सेवासदन/४७

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सेवासदन  (1919) 
द्वारा प्रेमचंद

[ २२० ] तो अब तक कभी एक सार्वदेशिक भाषा बन गई होती। जबतक आप जैसे विद्वान् लोग अंग्रेजी के भक्त बने रहेंगे, कभी एक सार्वदेशिक भाषा का जन्म न होगा। मगर यह काम कष्ट-साध्य है, इसे कौन करे? यहाँ तो लोगों को अंग्रेजी जैसी समुन्नत भाषा मिल गयी, सब उसी के हाथों बिक गये। मेरी समझ में नहीं आता कि अंग्रेजी भाषा बोलने और लिखने में लोग क्यो अपना गौरव समझते है? मैंने भी अंग्रेजी पढ़ी है। दो साल विलायत रह आया हूँ और आपके कितने ही अंग्रेजी के धुरंधर पंडितों से अच्छी अंगेजी लिख और बोल सकता हूँ पर मुझे उससे ऐसी घृणा होती है जैसे किसी अंगेज के उतारे कपड़े पहनने से।

पद्मसिंह ने इन वादों मे कोई भाग न लिया। ज्योंही अवसर मिला, उन्होंने विट्ठलदास को बुलाया और उन्हें एकान्त में ले जाकर शान्ता का पत्र दिखाया।

विट्ठलदास ने कहा, अब आप क्या करना चाहते है?

पद्म-मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आता। जबसे यह पत्र मिला है, ऐसा मालूम होता है मानो नदी में बहा जाता हूँ।

विट्ठल--कुछ न कुछ करना तो पड़ेगा।

पद्म-—क्या करूँ?

विट्ठल--शान्ता को बुला लाइये।

पद्म-—सारे घर से नाता टूट जायगा।

विट्ठल- टूट जाय। कर्तव्य के सामने किसी का क्या भय?

पद्म—यह तो आप ठीक कहते है, पर मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं। भैया को मैं अप्रसन्न करने का साहस नहीं कर सकता।

विट्ठल-- अपने यहाँ न रखिये, विधवाश्रम रख दीजिये, यह तो कठिन नहीं।

पद्म-- हाँ, यह आपने अच्छा उपाय बताया। मुझे इतना भी न सूझा था। कठिनाई में मेरी बुद्धि जैसे चरने चली जाती है। [ २२१ ] विट्ठल— लेकिन जाना आपको पड़ेगा।

पद्म—यह क्यों, आपके जाने से काम न चलेगा?

विट्ठल—भला उमानाथ उसे मेरे साथ क्यों भेजने लगे?

पद्म—इसमे उन्हें क्या आपत्ति हो सकती है!

विट्ठल— आप तो कभी-कभी बच्चों की सी बात करने लगते है। शान्ता उनकी बेटी न सही, पर इस समय वह उसके पिता है। वह उसे एक अपिरिचित मनुष्य के साथ क्यों आने देगे?

पद्म— भाई साहब नाराज न हो, मैं वास्तव में कुछ बौखला गया हूँ। लेकिन मेरे चलने में तो बड़ा उपद्रव खड़ा हो जायगा। भैया सुनेंगे तो वह मुझे मार ही डालेंगे। जनवासे मे उन्होंने जो धक्का लगाया था वह अभी तक मुझे याद है।

विट्ठल—अच्छा, आाप न जाइये, मैं ही चला जाऊँँगा। लेकिन उमानाथ के नाम एक पत्र दे देने में तो आपको कोई बाधा नहीं?

पद्म—आप कहेंगे कि वह निरा मिट्टी का लोदा है, पर मुझसे इतना साहस भी नहीं है। ऐसी युक्ति बताइये कि कोई अवसर पड़े तो मैं साफ निकल जाऊँँ। भाई साहब को मुझपर दोषारोपण का मौका न मिले।

विट्ठलदास ने झुंझलाकर उत्तर दिया, मुझे ऐसी युक्ति नहीं सूझती। भलेमानुस,आप भी अपने को मनुष्य कहेगे। कहाँ तो वह धुँँआधार व्याख्यान देते है, ऐसे उच्च भावों से भरा हुआ मानो मुक्तात्मा है और कहाँ यह भीरुता।

पद्मसिंह ने लज्जित होकर कहा, इस समय जो चाहे कह लीजिये, पर इस काम का सारा भार आपके ऊपर रहेगा।

विठ्ठल—अच्छा, एक तार तो दे दीजियेगा, या इतना भी न होगा?

पद्म—(उछलकर) हाँ, मैं तार दे दूँँगा। मैं तो जानता था कि आप कोई राह निकालेंगे! अगर कभी बात आ पड़ी तो मैं कह दूँगा कि मैने तार नहीं दिया, किसी ने मेरे नाम से दे दिया होगा। मगर एक ही क्षण में उनका विचार पलट गया। अपनी आत्मभीरुता पर लज्जा [ २२२ ] आई। मन में सोचा, भाई साहब ऐसे मूर्ख नहीं है कि इस धर्म — कार्य के लिये मुझसे अप्रसन्न हो और यदि हो भी जायँ तो मुझे इसकी चिन्ता न करनी चाहिये।

विट्ठल — तो आज ही तार दे दीजिये।

पद्म — लेकिन यह सरासर जालसाजी होगी।

विट्ठल — हाँ, होगी तो, आप ही समझिये।

पद्म — मैं ही चलूँँ तो कैसा हो?

विट्ठल — बहुत ही उत्तम, सारा काम ही बन जाय।

पद्म — अच्छी बात है, मैं और आप दोनों चले।

विट्ठल — तो कब?

पद्म — बस, आज तार देता हूँ कि हम लोग शान्ता को विदा कराने आ रहे है, परसो सन्ध्या की गाड़ी से चले चले।

विट्ठल — निश्चय हो गया?

पद्म — हाँ निश्चय हो गया। आप मेरा कान पकड़कर ले जाइयेगा।

विट्ठलदास ने अपने सरल-हदय मित्र की ओर प्रशंसा की दृष्टि से देखा और दोनो मनुष्य जलतरंग सुनने जा बैठे, जिसकी मनोहर ध्वनि आकाश में गूँज रही थी।

४१

जब हम स्वास्थ्यलाभ करने के लिये किसी पहाड़पर जाते है तो इस बात का विशेष यत्न करते है कि हमसे कोई कुपथ्य न हो। नियमितरूपसे व्यायाम करते है, आरोग्य का उद्देश्य सदैव हमारे सामने रहता है। सुमन विधवाश्रम में आत्मिक स्वास्थ्यलाभ करने गई थी और अभीष्ट को एक क्षण के लिये भी न भूलती थी। वह अपनी अन्य बहनो की सेवा में तत्पर रहती और धार्मिक पुस्तके पढ़ती। देवोपासना, स्नानादि में उसके व्यथित हृदय को शान्ति मिलती थी।

विट्ठलदास ने अमोला के समाचार उससे छिपा रखे थे, लेकिन जब [ २२३ ] जायगी। उसे मुँँह दिखाने की अपेक्षा गंगाकी गोद में मग्न हो जाना कितान सहज था।

अकस्मात् उसने देखा कि कोई आदमी उसकी तरफ चला आ रहा है। अभी कुछ-कुछ अंधेरा था, पर सुमन को इतना मालूम हो गया कि कोई साधु है। सुमन की उँगुली में एक अँगूठी थी। उसने उसे साधु को दान करने का निश्चय किया, लेकिन वह ज्यों ही समीप आया, सुमने भय, घृणा और लज्जा से अपना मुँँह छिपा लिया। यह गजाधर थे।

सुमन खड़ी थी और गजाघर उसके पैरो पर गिर पड़े और रुद्ध कण्ठ से बोले, मेरे अपराध क्षमा करो।

सुमन पीछे हट गई, उसको आँँखो के सामने अपने अपमान का दृश्य खिंंच गया। घाव हरा हो गया। उसके जी में आया कि इसे फटकारूँ, कहूँ कि तुम मेरे पिता के घातक, मेरे जीवन के नाश करने वाले हो, पर कुछ गजाधर की अनुकम्पापूर्ण उदारता, कुछ उसका साधु वेश और कुछ विराग भावने, जो प्राणघातका संकल्प कर लेने के बाद उदित हो जाता है, उसे द्रवित कर दिया। उसके नयन सजल हो गये, करुण स्वर से बोली, तुम्हारा कोई अपराध नहीं है, जो कुछ हुआ वह सब मेरे कर्मों का फल था।

गजाधर—नहीं सुमन, ऐसा मत कहो, यह सब मेरी मूर्खता और अज्ञानताका फल है। मैंने सोचा था कि उसका प्रायश्चित कर सकूंंगा, पर अपने अत्याचारका भीषण परिणाम देखकर मुझे विदित हो रहा है कि उसका प्राश्चित नहीं हो सकता। मैंने इन्ही आँँखो से तुम्हारे पूज्य पिता को गगा में लुप्त होते देखा है।

सुमन ने उत्सुक भाव से पूछा, क्या तुमने पिताजी को डूबते देखा है।

गजाधर-सुमन, डूबते देखा। मैं रातो को अकेला जा रहा था, मार्ग में वह मुझे मिल गये। मुझे अर्द्ध रात्रि के समय उन्हें गगाकी ओर जाते देखकर संदेह हुआ। उन्हें अपने स्थान पर लाया और उनके हृदय को शान्त करनेकी चेष्टा की। फिर यह समझकर कि मेरा मनोरथ [ २२४ ] पूरा हो गया, मैं सो गया। थोड़ी देर में जब उठा तो उन्हे वहाँ न देखा। तुरन्त गंगातटकी ओर दौड़ा। उस समय मैंने सुना कि वह मुझे पुकार रहे है, पर जब तक मैं यह निश्चय कर सकूँ कि वह कहाँ है उन्हें निर्दयी लहरो ने ग्रस लिया! यह दुर्लभ आत्मा मेरी आँखों के सामने स्वर्ग धाम को सिवारी। तब तक मुझे मालूम न था कि मेरा पाप इतना घोरतम है वह अक्षम्य है, अदंडय है। मालूम नहीं, ईश्वर के यहाँ मेरी क्या गति होगी?

गजाधर की आत्मवेदना ने सुमन के हृदय पर वही काम किया, जो साबुन मैल के साथ करता है। उसने जमे हुए मालिन्य को काटकर ऊपर कर दिया। वह सचित भाव ऊपर आ गये जिन्हे वह गुप्त रखना चाहती थी। बोली, परमात्मा ने तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान कर दी है। तुम अपनी सुकीर्ति से चाहे कुछ कर भी लो, पर मेरी क्या गति होगी, मैं तो दोनों लोको से गई। हाय! मेरी विलास-तृष्णा ने मुझे कहीं का न रखा। अब क्या छिपाऊँ, तुम्हारे दारिद्रय और इससे अधिक तुम्हारे प्रेमविहीन व्यवहार ने मुझमे असतोषका अकुर जमा दिया और चारों ओर पाप जीवन की मान मर्यादा, सुख विलास देखकर इस अकुर ने बढते-बढ़ते भटकटैय के सदृश सारे हृदय को छा लिया। उस समय एक फफोलेको फोड़ने लिये जरासी ठेस भी बहुत थी। तुम्हारी नम्रता, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी सहानुभूति, तुम्हारी उदारता उस फफोलेपर फहेका काम देती, पर तुमने उसे मसल दिया, मे पीड़ा से व्याकुल, सशाहीन हो गई। तुम्हारे उस पाशविक पैशाचिक व्यवहार का जब स्मरण होता है तो हृदय में एक ज्वाला सी दहकने लगती है और अन्त.करण से तुम्हारे प्रति शाप निकल आता है। यह मेरा अंतिम समय है, एक क्षण में यह पापमय शरीर गंगामे डूब जायगा, पिताजी की शरण में पहुँच जाऊँगी, इसलिये ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि तुम्हारे अपराधो को क्षमा करे।

गजाधर ने चिंतित स्वर मे कहा, सुमन, यदि प्राण देने से पापों का प्रायश्चित्त हो जाता तो में अबतक कभी प्राण दे चुका होता। [ २२५ ]सुमन—कम से कम दुखो का तो अन्त हो जायगा।

गजाधर—हाँ, तुम्हारे दुखो का अन्त हो सकता है, पर उनके दुखों का अन्त न होगा जो तुम्हारे दुखों में दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे माता पिता शरीर के बन्धन से मुक्त हो गये है, लेकिन उनकी आत्माएँ अपनी बिदेहावस्था में तुम्हारे पास विचर रही है। वह अभी तुम्हारे मुख से सुखी और दुःख से दुखी होगे। सोच लो कि प्राणघात करके उनको दुख पहुँचाओगी या अपना पुनरुद्धार करके उन्हें सुख और शान्ति दोगी। पश्चात्ताप अंतिम चेतावनी है। जो हमें आत्म-सुधार के निमित्त ईश्वर की ओर से मिलती है। यदि इसका अभिप्राय न समझकर हम शोकावस्था में अपने प्राणों का अन्त कर दे तो मानो हमने आत्मोद्घार की इस अंतिम प्रेरणा को भी निष्फल कर दिया। यह भो सोचो कि तुम्हारे न रहने से उस अवला शान्ता की क्या गति होगी, जिसने अभी संसार के ऊँँच नीच का कुछ अनुभव नहीं किया है, तुम्हारे सिवा उसका संसार में कौन है? उमानाथ का हाल तुम जानती ही हो, वह उसका निर्वाह नहीं कर सकते।उनमें दया है, पर लोभ उससे अधिक है। कभी न कभी वह उससे अवश्य ही अपना गला छुड़ा लेगे। उस समय वह किसकी होकर रहेगी।

सुमन को गजाधर के इस कथन में सच्ची समवेदना की झलक दिखाई दी। उसने उनकी ओर नीचतासूचक दृष्टी से देखकर कहा, शान्ता से मिलने की अपेक्षा मुझे प्राण देना सहज प्रतीत होता है। कई दिन हुए उसने पद्मसिंह के पास एक पत्र भेजा था। उमानाथ उसका कहीं और विवाह करना चाहते है। वह इसे स्वीकार नहीं करती।

गजाधर-देव हैं!

सुमन-शर्मा जी बेचारे और क्या करते है? उन्होंने निश्चय किया है कि उसे बुलाकर आश्रम में रमे। अगर उनके भाई मान जायेगे तब तो अच्छा ही है, नहीं तो उन दुखिया को न जाने कितने दिनों तन आश्रम में रहना पड़ेगा। वह कल यहाँँ आ जायगी। उसके सम्मुख जाने का [ २२६ ] भय, उससे आँँख मिलने की लज्जा मुझे मार डालती है। जब वह तिरस्का की आँँखो से मुझे देखेगी, उस समय में क्या करूँगी? और जो कहीं उसने घुणा वश मुझसे गले मिलने मे संकोच किया, तब तो मैं उसी क्षण विष खा लूँँगी। इस दुर्गति से तो प्राण दे देना अच्छा है।

गजाधार ने सुमन को श्रद्धाभाव से देखा, उन्हें अनुभव हुआ कि ऐसी अवस्था में भी वही करता जो सुमन करना चाहती है। बोले, सुमन तुम्हारे यह विचार यथार्थ है, पर तुम्हारे हृदय पर चाहे जो कुछ बीते, शान्ता के हित के लिये ततुम्हें सब कुछ सहना पड़ेगा। तुमसे उसका जितना कल्याण हो सकता है उतना अन्य किसी से नहीं हो सकता।अबतक तुम अपने लिये जीती थीं, अब दूसरो के लिये जीओ।

यह कह गजाधर जिधर से आये थे उधर ही चले गय। सुमन गंगाजी के तटपर देरतक खड़ी उनकी बातों पर विचार करती रही, फिर स्नान करके आश्रम की ओर चली, जैसे कोई मनुष्य समर से परास्त होकर घर की ओर जाता है।

४२

शान्ता ने पत्र तो भेजा, पर उसको उत्तर आने की कोई आशा न थी। तीन दिन बीत गये, उसका नैराश्य दिनों दिन बढ़ता जाता था। अगर कुछ अनुकूल उत्तर न आया तो उमानाथ अवश्य ही उसका विवाह कर देगे, यह सोचकर शान्ता का हृदय थरथराने लगता था। वह दिन में कई बार देवी के चबूतरेपर जाती और नाना प्रकार की मनौतियाँ करती। कभी शिवजी के मन्दिर में जाती और उनसे अपनी मनोकामना कहती। सदन एक क्षण के लिये भी उसके ध्यान से न उतरता। वह उसकी मूर्ति को हृदय ने त्रोके सामने बैठाकर उससे कर जोड़कर कहती, प्राणनाथ, मुझे क्यों नहीं अपनाते? लोक निन्दा के भय से। हाय, मेरी जान इतनी सस्ती है कि इन दामों विके। तुम मुझे त्याग रहे हो, आग में झोक रहे हो, केवल इस अपराध के लिये कि मैं सुमन की [ २२७ ] बहन हूँ। यही न्याय है। कहीं तुम मुझे मिल जाते, मैं तुम्हें पकड़ पाती, फिर देखती कि मुझसे कैसे भागते हो? तुम पत्थर नहीं हो कि मेरे आँसुओं से न पसीजते। तुम अपनी आँखों से एक बार मेरी दशा देख लेते तो फिर तुमसे न रहा जाता। हाँ, तुमसे कदापि न रहा जाता। तुम्हारा विशाल हृदय करुणा शून्य नहीं हो सकता। क्या करूँ तुम्हें अपने चित्तकी दशा कैसे दिखाऊँ।

चौथे दिन प्रात काल पद्मसिंह का पत्र मिला। शान्ता भयभीत हो गई। उसको प्रेमाभिलापाएँ शिथिल पड़ गई। अपनी भावी दशा की शंकाओं ने चित्त को अशान्त कर दिया।

लेकिन उमानाथ फूले न समाये। बाजे का प्रबन्ध किया। सवारियाँ एकत्रित की, गाँव भर में निमन्त्रण भेजे, मेहमानों के लिये चौपाल में फर्श आदि बिछवा दिये। गाँवे के लोग चकित थे, यह कैसा गौना है? विवाह तो हुआ ही नहीं गौना कैसा? वह समझते थे कि उमानाथ ने कोई न कोई चाल खेली है। एक ही धूर्त है। निर्दिष्ट समय पर उमानाथ स्टेशन गये और बाजे बजवाते हुए मेहमानों को अपने घर लाये। चौपाल में उन्हें ठहराया। केवल तीन आदमी थे। पद्मसिंह विट्ठलदास और एक नौकर।

दूसरे दिन सन्ध्या समय विदाई का मुहूर्त था, तीसरा पहर हो गया किन्तु उमानाथ घर में गाँव की कोई स्त्री नहीं दिखाई देती। वह बार-बार अन्दर आते है, तेवर बदलते हैं, दीवारो को धमकाकर कहते है, में एफ-एक की देख लूँगा। जान्हवी से बिगड़कर कहते है कि मैं सबकी खबर लूँगा। लेकिन वह धमकियाँ जो कभी नबरदारों को कंपायामान कर दिया करती थी, आज किसी पर असर नहीं करती। बिरादरी अनुचित दबाव नहीं मानती है घमण्डियों का सिर नीचा करने के लिये वह ऐसे ही अवसरों की ताक में रहती है।

सन्ध्या हुई। कहा रोने पालकी द्वारपर लगा दी। जान्हवी और शान्ता गले मिलकर खूब रोई। [ २२८ ] शान्ता का हृदय प्रेम से परिपूर्ण था, इस पर उसे जो जो कष्ट उठाने पड़े थे वह इस समय भूल गये थे। इन लोगों से फिर भेट न होगी इस घर के अब फिर दर्शन न होंगे, इनसे सदैव के लिये नाता टूटता है, यह सोचकर उसका हृदय विदीर्ण हुआ जाता था। जान्हवी का हृदय भी दया से भरा हुआ था। इस माता-पिता विहीन बालिका को हमने बहुत कष्ट दिये यह सोचकर वह अपने आँसुओंको न रोक सकती थी। दोनों के हृदय में सच्चे, निर्मल, कोमल भावो की तरंगे उठ रही थी।

उमानाथ घर में आये तो शान्ता उनके पैरो से लिपट गई और विनय करती हुई कहने लगी, तुम्हीं मेरे पिता हो, अपनी बेटी को भूल न जाना, मेरी बहनों को गहने-कपड़े देना, होली और तीज में उन्हें बुलाना, पर मैं तुम्हारे दो अक्षरो के पत्र को ही अपना धन्यभाग्य समझूँगी। उमानाथ ने उसको संबोधन करते हुए कहा, बेटी, जैसी मेरी और दो बेटियाँ हैं। वैसी हो तुम भी हो, परमात्मा तुम्हें सदा सुखी रखे। यह कह कर रोने लगे।

सन्ध्या का समय था, मुन्नी गाय घर में आई तो शान्ता उसके गले लिपटकर रोने लगी। उसने तीन-चार वर्ष उस गाय की सेवा की थी। अब वह किसे भूसी लेकर दौड़गी? किसके गले में काले डोरे में कौड़ियाँ गूथकर पहनावेगी? मुन्नी सिर झुकाये उसके हाथो को चाटती थी। उसका वियोग दुख उसकी आँखों से झलक रहा था।

जान्हवी ने शान्ता को लाकर पालकी में बैठा दिया, कहारोने पालकी उठाई। शान्ता को ऐसा मालूम हुआ कि मानों वह अथाह सागर मे वहीं जा रही है।

गाँव की स्त्रियाँ अपने द्वारों पर खड़ी पालकी को देखती थी और रोती थीं।

उमानाथ स्टेशन तक पहुँचाने आये। चलते समय अपनी पगड़ी उताकर उन्होंने पद्मसिंह पौरो पर रख दी। पद्मसिंह ने उनको गले से लगा लिया। [ २२९ ] जब गाड़ी चली तो पद्मसिंह ने विट्लदास से कहा, अब इस अभिनयका सबसे कठिन भाग आ गया।

बिट्ठल——मैं नहीं समझा।

पद्म——क्या शान्ता से कुछ कहे सुने बिना ही उसे आश्रम में पहुँचा दीजियेगा। उसे पहले उसके लिये तैयार करना चाहिये।

विट्ठल——हाँ, यह आपने ठीक सोचा, तो जाकर कह दूँ?

पद्म——जरा सोच तो लीजिये, क्या कहियेगा? अभी तो वह यह समझ रही है कि ससुराल में जा रही हूँ। वियोग के दु:ख मे यह आशा उसे सँभाले हुए है। लेकिन जब उसे हमारा कौशल ज्ञात हो जायगा तो उसे कितना दुःख होगा? मुझे पछतावा हो रहा है कि मैंने पहले ही वे बाते क्यों न कह दी?

विट्ठल——तो अब कहने में क्या बिगड़ा जाता है? मिर्जापुर में गाड़ी देर तक ठहरेगी, मैं जाकर उसे समझा दूँगा।

पद्म——मुझसे बड़ी भूल हुई।

विट्ठल——तो उस भूलपर पछताने से अगर काम चल जाय तो जी भरकर पछता लीजिये।

पद्म——आपके पास पेन्सिल हो तो लाइये, एक पत्र लिखकर सब समाचार प्रकट कर दूँ।

विट्ठल——नहीं तार दे दीजिये, यह और भी उत्तम होगा। आप विचित्र जीव है, सीधी-सी बात में भी इतना आगा पीछा करने लगते है।

पद्म—— समस्या ही ऐसी आ पड़ी है, मैं क्या करुँ? एक बात मेरे ध्यान में आती है, मुगलसराय में देर तक रुकना पड़ेगा, बस वही उसके पास जाकर सब वृत्तांत कह दूँगा।

विट्ठल——यह आप बहुत दूर की कौड़ी लाये, इसलिये बुद्धिमानों ने कहा है कि कोई काम बिना भली भाँति सोचे नहीं करना चाहिये। आपकी बुद्धि ठिका ने पर पहुँचती है, लेकिन बहुत चक्कर खाकर। यही बात आपको पहले न सूझी। [ २३० ] शान्ता डचौढे दरजे के जनाने कमरे में बैठी हुई थी। वहाँ दो ईसाई लेडियाँ ओर बैठी थी। वे शान्ता को देखकर अग्रेजी में बाते करने लगी।

"मालूम होता है यह कोई नवविवाहिता स्त्री है।”

"हाँ, किसी ऊँचे कुलकी है। ससुराल जा रही है।”

"ऐसी रो रही है मानों कोई ढकेले लिये जाता हो।”

“पतिकी अभीतक सूरत न देखी होगी, प्रेम कैसे हो सकता है। भय से उसका हृदय काँप रहा होगा।”

"यह इनके यहाँ अत्यत निकृष्ट रिवाज है। बेचारी कन्या एक अनजान घर में भेज दी जाती है, जहाँ कोई उसका अपना नहीं होता।”

"यह सब पाशविक कालकी प्रथा है, जब स्त्रियों को बलात् उठा ले जाते थे।"

"क्यो बाईजी, (शान्ता से) ससुराल जा रही हो?”

शान्ता ने धीरे से सिर हिलाया।

"तुम इतनी रूपवती हो, तुम्हारा पति भी तुम्हारे जोड़ का है?"

शान्ता ने गंभीरता से उत्तर दिया, पति की सुन्दरता नहीं देखी जाती।

"यदि वह काला-कलूटा हो तो?”

शान्ता ने गर्व से उत्तर दिया, हमारे लिये वह देवतुल्य है, चाहे कैसा ही हो।

अच्छा, मान लो तुम्हारे ही सामने दो मनुष्य लाये जायें, एक रूपवान हो, दूसरा कुरूप, तो तुम किसे पसन्द करोगी?

शान्ता ने दृढता से उत्तर दिया, जिसे हमारे माता-पिता पसन्द करें।

शान्ता समझ रही थी कि यह दोनों हमारी विवाह-प्रथा पर आक्षेप कर रही है। थोडी देर के बाद उसने उनसे पूछा, मैंने सुना है आप लोग अपना पति खुद चुन लेती है?

"हाँ, हम इस विषय में स्वतन्त्र है।"

"आप अपने को माँ-बाप से बुद्धिमान समझती है?" [ २३१ ] वेश्याओं का नाच कराने के लिये एक भारी टैक्स लगाया जाय, और ऐसे जलसे किसी हालत में खुले स्थानों में न हो।

प्रोफेसर रमेशदत्त ने उसका समर्थन किया।

मैयद शफकतअली (प० डिप्टो० कले) ने कहा——इस तज-वोज में मुझे पूरा इत्तफाक है, लेकिन बगैर मुनासिब तरमीम के मैं इस तसलीम नहीं कर सकता। मेरी राय है कि रिज्योलूशन के पहले हिस्से में यह अल्फाज बढ़ा दिये जायें——वइस्तसनाय उनके जो नौ माह के अन्दर या तो अपनी निकाह कर ले, या कोई हुनर सीख ले, जिससे बह जायज तरीके पर जिन्दगी बसर कर सके।

कुँवर अनिरुद्ध सिंह बोले, मुझे इस तरमीम से पूरी सहानुभूति है। हमें वेश्याओं का पतित समझने का कोई अधिकार नहीं है, यह हमारी परम घप्टता है। हम रात-दिन जो रिश्वते लेते हैं, सूद खाते है, दीनों का ‘रक्त चूसते है, असहायों का गला काटते हैं, कदापि इस योग्य नहीं है कि समाज के किसी अगको नीच या तुच्छ समझे। सबसे नीच हम है, सबसे पापी, दुराचारी, अन्यायी हम है जो अपने काे शिक्षित, सभ्य, उदार, सच्चा समझते है। हमारे शिक्षित भाइयों ही की बदौलत दालमण्डी आवाद है, चाैक में चहल-पहल है, चकलों में रौनक है। यह मीना-बाजार हम लोगों ही ने सजाया है, ये चिड़ियाँ हम लोगों ने ही फँसाई है, ये कठपुतलियाँ हमने बनाई है। जिस समाज से अत्याचारी जमीदार, रिश्वती राज्य-कर्मचारी, अन्यायी महाजन, स्वार्थी बन्धु अदर और सम्मान के पात्र हो, वहाँ दालमण्डी क्यों न आबाद हो? हराम का धन हरामकारी के सिवा और कहाँ जा सकता है? जिस दिन नजराना, रिश्वत और सूद-दर-सूदका अन्त होगा, उसी दिन दालमण्डी उजड़ जायगी, वे चिड़ियाँ उड़ जायेंगी-पहले नहीं। मुलय प्रस्ताव इस तरमीम के बिना नश्तरका वह घाव है जिसपर मरहम नहीं। मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता।

प्रभाकर राव ने कहा, मेरी समझमें नहीं आता कि इस तरमीमका रिज्योल्यूशन से क्या संबध है? इसको आप अलग दूसरे प्रस्ताव के रूप में [ २३२ ] पेश कर सकते है। सुधार के लिए आप जो कुछ कर सके वह सर्वथा प्रशस-नीय है, लेकिन यह काम बस्ती से हटाकर भी उतना हो आसान है जितना शहर के भीतर, बल्कि वहाँ वह सुविधा अधिक हो जायगी।

अबुलवफा ने कहा, मुझे इस तरमीम से पूरा इत्तफाक है।

अब्दुल्लतीफ बोले, बिला तरमीम के मे रिज्योल्यूशन को कभी कबूल नहीं कर सकता।

दीनानाथ तिवारी ने भी तरमीम पर जोर दिया।

पद्मसिंह बोले, इस प्रस्ताव से हमारा उद्देश्य वेश्याओं को कष्ट देना नहीं वरन् उन्हें सुमार्ग पर लाना है, इसलिये मुझे इस तरमीम के स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है।

सैयद तेगअली ने फरमया, तरमीम से असल तजबीज का मशा फौत हो जान का खौफ है। आप गोया एक मकान का सदर दरवाजा बन्द करके पीछे की तरफ़ दूसरा दरवाजा बना रहे हैं। यह गैरमुमकिन है कि वे औरतें जो अब तक ऐश और बेतकल्लुफीकी जिन्दगी बसर करती थी, मेहनत और मजदूरी की जिन्दगी बसर करने पर राजी हो जायें। वह इस तरमीम से नाजायज फायदा उठायेगी, कोई अपने वालाखाने पर सिगरकी एक मशीन रखकर अपना बचाव कर लेगी, कोई मोजे की एक मशीन रख लेगी, कोई पान की दुकान खोल लेगी, कोई‌ अपने बालाखाने पर सेव और अनार के खोनचे सजा देगी। नकली निकाह और फरजी शादियों का बाजार गर्म हो जायगा और इस परदे की आड़ में पहले से भी ज्यादा हरामकारी होने लगेगी। इस तरमीम को मजूरकरना इंसानी खसलतसे बेइल्मीका इजहार करना है।

हकीम शोहरतखां ने कहा, मुझ सैयद तेगअलीके खयालात बेजा मालूम होते हैं। पहले इन खवीस हस्तियों को शहरबदर कर देना चाहिये। इसके बाद अगर वह जायज तरीके पर जिन्दगी बसर करना चाहे तो काफी इतमीनान के बाद उन्हें इम्तहानन शहर में आकर आबाद होने की इजाजत देनी चाहिये। शहर का दरवाजा बन्द नहीं है, जो चाहे यहाँ आबाद [ २३३ ] हो सकता है। मुझे कामिल यकीन है कि तरमीम से इस तजबीज का मक-सद गायब हो जायगा।

शरीफहसन वकील बोले, इसमें कोई शक नहीं कि पंडित पद्मसिंह एक बहुत ही नेक और रहीम बुजुर्ग हैं, लेकिन इस तरमीम को कबूल करके उन्होंने असल मकसट पर निगाह रखने के बजाय हरदिलअजीज बनने को कोशिश की है। इसमें तो यही बेहतर था कि यह तजवीज पेश हो न की जाती। सैयद शफकतअली साहब ने अगर ज्यादा गौर से काम लिया होता तो वह कभी यह तरमीम पेश न करते।

शाकिर वेगने कहा, कम्प्रोमाइज मुलकी मुआमिलात में चाहे कितना ही काबिल तारीफ हो, लेकिन इखला को बुराइयों पर सिर्फ परदा पड़ जाता है।

सभापति सेठ बलभद्रदासने रिज्योल्यूशनके पहले भाग पर राय ली। ९ सम्मतियाँ अनुकूल थी, ८ प्रतिकूल। प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। फिर तरमीम पर राय ली गयी, ८ आदमी उसके अनुकूल थे, ८ प्रतिकूल, तरमीम भी पास हो गयी। सभापति ने उसके अनुकूल राय दी। डाक्टर शयामाचरण ने किसी तरफ राय नहीं दी।

प्रोफेसर रमेशदत्त और स्तमभाई और प्रभाकरराव ने तरमीम के स्वीकृत हो जाने में अपनी हार समझी और पद्मसिंह को ओर इस भाव से देखा, मानों उन्होंने विश्वासघात किया है। कुँवर साहब के विषय में उन्होंने स्थिर किया कि यह केवल बातूनी, शक्की और सिद्धातहीन मनुष्य है।

अबुलवफा और उनके मित्र गण ऐसे प्रसन्न थे मानों उन्हीं की जीत हुई है। उनका यों पुलकित होना प्रभाकरराव और उनके मित्रों के हृदय में कांटे की तरह गढ़ता था।

प्रस्ताव के दूसरे भागपर सम्मति ली गई। प्रभाकरराव और उनके मित्रों ने इस बार उसका विरोध किया। वह पद्मसिंह को विश्वासघातक का दण्ड देना चाहते थे। यह प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया। अबुलवंफा आर उनके मित्र बगले बजाने लगे। [ २३४ ]अब प्रस्ताव के तीसरे भाग की बारी आई। कुँवर अनिरुद्धसिंह ने उसका समर्थन किया। हकीम शोहरतखा, सैयद शफकत अली, शरीफहसन और शाकिर बेंगने भी उसका अनुमोदन किया। लेकिन प्रभाकर-राव और उनके मित्रों ने उसका भी विरोध किया। तरमीम के पास हो जाने के बाद उन्हें इस संबंध में अन्य सभी उद्योग निष्फल मालूम होते थे। वह उन लोगों में थे जो या तो सब लेगे या कुछ न लेगे। प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया।

कुछ रात गये सभा समाप्त हुई। जिन्हें हार की शंका थी वह हँसते हुए निकले, जिन्हें जीत का निश्चय था, उनके चेहरोपर उदासी छाई हुई थी।

चलते समय कुँवर साहब ने मिस्टर रुस्तम भाई से कहा, यह आप-लोगों ने क्या कर दिया?

रुस्तमभाई ने व्यंग भाव से उत्तर दिया, जो अपने किया वहीं हमने किया। आपने घड़े में छेद कर दिया, हमने उसे पटक दिया। परिणाम दोनों का एक ही है।

सब लोग चले गये। अन्धेरा गहरा हो गया। चौकीदार और माली भी फाटक बन्द करके चल दिये, लेकिन पद्मसिंह वहीं घास पर निरुत्साह और चिंता की मूर्ति बने हुए बैठे थे।

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पद्मसिंह की आत्मा किसी भॉंति इस तरमीम के स्वीकार करने में अपनी भूल स्वीकार न करती थी। उन्हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्र गण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेगे। उन्हें प्रस्ताव-के एक अंश के अस्वीकृत हो जाने का खेद न था, खेद यह था कि इसका दोष उनके सिर मढ़ा जाता था, हालांकि उन्हें यह संपूर्णत अपने सहकारियों को असहिष्णुता और अदूरदर्शिता प्रतीत होती थी। इस तरमीम को वह गौण ही समझते थे। इसके दुरुपयोगकी जो शंकाएँ [ २३५ ] की गयी थीं उन पर पद्मसिंह को विश्वास न था। वह अविश्वास इस प्रस्ताव की सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल देता था। उन्हें अब यह निश्चय होता जाता था कि वर्तमान सामाजिक दशा के होते हुए इस प्रस्ताव से जो आशाएँ की गई थीं उनके पूरे होने की कोई सभावना नहीं है। वह कभी-कभी पछताते थे कि मैंने व्यर्थ ही यह झगङा अपने सिरलिया। उन्हें आश्चर्य होता था कि मैं कैसे इस काँटे दार झाड़ी में उलझा और यदि इस भावी असफलताका भार इस तरमीम के सिर जा पङता तो वे एक बड़ी भारी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते, पर यह उन्हें दुईशा मात्र प्रतीत होती थी। अब सारी बदनामी उन्हीं पर आवेगी, विरोधी दल उनकी हँसी उड़ावेयगा, उनकी उद्दंडता पर टिप्पणियाँ करेगा और यह सारी निन्टा उन्हें अकेले सहनी पड़ेगी, कोई उनका मित्र नहीं, कोई उन्हें तसल्ली देने वाला नहीं। विटठलदास से आशा थी कि वह उनके साथ न्याय करेंगे, उनके रूठे हुए मित्रों को मना लावेगे, लेकिन विट्ठल-दास ने उल्टे उन्हीं को अपराधी ठहराया। वह बोले, आपने इस तरमीम को स्वीकार करके सारा गुड गोबर कर दिया, बरसो की मेहनतपर पानी फेर दिया। केवल कुँवर अनिरूद्ध सिंह वह मनुष्य थे जो पद्म सिंह के व्यथित हृदय को ढाढस देते थे और उनसे सहानुभूति रखते थे।

पूरे महीने भर पद्मसिंह कचहरी न जा सके। बस, अकेले बैठे हुए इसी घटना की आलोचना किया करते है उनके विचारो में एक विचित्र निपक्षता आ गई थी। मित्रों के वैमनस्य से उन्हें जो दु:ख होता था, उस पर ध्यान देकर वह यह सोचते कि जब ऐसे सुशिक्षित, विचारशील पुरूष एक जरासी बातपर अपने निश्चित सिद्धांतो के प्रतिकूल व्यवहार करते है तो इस देश का कल्याण होने कि कोई आशा नहीं। माना कि मैंने तरमीम को स्वीकार करने में भूल की, लेकिन मेरी भूलने उन्हें क्यों अपनें मार्ग से विचलित कर दिया?

पद्मसिंह को इस मानसिक कष्ट की अवस्थामें पहली बार अनुभव हुआ कि एक अबला स्त्री, चित्त को सावधान करने की कितनी शक्ति रखती [ २३६ ] है। अगर संसार में कोई प्राणी था जो सपूर्णतः उनकी अवस्था को समझता था तो वह सुभद्रा थी। वह उस तरमीम को उससे कही अधिक आवश्यक समझती थी, जितना वे स्वयं समझते थे। वह उनके सहकारियों की उनसे कही अधिक तीव्र समालोचना करती। उसकी बातों से पद्मसिंह को बड़ी शांति होती थी। यद्यपि वह समझते थे कि सुभद्रा में ऐसे गहन विषय के समझने और तौलने की सामर्थ्य नहीं और यह जो कुछ कहती है वह केवल मेरी ही बातों की प्रतिध्वनि है तथापि इस ज्ञान से उनके आनन्द में कोई विघ्न न पड़ता था।

लेकिन महीना पूरा भी न हो पाया था कि प्रभाकरराव ने अपने पत्र में इस प्रस्ताव के संबंध में एक लेखमाला निकालनी आरंभ कर दी। उसमें पद्मसिंह पर ऐसी ऐसी मार्मिक चोट करने लगे कि उन्हें पढ़कर वह तिलमिला जाते थे। एक लेख में उन्होने पद्मसिंहके पूर्व चरित्र और इस तरमीम से घनिष्ट संबंध दिखाया। एक दूसरे लेख मे उनके आचरण पर आक्षेप करते हुए लिखा, वह वर्तमानकाल के देश-सेवक है जो देशको भूल जायें, पर अपने को कभी नही भूलते, जो देशसेवा की आड़ मे अपना स्वार्थ साधन करते है। जाति के नवयुवक कुएँ मे गिरते हो तो गिरे, काशी के हाजी की कृपा बनी रहनी चाहिये। पद्मसिंह को इस अनुदारता और मिथ्या द्वेष पर जितना क्रोध आता था उतनाही आश्चर्य होता था। असज्जनता इस सीमा तक जा सकती है यह अनुभव उन्हें आज ही हुआ। यह सभ्यता और शालीनता के ठेकेदार बनते है, लेकिन उनकी आत्मा ऐसी मलिन है। और किसी मे इतना साहस नहीं कि इसका प्रतिवाद करे?

सन्ध्या का समय था। वह लेख चारपाईपर पड़ा हुआ था। पद्मसिंह सामने मेजपर बैठे हुए इस लेख का उत्तर लिखने की चेष्टा कर रहे थे, पर कुछ लिखते न बनता था कि सुभद्रा ने आकर कहा, गरमी में यहाँ क्यों बैठे हो? चलो बाहर बैठो।

पद्म--प्रभाकरराव ने मुझे आज खूब गालियाँ दी है, उन्हीं का जवाब लिख रहा हूँ। [ २३७ ]सुभद्रा -वह तुम्हारे पीछे इस तरह क्यों पड़ा हुआ है?

यह कहकर सुभद्रा वह लेख पढ़ने लगी और पाँच मिनट में उसने उसे आद्योपान्त पढ़ डाला।

पद्म--कैसा लेख है?

सुभद्रा—यह लेख थोड़े ही है, यह तो खुली हुई गालियाँ हैं। मैं समझती थी कि गालियों की लड़ाई स्त्रियों में ही होती है, लेकिन देखती हूँ तो पुरुष हम लोगो में भी बढ़े हुए है। ये विद्वान् भी होगे?

पद्म-हाँ, विद्वान् क्यों नहीं है, दुनिया भर की किताबे चाटे बैठे है।

सुभद्रा-और उस पर यह हाल।

पद्म—मैं इसका उत्तर लिख रहा हूँ, ऐसी खबर लूँगा कि वह भी याद करें कि किसीसे पाला पड़ा था।

सुभद्रा-—मगर गालियों का क्या उत्तर होगा?

पद्म -गालियाँ।

सुभद्रा—नहीं, गालियों का उत्तर मौन है। गालियों का उत्तर गाली तो मूर्ख भी देते हैं, फिर उनमें और तुममें अन्तर ही क्या है?

पद्मसिंह ने सुभद्रा को श्रद्धापूर्ण नेत्रों से देखा। उसकी बात उनके मन से बैठ गई। कभी-कभी हमें उन लोगों से भी शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमान वश अज्ञानी समझते है।

पद्म-- तो मौन धारण कर लूँ?

सुभद्रा--मेरी तो यही सलाह है। उसे जो जी में आये बकने दो। कभी-न-कभी वह अवश्य लज्जित होगा। बस वही इन गालियों का दंड होगा।

पद्म-—यह लज्जित कभी न होगा, ये लोग लज्जित होना जानते ही नहीं। अभी मैं उनके पास जाऊँ तो मेरा बड़ा आदर करेगा, हंस-हंसकर बोलेगा, लेकिन सन्ध्या होते ही फिर उन पर गालियों का नशा चढ़ जाएगा।

सुभद्रा -तो उसका उद्यम गया दूसरों पर आक्षेप करना ही है।