ति है । देखा चाहिए, सर तेजबहादुर सप्रू सर्वदल सम्मेलन को सफल बनाने मे कहाँ तक सफल होते है। हमारी श्राशा तो नौजवान मुसलमानो का मुँह ताक रही है । इसलामिया कालेज लाहौर मे, जहाँ अधिकाश मुसल- मान छात्र थे, स्वाधीनता का प्रस्ताव मुसलमान नेतात्रों के विरोध पर भी पास हो गया । इससे पता चलता है, कि हवा का रुख किधर है।

महात्माजी का वाइसराय से निवेदन
 

महात्माजी ने वाइसराय को जो पत्र लिखा है उसे Ultimatum कहना, उस पत्र के महत्त्व को मिटाना है । वह एक सच्चे, आत्मदर्शी हृदय के उद्गार है । उसमे एक भी ऐसा शब्द नहीं है, जिसमे मालिन्य, क्रोध, द्वेष या कटुता की गंध हो । उस पवित्र आत्मा में मालिन्य या द्वेष का स्थान ही नही है। वह किसी का शत्रु नही, सबका मित्र है । अंग्रेजी शासन का ऐसा सपूर्ण इतिहास इतने थोड़े-से शब्दो मे, इतनी सद्- प्रेरणा के साथ महात्माजी के सिवा दूसरा कौन लिख सकता था । उस पत्र मे जितनी जागृति, जितनी स्फूर्ति, जितना सत्साहस है, वह शायद [ २५१ ]
भगवतगीता मे हो तो हो,और तो हमे कहीं नहीं मिलता। भारत के ही इतिहास मे नहीं, ससार के इतिहास मे भी वह यादगार बनकर रहेगा। पाठक के हृदय पर एक-एक शब्द देव-वाणी-सा प्रभाव डालता है, प्रतिक्षण अात्मा ऊँची होती जाती है, यहाँ तक कि उसे समाप्त कर लेने पर आप अपने को एक नई दुनिया मे पाते हैं। महात्मा गाँधी ने स्पष्ट कह दिया है, कि हम पद के लिए, धन के लिए, अधिकार के लिए स्वराज्य नहीं चाहते, हम स्वराज्य चाहते है उन गॅगे, बेजबान आदमियो के लिए, जो दिन-दिन दरिद्र होते जा रहे है । अगर आज सभी अंग्रेज अफसरों की जगह हिन्दुस्तानी हो जायें, तब भी हम स्वराज्य से उतने ही दूर रहेगे, जितने इस वक्त है। हमारा उद्देश्य तो तभी पूरा होगा, जब हमारी दरिद्र, क्षुधित, वस्त्रहीन जनता की दशा कुछ सुधरेगी ।

मगर हमारे ही देश मे हमारे ही कुछ ऐसे भाई हैं, जिन्हे इस निवेदन मे कोई नयी बात, कोई नया सन्देश नही नजर आता। उन पर उसके ऊँचे, पवित्र भावो का जरा भी असर नहीं पड़ा । वह अब भी यही रट लगाये जा रहे हैं कि महात्माजी आग से खेल रहे है, समाज की जड खोदनेवाली शक्तियो को उभार रहे है । जिन्हे अँग्रेजो के साथ मिलकर प्रजा को लूटते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करने का अवसर प्राप्त है, वे इसके सिवा और कह ही क्या सकते हैं । वे अपना स्वार्थ देखते है, अपनी प्रभुता का सिक्का जमते देखना चाहते हैं। उनके स्वराज्य मे गरीबो को मजदूरो को , किसानो को स्थान नहीं है, स्थान है केवल अपने लिए; मगर जिस व्यक्ति के हृदय मे गरीबो की दिन-दिन गिरती हुई दशा देख कर ज्वाला-सी उठती रहती है, जो उनकी मूक वेदना देख-देखकर तड़प रहा है, वह किसी ऐसे स्वराज्य की कल्पना से संतुष्ट नहीं हो सकता, जिसमे कुछ ऊँचे दरजे के आदमियो का हित हो और प्रजा की दशा ज्यो-की त्यो बनी रहे । हमारी लड़ाई केवल अँग्रेज सत्ताधारियो से नहीं, हिन्दुस्तानी सत्ताधारियों से भी है । हमे ऐसे लक्षण नज़र आ रहे है, कि यह दोनों सत्ताधारी इस अधार्मिक संग्राम मे आपस मे मिल जायेंगे और
[ २५२ ]प्रजा को दबाने की, इस आन्दोलन को कुचलने की कोशिश करेंगे । लेकिन यह उन्हीं के हक मे बुरा होगा। प्रजा की दशा तो अब जितनी बुरी है,उससे बुरी और हो ही क्या सकती है ? हॉ, जो लोग प्रजा के मत्थे ऐश करते है, यूरोप मे विहार करते हैं, मोटरो में बैठे हुए हवा में उड़ते है, उनकी खैरियत नही है । हम उन्हे धमकी नहीं दे रहे हैं, धाँधली उसी वक्त तक हो सकती है, जब तक जनता सोई हुई है । हम अब भी अाशा रखते हैं, कि महात्माजी का सदुद्योग सत्ताधारियो के विचार-कोण मे इच्छित परिवर्तन करेगा । विचारा का परिवर्तन अब तक तलवार से होता आया है, लेकिन विचार जैसी सूक्ष्म वस्तु पर तलवार का असर या तो होता ही नहीं, या होता है तो स्थायी नही होता । सूक्ष्म वस्तु पर सूक्ष्म वस्तु का ही असर पड़ता है । भारत ने इसके पहले भी ससार के सामने आव्यात्मिक आदर्श रक्खे हैं, वही चेष्टा वह फिर कर रहा है। वह इतिहास की परम्परागत प्रगति को बदल देना चाहता है। वह सफल होगा या विफल, यह दैव के हाथ है, लेकिन उसकी विफलता भी ऐसी होगी, जिस पर सैकड़ों सफलताएँ भेट की जा सकती है।

हमे अाशा है, कि वाइसराय के हृदय पर इस निवेदन का कुछ असर होगा, वह उस सौजन्य, विनम्रता और सच्चाई की कुछ कद्र करेगे। पर वाइसराय की ओर से उसका जो जवाब दिया गया है, वह सिद्ध कर रहा है कि महात्माजी का सन्देश उनके हृदय तक नहीं पहुँचा।

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[ २५३ ]
हमे यह जानकर सच्चा आनन्द हुअा कि हमारे सुशिक्षित और

विचारशील युवकों मे भी साहित्य मे एक नई स्फूर्ति और जागृति लाने की धुन पैदा हो गई है। लन्दन मे The Indian Progressive Writers, Association की इसी उद्देश्य से बुनियाद डाल दी गई है, और उसने जो अपना मैनिफेस्टो भेजा है, उसे देखकर यह आशा होती है कि अगर यह सभा अपने नये मार्ग पर जमी रही, तो साहित्य में नवयुम का उदय होगा । उस मैनिफेस्टो का कुछ अंश हम यहाँ आशय रूप मे देते हैं-

भारतीय समाज मे बड़े-बड़े परिवर्तन हो रहे हैं। पुराने विचारो और विश्वासो की जड़ें हिलती जा रही हैं और एक नये समाज का जन्म हो रहा है। भारतीय साहित्यकारो का धर्म है कि वह भारतीय जीवन मे पैदा होनेवाली क्राति को शब्द और रूप दें और राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर चलाने में सहायक हों । भारतीय साहित्य, पुरानी सभ्यता के नष्ट हो जाने के बाद से जीवन की यथार्थताओ से भागकर उपासना और भक्ति की शरण में जा छिपा है । नतीजा यह हुआ है कि वह निस्तेज और निष्प्राण हो गया है, रूप मे भी अर्थ मे भी। और अाज हमारे साहित्य मे भक्ति और वैराग्य की भरमार हो गई है। भावुकता ही का प्रदर्शन हो रहा है, विचार और बुद्धि का एक प्रकार से बहिष्कार कर दिया गया है। पिछली दो सदियो में विशेषकर इसी तरह का साहित्य रचा गया है जो हमारे इतिहास का लज्जास्पद काल है । इस सभा का
[ २५४ ]उद्देश्य अपने साहित्य और दूसरी कलाओ को पुजारियो पडितो और अप्रगतिशील-वर्गों के आधिपत्य से निकालकर उन्हे जनता के निकटतम ससर्ग मे लाया जाय, उनमे जीवन और वास्तविकता लाई जाय, जिससे हम अपने भविष्य को उज्ज्वल कर सकें । हम भारतीय सभ्यता का परम्पराअो की रक्षा करते हुए, अपने देश की पतनोन्मुखी प्रवृत्तियो की बड़ी निर्दयता से आलोचना करेगे और आलोचनात्मक तथा रचनात्मक कृतियों से उन सभी बातो का सचय करेगे, जिससे हम अपनी मंजिल पर पहुँच सके । हमारी धारणा है कि भारत के नये साहित्य को हमारे वर्तमान जीवन के मौलिक बध्यो का समन्वय करता चाहिये, और वह है हमारी रोटी का, हमारी दरिद्रता का हमारी सामाजिक अवनति का और हमारी राजनैतिक पराधीनता का प्रश्न। तभी हम इन समस्याओं को समझ सकेंगे और तभी हममे क्रियात्मक शक्ति आयेगी। वह सब कुछ जो हमे निष्क्रियता, अकर्मण्यता और अन्धविश्वास की ओर ले जाता है, हेय है, वह सब कुछ जो हममें समीक्षा की मनोवृत्ति लाता है, जो हमे प्रियतम रूढियों को भी बुद्धि की कसौटी पर कसने के के लिए प्रोत्साहित करता है, जो हमें कर्मण्य बनाता है और हममे सगठन की शक्ति लाता है, उसी को हम प्रगतिशील समझते हैं।

इन उद्देश्यों को सामने रखकर इस सभा ने निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकार किये हैं-

(१) भारत के भिन्न भिन्न भाषा-प्रातो मे लेखकों की सस्थाएँ बनाना, उन संस्थानों मे सम्मेलनों, पैम्फलेटो आदि द्वारा सहयोग और समन्वय पैदा करना, प्रान्तीय, केन्द्रीय और लन्दन की संस्थाओं में निकट सम्बन्ध स्थापित करना।

(२) उन साहित्यिक सस्थाओं से मेल-जाल पैदा करना, जो इस सभा के उद्देश्यों के विरुद्ध न हों। [ २५५ ]
३) प्रगतिशील साहित्य की सृष्टि और अनुवाद करना, जो कलात्मक दृष्टि से भी निर्दोष हो, जिससे हम साम्कृतिक अवसाद को दूर कर सके और भारतीय स्वाधीनता और सामाजिक उत्थान की ओर बढ सकें।

४) हिन्दुस्तानी को राष्ट्र-भाषा और इडो-रोमन लिपि को राष्ट्र- लिपि स्वीकार कराने का उद्योग करना ।

(५) साहित्यकारो के हित की रक्षा करना, उन साहित्यकारों को सहायता करना, जो अपनी पुस्तके प्रकाशित कराने के लिए सहायता चाहते हो।

६) विचार और राय को आज़ाद करने के लिए प्रयत्न करना । मैनिफेस्टो पर सर्वश्री डा० मुल्कराज अानन्द, डा० के० एस० भट्ट, डा० जे० सी० घोष, डा० एस० सिन्हा, एम० डी० तासीर और एस० एस० जहीर के शुभ नाम है, और पत्र-व्यवहार का पता है-

Dr M. R. Anand

32, Russell Square

London (W. C. I)

हम इस सस्था का हृदय से स्वागत करते है और आशा करते है कि वह चिरजीवी हो । हमे वास्तव मे ऐसे ही साहित्य की जरूरत है और हमने यही आदर्श अपने सामने रक्खा है । हस भी इन्हीं उद्देश्यों के लिए जारी किया गया है । हाँ, हम अभी इडो-रोमन को राष्ट्र-लिपि स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है, क्योंकि हम नागरी-लिपि मे सशोधन करके उसे इतना पूर्ण बना लेना चाहते हैं, जिससे वह भारत की सभी भाषाओं के लिये समान रूप से उपयोगी हो । हम यह भी कह देना चाहते है, कि अगर यह सस्था भारत के उस साहित्य को, जो उसके उद्देश्यो के अनुकूल हो, अंग्रेजी में अनुवाद कराके प्रकाशित कराने का प्रबन्ध कर सके, तो यह साहित्य और राष्ट्र-दोनों ही की सच्ची सेवा होगी । हम
[ २५६ ]हिन्दी-लेखक-संघ के सदस्यो से भी निवेदन कर देना चाहते हैं कि वे इन प्रस्तावो पर विचार करें और उस पर अपना मत प्रकट करें । लेखक- संघ के उद्देश्य भी बहुत कुछ इस संस्था से मिलते हैं और कोई कारण नहीं कि दोनो मे सहयोग न हो सके।

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[ २५७ ]अबकी बिहार का प्रातीय साहित्य सम्मेलन २२-२३ फरवरी को

पूर्णिया मे हुआ । श्री बाबू यशोदानन्दन जी ने, जो हिन्दी के वयो- वृद्ध साहित्य-सेवी है, सभापति का आसन ग्रहण किया था। इस जीर्णा- वस्था मे भी उन्होने यह दायित्व स्वीकार किया, यह उनके प्रौढ साहित्यानुराग का प्रमाण है। प्रान्त के हरेक भाग से प्रतिनिधि आये हुए थे और खूब उत्साह था । मेहमानो के आदर-सत्कार मे स्वागताध्यक्ष श्री बाबू रघुवशसिह के सुप्रबन्ध से कोई कमी नहीं हुई। सभापति महोदय ने अपने भाषण मे हिंदी भाषा, साहित्य, देव नागरी लिपि आदि विषयो का विस्तार से उल्लेख किया और बिहार मे हिन्दी के प्रचार और प्रगति की जो चर्चा की, वह बिहार के लिए गौरव की वस्तु है। हमे नही मालूम था कि कविता मे खड़ी बोली के व्यवहार की प्रेरणा पहले बिहार मे हुई, और हिन्दी साहित्य-सम्मेलन की कल्पना भी बिहार की ही ऋणी है । मुसलमानी शासन-काल मे हिन्दी की वृद्धि क्योंकर हुई, इस पर आपने निष्पक्ष प्रकाश डाला । आप उर्दू को कोई स्वतत्र भाषा नहीं मानते, बल्कि उसे हिन्दी का ही एक रूप कहते है। आपने कहा-

"मुसलमानी-शासन ने हिन्दी-भाषा के प्रसार और प्रचार के मार्ग मे बडी सहायता पहुँचाई है। उसी काल मे हिन्दी के तीन रूप हो गये थे । एक नागरी लिपि मे व्यक्त ठेठ हिन्दी, जिसे लोग अधिकाश मे 'भाषा' या 'देव-नागरी' या 'नागरी' कहते थे, दूसरा उर्दू यानी फारसी लिपि में लिखी हुई फारसी मिश्रित हिन्दी, अर्थात् उर्दू और तीसरी पद्य हिन्दी यानी ब्रज-भाषा । जो हिन्दी आज राष्ट्र-भाषा के सिंहासन पर अभिषिक्त होने की अधिकारिणी है, वह देव नागरी है । यह और उर्दू वस्तुतः एक ही है और दिल्ली प्रात की बोली है।' [ २५८ ]कवि हैं और जीवन मे कविता का स्थान क्या है, यह खूब जानते हैं। आपने बहुत ठीक कहा, कि कविता केवल मनोरंजन की वस्तु नही और न गा-गाकर सुनाने की चीज है । वह तो हमारे हृदय मे प्रेरणाओं की डालने वाली, हमारे अवसाद-ग्रस्त मन मे अानन्दमय स्फूर्ति का सचार करने वाली, हममे कोमल भावनाओ को जगाने वाली ( स्त्रैण भावनात्रो को नहीं) वस्तु है । कविता मे अगर जागृति पैदा करने की शक्ति नहीं है, तो वह बेजान है । आप हाला बॉधे, या तन्त्री के तार, या बुलबुल और कफस, उसमें जीवन को तड़पाने वाली शक्ति होनी चाहिए । प्रेमि- कात्रो के सामने बैठकर ऑसू बहाने का यह जमाना नहीं है। उस व्यापार मे हमने कई सदियों खो दी, विरह का रोना रोते-रोते हम कहीं के न रहे । अब हमे ऐसे कवि चाहिए, जो हज़रते इकबाल की तरह हमारी मरी हुई हड्डियो मे जान डाले। देखिए, इस कवि ने लेनिन को खुदा के सामने ले जाकर क्या फ़रियाद कराई है और उसका खुदा पर इतना असर होता है कि वह अपने फरिश्तो को हुक्म देता है-

उहो, मेरी दुनिया के गरीबो को जगा दो,
काखे' उमरा के दरो- दीवार हिला दो।
गरमाअो गुलामो का लहू सोज़े यकीं से,
कुंजिश्कर फरोमाया को शाही से लड़ा दो।
सुलतानिये' जमहूर' का आता है ज़माना,
जो नक्शे कोहन' तुमको नज़र आये मिटा दो ।
जिस खेत से दहकों को मयस्सर नही रोटी,
उस खेत के हर खोशए गदुम को जला दो।
क्यो खालिको मखलूक ११ मे हायल रहे परदे,
पीराने कलीसा को कलीसा'३ से उठा दो।


(१) महल (२) चिड़ा (३) तुच्छ (४) शिका (५-६) प्रजा-राज्य (७) पुराना (८) किसान (8) गेहूँ की बाल (१०) स्रष्टा (११) सृष्टि. (१२) मठधारी (१३) गिरजे । [ २५९ ]
२१, २२ सितम्बर को पटना ने अपने साहित्य परिषद् का कई बरसों के बाद आने वाला वार्षिकोत्सव बढ़ी धूमधाम से मनाया। हिन्दी के शब्द जादूगर श्री माखन नाल जी चतुर्वेदी सभापति थे और साहित्यकारों का अच्छा जमघट था । हम तो अपने दुर्भाग्य से उसमें सम्मिलित होने का गोरव न पा सके । शुक्रवार की सन्ध्या समय से ही हमे ज्वर हो पाया और वह सोमवार को उतरा। हम छटपटा कर रह गये । रविवार को भी हम यही आशा करते रहे कि आज ज्वर उतर जायगा और हम चले जायगे, लेकिन ज्वर ने उस वक्त गला छोड़ा, जब परिषद् का उत्सव समाप्त हो चुका था। पटने जाकर खाट पर सोने से काशी मे खाट पर पड़े रहना और ज्यादा सुखद था, और यों भी बीमारी के समय, चाहे वह हलकी ही क्यों न हो, बुजुर्गों के मतानुसार, और धर्मशास्त्रों के आदेशानुसार, काशी के समीप ही रहना ज्यादा कल्याणकारी होता है ...लौकिक और पारलौकिक दोनो -ष्टियों से ! अतएव हमें आशा है कि हमारे साहित्यिक बन्धुत्रों ने हमारी गैरहाजिरी मुश्राफ कर दी होगी। इस ज्वर ने ऐसा अच्छा अवसर हमसे छीन लिया, इसका बदला हम उससे अवश्य लेंगे, चाहे हमे अहिंसा नीति तोड़नी क्यो न पडे । सभापति का जो भाषण छपकर नासी भात के रूप में मिला है, वह गर्म गर्म कितना स्वादिष्ट होगा...यह सोचता है तो यही जी चाहता है कि ज्वर महोदय कहीं फिर दिखें, लेकिन उनका कहीं पता भी नहीं। इस भाषण मे जीवन है, आदेश है, मार्ग निर्देशन
[ २६० ]है और साहित्यसेवियो के लिये आदर्श है, मगर आपने पूर्वजो का बोझा मस्तक पर लादने की जो बात कही, वह हमारी समझ में न आई। हमारा ख्याल है कि हम पूर्वजो का बोझ जरूरत से ज्यादा लादे हुए हैं, और उसके बोझ के नीचे दबे जा रहे है। हम अतीत मे रहने के इतने आदी हो गये हैं कि वर्तमान और भविष्य की जैसे हमें चिन्ता ही नहीं रही। यूरोप और पश्चिमी जग इसीलिए हमारी उपेक्षा करता है कि वह हमे पाच हजार साल पहले के जन्तु समझता है, जिसके लिए अजायबघरो और पिंजरापोलो मे ही स्थान है । वह हमारे भोजपत्रों और ताम्र लेखों को लाद लादकर इसलिए नहीं ले जाता कि उनसे ज्ञान का अर्जन करे, बल्कि इसलिए कि उन्हे अपने संग्रहालयो मे सुरक्षित रखकर अपने विजय गर्व को तुष्टि दे, उसी तरह जैसे पुराने जमाने मे विजय की लूट के साथ नर नारियों की भी लूट होती थी और जुलूसों मे उनका प्रदर्शन किया जाता था । प्राचीन अगर हमे आदर्श और मार्ग देता है, तो उसके साथ ही रूढ़ियाँ और अन्ध विश्वास भी देता है। चुनाचे अाज राम और कृष्ण राम लीला और रास लीला की वस्तु बनकर रह गये हैं और बुद्ध और महावीर ईश्वर बना दिये गये हैं। यह प्राचीन का भार नहीं तो और क्या है कि आज भी असंख्य प्राणी, जिसमे अच्छे खासे पढे लिखे आदमियों की संख्या है, नदियों मे नहाकर अपना मन शुद्ध कर लिया करते हैं ? प्राचीन, उन राष्ट्रो और जातियो के लिए गर्व की वस्तु होगी और होनी चाहिए जो अपने पूर्वजो के पुरुषार्थ और उनकी साधनाओ से आज मालामाल हो रहे हैं। जिस जाति को पूर्वजो से पराजय का अपमान और रूढियों का तौक ही विरासत मे मिला, वे प्राचीन के नाम को क्यो रोयें। ऐसे दर्शन को क्या हम लेकर चाटे, जिसने हमारे पूर्वजो को इतना अकर्मण्य बना दिया कि जब बख्तियार खिलजी ने बिहार विजय किया, तो पता चला कि सारा नगर और किला एक विशाल वाचनालय था । विद्वान लोग मजे से राज्य का आश्रय पाते थे और अपनी कुटिया मे बैठे हुए प्राचीन शास्त्रो मे डूबे रहते थे। [ २६१ ]
उनके इर्द गिर्द क्या हो रहा है, दुनिया किस गति से बढी जा रही है, उन्हे इसकी खबर न थी। और शायद वस्तियार उन विद्वानो से मुजाहिम न होता और उनकी वृत्ति ज्यो की त्यो बनी रहती, न वे उसी बेफिक्री से अपना शास्त्र पढे जाते और आध्यात्मिक विचारों के आनन्द लूटते रहते और अमर जीवन की मंजिल नापते चले जाते। उधर पश्चिम के नाविक समुद्र के तूफान का मुकाबला करके ससार विजय कर रहे थे और हमारे बाबा दादा बैठे मुक्ति का मार्ग ढूँढ रहे थे। पश्चिम ने जिस वस्तु के लिए तपस्या की, उसे वह वस्तु मिली। हमारे पूर्वजो ने जिस वस्तु की तपस्या की, वह उन्हे मिली या मिलेगी इसके बारे मे अभी कुछ कहना कठिन है। जिसके लिए ससार मिथ्या हो, और दुःख का घर हो, उसकी यदि संसार उपेक्षा करे, तो उन्हें शिकायत का क्या मौका है ? हमे स्वर्ग की ओर से निश्चिन्त रहना चाहिए, वह हमे मिलेगा और जरूर मिलेगा । चतुर्वेदी जी के ही शब्दो में 'ग्रन्थो के बन्धनो के आदी हम स्वामी राम के कथन मे भी मुक्ति का गीत हूँढने के बजाय वेदान्त का बन्धन हूँढने लगे। और क्यो न हूँढते ? बन्धनो के सिवा, और ग्रन्थो के सिवा हमारे पास और क्या था ? पडित लोग पढते थे और योद्धा लोग लड़ते थे और एक दूसरे की बेइज्जती करते थे और लड़ाई से फुरसत मिलती थी तो व्यभिचार करते थे। यह हमारो व्यावहारिक सस्कृति थी। पुस्तको मे वह जितनी ही ऊची और पवित्र थी, व्यवहार मे उतनी ही निन्द्य और निकृष्ट ।

आगे चलकर सभापति जी ने हमारी वर्तमान साहित्यिक मनोवृत्ति का जो चित्र खींचा है, उसका एक एक शब्द यथार्थ है :

'हम अपनी इस आदत को क्या करे ? यदि किसी के दोष सुनता हूँ तो तुरन्त मान लेता हूँ और उस अद्रव्य को पेट मे लेकर फिर बाहर लाता हूँ और अपनी साहित्यिक पीढी को उस निन्द्य निधि की खैरात बाटता हूँ । संसार के दोषो का मैं बिना प्रमाण सरल विश्वासी होता हूँ और यह चाहता हूँ कि मेरी ही तरह मेरा पाठक भी मेरी
[ २६२ ]लोक निन्दा पर विश्वास करे । किन्तु यदि किसी के गुण, किसी की मौलिकता, किसी की उच्चता की चर्चा सुनता हूँ, तब मै उसके लिए प्रमाण वसूल करने के इजहार लेना चाहता हूँ।'

और भाषण के अन्तिम शब्द तो बड़े ही मर्मस्पर्शी है :

'हम बडे हों या छोटे, हमने घर घर या व्यक्ति व्यक्ति मे मरने का डर बोया है । हमारे लिए मार डालना ही गुनाह नहीं, मर जाना गुनाह हो गया है......आज के साहित्यिक चिन्तक पर जिम्मेवारी है कि वह पुरुषार्थ को दोनो हाथों मे लेकर जीने का खतरा और मरने का स्वाद अपनी पीढ़ी मे बोये । यह पुरुषार्थ शस्त्रधरो से नहीं हो सकता, यह तो कलम के धनियों ही के करने का काम है।'

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[ २६३ ]
हिन्दी साहित्य मे आजकल जो शिथिलता-सी छाई हुई है, उसे

देखकर साहित्य प्रेमियों को हताश होना पड़ता है । अाज हिन्दी मे एक भी ऐसा सफल प्रकाशक नहीं, जो साल भर मे दो चार पुस्तकों से अधिक निकाल सकता हो । प्रत्येक प्रकाशक के कार्यालय में हस्त-लिखित पुस्तकों का ढेर लगा पड़ा है; पर प्रकाशको को साहस नहीं होता कि उन्हे प्रका- शित कर सके । दो-चार इने गिने लेखको की पुस्तकें ही छाती है; पर वहाँ भी पुस्तको की निकासी नहीं होती। दो हजार का एडीशन विकते. बिकते कम-से-कम तीन साल लग जाते हैं । अधिकाश पुस्तको की तो दस साल मे अगर दो हजार प्रतियाँ निकल जाये, तो गनीमत समझी जाती है । जब पुस्तको की बिक्री का यह हाल है, तो प्रकाशक पुरस्कार कहाँ से दे और दें भी तो वह पत्र-पुष्य से अधिक नहीं हो सकता । पत्र-पुष्प से लेखक को क्या सतोष हो सकता है क्योकि वह भी आदमी है और उसे भी जरूरत होती ही हैं। इसका फल यह है, कि लेखक अलग उत्साहहीन होते जाते हैं, प्रकाशक अलग कधा डालते जाते है और साहित्य की जो उन्नति होनी चाहिए, वह नहीं होने पाती । लेखक को अच्छा पुरस्कार मिलने की आशा हो तो वह तन-मन से रचना मे प्रवृत्त हो सकता है, और प्रकाशक को यदि अच्छी बिक्री की प्राशा हो तो वह रुपये लगाने को भी तैयार है। लेकिन सारा दारमदार पुस्तको की बिक्री पर है और जब तक हिन्दी-पाठक पुस्तकें खरीदना अपना कर्तव्य न सम- झने लगेंगे, यह शिथिलता ज्यो-की-त्यो बनी रहेगी। कितने खेद की बात
[ २६४ ]है, कि बड़ी बड़ी अामदनी रखनेवाले सजन भी हिन्दी की पुस्तके मॉगकर पढने मे सकोच नहीं करते । शायद वह हिन्दी-पुस्तके पढना ही हिन्दी पर कोई एहसान समझते हैं। इस विषय मे उर्दूवाले क्या कर रहे है, उसकी चर्चा हम यहाँ कर देना चाहते है। लाहौर मे, जो उर्दू का केंद्र है, कुछ लोगो ने एक समिति बना ली है और उनका काम है शहर- शहर और कस्बे-कस्बे घूमकर पाठको से अपनी आय का शताश उर्दू पुस्तके खरीदने मे खर्च करने का अनुरोध करना । पाठक जो पुस्तक चाहे अपनी रुचि के अनुसार खरीदे, पर ख़रीदे जरूर । पाठको से एक प्रतिज्ञा कराई जाती है और सुनते है कि समिति को इस सदुद्योग मे खासी सफलता हो रही है । बहुत से पाठक तो केवल इसलिए पुस्तकें नहीं खरीदते कि उन्हें खबर नही कौन कौन सी अच्छी पुस्तके निकलती हैं । उनका इस तरफ ध्यान ही नहीं जाता।जरूरत की चीजे तो उन्हें झक मारकर लेनी पड़ती हैं। स्त्री लडके सभी आग्रह करते है। लेकिन पुस्तको के लिए ऐसा आग्रह अभी नही होता । केवल पाठ्य पुस्तके तो खरीद ली जाती है, अन्य पुस्तको का ख़रीदना अनावश्यक या फ़िजूल- खर्ची समझी जाती है । मगर जब समिति ने पबलिक का ध्यान इस ओर खींचा, तो लोग बडे हर्प से उसके साथ सहयोग करने को तैयार हो गये। कितने ही सजनो ने तो पुस्तको के चुनाव का भार भी समिति के सिर रख दिया। जिसकी वार्षिक प्राय बाहर सौ रुपये है, वह साल-भर मे बारह रुपये की पुस्तकें खरीदने का यदि प्रण कर ले, तो हमे विश्वास है, कि थोडे ही दिनों मे हिन्दी-साहित्य का बड़ा कल्याण हो सकता है। ऐसे सजनो की कमी नहीं है, केवल साहित्य-प्रेमियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाने की ज़रूरत है । अगर उर्दू मे ऐसी समिति बन सकती है, तो हिन्दी मे भी अवश्य बन सकती है। अगर हमारी हिन्दी सभाएँ इस तरफ ध्यान दे, तो साहित्य का बहुत उपकार हो सकता है।

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[ २६५ ]
लेखक संघ के विषय में 'हस' मे विज्ञप्ति निकल चुकी है और

साहित्य-सेवियो तथा पाठको को यह जानकर हर्ष होगा कि लेखको ने सघ का खुले दिल से स्वागत किया है । और लगभग माठ सजन उसके सदस्य बन चुके हैं। चारो तरफ से अाशाजनक पत्र पा रहे है मगर अभी तक यह निश्चित नही किया जा सका कि संघ का मुख्य काम क्या होगा? सयोजक महोदय ने अपने प्रारम्भिक पत्र मे सघ के उद्देश्यों का कुछ जिक्र किया है, और जो लोग सघ मे शामिल हुए है, वे उन उद्देश्यो से सहमत है, इसमे सन्देह नहीं; लेकिन वह उसूल कार्य बनकर क्या रूप धारण करेगे, इस विषय मे कुछ नही कहा जा सकता ! संघ लेखको के स्वत्वो की रक्षा करेगा। लेकिन कैसे ? कुछ सजनो का विचार है कि लेखक संघ उसी तरह लेखको के हितों और अधिकारो की रक्षा करे, जैसे अन्य मजूर संघ अपने सदस्यो की रक्षा करते है, क्योकि लेखक भी मजूर ही है, यद्यपि वे हथौडे और बसुले से काम न करके कलम से काम करते हैं। और लेखक मजूर हुए तो प्रकाशक पूजीपति हुए। इस तरह यह संघ लेखकों को प्रकाशको की लूट से बचाये, और यही उसका मुख्य काम हो । कुछ अन्य सजनो का मत है कि लेखक संघ को पूंजी खड़ी करके एक विशाल सहकारी प्रकाशन सस्था बनाना चाहिए जिससे वह लेखक को उसकी मजदूरी की ज्यादा से ज्यादा उजरत दे सके । खुद केवल नाम मात्र का नफा ले ले, वह भी केवल कार्यालय के कर्मचारियो के वेतन और कार्यालय के दूसरे कामो के लिए । सम्भव है इसी तरह के और
[ २६६ ]
प्रस्ताव भी लोगों के मन मे हो। ऐसी दशा मे यही उचित जान पड़ता है कि सघ के कार्यक्रम को निश्चय करने के लिए सभी सदस्यों को किसी केन्द्र मे निमन्त्रित किया जाये ओर वहा सब पक्षों की तजवीजे सुनने और उन पर विचार करने के बाद कोई राय कायम की जाये। और तब इस निश्चय को कार्य रूप मे लाने के लिए एक कार्यकारिणी समिति बनाई जाय । उस सम्मेलन में प्रत्येक सदस्य को अपने प्रस्ताव पेश करने और उसका समर्थन कराने का अधिकार होगा और जो कुछ होगा बहुमत से होगा, इसलिए किसी को शिकायत का मौका न होगा । हम इतना अवश्य निवेदन कर देना चाहते हैं कि मौजूदा हालत ऐसी नहीं है कि प्रकाशकों को लेखको के साथ ज्यादा न्यायसगत व्यवहार करने पर मजबूर किया जा सके। साहित्य का प्रकाशन करने वाले प्रकाशकों की वास्तविक दशा का जिन्हे अनुभव है, वह यह स्वीकार करेंगे कि इस समय एक भी ऐसा साहित्य ग्रन्थ प्रकाशक नहीं है जो नफे से काम कर रहा हो। जो प्रकाशक धर्मग्रन्थों या पाठ्यपुस्तको का व्यापार करते है उनकी दशा इतनी बुरी नहीं है, कुछ तो खासा लाभ उठा रहे हैं। लेकिन जो लोग मुख्यतः साहित्य ग्रन्थ ही निकाल रहे हैं, वे प्रायः बड़ी मुश्किल से अपनी लागत निकाल पाते हैं। कारण है साधारण जनता की साहित्यिक अरुचि । जब प्रकाशक को यही विश्वास नहीं कि किसी पुस्तक के कागज़ और छपाई की लागत भी निकलेगी या नहीं, तो वह लेखकों को पुरस्कार या रायल्टी कहाँ से दे सकता है। नतीजा यह होगा कि प्रकाशको को अपना कारोबार चलाने के लिए सड़ियल पुस्तके निका- लनी पड़ेंगी और अच्छे लेखको की पुस्तकें कोई प्रकाशक न मिलने के कारण पड़ी रह जायेंगी। साहित्यिक रचनात्रो का प्रकाशन प्रायः बन्द सा है। प्रकाशक नई पुस्तकें छापते डरते हैं, और नये लेखको के लिए तो द्वार ही बन्द हैं। इसलिए पहले ऐसी परिस्थिति तो पैदा हो कि प्रकाशक को प्रकाशन से नफे की आशा हो । हिन्दी बीस करोड़ व्यक्तियो की भाषा होकर भी गुजराती, मराठी या बगला के बराबर पुस्तकों का
[ २६७ ]प्रचार नहीं कर सकती। अगर नफे की आशा हो तो प्रकाशक बड़ी खुशी से रुपये लगायेगा और तभी लेखको के लिए कुछ किग जा सकता है। इसलिए अभी तो सघ को यही सोचना पडेगा कि जनता में साहित्य की रुचि कैसे बढ़ाई जाये और किस ढग की पुस्तके तैयार की जायें जो जनता को अपनी ओर खीच सके । अतएव मघ को साहित्यिक प्रगति पर नियन्त्रण रखने की चेष्टा करनी पडेगी। इस समय जो सस्थाएँ है जैसे नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन या हिन्दुस्तानी एकेडेमी, उनके काम मे सघ को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं ।नागरी प्रचारिणी सभा अब विशेषकर पुराने कवियो की ओर उनकी रचनाओ की खोज कर रही है। वह साहित्यिक पुरातत्व से मिलती जुलती चीज़ है । सम्मेलन को परीक्षाओ से विशेष दिलचस्पी है और हिन्दुस्तानी एकेडेमी एक सरकारी सस्था है, जहाँ प्रोफेसरो का राज है और जहाँ साधारण साहित्य-सेवियो के लिए स्थान नहीं । सघ का कार्य क्षेत्र इनसे अलग और ऐसा होना चाहिए जिससे साहित्य और उसके पुजारी दोनो की सेवा हो सके।

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