सेवासदन/४५

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सेवासदन  (1919) 
द्वारा प्रेमचंद

[ २१० ] सर्वथा निराधार हो गई। लेकिन नैराश्य ने उसके जीवन को उद्देश्यहीन नहीं होने दिया। उसका हृदय और भी कोमल हो गया। कृष्णचन्द्र ने चलते-चलते उसे जो शिक्षा दी थी, उसमें अब विलक्षण प्रेरणा शक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था। आज से शान्ता सहिष्णुताकी मूर्ति बन गई। पावस की अंतिम बूंदो के सदृश मनुष्य की वाणी के अंतिम शब्द कभी निष्फल नहीं जाते। शान्ता अब मुँह से कोई ऐसा शब्द न निकालती, जिससे उसके पिता की आत्मा को दुख हो, उनके जीवनकाल में वह कभी-कभी उनकी अवहेलना किया करती थी, पर अब वह अनुदार विचारों को हृदय में भी न आने देती थी। उसे निश्चय था कि भौतिक शरीर से मुक्त आत्मा के लिये अन्तर और वाह्य में कोई भेद नहीं। यद्यपि अब वह जान्हवी को संतुष्ट रखने के निमित्त कोई बात उठा न रखती थी, तथापि जान्हवी उसे दिन मे दो-चार बार अवश्य ही उल्टी सीधी सुना देती। शान्ता को क्रोध आता, पर वह विष का घूंट पीकर रह जाती, एकान्त में भी न रोती। उसे भय था कि पिताजी की आत्मा मेरे रोनेसे दु:खी होगी।

होली के दिन उमानाथ अपनी दोनों लड़कियो के लिये उत्तम साड़ियाँ लाये। जान्हवी ने ने भी रेशमी साड़ी निकाली, पर शान्ता को अपनी पुरानी धोती ही पहननी पड़ी। उसका हृदय दु:ख से विदीर्ण हो गया, पर उसका मुख जरा भी मलिन न हुआ। दोनो बहने मुँह फुलाये बैठी थी कि साड़ियाँ में गोट नहीं लगवाई गई और शान्ता प्रसन्न वदन घर का काम काज कर रही थी, यहाँ तक कि जान्हवी को भी उसपर दया आ गई। उसने अपनी एक पुरानी लेकिन रेशमी साड़ी निकालकर शान्ता को दे दी। शान्ता ने जरा भी मान न किया। उसे पहनकर फिर पकवान बनाने में मग्न हो गई।

एक दिन शान्ता उमानाथ की धोती छँटनी भूल गई। दूसरे दिन प्रातःकाल उमानाथ नहाने चले तो धोती गीली पड़ी थी। वह तो कुछ न बोले, पर जान्हवी ने शान्ता को इतना कोसा कि वह रो पड़ी। रोती थी और धोती छाँटती थी। उमानाथ को यह देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने मन में सोचा, हम केवल पेट की रोटियों के लिये इस अनाथ को इतना कष्ट दे रहे हैं? [ २११ ] ईश्वर के यहाँ क्या जवाब देंगे? जान्हवी को तो उन्होंने कुछ न कहा पर निश्चय किया कि शीघ्र ही इस अत्याचार का अन्त करना चाहिये। मृतक संस्कारो से निवृत होकर उमानाथ आजकल मदनसिंह पर मुकद्दमा दायर करने का कार्यवाही में मग्न थे। वकीलो ने उन्हें विश्वास दिलाया था कि तुम्हारी अवश्य विजय होगी। पांच हजार रुपये मिल जाने से मेरा कितना कल्याण होगा, यह कल्याण कामना उमानाथ को आनन्दोन्मत्त कर देती थी, इस कल्पना ने उनकी शुभाकांक्षाओं को जागृत कर दिया था। नया कर बनाने के मन्सूबे होने लगे थे। उस घर का चित हृदयपट पर खिंच गया था। उसके लिये उर्पयुक्त स्थान की बातचीत शुरू हो गयी थी। इन आनन्दकल्पनाओं में शांता को सुधि ही न रही थी जान्हवी के इस अत्याचार ने उनको शान्ता की ओर आकर्षित किया। गजाधर के दिये हुए सहस्त्र रुपये जो उन्होंने मुकदमें के खर्च के लिये अलग रख दिये ये घरों मौजूद थे एक दिन जाहन्वी से उन्होंने इस विषय में कुछ बातचीत की। कही एक सुयोग्य वर मिलने की आशा थी। शान्ता ने यह बात सुनी। मुकद्दमे की बातचीत सुनकर भी उसे दुख होता था, पर वह उसमें दखल देना उचित समझती थी। लेकिन विवाह की बातचीत सुनकर वह चुप न रह सकी। एक प्रबल प्रेरक शक्ति ने उसकी लज्जा और संकोच को हटा दिया ज्योंही उमानाथ चले, वह जान्हवी के पास आकर बोली, मामा अभी तुमसे क्या कह रहे थे? जान्हवी ने असंतोष भाव से उत्तर दिया, कह क्या रहे थे, अपना दु:ख रो रहे थे। अभागिनी सुमन ने यह सब कुछ किया नहीं तो यह दोहरकम्मा क्यों करना पड़ता? अब न उतना उत्तम कुल ही मिलता है, न वैसा सुन्दर वर। थोडी दूर पर एक गांव है। वहीं एक वर देखने गये थे। शान्ता ने भूमि की ओर ताकते हुए उत्तर दिया, क्या मैं तुम्हें इतना कष्ट देती हूँ कि मुझे फेंकने की पड़ी हुई है? तुम मामा से कह दो कि मेरे लिए कष्ट न उठावें।

जान्हवी-तुम उनकी प्यारी भांजी हो, उनसे तुम्हारा दुःख नहीं देना जाता। मैंने भी तो यही कहा था कि अभी रहने दो। जब मुकदमे का [ २१२ ] रुपया हाथ आ जाय तो निश्चिंत होकर करना पर वह मेरी बात माने तब तो?

शांता-मुझे वहीं क्यों नहीं पहुँचा देते?

जान्हवी ने विस्मित होकर पूछा, कहाँ?

शान्ता ने सरल भाव से उत्तर दिया, चाहे चुनार, चाहे काशी।

जान्हवी-—कैसे बच्चों की सी बात करती हो! अगर ऐसा ही होता तो रोना काहे का था? उन्हीं तुम्हे घर में रखना होता तो यह उपद्रव क्यों मचाते?

शान्ता-बहू बनाकर न रक्खे लौण्डी बनाकर तो रखेंगे।

जान्हवी ने निर्दयता से कहा, तो चली जाओ, तुम्हारे मामा से यह कभी न होगा कि तुम्हें सिर चढ़ाकर ले जाँय और वहाँ अपना अपमान करा के फिर तुम्हें ले आवे। वह तो उन लोगों का मुँह कुचलकर उनसे रुपये भरावेगें।

शान्ता-—मामी, वे लोग चाहे कैसे हो अभिमानी हो, लेकिन मैं उनके द्वारपर जाकर खड़ी हो जाऊंगी तो उन्हें मुझपर दया आ ही जायगी। मुझे विश्वास है कि वह मुझे अपने द्वारपर से हटा न देगे। अपना बैरी भी द्वार पर आ जाय तो उसे भगाते संकोच होता है मैं तो फिर भी...

जान्हवी अधीर हो गई। यह निर्लज्जता उससे न सही गई। बात काटकर बोली, चुप भी रहो, लाज हया तो जैसे तुम्हें छू नहीं गई। मान न मान में तेरा मेहमान। जो अपनी बात न पूछे बह चाहे धन्नासेठ ही क्यों न हो, उसकी ओर आँख उठाकर न देखे। अपनी तो यह टेक है। अब तो वे लोग यहाँ आकर नकघिसनी भी करे तो तुम्हारे मामा दूर ही से भगा देगे।

शान्ता चुप हो गई। संसार चाहे जो कुछ समझता हो, वह अपने को विवाहिता ही समझती थी। एक विवाहिता कन्या का दूसरे घर में विवाह हो, यह उसे अत्यंत लज्जाजनक, असह्य प्रतीत होता था। बारात आने के एक मास पहले से वह सदन के रूप गुण की प्रशंसा सुन-सुनकर उसके हाथों बिक चुकी थी। उसने अपने द्वार पर, द्वारचार के समय, सदन को अपने पुरुष की भॉति देखा है, इस प्रकार नहीं मानो वह कोई अपरिचित मनुष्य है। अब किसी दूसरे पुरुष की कल्पना उसके सतीत्व पर कुठार के [ २१३ ] समान लगती थी। वह इतने दिनों तक सदन को अपना पति समझने बाद उसे हृदय से निकाल न सकती थी, चाहे वह उसकी बात पूछे या न पूछे, चाहे उसे अंगीकार करे या न करे।अगर द्वाराचार के बाद ही सदन उसके सामने आता तो वह उसी भाँति उससे मिलती मानो वह उसका पति हैं विवाह, भंवर या सेंदुर बंंधन नहीं, बंधन केवल मन का भाव है।

शान्ता को अभी तक यह आशा थी कि कभी न कभी में पति घर अवश्य जाऊँगी, कभी न कभी स्वामी के चरणो में अवश्य ही आश्रय पाऊँगी, पर आज अपने विवाह की-या पुनर्विवाह की बात सुनकर उसका अनुरक्त हृदय काँप उठा। उसने निस्संकोच होकर जान्हवी से विनय की कि मुझे पति के घर भेज दो। यहीं तक उसकी सामर्थ्य थी। इसके सिवा वह और क्या करती? पर जान्हवी की निर्दयतापूर्ण उपेक्षा देखकर उसका धैर्य हाथ से जाता रहा। मन की चंचलता बढ़ने लगी। रात को जब सब सो गये तो उसने पद्मसिंह को एक विनय पत्र लिखना शुरू किया। यह उसका अंतिम साधन था। इसके निष्फल होने पर उसने कर्तव्य का निश्चय कर लिया था।

पत्र शीघ्र ही समाप्त हो गया। उसने पहले ही से कल्पना में उसकी रचना कर ली थी। केवल लिखना बाकी था-

“पूज्य धर्म पिता चरण-कमलों में सेविका शान्ता का प्रणाम स्वीकार हो। मैं बहुत दु:ख में हूँ। मुझपर दया करके अपने चरणों में आश्रय दीजिये। पिताजी गंगा में डूब गये। यहां आप लोगो पर मुकदमा चलाने का प्रस्ताव हो रहा है मेरे पुनर्विवाह की बातचीत हो रही है। शीघ्र सुधि लीजिये। एक सप्ताह तक आपकी राह देखूँगी। उसके बाद फिर आप अबला की पुकार न सुनेंगे।’’

इतने में जान्हवी की आँख खुली। मच्छरो नेंं सारे शरीर में कांटे चुभो दिये थें। खुजलाते हुए बोली, शान्ता! यह क्या कर रही है।

"शान्ता ने निर्भय होकर कहा पत्र लिख रही हूँ।”

"किसको?” [ २१४ ]"अपने श्वसुर को।”

"चुल्लू भर पानी में डूब नहीं मरती?”

"सातवे दिन मरुँगी।"

जान्हवी ने कुछ उत्तर न दिया, फिर सो गई। शान्ता ने लिफाफे पर पता लिखा और उसे अपने कपड़ो की गठरी में रखकर लेट रही।

४०

पद्मसिंह का पहला विवाह उस समय हुआ था जब वह कालेज में पढ़ते थे और एफ० ए० पास हुए तो वह एक पुत्र के पिता थे। पर बालिका वधू शिशुपालन का मर्म न जानती थी। बालक जन्म के समय तो हृष्ट पुष्ट था पर पीछे धीरे-धीरे क्षीण होने लगा था। यहाँ तक कि छठे महीने माता ओर शिशु दोनों ही चल बसे। पद्मसिंह ने निश्चय किया अब विवाह न करूँगा। मगर वकालत पास करने पर उन्हें फिर वैवाहिक बन्धन में फँसना पड़ा। सुभद्रा रानी वधू बनकर आई। इसे आज सात वर्ष हो गये।

पहले दो तीन साल तक तो पद्मसिंह को सन्तान का ध्यान ही नहीं हुआ। यदि भामा इसकी चर्चा करती तो वह टाल जाते। कहते मुझे संतान की इच्छा नहीं। मुझसे यह बोझ न सँभलेगा। अभी तक सन्तान की आशा थी, इसलिये अधीर नहीं होते थे।

लेकिन जब चौथा साल भी यों ही कट गया तो उन्हे कुछ निराशा होने लगी। मन में चिंता उपस्थित हुई, क्या सचमुच में निस्सन्तान ही रहूँँगा? ज्यों ज्यों दिन गुजरते थे यह चिंता बढ़ती जाती थी। अब उन्हे अपना जीवन कुछ शून्य सा मालूम होने लगा सुभद्रा से वह प्रेम न रहा, सुभद्रा ने इसे ताड़ लिया। उसे दु:ख तो हुआ, पर इसे अपने कर्मो का फल समझकर उसने संतोष किया।

पद्मसिंह अपने को बहुत समझाते कि तुम्हें सन्तान लेकर क्या करना हैं? जन्म से लेकर पचीस वर्ष की आयु तक उसे जिलाओ, खिलाओ, पढ़ाओ तिसपर भी यह शंका ही लगी रहती है कि यह किसी ढंग की भी होगी या नहीं। [ २१५ ] सिकल उबर फेर दी। वह शान्ता के विषय मे इसी समय कुछ न कुछ निश्चय कर लेना चाहते थे। उन्हें भय था कि कहीं विलव होने से यह जोश ठण्डा न पड़ जाय।

कुँवरसाहब के यहाँ ग्वालियर से एक जलतरंग बजानेवाला आया हुआ था। उसी का गाना सुनने के लिए आज उन्होंने अपने मित्रों को निमंत्रित किया था। पद्मसिंह वहाँ पहुँचे तो विट्ठलदास और प्रोफेसर रमेशदत्त में उच्चस्वर से विवाद हो रहा था और कुंवरसाहब, पंण्डित प्रभाकरराव तया सैयद तेगअली बैठे हुए बटेरो की इस लड़ाई का तमाशा देख रहे थे। शर्माजी को देखते ही कुँवरसाहब ने उनका स्वागत किया। बोले, आइये, आइये, देखिए यहाँ घोर संग्राम हो रहा है, किसी तरह इन्हें अलग कीजिये नहीं तो ये लड़ते-लड़ते मर जायेंगे।

इतने में प्रोफेसर रमेशदत्त बोले, थियासोफिस्ट होना कोई गाली नहीं है। मैं थियासोफिस्ट हूँ और इसे सारा शहर जानता है। हमारे ही समाज के उद्योग का फल है कि आज अमेरिका, जर्मनी ,रूस इत्यादि देशों में आापको राम और कृष्ण के भक्त और गीता, उपनिषद् आदि सदग्रन्थों के प्रेमी दिखाई देने लगे है। हमारे समाज ने हिन्दू जाति का गौरव बैठा दिया है उसके महत्व को प्रसारित कर दिया है और उसे उस उच्चासन पर बिठा दिया है जिसे वह अपनी अकर्मण्यता के कारण कई शताब्दियों से छोड़ बैठी थी। यह हमारी परस कृतघ्नता होगी अगर हम उन लोगों का यश न स्वीकार करें, जिन्होंने अपने दीपक हमारे अन्धकार को दूर करके हमें वह रत्न दिखा दिये है जिन्हें देखने की हम सामर्थ्य न थी। वह दीपक व्लावेट्स्की का हो, या आल्कट का या किसी अन्य पुरुष का, हमें इससे कोई प्रयोजन नहीं। जिसने हमारा अन्धकार मिटाया हो उसका अनुग्रहीत होना हमारा कर्तव्य है, अगर आप इसे गुलामी कहते है तो यह आपका अन्याय है।

विट्ठठलदास ने इस कथन को ऐसे उपेक्ष्य भाव से सुना मानो वह कोई निरर्थक बकवाद है और बोले, इसी का नाम गुलामी है, बल्कि गुलाम तो [ २१६ ] एक प्रकार से स्वतंत्र होता है, उसका अधिकार शरीर पर होता है, आत्मापर नहीं। आप लोगों ने तो अपनी आत्मा ही को बेच दिया है। आपकी अंगरेजी शिक्षा ने आपको ऐसा पददलित किया है कि जबतक यूरोप का कोई विद्वान किसी विषय के गुण दोष प्रकट न करे तब तक आप उस विषय की ओर से उदासीन रहते है। आप उपनिषदों का आदर इस लिये नहीं करते कि वह स्वयं आदरणीय है बल्कि इसलिये करते है कि व्लावेट्स्की और मैक्समूलर ने उनका आदर किया है। आप में अपनी बुद्धि से काम लेने की शक्ति का लोप हो गया है। अभी तक आप तान्त्रिक विद्या की बात भी न पूछते थे। अब जो यूरोपीय विद्वानों ने उसका रहस्य खोलना शुरू किया तो आपको अब तन्त्रों मे गुण दिखाई देते है। यह मानसिक गुलामी उस भौतिक गुलामी से कहीं गई गुजरी है। आप उपनिषदों को अग्रेंजी में पढ़ते है, गीता को जर्मन मे अर्जुन को अर्जुना कृष्ण को कृशना कहकर अपनी स्वभाषा ज्ञान का परिचय देते है। आपने इसी मानसिक दासत्व के कारण उस क्षेत्र में अपनी पराजय स्वीकार कर ली, जहाँ हम अपने पुरुष की प्रतिभा और प्रचण्ड़ता से चिरकाल तक अपनी विषय पताका फहरा सकते थे।

रमेशदत्त इसका कुछ उत्तर देना ही चाहते थे कि कुंवर साहब बोल उठे मित्रों! अब मुझसे बिना बोले नहीं रहा जाता। लाला साहब, आप अपने इस ‘गुलामी' शब्द को वापस लीजिये।

विठ्ठल-क्यों वापस लूँ?

कुंवर -आपको इसके प्रयोग करने का अधिकार नहीं है।

विट्ठल—मेरा आशय यह है कि हममे कोई भी दूसरों को गुलाम कहने का अधिकार नहीं रखता। अंधों के नगर में कौन किसको अन्धा कहेगा? हम सबके सब राजा हो या रंक, गुलाम है। हम अगर अपढ़ निर्धन गंवार है तो थोड़े गुलाम है, हम अपने राम का नाम लेते है।, अपनी धोती पगड़ी का व्यवहार करते है, अपनी बोली बोलते हैं, अपनी गाय पालते है और अपनी गंगा में नहाते है, और हम यदि विद्वान, [ २१७ ] उन्नत ऐश्वर्यवान है तो बहुत गुलाम है, जो विदेशी भाषा बोलते है, कुत्तें पालते हैं और अपने देशवासियों को नीच समझते हैं, सारी जाति इन्हीं दो भाग में विभक्त है। इसलिये कोई किसी को गुलाम नहीं कह सकता। गुलामी के मानसिक, आत्मिक, शारीरिक आादि विभाग करना भ्रंतिकारक है। गुलामी केवल आत्मिक होती है, और दशाएँ इसी के अन्तर्गत है? मोटर बंगले, पोलो और प्यानो यह एक एक वेड़ी के तुल्य है। जिसने इन बेडियों को नहीं पहना उसी को सच्ची स्वाधीनता का आनन्द प्राप्त हो सकता है, और आप जानते है वह कौन लोग हैं? वह दीन कृषक है जो अपने पसीने की कमाई खाते है, अपने जातीय भेष, भाषा और भावका आदर करते है और किसी के सामने सिर नहीं झुकाते।

प्रभाकराव ने मुस्कराकर कहा, आपको कृपक बन जाना चाहिये।

कुंवर तो अपने पूर्वजन्म कुकर्मो को कैसे भोगूँगा? बड़े दिन में मेवे की डालियाँ कैसे लगाऊँगा? सलामी के लिये खानसामा की खुशा मद कैसे करूँगा? उपाधि के लिये नैनीताल के चक्कर कैसे लगाऊँगा? डिनर पार्टी देकर लेडियों कुत्तों को कैसे गोद में उठाऊँगा? देवताओं को प्रसन्न और संतुष्ट करने के लिये देशहित के कार्यों में असम्मति कैसे दूँगा? यह सब मानव अध पतन की अन्तिम अवस्थाएँ हैं। उन्हें भोग किये बिना मेरी मुक्ति नहीं हो सकती। (पद्मसिंह से) कहिये शर्मा जी, आपका प्रस्ताव बोर्ड में कब आयेगा? आप आजकल कुछ उत्साहहीन से दीख पड़ते है। क्यों, इस प्रस्ताव को भी कहीं गति होगी जो हमारे अन्य सा सार्वजनिक कार्यों की हुआ करती है?

इधर कुछ दिनों से वास्तव में पद्मसिंह का उत्साह कुछ क्षीण हो गया था। ज्यो-ज्यों उसके पास होने को आशा बढ़ती थी, उनका अविश्वास भी बढ़ता जाता था, विद्यार्थी की परीक्षा जबतक नहीं होती वह उसी की तैयारी में लगा रहता है, लेकिन परीक्षायें उत्तीर्ण हो जाने के बाद भावी जीवन-संग्राम की चिन्ता उसे हतोत्साह कर दिया करती है। उसे अनुभव होता है कि जिन साधनों से अबतक मैंने सफलताा प्राप्त की है वह इस [ २१८ ] नये, विस्तृत, अगम्य क्षेत्र में अनुपयुक्त है। वही दशा इस समय शर्मा जी की थी। अपना प्रस्ताव उन्हे कुछ व्यर्थ-सा मालूम होता था। व्यर्थ ही नहीं कभी कभी उन्हें उससे लाभ के बदले हानि होने का भय होता था। लेकिन वह अपने संदेहात्मक विचारों को प्रकट करनेका साहस न कर सकते थे; कुँवरसाहब की ओर विश्वासपूर्ण दृष्टि से देखकर बोले, जी नहीं, ऐसा तो नहीं है, हाँ आजकल फुर्सत न रहने से वह काम जरा धीमा पड़ गया है।

कुँवर-—उसके पास होने में तो अब कोई बाधा नहीं है?

पद्मसिंह ने तगअली की तरफ देखकर कहा मुसलमान मेम्बरों का ही भरोसा है।

तेगअली ने मार्मिक भाव से कहा, उनपर एतमाद करना रेत पर दीवार बनाना है। आपको मालूम नहीं, वहाँ क्या चाले चली जा रही है? अजब नहीं है कि वह ऐन वक्त पर धोखा दे।

पद्मसिंह- मुझे तो ऐसी आशा ही है।

तेगअली यह आपकी शराफत है। वहाँ इस वक्त, उर्दू हिन्दी का झगड़ा, गोकशोका मसला, जुदागाना इन्तखाब, सूद का मुआविज कानून, इन सबों से मजहबी तास्सुव के भड़काने में मदद ली जा रही है।

प्रभाकराव-—सेठ बलभद्रदास न आवेगे क्या, किसी तरह उन्हीं को समझाना चाहिये।

कुँवर-—मैंने उन्हें निमन्त्रण ही नहीं दिया, क्योंकि मैं जानता था कि कदापि न आयेंगे। वह मतभेद को वैमनस्य समझते हैं। हमारे प्रायः सभी नेताओं का यही हाल है। यही एक विषय है, जिसमे उनकी सजीवता प्रकट होती है। आपका उनसे जरा भी मतभेद हुआ और वह आपके जानी दुश्मन हो गये, आपसे बोलना तो दूर रहा आपकी सूरत तक न देखेंगे, बल्कि अवसर पायेगे तो अधिकारियों से आपकी शिकायत करेगें अपने मित्रों की मंडली मे आपके रीति व्यवहार की आचार-विचार, आलोचना करेगें आप ब्राह्मण है तो आपको भिक्षुक कहेगे क्षत्रिय हैं तो आपको उजड्ड गंवार कहेगें। वैश्य हैं तो आपको बनिये, डण्डी [ २१९ ] तौल की पदवी मिलेगी और शूद्र है तब तो आप बने बनाये चाण्डाल हैं ही। आप अगर गाने से प्रेम रखते हैं तो आप दुराचारी है, आप सत्संगी है तो आपको तुरन्त ‘बछिया के ताऊ' की उपाधि मिल जायगी। यहाँ तक कि आापकी माता और स्त्री पर भी निन्दास्पद आक्षेप किये जायेंगे। हमारे यहाँ मतभेद महापाप है और उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं। अहा!वह देखिये, डाक्टर श्यामाचरण की मोटर आ गयी।

डाक्टर श्यामाचरण मोटर से उतरे और उपस्थित सज्जनों की ओर देखते हुए बोले, I am sorry. I was late.

कुँवर साहब ने उनका स्वागत किया। औरों ने भी हाथ मिलाया और डाक्टरसाहब एक कुर्सी पर बैठकर बोले-When is the performance going to begin!

कुँवर-डाक्टर साहब, आप भूलते है, यह काले आदमियों का समाज हैं।

डाक्टर साहब ने हँसकर कहा, मुआफ कीजियेगा, मुझे याद न रहा कि आपके यहाँ म्लेच्छों की भाषा बोलना मना है।

कुँवर—लेकिन देवताओं के समाज में तो आप कभी ऐसी भूल नहीं करते।

डाक्टर--तो महाराज उसका कुछ प्रायश्चित करा लीजिये।

कुँवर—इसका प्रायश्चित्त यहीं है कि आप मित्रों से अपनी मातृभाषा-का व्यवहार किया कीजिये।

डाक्टर-आप राजा लोग हैं, आपसे यह प्रण निभ सकता है हमसे इसका पालन क्योंकर हो सकता है? अंग्रेजी तो हमारी Lingua Franca (सार्वदेशिक भाषा) हो रही है।

कुँवर--उसे आपही लोगों ने तो यह गौरव प्रदान कर रखा है। फारस और काबुल के मूर्ख सिपाहियों और हिन्दू व्यापारियों के समागम से उर्दू जैसी भाषा का प्रादुर्भाव हो गया। अगर हमारे देश के भिन्न- भिन्न प्रांतों के विद्वज्जन परस्पर अपनी ही भाषा में सम्भाषण करते [ २२० ] तो अब तक कभी एक सार्वदेशिक भाषा बन गई होती। जबतक आप जैसे विद्वान् लोग अंग्रेजी के भक्त बने रहेंगे, कभी एक सार्वदेशिक भाषा का जन्म न होगा। मगर यह काम कष्ट-साध्य है, इसे कौन करे? यहाँ तो लोगों को अंग्रेजी जैसी समुन्नत भाषा मिल गयी, सब उसी के हाथों बिक गये। मेरी समझ में नहीं आता कि अंग्रेजी भाषा बोलने और लिखने में लोग क्यो अपना गौरव समझते है? मैंने भी अंग्रेजी पढ़ी है। दो साल विलायत रह आया हूँ और आपके कितने ही अंग्रेजी के धुरंधर पंडितों से अच्छी अंगेजी लिख और बोल सकता हूँ पर मुझे उससे ऐसी घृणा होती है जैसे किसी अंगेज के उतारे कपड़े पहनने से।

पद्मसिंह ने इन वादों मे कोई भाग न लिया। ज्योंही अवसर मिला, उन्होंने विट्ठलदास को बुलाया और उन्हें एकान्त में ले जाकर शान्ता का पत्र दिखाया।

विट्ठलदास ने कहा, अब आप क्या करना चाहते है?

पद्म-मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आता। जबसे यह पत्र मिला है, ऐसा मालूम होता है मानो नदी में बहा जाता हूँ।

विट्ठल--कुछ न कुछ करना तो पड़ेगा।

पद्म-—क्या करूँ?

विट्ठल--शान्ता को बुला लाइये।

पद्म-—सारे घर से नाता टूट जायगा।

विट्ठल- टूट जाय। कर्तव्य के सामने किसी का क्या भय?

पद्म—यह तो आप ठीक कहते है, पर मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं। भैया को मैं अप्रसन्न करने का साहस नहीं कर सकता।

विट्ठल-- अपने यहाँ न रखिये, विधवाश्रम रख दीजिये, यह तो कठिन नहीं।

पद्म-- हाँ, यह आपने अच्छा उपाय बताया। मुझे इतना भी न सूझा था। कठिनाई में मेरी बुद्धि जैसे चरने चली जाती है। [ २२१ ] विट्ठल— लेकिन जाना आपको पड़ेगा।

पद्म—यह क्यों, आपके जाने से काम न चलेगा?

विट्ठल—भला उमानाथ उसे मेरे साथ क्यों भेजने लगे?

पद्म—इसमे उन्हें क्या आपत्ति हो सकती है!

विट्ठल— आप तो कभी-कभी बच्चों की सी बात करने लगते है। शान्ता उनकी बेटी न सही, पर इस समय वह उसके पिता है। वह उसे एक अपिरिचित मनुष्य के साथ क्यों आने देगे?

पद्म— भाई साहब नाराज न हो, मैं वास्तव में कुछ बौखला गया हूँ। लेकिन मेरे चलने में तो बड़ा उपद्रव खड़ा हो जायगा। भैया सुनेंगे तो वह मुझे मार ही डालेंगे। जनवासे मे उन्होंने जो धक्का लगाया था वह अभी तक मुझे याद है।

विट्ठल—अच्छा, आाप न जाइये, मैं ही चला जाऊँँगा। लेकिन उमानाथ के नाम एक पत्र दे देने में तो आपको कोई बाधा नहीं?

पद्म—आप कहेंगे कि वह निरा मिट्टी का लोदा है, पर मुझसे इतना साहस भी नहीं है। ऐसी युक्ति बताइये कि कोई अवसर पड़े तो मैं साफ निकल जाऊँँ। भाई साहब को मुझपर दोषारोपण का मौका न मिले।

विट्ठलदास ने झुंझलाकर उत्तर दिया, मुझे ऐसी युक्ति नहीं सूझती। भलेमानुस,आप भी अपने को मनुष्य कहेगे। कहाँ तो वह धुँँआधार व्याख्यान देते है, ऐसे उच्च भावों से भरा हुआ मानो मुक्तात्मा है और कहाँ यह भीरुता।

पद्मसिंह ने लज्जित होकर कहा, इस समय जो चाहे कह लीजिये, पर इस काम का सारा भार आपके ऊपर रहेगा।

विठ्ठल—अच्छा, एक तार तो दे दीजियेगा, या इतना भी न होगा?

पद्म—(उछलकर) हाँ, मैं तार दे दूँँगा। मैं तो जानता था कि आप कोई राह निकालेंगे! अगर कभी बात आ पड़ी तो मैं कह दूँगा कि मैने तार नहीं दिया, किसी ने मेरे नाम से दे दिया होगा। मगर एक ही क्षण में उनका विचार पलट गया। अपनी आत्मभीरुता पर लज्जा [ २२२ ] आई। मन में सोचा, भाई साहब ऐसे मूर्ख नहीं है कि इस धर्म — कार्य के लिये मुझसे अप्रसन्न हो और यदि हो भी जायँ तो मुझे इसकी चिन्ता न करनी चाहिये।

विट्ठल — तो आज ही तार दे दीजिये।

पद्म — लेकिन यह सरासर जालसाजी होगी।

विट्ठल — हाँ, होगी तो, आप ही समझिये।

पद्म — मैं ही चलूँँ तो कैसा हो?

विट्ठल — बहुत ही उत्तम, सारा काम ही बन जाय।

पद्म — अच्छी बात है, मैं और आप दोनों चले।

विट्ठल — तो कब?

पद्म — बस, आज तार देता हूँ कि हम लोग शान्ता को विदा कराने आ रहे है, परसो सन्ध्या की गाड़ी से चले चले।

विट्ठल — निश्चय हो गया?

पद्म — हाँ निश्चय हो गया। आप मेरा कान पकड़कर ले जाइयेगा।

विट्ठलदास ने अपने सरल-हदय मित्र की ओर प्रशंसा की दृष्टि से देखा और दोनो मनुष्य जलतरंग सुनने जा बैठे, जिसकी मनोहर ध्वनि आकाश में गूँज रही थी।

४१

जब हम स्वास्थ्यलाभ करने के लिये किसी पहाड़पर जाते है तो इस बात का विशेष यत्न करते है कि हमसे कोई कुपथ्य न हो। नियमितरूपसे व्यायाम करते है, आरोग्य का उद्देश्य सदैव हमारे सामने रहता है। सुमन विधवाश्रम में आत्मिक स्वास्थ्यलाभ करने गई थी और अभीष्ट को एक क्षण के लिये भी न भूलती थी। वह अपनी अन्य बहनो की सेवा में तत्पर रहती और धार्मिक पुस्तके पढ़ती। देवोपासना, स्नानादि में उसके व्यथित हृदय को शान्ति मिलती थी।

विट्ठलदास ने अमोला के समाचार उससे छिपा रखे थे, लेकिन जब [ २२३ ] जायगी। उसे मुँँह दिखाने की अपेक्षा गंगाकी गोद में मग्न हो जाना कितान सहज था।

अकस्मात् उसने देखा कि कोई आदमी उसकी तरफ चला आ रहा है। अभी कुछ-कुछ अंधेरा था, पर सुमन को इतना मालूम हो गया कि कोई साधु है। सुमन की उँगुली में एक अँगूठी थी। उसने उसे साधु को दान करने का निश्चय किया, लेकिन वह ज्यों ही समीप आया, सुमने भय, घृणा और लज्जा से अपना मुँँह छिपा लिया। यह गजाधर थे।

सुमन खड़ी थी और गजाघर उसके पैरो पर गिर पड़े और रुद्ध कण्ठ से बोले, मेरे अपराध क्षमा करो।

सुमन पीछे हट गई, उसको आँँखो के सामने अपने अपमान का दृश्य खिंंच गया। घाव हरा हो गया। उसके जी में आया कि इसे फटकारूँ, कहूँ कि तुम मेरे पिता के घातक, मेरे जीवन के नाश करने वाले हो, पर कुछ गजाधर की अनुकम्पापूर्ण उदारता, कुछ उसका साधु वेश और कुछ विराग भावने, जो प्राणघातका संकल्प कर लेने के बाद उदित हो जाता है, उसे द्रवित कर दिया। उसके नयन सजल हो गये, करुण स्वर से बोली, तुम्हारा कोई अपराध नहीं है, जो कुछ हुआ वह सब मेरे कर्मों का फल था।

गजाधर—नहीं सुमन, ऐसा मत कहो, यह सब मेरी मूर्खता और अज्ञानताका फल है। मैंने सोचा था कि उसका प्रायश्चित कर सकूंंगा, पर अपने अत्याचारका भीषण परिणाम देखकर मुझे विदित हो रहा है कि उसका प्राश्चित नहीं हो सकता। मैंने इन्ही आँँखो से तुम्हारे पूज्य पिता को गगा में लुप्त होते देखा है।

सुमन ने उत्सुक भाव से पूछा, क्या तुमने पिताजी को डूबते देखा है।

गजाधर-सुमन, डूबते देखा। मैं रातो को अकेला जा रहा था, मार्ग में वह मुझे मिल गये। मुझे अर्द्ध रात्रि के समय उन्हें गगाकी ओर जाते देखकर संदेह हुआ। उन्हें अपने स्थान पर लाया और उनके हृदय को शान्त करनेकी चेष्टा की। फिर यह समझकर कि मेरा मनोरथ [ २२४ ] पूरा हो गया, मैं सो गया। थोड़ी देर में जब उठा तो उन्हे वहाँ न देखा। तुरन्त गंगातटकी ओर दौड़ा। उस समय मैंने सुना कि वह मुझे पुकार रहे है, पर जब तक मैं यह निश्चय कर सकूँ कि वह कहाँ है उन्हें निर्दयी लहरो ने ग्रस लिया! यह दुर्लभ आत्मा मेरी आँखों के सामने स्वर्ग धाम को सिवारी। तब तक मुझे मालूम न था कि मेरा पाप इतना घोरतम है वह अक्षम्य है, अदंडय है। मालूम नहीं, ईश्वर के यहाँ मेरी क्या गति होगी?

गजाधर की आत्मवेदना ने सुमन के हृदय पर वही काम किया, जो साबुन मैल के साथ करता है। उसने जमे हुए मालिन्य को काटकर ऊपर कर दिया। वह सचित भाव ऊपर आ गये जिन्हे वह गुप्त रखना चाहती थी। बोली, परमात्मा ने तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान कर दी है। तुम अपनी सुकीर्ति से चाहे कुछ कर भी लो, पर मेरी क्या गति होगी, मैं तो दोनों लोको से गई। हाय! मेरी विलास-तृष्णा ने मुझे कहीं का न रखा। अब क्या छिपाऊँ, तुम्हारे दारिद्रय और इससे अधिक तुम्हारे प्रेमविहीन व्यवहार ने मुझमे असतोषका अकुर जमा दिया और चारों ओर पाप जीवन की मान मर्यादा, सुख विलास देखकर इस अकुर ने बढते-बढ़ते भटकटैय के सदृश सारे हृदय को छा लिया। उस समय एक फफोलेको फोड़ने लिये जरासी ठेस भी बहुत थी। तुम्हारी नम्रता, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी सहानुभूति, तुम्हारी उदारता उस फफोलेपर फहेका काम देती, पर तुमने उसे मसल दिया, मे पीड़ा से व्याकुल, सशाहीन हो गई। तुम्हारे उस पाशविक पैशाचिक व्यवहार का जब स्मरण होता है तो हृदय में एक ज्वाला सी दहकने लगती है और अन्त.करण से तुम्हारे प्रति शाप निकल आता है। यह मेरा अंतिम समय है, एक क्षण में यह पापमय शरीर गंगामे डूब जायगा, पिताजी की शरण में पहुँच जाऊँगी, इसलिये ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हारे अपराधो को क्षमा करे।

गजाधर ने चिंतित स्वर मे कहा, सुमन, यदि प्राण देने से पापों का प्रायश्चित्त हो जाता तो में अबतक कभी प्राण दे चुका होता। [ २२५ ]सुमन—कम से कम दुखो का तो अन्त हो जायगा।

गजाधर—हाँ, तुम्हारे दुखो का अन्त हो सकता है, पर उनके दुखों का अन्त न होगा जो तुम्हारे दुखों में दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे माता पिता शरीर के बन्धन से मुक्त हो गये है, लेकिन उनकी आत्माएँ अपनी बिदेहावस्था में तुम्हारे पास विचर रही है। वह अभी तुम्हारे मुख से सुखी और दुःख से दुखी होगे। सोच लो कि प्राणघात करके उनको दुख पहुँचाओगी या अपना पुनरुद्धार करके उन्हें सुख और शान्ति दोगी। पश्चात्ताप अंतिम चेतावनी है। जो हमें आत्म-सुधार के निमित्त ईश्वर की ओर से मिलती है। यदि इसका अभिप्राय न समझकर हम शोकावस्था में अपने प्राणों का अन्त कर दे तो मानो हमने आत्मोद्घार की इस अंतिम प्रेरणा को भी निष्फल कर दिया। यह भो सोचो कि तुम्हारे न रहने से उस अवला शान्ता की क्या गति होगी, जिसने अभी संसार के ऊँँच नीच का कुछ अनुभव नहीं किया है, तुम्हारे सिवा उसका संसार में कौन है? उमानाथ का हाल तुम जानती ही हो, वह उसका निर्वाह नहीं कर सकते।उनमें दया है, पर लोभ उससे अधिक है। कभी न कभी वह उससे अवश्य ही अपना गला छुड़ा लेगे। उस समय वह किसकी होकर रहेगी।

सुमन को गजाधर के इस कथन में सच्ची समवेदना की झलक दिखाई दी। उसने उनकी ओर नीचतासूचक दृष्टी से देखकर कहा, शान्ता से मिलने की अपेक्षा मुझे प्राण देना सहज प्रतीत होता है। कई दिन हुए उसने पद्मसिंह के पास एक पत्र भेजा था। उमानाथ उसका कहीं और विवाह करना चाहते है। वह इसे स्वीकार नहीं करती।

गजाधर-देव हैं!

सुमन-शर्मा जी बेचारे और क्या करते है? उन्होंने निश्चय किया है कि उसे बुलाकर आश्रम में रमे। अगर उनके भाई मान जायेगे तब तो अच्छा ही है, नहीं तो उन दुखिया को न जाने कितने दिनों तन आश्रम में रहना पड़ेगा। वह कल यहाँँ आ जायगी। उसके सम्मुख जाने का [ २२६ ] भय, उससे आँँख मिलने की लज्जा मुझे मार डालती है। जब वह तिरस्का की आँँखो से मुझे देखेगी, उस समय में क्या करूँगी? और जो कहीं उसने घुणा वश मुझसे गले मिलने मे संकोच किया, तब तो मैं उसी क्षण विष खा लूँँगी। इस दुर्गति से तो प्राण दे देना अच्छा है।

गजाधार ने सुमन को श्रद्धाभाव से देखा, उन्हें अनुभव हुआ कि ऐसी अवस्था में भी वही करता जो सुमन करना चाहती है। बोले, सुमन तुम्हारे यह विचार यथार्थ है, पर तुम्हारे हृदय पर चाहे जो कुछ बीते, शान्ता के हित के लिये ततुम्हें सब कुछ सहना पड़ेगा। तुमसे उसका जितना कल्याण हो सकता है उतना अन्य किसी से नहीं हो सकता।अबतक तुम अपने लिये जीती थीं, अब दूसरो के लिये जीओ।

यह कह गजाधर जिधर से आये थे उधर ही चले गय। सुमन गंगाजी के तटपर देरतक खड़ी उनकी बातों पर विचार करती रही, फिर स्नान करके आश्रम की ओर चली, जैसे कोई मनुष्य समर से परास्त होकर घर की ओर जाता है।

४२

शान्ता ने पत्र तो भेजा, पर उसको उत्तर आने की कोई आशा न थी। तीन दिन बीत गये, उसका नैराश्य दिनों दिन बढ़ता जाता था। अगर कुछ अनुकूल उत्तर न आया तो उमानाथ अवश्य ही उसका विवाह कर देगे, यह सोचकर शान्ता का हृदय थरथराने लगता था। वह दिन में कई बार देवी के चबूतरेपर जाती और नाना प्रकार की मनौतियाँ करती। कभी शिवजी के मन्दिर में जाती और उनसे अपनी मनोकामना कहती। सदन एक क्षण के लिये भी उसके ध्यान से न उतरता। वह उसकी मूर्ति को हृदय ने त्रोके सामने बैठाकर उससे कर जोड़कर कहती, प्राणनाथ, मुझे क्यों नहीं अपनाते? लोक निन्दा के भय से। हाय, मेरी जान इतनी सस्ती है कि इन दामों विके। तुम मुझे त्याग रहे हो, आग में झोक रहे हो, केवल इस अपराध के लिये कि मैं सुमन की [ २२७ ] बहन हूँ। यही न्याय है। कहीं तुम मुझे मिल जाते, मैं तुम्हें पकड़ पाती, फिर देखती कि मुझसे कैसे भागते हो? तुम पत्थर नहीं हो कि मेरे आँसुओं से न पसीजते। तुम अपनी आँखों से एक बार मेरी दशा देख लेते तो फिर तुमसे न रहा जाता। हाँ, तुमसे कदापि न रहा जाता। तुम्हारा विशाल हृदय करुणा शून्य नहीं हो सकता। क्या करूँ तुम्हें अपने चित्तकी दशा कैसे दिखाऊँ।

चौथे दिन प्रात काल पद्मसिंह का पत्र मिला। शान्ता भयभीत हो गई। उसको प्रेमाभिलापाएँ शिथिल पड़ गई। अपनी भावी दशा की शंकाओं ने चित्त को अशान्त कर दिया।

लेकिन उमानाथ फूले न समाये। बाजे का प्रबन्ध किया। सवारियाँ एकत्रित की, गाँव भर में निमन्त्रण भेजे, मेहमानों के लिये चौपाल में फर्श आदि बिछवा दिये। गाँवे के लोग चकित थे, यह कैसा गौना है? विवाह तो हुआ ही नहीं गौना कैसा? वह समझते थे कि उमानाथ ने कोई न कोई चाल खेली है। एक ही धूर्त है। निर्दिष्ट समय पर उमानाथ स्टेशन गये और बाजे बजवाते हुए मेहमानों को अपने घर लाये। चौपाल में उन्हें ठहराया। केवल तीन आदमी थे। पद्मसिंह विट्ठलदास और एक नौकर।

दूसरे दिन सन्ध्या समय विदाई का मुहूर्त था, तीसरा पहर हो गया किन्तु उमानाथ घर में गाँव की कोई स्त्री नहीं दिखाई देती। वह बार-बार अन्दर आते है, तेवर बदलते हैं, दीवारो को धमकाकर कहते है, में एफ-एक की देख लूँगा। जान्हवी से बिगड़कर कहते है कि मैं सबकी खबर लूँगा। लेकिन वह धमकियाँ जो कभी नबरदारों को कंपायामान कर दिया करती थी, आज किसी पर असर नहीं करती। बिरादरी अनुचित दबाव नहीं मानती है घमण्डियों का सिर नीचा करने के लिये वह ऐसे ही अवसरों की ताक में रहती है।

सन्ध्या हुई। कहा रोने पालकी द्वारपर लगा दी। जान्हवी और शान्ता गले मिलकर खूब रोई।