सेवासदन/४८

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सेवासदन  (1919) 
द्वारा प्रेमचंद

[ २२५ ]सुमन—कम से कम दुखो का तो अन्त हो जायगा।

गजाधर—हाँ, तुम्हारे दुखो का अन्त हो सकता है, पर उनके दुखों का अन्त न होगा जो तुम्हारे दुखों में दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे माता पिता शरीर के बन्धन से मुक्त हो गये है, लेकिन उनकी आत्माएँ अपनी बिदेहावस्था में तुम्हारे पास विचर रही है। वह अभी तुम्हारे मुख से सुखी और दुःख से दुखी होगे। सोच लो कि प्राणघात करके उनको दुख पहुँचाओगी या अपना पुनरुद्धार करके उन्हें सुख और शान्ति दोगी। पश्चात्ताप अंतिम चेतावनी है। जो हमें आत्म-सुधार के निमित्त ईश्वर की ओर से मिलती है। यदि इसका अभिप्राय न समझकर हम शोकावस्था में अपने प्राणों का अन्त कर दे तो मानो हमने आत्मोद्घार की इस अंतिम प्रेरणा को भी निष्फल कर दिया। यह भो सोचो कि तुम्हारे न रहने से उस अवला शान्ता की क्या गति होगी, जिसने अभी संसार के ऊँँच नीच का कुछ अनुभव नहीं किया है, तुम्हारे सिवा उसका संसार में कौन है? उमानाथ का हाल तुम जानती ही हो, वह उसका निर्वाह नहीं कर सकते।उनमें दया है, पर लोभ उससे अधिक है। कभी न कभी वह उससे अवश्य ही अपना गला छुड़ा लेगे। उस समय वह किसकी होकर रहेगी।

सुमन को गजाधर के इस कथन में सच्ची समवेदना की झलक दिखाई दी। उसने उनकी ओर नीचतासूचक दृष्टी से देखकर कहा, शान्ता से मिलने की अपेक्षा मुझे प्राण देना सहज प्रतीत होता है। कई दिन हुए उसने पद्मसिंह के पास एक पत्र भेजा था। उमानाथ उसका कहीं और विवाह करना चाहते है। वह इसे स्वीकार नहीं करती।

गजाधर-देव हैं!

सुमन-शर्मा जी बेचारे और क्या करते है? उन्होंने निश्चय किया है कि उसे बुलाकर आश्रम में रमे। अगर उनके भाई मान जायेगे तब तो अच्छा ही है, नहीं तो उन दुखिया को न जाने कितने दिनों तन आश्रम में रहना पड़ेगा। वह कल यहाँँ आ जायगी। उसके सम्मुख जाने का [ २२६ ] भय, उससे आँँख मिलने की लज्जा मुझे मार डालती है। जब वह तिरस्का की आँँखो से मुझे देखेगी, उस समय में क्या करूँगी? और जो कहीं उसने घुणा वश मुझसे गले मिलने मे संकोच किया, तब तो मैं उसी क्षण विष खा लूँँगी। इस दुर्गति से तो प्राण दे देना अच्छा है।

गजाधार ने सुमन को श्रद्धाभाव से देखा, उन्हें अनुभव हुआ कि ऐसी अवस्था में भी वही करता जो सुमन करना चाहती है। बोले, सुमन तुम्हारे यह विचार यथार्थ है, पर तुम्हारे हृदय पर चाहे जो कुछ बीते, शान्ता के हित के लिये ततुम्हें सब कुछ सहना पड़ेगा। तुमसे उसका जितना कल्याण हो सकता है उतना अन्य किसी से नहीं हो सकता।अबतक तुम अपने लिये जीती थीं, अब दूसरो के लिये जीओ।

यह कह गजाधर जिधर से आये थे उधर ही चले गय। सुमन गंगाजी के तटपर देरतक खड़ी उनकी बातों पर विचार करती रही, फिर स्नान करके आश्रम की ओर चली, जैसे कोई मनुष्य समर से परास्त होकर घर की ओर जाता है।

४२

शान्ता ने पत्र तो भेजा, पर उसको उत्तर आने की कोई आशा न थी। तीन दिन बीत गये, उसका नैराश्य दिनों दिन बढ़ता जाता था। अगर कुछ अनुकूल उत्तर न आया तो उमानाथ अवश्य ही उसका विवाह कर देगे, यह सोचकर शान्ता का हृदय थरथराने लगता था। वह दिन में कई बार देवी के चबूतरेपर जाती और नाना प्रकार की मनौतियाँ करती। कभी शिवजी के मन्दिर में जाती और उनसे अपनी मनोकामना कहती। सदन एक क्षण के लिये भी उसके ध्यान से न उतरता। वह उसकी मूर्ति को हृदय ने त्रोके सामने बैठाकर उससे कर जोड़कर कहती, प्राणनाथ, मुझे क्यों नहीं अपनाते? लोक निन्दा के भय से। हाय, मेरी जान इतनी सस्ती है कि इन दामों विके। तुम मुझे त्याग रहे हो, आग में झोक रहे हो, केवल इस अपराध के लिये कि मैं सुमन की [ २२७ ] बहन हूँ। यही न्याय है। कहीं तुम मुझे मिल जाते, मैं तुम्हें पकड़ पाती, फिर देखती कि मुझसे कैसे भागते हो? तुम पत्थर नहीं हो कि मेरे आँसुओं से न पसीजते। तुम अपनी आँखों से एक बार मेरी दशा देख लेते तो फिर तुमसे न रहा जाता। हाँ, तुमसे कदापि न रहा जाता। तुम्हारा विशाल हृदय करुणा शून्य नहीं हो सकता। क्या करूँ तुम्हें अपने चित्तकी दशा कैसे दिखाऊँ।

चौथे दिन प्रात काल पद्मसिंह का पत्र मिला। शान्ता भयभीत हो गई। उसको प्रेमाभिलापाएँ शिथिल पड़ गई। अपनी भावी दशा की शंकाओं ने चित्त को अशान्त कर दिया।

लेकिन उमानाथ फूले न समाये। बाजे का प्रबन्ध किया। सवारियाँ एकत्रित की, गाँव भर में निमन्त्रण भेजे, मेहमानों के लिये चौपाल में फर्श आदि बिछवा दिये। गाँवे के लोग चकित थे, यह कैसा गौना है? विवाह तो हुआ ही नहीं गौना कैसा? वह समझते थे कि उमानाथ ने कोई न कोई चाल खेली है। एक ही धूर्त है। निर्दिष्ट समय पर उमानाथ स्टेशन गये और बाजे बजवाते हुए मेहमानों को अपने घर लाये। चौपाल में उन्हें ठहराया। केवल तीन आदमी थे। पद्मसिंह विट्ठलदास और एक नौकर।

दूसरे दिन सन्ध्या समय विदाई का मुहूर्त था, तीसरा पहर हो गया किन्तु उमानाथ घर में गाँव की कोई स्त्री नहीं दिखाई देती। वह बार-बार अन्दर आते है, तेवर बदलते हैं, दीवारो को धमकाकर कहते है, में एफ-एक की देख लूँगा। जान्हवी से बिगड़कर कहते है कि मैं सबकी खबर लूँगा। लेकिन वह धमकियाँ जो कभी नबरदारों को कंपायामान कर दिया करती थी, आज किसी पर असर नहीं करती। बिरादरी अनुचित दबाव नहीं मानती है घमण्डियों का सिर नीचा करने के लिये वह ऐसे ही अवसरों की ताक में रहती है।

सन्ध्या हुई। कहा रोने पालकी द्वारपर लगा दी। जान्हवी और शान्ता गले मिलकर खूब रोई। [ २२८ ] शान्ता का हृदय प्रेम से परिपूर्ण था, इस पर उसे जो जो कष्ट उठाने पड़े थे वह इस समय भूल गये थे। इन लोगों से फिर भेट न होगी इस घर के अब फिर दर्शन न होंगे, इनसे सदैव के लिये नाता टूटता है, यह सोचकर उसका हृदय विदीर्ण हुआ जाता था। जान्हवी का हृदय भी दया से भरा हुआ था। इस माता-पिता विहीन बालिका को हमने बहुत कष्ट दिये यह सोचकर वह अपने आँसुओंको न रोक सकती थी। दोनों के हृदय में सच्चे, निर्मल, कोमल भावो की तरंगे उठ रही थी।

उमानाथ घर में आये तो शान्ता उनके पैरो से लिपट गई और विनय करती हुई कहने लगी, तुम्हीं मेरे पिता हो, अपनी बेटी को भूल न जाना, मेरी बहनों को गहने-कपड़े देना, होली और तीज में उन्हें बुलाना, पर मैं तुम्हारे दो अक्षरो के पत्र को ही अपना धन्यभाग्य समझूँगी। उमानाथ ने उसको संबोधन करते हुए कहा, बेटी, जैसी मेरी और दो बेटियाँ हैं। वैसी हो तुम भी हो, परमात्मा तुम्हें सदा सुखी रखे। यह कह कर रोने लगे।

सन्ध्या का समय था, मुन्नी गाय घर में आई तो शान्ता उसके गले लिपटकर रोने लगी। उसने तीन-चार वर्ष उस गाय की सेवा की थी। अब वह किसे भूसी लेकर दौड़गी? किसके गले में काले डोरे में कौड़ियाँ गूथकर पहनावेगी? मुन्नी सिर झुकाये उसके हाथो को चाटती थी। उसका वियोग दुख उसकी आँखों से झलक रहा था।

जान्हवी ने शान्ता को लाकर पालकी में बैठा दिया, कहारोने पालकी उठाई। शान्ता को ऐसा मालूम हुआ कि मानों वह अथाह सागर मे वहीं जा रही है।

गाँव की स्त्रियाँ अपने द्वारों पर खड़ी पालकी को देखती थी और रोती थीं।

उमानाथ स्टेशन तक पहुँचाने आये। चलते समय अपनी पगड़ी उताकर उन्होंने पद्मसिंह पौरो पर रख दी। पद्मसिंह ने उनको गले से लगा लिया। [ २२९ ] जब गाड़ी चली तो पद्मसिंह ने विट्लदास से कहा, अब इस अभिनयका सबसे कठिन भाग आ गया।

बिट्ठल——मैं नहीं समझा।

पद्म——क्या शान्ता से कुछ कहे सुने बिना ही उसे आश्रम में पहुँचा दीजियेगा। उसे पहले उसके लिये तैयार करना चाहिये।

विट्ठल——हाँ, यह आपने ठीक सोचा, तो जाकर कह दूँ?

पद्म——जरा सोच तो लीजिये, क्या कहियेगा? अभी तो वह यह समझ रही है कि ससुराल में जा रही हूँ। वियोग के दु:ख मे यह आशा उसे सँभाले हुए है। लेकिन जब उसे हमारा कौशल ज्ञात हो जायगा तो उसे कितना दुःख होगा? मुझे पछतावा हो रहा है कि मैंने पहले ही वे बाते क्यों न कह दी?

विट्ठल——तो अब कहने में क्या बिगड़ा जाता है? मिर्जापुर में गाड़ी देर तक ठहरेगी, मैं जाकर उसे समझा दूँगा।

पद्म——मुझसे बड़ी भूल हुई।

विट्ठल——तो उस भूलपर पछताने से अगर काम चल जाय तो जी भरकर पछता लीजिये।

पद्म——आपके पास पेन्सिल हो तो लाइये, एक पत्र लिखकर सब समाचार प्रकट कर दूँ।

विट्ठल——नहीं तार दे दीजिये, यह और भी उत्तम होगा। आप विचित्र जीव है, सीधी-सी बात में भी इतना आगा पीछा करने लगते है।

पद्म—— समस्या ही ऐसी आ पड़ी है, मैं क्या करुँ? एक बात मेरे ध्यान में आती है, मुगलसराय में देर तक रुकना पड़ेगा, बस वही उसके पास जाकर सब वृत्तांत कह दूँगा।

विट्ठल——यह आप बहुत दूर की कौड़ी लाये, इसलिये बुद्धिमानों ने कहा है कि कोई काम बिना भली भाँति सोचे नहीं करना चाहिये। आपकी बुद्धि ठिका ने पर पहुँचती है, लेकिन बहुत चक्कर खाकर। यही बात आपको पहले न सूझी। [ २३० ] शान्ता डचौढे दरजे के जनाने कमरे में बैठी हुई थी। वहाँ दो ईसाई लेडियाँ ओर बैठी थी। वे शान्ता को देखकर अग्रेजी में बाते करने लगी।

"मालूम होता है यह कोई नवविवाहिता स्त्री है।”

"हाँ, किसी ऊँचे कुलकी है। ससुराल जा रही है।”

"ऐसी रो रही है मानों कोई ढकेले लिये जाता हो।”

“पतिकी अभीतक सूरत न देखी होगी, प्रेम कैसे हो सकता है। भय से उसका हृदय काँप रहा होगा।”

"यह इनके यहाँ अत्यत निकृष्ट रिवाज है। बेचारी कन्या एक अनजान घर में भेज दी जाती है, जहाँ कोई उसका अपना नहीं होता।”

"यह सब पाशविक कालकी प्रथा है, जब स्त्रियों को बलात् उठा ले जाते थे।"

"क्यो बाईजी, (शान्ता से) ससुराल जा रही हो?”

शान्ता ने धीरे से सिर हिलाया।

"तुम इतनी रूपवती हो, तुम्हारा पति भी तुम्हारे जोड़ का है?"

शान्ता ने गंभीरता से उत्तर दिया, पति की सुन्दरता नहीं देखी जाती।

"यदि वह काला-कलूटा हो तो?”

शान्ता ने गर्व से उत्तर दिया, हमारे लिये वह देवतुल्य है, चाहे कैसा ही हो।

अच्छा, मान लो तुम्हारे ही सामने दो मनुष्य लाये जायें, एक रूपवान हो, दूसरा कुरूप, तो तुम किसे पसन्द करोगी?

शान्ता ने दृढता से उत्तर दिया, जिसे हमारे माता-पिता पसन्द करें।

शान्ता समझ रही थी कि यह दोनों हमारी विवाह-प्रथा पर आक्षेप कर रही है। थोडी देर के बाद उसने उनसे पूछा, मैंने सुना है आप लोग अपना पति खुद चुन लेती है?

"हाँ, हम इस विषय में स्वतन्त्र है।"

"आप अपने को माँ-बाप से बुद्धिमान समझती है?" [ २३१ ] वेश्याओं का नाच कराने के लिये एक भारी टैक्स लगाया जाय, और ऐसे जलसे किसी हालत में खुले स्थानों में न हो।

प्रोफेसर रमेशदत्त ने उसका समर्थन किया।

मैयद शफकतअली (प० डिप्टो० कले) ने कहा——इस तज-वोज में मुझे पूरा इत्तफाक है, लेकिन बगैर मुनासिब तरमीम के मैं इस तसलीम नहीं कर सकता। मेरी राय है कि रिज्योलूशन के पहले हिस्से में यह अल्फाज बढ़ा दिये जायें——वइस्तसनाय उनके जो नौ माह के अन्दर या तो अपनी निकाह कर ले, या कोई हुनर सीख ले, जिससे बह जायज तरीके पर जिन्दगी बसर कर सके।

कुँवर अनिरुद्ध सिंह बोले, मुझे इस तरमीम से पूरी सहानुभूति है। हमें वेश्याओं का पतित समझने का कोई अधिकार नहीं है, यह हमारी परम घप्टता है। हम रात-दिन जो रिश्वते लेते हैं, सूद खाते है, दीनों का ‘रक्त चूसते है, असहायों का गला काटते हैं, कदापि इस योग्य नहीं है कि समाज के किसी अगको नीच या तुच्छ समझे। सबसे नीच हम है, सबसे पापी, दुराचारी, अन्यायी हम है जो अपने काे शिक्षित, सभ्य, उदार, सच्चा समझते है। हमारे शिक्षित भाइयों ही की बदौलत दालमण्डी आवाद है, चाैक में चहल-पहल है, चकलों में रौनक है। यह मीना-बाजार हम लोगों ही ने सजाया है, ये चिड़ियाँ हम लोगों ने ही फँसाई है, ये कठपुतलियाँ हमने बनाई है। जिस समाज से अत्याचारी जमीदार, रिश्वती राज्य-कर्मचारी, अन्यायी महाजन, स्वार्थी बन्धु अदर और सम्मान के पात्र हो, वहाँ दालमण्डी क्यों न आबाद हो? हराम का धन हरामकारी के सिवा और कहाँ जा सकता है? जिस दिन नजराना, रिश्वत और सूद-दर-सूदका अन्त होगा, उसी दिन दालमण्डी उजड़ जायगी, वे चिड़ियाँ उड़ जायेंगी-पहले नहीं। मुलय प्रस्ताव इस तरमीम के बिना नश्तरका वह घाव है जिसपर मरहम नहीं। मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता।

प्रभाकर राव ने कहा, मेरी समझमें नहीं आता कि इस तरमीमका रिज्योल्यूशन से क्या संबध है? इसको आप अलग दूसरे प्रस्ताव के रूप में [ २३२ ] पेश कर सकते है। सुधार के लिए आप जो कुछ कर सके वह सर्वथा प्रशस-नीय है, लेकिन यह काम बस्ती से हटाकर भी उतना हो आसान है जितना शहर के भीतर, बल्कि वहाँ वह सुविधा अधिक हो जायगी।

अबुलवफा ने कहा, मुझे इस तरमीम से पूरा इत्तफाक है।

अब्दुल्लतीफ बोले, बिला तरमीम के मे रिज्योल्यूशन को कभी कबूल नहीं कर सकता।

दीनानाथ तिवारी ने भी तरमीम पर जोर दिया।

पद्मसिंह बोले, इस प्रस्ताव से हमारा उद्देश्य वेश्याओं को कष्ट देना नहीं वरन् उन्हें सुमार्ग पर लाना है, इसलिये मुझे इस तरमीम के स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है।

सैयद तेगअली ने फरमया, तरमीम से असल तजबीज का मशा फौत हो जान का खौफ है। आप गोया एक मकान का सदर दरवाजा बन्द करके पीछे की तरफ़ दूसरा दरवाजा बना रहे हैं। यह गैरमुमकिन है कि वे औरतें जो अब तक ऐश और बेतकल्लुफीकी जिन्दगी बसर करती थी, मेहनत और मजदूरी की जिन्दगी बसर करने पर राजी हो जायें। वह इस तरमीम से नाजायज फायदा उठायेगी, कोई अपने वालाखाने पर सिगरकी एक मशीन रखकर अपना बचाव कर लेगी, कोई मोजे की एक मशीन रख लेगी, कोई पान की दुकान खोल लेगी, कोई‌ अपने बालाखाने पर सेव और अनार के खोनचे सजा देगी। नकली निकाह और फरजी शादियों का बाजार गर्म हो जायगा और इस परदे की आड़ में पहले से भी ज्यादा हरामकारी होने लगेगी। इस तरमीम को मजूरकरना इंसानी खसलतसे बेइल्मीका इजहार करना है।

हकीम शोहरतखां ने कहा, मुझ सैयद तेगअलीके खयालात बेजा मालूम होते हैं। पहले इन खवीस हस्तियों को शहरबदर कर देना चाहिये। इसके बाद अगर वह जायज तरीके पर जिन्दगी बसर करना चाहे तो काफी इतमीनान के बाद उन्हें इम्तहानन शहर में आकर आबाद होने की इजाजत देनी चाहिये। शहर का दरवाजा बन्द नहीं है, जो चाहे यहाँ आबाद [ २३३ ] हो सकता है। मुझे कामिल यकीन है कि तरमीम से इस तजबीज का मक-सद गायब हो जायगा।

शरीफहसन वकील बोले, इसमें कोई शक नहीं कि पंडित पद्मसिंह एक बहुत ही नेक और रहीम बुजुर्ग हैं, लेकिन इस तरमीम को कबूल करके उन्होंने असल मकसट पर निगाह रखने के बजाय हरदिलअजीज बनने को कोशिश की है। इसमें तो यही बेहतर था कि यह तजवीज पेश हो न की जाती। सैयद शफकतअली साहब ने अगर ज्यादा गौर से काम लिया होता तो वह कभी यह तरमीम पेश न करते।

शाकिर वेगने कहा, कम्प्रोमाइज मुलकी मुआमिलात में चाहे कितना ही काबिल तारीफ हो, लेकिन इखला को बुराइयों पर सिर्फ परदा पड़ जाता है।

सभापति सेठ बलभद्रदासने रिज्योल्यूशनके पहले भाग पर राय ली। ९ सम्मतियाँ अनुकूल थी, ८ प्रतिकूल। प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। फिर तरमीम पर राय ली गयी, ८ आदमी उसके अनुकूल थे, ८ प्रतिकूल, तरमीम भी पास हो गयी। सभापति ने उसके अनुकूल राय दी। डाक्टर शयामाचरण ने किसी तरफ राय नहीं दी।

प्रोफेसर रमेशदत्त और स्तमभाई और प्रभाकरराव ने तरमीम के स्वीकृत हो जाने में अपनी हार समझी और पद्मसिंह को ओर इस भाव से देखा, मानों उन्होंने विश्वासघात किया है। कुँवर साहब के विषय में उन्होंने स्थिर किया कि यह केवल बातूनी, शक्की और सिद्धातहीन मनुष्य है।

अबुलवफा और उनके मित्र गण ऐसे प्रसन्न थे मानों उन्हीं की जीत हुई है। उनका यों पुलकित होना प्रभाकरराव और उनके मित्रों के हृदय में कांटे की तरह गढ़ता था।

प्रस्ताव के दूसरे भागपर सम्मति ली गई। प्रभाकरराव और उनके मित्रों ने इस बार उसका विरोध किया। वह पद्मसिंह को विश्वासघातक का दण्ड देना चाहते थे। यह प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया। अबुलवंफा आर उनके मित्र बगले बजाने लगे। [ २३४ ]अब प्रस्ताव के तीसरे भाग की बारी आई। कुँवर अनिरुद्धसिंह ने उसका समर्थन किया। हकीम शोहरतखा, सैयद शफकत अली, शरीफहसन और शाकिर बेंगने भी उसका अनुमोदन किया। लेकिन प्रभाकर-राव और उनके मित्रों ने उसका भी विरोध किया। तरमीम के पास हो जाने के बाद उन्हें इस संबंध में अन्य सभी उद्योग निष्फल मालूम होते थे। वह उन लोगों में थे जो या तो सब लेगे या कुछ न लेगे। प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया।

कुछ रात गये सभा समाप्त हुई। जिन्हें हार की शंका थी वह हँसते हुए निकले, जिन्हें जीत का निश्चय था, उनके चेहरोपर उदासी छाई हुई थी।

चलते समय कुँवर साहब ने मिस्टर रुस्तम भाई से कहा, यह आप-लोगों ने क्या कर दिया?

रुस्तमभाई ने व्यंग भाव से उत्तर दिया, जो अपने किया वहीं हमने किया। आपने घड़े में छेद कर दिया, हमने उसे पटक दिया। परिणाम दोनों का एक ही है।

सब लोग चले गये। अन्धेरा गहरा हो गया। चौकीदार और माली भी फाटक बन्द करके चल दिये, लेकिन पद्मसिंह वहीं घास पर निरुत्साह और चिंता की मूर्ति बने हुए बैठे थे।

४४

पद्मसिंह की आत्मा किसी भॉंति इस तरमीम के स्वीकार करने में अपनी भूल स्वीकार न करती थी। उन्हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्र गण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेगे। उन्हें प्रस्ताव-के एक अंश के अस्वीकृत हो जाने का खेद न था, खेद यह था कि इसका दोष उनके सिर मढ़ा जाता था, हालांकि उन्हें यह संपूर्णत अपने सहकारियों को असहिष्णुता और अदूरदर्शिता प्रतीत होती थी। इस तरमीम को वह गौण ही समझते थे। इसके दुरुपयोगकी जो शंकाएँ [ २३५ ] की गयी थीं उन पर पद्मसिंह को विश्वास न था। वह अविश्वास इस प्रस्ताव की सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल देता था। उन्हें अब यह निश्चय होता जाता था कि वर्तमान सामाजिक दशा के होते हुए इस प्रस्ताव से जो आशाएँ की गई थीं उनके पूरे होने की कोई सभावना नहीं है। वह कभी-कभी पछताते थे कि मैंने व्यर्थ ही यह झगङा अपने सिरलिया। उन्हें आश्चर्य होता था कि मैं कैसे इस काँटे दार झाड़ी में उलझा और यदि इस भावी असफलताका भार इस तरमीम के सिर जा पङता तो वे एक बड़ी भारी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते, पर यह उन्हें दुईशा मात्र प्रतीत होती थी। अब सारी बदनामी उन्हीं पर आवेगी, विरोधी दल उनकी हँसी उड़ावेयगा, उनकी उद्दंडता पर टिप्पणियाँ करेगा और यह सारी निन्टा उन्हें अकेले सहनी पड़ेगी, कोई उनका मित्र नहीं, कोई उन्हें तसल्ली देने वाला नहीं। विटठलदास से आशा थी कि वह उनके साथ न्याय करेंगे, उनके रूठे हुए मित्रों को मना लावेगे, लेकिन विट्ठल-दास ने उल्टे उन्हीं को अपराधी ठहराया। वह बोले, आपने इस तरमीम को स्वीकार करके सारा गुड गोबर कर दिया, बरसो की मेहनतपर पानी फेर दिया। केवल कुँवर अनिरूद्ध सिंह वह मनुष्य थे जो पद्म सिंह के व्यथित हृदय को ढाढस देते थे और उनसे सहानुभूति रखते थे।

पूरे महीने भर पद्मसिंह कचहरी न जा सके। बस, अकेले बैठे हुए इसी घटना की आलोचना किया करते है उनके विचारो में एक विचित्र निपक्षता आ गई थी। मित्रों के वैमनस्य से उन्हें जो दु:ख होता था, उस पर ध्यान देकर वह यह सोचते कि जब ऐसे सुशिक्षित, विचारशील पुरूष एक जरासी बातपर अपने निश्चित सिद्धांतो के प्रतिकूल व्यवहार करते है तो इस देश का कल्याण होने कि कोई आशा नहीं। माना कि मैंने तरमीम को स्वीकार करने में भूल की, लेकिन मेरी भूलने उन्हें क्यों अपनें मार्ग से विचलित कर दिया?

पद्मसिंह को इस मानसिक कष्ट की अवस्थामें पहली बार अनुभव हुआ कि एक अबला स्त्री, चित्त को सावधान करने की कितनी शक्ति रखती [ २३६ ] है। अगर संसार में कोई प्राणी था जो सपूर्णतः उनकी अवस्था को समझता था तो वह सुभद्रा थी। वह उस तरमीम को उससे कही अधिक आवश्यक समझती थी, जितना वे स्वयं समझते थे। वह उनके सहकारियों की उनसे कही अधिक तीव्र समालोचना करती। उसकी बातों से पद्मसिंह को बड़ी शांति होती थी। यद्यपि वह समझते थे कि सुभद्रा में ऐसे गहन विषय के समझने और तौलने की सामर्थ्य नहीं और यह जो कुछ कहती है वह केवल मेरी ही बातों की प्रतिध्वनि है तथापि इस ज्ञान से उनके आनन्द में कोई विघ्न न पड़ता था।

लेकिन महीना पूरा भी न हो पाया था कि प्रभाकरराव ने अपने पत्र में इस प्रस्ताव के संबंध में एक लेखमाला निकालनी आरंभ कर दी। उसमें पद्मसिंह पर ऐसी ऐसी मार्मिक चोट करने लगे कि उन्हें पढ़कर वह तिलमिला जाते थे। एक लेख में उन्होने पद्मसिंहके पूर्व चरित्र और इस तरमीम से घनिष्ट संबंध दिखाया। एक दूसरे लेख मे उनके आचरण पर आक्षेप करते हुए लिखा, वह वर्तमानकाल के देश-सेवक है जो देशको भूल जायें, पर अपने को कभी नही भूलते, जो देशसेवा की आड़ मे अपना स्वार्थ साधन करते है। जाति के नवयुवक कुएँ मे गिरते हो तो गिरे, काशी के हाजी की कृपा बनी रहनी चाहिये। पद्मसिंह को इस अनुदारता और मिथ्या द्वेष पर जितना क्रोध आता था उतनाही आश्चर्य होता था। असज्जनता इस सीमा तक जा सकती है यह अनुभव उन्हें आज ही हुआ। यह सभ्यता और शालीनता के ठेकेदार बनते है, लेकिन उनकी आत्मा ऐसी मलिन है। और किसी मे इतना साहस नहीं कि इसका प्रतिवाद करे?

सन्ध्या का समय था। वह लेख चारपाईपर पड़ा हुआ था। पद्मसिंह सामने मेजपर बैठे हुए इस लेख का उत्तर लिखने की चेष्टा कर रहे थे, पर कुछ लिखते न बनता था कि सुभद्रा ने आकर कहा, गरमी में यहाँ क्यों बैठे हो? चलो बाहर बैठो।

पद्म--प्रभाकरराव ने मुझे आज खूब गालियाँ दी है, उन्हीं का जवाब लिख रहा हूँ। [ २३७ ]सुभद्रा -वह तुम्हारे पीछे इस तरह क्यों पड़ा हुआ है?

यह कहकर सुभद्रा वह लेख पढ़ने लगी और पाँच मिनट में उसने उसे आद्योपान्त पढ़ डाला।

पद्म--कैसा लेख है?

सुभद्रा—यह लेख थोड़े ही है, यह तो खुली हुई गालियाँ हैं। मैं समझती थी कि गालियों की लड़ाई स्त्रियों में ही होती है, लेकिन देखती हूँ तो पुरुष हम लोगो में भी बढ़े हुए है। ये विद्वान् भी होगे?

पद्म-हाँ, विद्वान् क्यों नहीं है, दुनिया भर की किताबे चाटे बैठे है।

सुभद्रा-और उस पर यह हाल।

पद्म—मैं इसका उत्तर लिख रहा हूँ, ऐसी खबर लूँगा कि वह भी याद करें कि किसीसे पाला पड़ा था।

सुभद्रा-—मगर गालियों का क्या उत्तर होगा?

पद्म -गालियाँ।

सुभद्रा—नहीं, गालियों का उत्तर मौन है। गालियों का उत्तर गाली तो मूर्ख भी देते हैं, फिर उनमें और तुममें अन्तर ही क्या है?

पद्मसिंह ने सुभद्रा को श्रद्धापूर्ण नेत्रों से देखा। उसकी बात उनके मन से बैठ गई। कभी-कभी हमें उन लोगों से भी शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमान वश अज्ञानी समझते है।

पद्म-- तो मौन धारण कर लूँ?

सुभद्रा--मेरी तो यही सलाह है। उसे जो जी में आये बकने दो। कभी-न-कभी वह अवश्य लज्जित होगा। बस वही इन गालियों का दंड होगा।

पद्म-—यह लज्जित कभी न होगा, ये लोग लज्जित होना जानते ही नहीं। अभी मैं उनके पास जाऊँ तो मेरा बड़ा आदर करेगा, हंस-हंसकर बोलेगा, लेकिन सन्ध्या होते ही फिर उन पर गालियों का नशा चढ़ जाएगा।

सुभद्रा -तो उसका उद्यम गया दूसरों पर आक्षेप करना ही है। [ २३८ ]पद्म—नहीं, उद्यम तो यह नहीं है लेकिन संपादक लोग अपने ग्राहक बढ़ाने के लिये इस प्रकार को कोई न कोई फुलझड़ी छोड़ते रहते हैं। ऐसे आक्षेपपूर्ण लेखों से पत्रों की बिक्री बढ़ जाती है, जनता को ऐसे झगड़ों में आनन्द प्राप्त होता है और संपादक लोग अपने महत्व को भूलकर जनता के इस विवाद-प्रेम से लाभ उठाने लगते हैं। गुरुपद को छोड़कर जनता के कलह-प्रेम का आवाहन करने लगते हैं। कोई-कोई संपादक तो यहाॅं तक कहते है कि अपने ग्राहकों को प्रसन्न रखना हमारा कर्तव्य है। हम उनका खाते है तो उन्हीं का गावेगें।

सुभद्रा--तब तो ये लोग केवल पैसे के गुलाम है। इनपर क्रोध करने की जगह दया करनी चाहिये।

पद्मसिंह मेज से उठ आये। उत्तर लिखने का विचार छोड़ दिया। वह सुभद्रा को ऐसी विचारशीला कभी न समझते थे, उन्हें अनुभव हुआ कि यद्यपि मैने बहुत विद्या पढ़ी है, पर इसके हृदय की उदारता को मैं नहीं पहुँचता। यह अशिक्षित होकर भी मुझसे कहीं उच्च विचार रखती है। उन्हें आज ज्ञात हुआ कि स्त्री सन्तान-हीन होकर भी पुरुष के लिए शान्ति, आनन्द का एक अविरल स्रोत है। सुभद्रा के प्रति उनके हृदय में एक नया प्रेम जाग्रत हो गया। एक लहर उठी जिसने बरसों के जमे हुए मालिन्य को काटकर बहा दिया। उन्होंने विमल, विशुद्धभाव से उसे देखा। सुभद्रा उसका आशय समझ गई और उसका हृदय आनन्द से विहृल गद्गगद् हो गया।

४५

सदन जब सुमन को देखकर लौटा तो उसकी दशा उस दरिद मनुष्य की-सी थी, जिसका वर्षों का धन चोरों ने हर लिया हो।

वह सोचता था, सुमन मुझसे बोली क्यों नहीं, उसने मेरी ओर ताका क्यों नहीं? क्या वह मुझे इतना नीच समझती है? नहीं, वह अपने पूर्व चरित्रपर लज्जित है और मुझे भूल जाना चाहती है। संभव है, [ २३९ ] निकाल देता, पर गुमनाम लेखों का छापना नियम विरुद्ध है, इसी से मजबूर था। शुभ नाम?

सदन ने अपना नाम बताया। उसका क्रोध कुछ शान्त हो चला था।

प्रभाकर-आप तो शर्माजी के परम भक्त मालूम होते है।

सदन--में उनका भतीजा हूँ।

प्रभाकर-ओह, तब तो आप अपनही है। कहिये, शर्माजी अच्छे तो है? वे तो दिखाई ही नहीं दिये।

सदन—अभी तक तो अच्छे हैं, पर आपके लेखों का यही तार रहा तो ईश्वर ही जाने उनकी क्या गति होगी। आप उनके मित्र होकर इतना द्वेष कैसे करने लगे?

प्रभाकर--द्रेष? राम राम! आप क्या कहते है? मुझे उनसे लेशमात्र भी द्वेष नहीं है। आप हम संपादकों के कर्तव्य को नहीं जानते। हम पब्लिक के सामने अपना हृदय खोलकर रखना अपना धर्म समझते हैं। अपने मनोभावों को गुप्त रखना हमारे नीत-शास्त्र में पाप है। हम न किसी के मित्र न है न किसी के शत्रु। हम अपने जन्म के मित्रों को एक क्षण में त्याग देते है और जन्म के शत्रुओं से एक क्षण में गले मिल जाते हैं। हम सार्वजनिक विषय में किसी की भूलों की क्षमा नहीं, करते, इसलिए कि हमारे क्षमा करने से उनका प्रभाव और भी हानिकारक हो जाता हैं।

पद्मसिंह मेरे परममित्र है और मैं उनका हृदय से आदर करता हूँ। मुझे उनपर आक्षेप करते हुए हार्दिक वेदना होती है। परसों तक मेरा उनसे केवल सिद्धान्त का विरोध था, लेकिन परसों ही मुझे ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे विदित होता है कि उस तरमीम के स्वीकार करने में उनका कुछ और ही उद्देश्य था। आपसे कहने में कोई हानि नहीं है कि उन्होंने कई महीने हुए सुमन बाई नाम की बेश्या को गुप्त रीति से विधवा आश्रम में प्रवृष्ट करा दिया और लगभग एक मास से उसकी छोटी बहन को भी आश्रम में ही ठहरा रक्खा है। मैं अब भी चाहता हूँ कि मुझे गलत खबर [ २४० ] मिली हो, लेकिन मैं शीघ्र ही किसी और नीयत से नहीं तो उनका प्रतिवाद कराने के ही लिए इस खबर को प्रकाशित कर दूँगा?

सदन—यह खबर आपको कहाँँ से मिली?

प्रभाकर—इसे मैं नहीं बता सकता, लेकिन आप शर्माजी से कह दीजियेगा कि यदि उनपर यह मिथ्या दोषारोपण हो तो मुझे सूचित कर दे। मुझे यह मालूम हुआ है कि इस प्रस्ताव के बोर्ड आने से पहले शर्माजी हाजी हाशिम के यहाँँ नित्य जाते थे। ऐसी अवस्था मे आप स्वयं देख सकते है कि मैं उनकी नीयत को कहाँ तक निस्पृह समझ सकता था?

सदन का क्रोध शान्त हो गया। प्रभाकरराव की बातों ने उसे वशीभूत कर लिया, वह मनमे उनका आदर करने लगा और कुछ इधर-उधर की बाते करके घर लौट आया। उसे अब सबसे बड़ी चिन्ता यह थी कि क्या शान्ता सचमुच आश्रम में लाई गई है?

रात्रि को भोजन करते समय उसने बहुत चाहा कि शर्मा जी से इस विषय मे कुछ बातचीत करे, पर साहस न हुआ। सुमन को तो विधवा-आश्रम में जाते उसने देखा ही था, लेकिन अब उसे कई बातों का स्मरण करके जिनका तात्पर्य अबतक उसकी समझ में न आया, था, शान्ता के लाये जाने का सन्देह भी होने लगा।

वह रातभर विकल रहा। शान्ता आश्रम में क्यो आई है? चाचा ने उसे क्यों यहाँ बुलाया है? क्या उमानाथ ने उसे अपने घर में नहीं रखना चाहा? इसी प्रकार के प्रश्न उसके मन में उठते रहे। प्रात काल वह विधवा-आश्रम वाले घाट की ओर चला कि अगर सुमन से भेंट हो जाय तो उससे सारी बात पूछूँ। उसे वहाँ बैठे थोड़ी ही देर हुई थी कि सुमन आती हुई दिखाई दी। उसके पीछे एक और सुन्दरी चली आती थी। उसका मुखचन्द्र घूँघट से छिपा हुआ था।

सदन को देखते ही सुमन ठिठक गई। वह इधर कई दिनों से सदन से मिलना चाहती थी। यद्यपि पहले उसने मन में निश्चय कर लिया था कि सदन से कभी न बोलूँगी, पर शान्ता के उद्धार का उसे इसके सिवा कोई [ २४१ ] अन्य उपाय न सूझता था? उसने लजाते हुए सदनसे कहा, सदनसिंह आज बड़े भाग्य से तुम्हारे दर्शन हुए। तुमने तो इधर आना ही छोड़ दिया। कुशलसे तो हो?

सदन झेंपता हुआ बोला, हाँ, सब कुशल है।

सुमन—दुबले बहुत मालूम होते हो, बीमार थे क्या?

सदन—नहीं, बहुत अच्छी तरह हूँ। मुझे मौत कहाँ?

हम बहुधा अपनी झेंप मिटाने और दूसरोंकी सहानुभूति प्राप्त करने के लिए कृत्रिम भावों की आड़ लिया करते हैं।

सुमन—चुप रहो, कैसा अशकुन मुँहसे निकालते हो। मैं मरने की मनाती तो एक बात थी, जिसके कारण यह सब हो रहा है। इस रामलीला की कैकेयी मैं ही हूँ। आप भी डूबी ओर दूसरों को भी अपने साथ ले डूबी। खड़े कबतक रहोगे, बैठ जाओ। मुझे आज तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं। मुझे क्षमा करना, अब तुम्हें भैया कहूँगी। अब मेरा तुमसे भाई बहनका नाता है। मैं तुम्हारी बड़ी साली हूँ, अगर कोई कड़ी बात मुँह से निकल जाय तो बुरा मत मानना। मेरा हाल तो तुम्हें मालूम ही होगा। तुम्हारे चाचा ने मेरा उद्धार किया और अब मैं विधवा आश्रम में पड़ी अपने दिनो को रोती हूँ और सदा रोऊँगी। इधर एक महीनेसे मेरी अभागिनी बहन भी यहीं आ गई है, उमानाथके घर उसका निर्वाह न हो सका। शर्माजी को परमात्मा चिरजीवी करें, वह स्वयं अमोला गए और इसे ले आए। लेकिन यहाँ लाकर उन्होंने भी इसकी सुधि न ली। मैं तुमसे पूछती हूँ, भला यह कहाँ की नीति है कि एक भाई चोरी करे और दूसरा पकड़ा जाय। अब तुमसे कोई बात छिपी नहीं है, अपने खोटे नसीब से, दिनों के फेर से, पूर्वजन्म के पापों से मुक्त अभागिनी ने धर्मका मार्ग छोड़ दिया। उसका दण्ड मुझे मिलना चाहिए था और वह मिला। लेकिन इस बेचारी ने क्या अपराध किया था कि जिसके लिए तुम लोगों ने इसे त्याग दिया? इसका उत्तर तुम्हें देना पड़ेगा! देखो, अपने बड़ों की आड़ मत लेना, यह कायर मनु्ष्य की चाल है। सच्चे हृदय से बताओ, [ २४२ ] यह अन्याय था या नहीं? और तुमने कैसे ऐसा घोर अन्याय होने दिया है। क्या तुम्हें एक अबला बालिका का जीवन नष्ट करते हुए तनिक भी दया न आई?

यदि शान्ता यहाँ न होती तो कदाचित् सदन अपने मन के भावों को प्रकट करने का साहस कर जाता। वह इस अन्याय को स्वीकार कर लेता। लेकिन शान्ता के सामने वह एकाएक अपनी हार मानने के लिए तैयार न हो सका। इसके साथ ही अपनी कुल मर्यादा की शरण लेते हुए भी उसे संकोच होता था। वह ऐसा कोई वाक्य मुँह से न निकालना चाहता था, जिससे शान्ता को दुख हो, न कोई ऐसी बात कह सकता था, जो झूठी आशा उत्पन्न करे। उसकी उड़ती हुई दृष्टि ने जो शान्ता पर पड़ी थी, उसे बड़े संकट में डाल दिया था, उसकी दशा उस बालक की सी थी, जो किसी मेहमान की लाई हुई मिठाई को ललचायी हुई आँखों से देखता है, लेकिन माता के भय से निकालकर खा नहीं सकता। बोला, बाईजी, आपने पहले ही मेरा मुँह बन्द कर दिया है, इसलिए मैं कैसे करें कि जो कुछ मेरे बड़ों ने किया, मैं उनके सिर दोष रखकर अपना गला नहीं छुड़ाना चाहता। उस समय लोक-लज्जा से से भी डरता था। इतना तो आप भी मानेगी कि संसार में रहकर संसार की चाल चलनी पड़ती है। मैं इस अन्याय को स्वीकार करता हूँ। लेकिन यह अन्याय हमने नहीं किया, वरन् उस समाज ने किया है, जिसमें हम लोग रहते है।

सुमन—भैया, तुम पढ़े लिखे मनुष्य हो, मैं तुमसे बातों में नहीं जीत सकती, जो तुम्हें उचित जान पड़े वह करो। अन्याय अन्याय हो है, चाहे कोई एक आदमी करे या सारी जाति करे। दूसके भय से किसी पर अन्याय नहीं करना चाहिए। शान्ता यहाँ खड़ी है, इसलिए मैं उसके भेद नहीं खोलना चाहती, लेकिन इतना अवश्य करेंगी कि तुम्हें दूसरी जगह धन, सम्मान, रूप, गुण सब मिल जाय पर यह प्रेम न मिलेगा। अगर तुम्हारे जैसा इसका हृदय भी होता तो यह आज अपनी नई ससुराल में आनन्द से बैठी होती, लेकिन केवल तुम्हारे प्रेम नें उसे यहाँ खीचा। [ २४३ ] तुम उसे जिस तरह चाहे रखो, वह तुम्हारे ही नाम पर आजन्म बैठी रहे।

सदन ने देखा कि शान्ता की आँखो से जल बहकर उसके पैरों पर गिर रहा है। उसका सरल प्रेम-तृषित हृदय शोक से भर गया। अत्यन्त करुण स्वर से बोला, मेरी समझ में नहीं आता कि क्या करूँ? ईश्वर साक्षी है। कि दुःख से मेरा कलेजा फटा जाता है।

सुमन-तुम पुरुष हो, परमात्मा ने तुम्हें सब शक्ति दी है।

सदन- मुझसे जो कुछ कहिये करने को तैयार हूँ।

सुमन-वचन देते हो?

सदन—मेरे चित्त को जो दशा हो रहो है वह ईश्वर ही जानते होंगे, मुँह से क्या कहूँ।

सुमन—मरदों को बातों पर विश्वास नहीं आता।

यह कहकर मुस्कुराई। सदन ने लज्जित होकर कहा, अगर अपने वश की बात होती तो अपना हृदय निकालकर आपको दिखाता। यह कहकर उसने दबी हुई आँखो से शान्ता की ओर ताका।

सुमन-—अच्छा, तो आप इसी गंगा नदी के किनारे शान्ता का हाथ पकड़कर कहिए कि तुम मेरी स्त्री हो और मैं तुम्हारा पुरुष हैं, मैं तुम्हारा पालन करुँगा।

सदन के आत्मिक बल ने जवाब दे दिया। वह बगले झाँकने लगा, मानो अपना मुँह छिपाने के लिए कोई स्थान खोज रहा है। उसे ऐसा जान पडा कि गंगा मुझे छिपाने के लिए बढ़ी चली आती है। उसने डूबते हुए मनुष्य की भाँति आकाश की ओर देखा और लज्जा से आँखे नीची किए रुक-रुककर बोला, सुमन, मुझे इसके लिए सोचने का अवसर दो। सुमन ने नम्रता से कहा, हाँ सोचकर निश्चय कर लो, मैं तुम्हे धर्म संकट में नहीं डालना चाहती। यह कहकर वह शान्ता से बोली, देख तेरा पति तेरे सामने खड़ा है। मुझसे जो कुछ कहते बना उससे कहा, पर वह नहीं पसीजता। वह अब सदा के लिए तेरे हाथ से जाता है। अगर तेरा प्रेम सत्य है और उसमें कुछ बल है तो उसे रोक ले, उससे प्रेम वरदान ले लें। [ २४४ ]यह कहकर सुमन गंगा की ओर चली। शान्ता भी धीरे-धीरे उसी के पीछे चली गई। उसका प्रेम मान के नीचे दब गया। जिसके नामपर वह यावज्जीवन दुःख झेलने का निश्चय कर चुकी थी, जिसके चरणों पर वह कल्पना में अपने को अर्पण कर चुकी थी, उसी से वह इस समय तन बैठी। उसने उसकी अवस्था को न देखा, उसकी कठिनाइयों का विचार न किया, उसकी पराधीनता पर ध्यान न दिया। इस समय वह यदि सदन के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती तो उसका अभीष्ट सिद्ध हो जाता पर उसने विनय के स्थानपर मान करना उचित उमझा।

सदन एक क्षण वहाँ खड़ा रहा और बाद को पछताता हुआ घर को चला।

४६

सदन को ऐसी गलानि हो रही थी, मानो उसने कोई बड़ा पाप किया हो। वह बार-बार अपने शब्दों पर विचार करता और यही निश्चय करता कि मैं बड़ा निर्दयी हूँ। प्रेमाभिलाषा ने उसे उन्मत्त कर दिया था।

वह सोचता, मुझे संसार का इतना भय क्यों है? संसार मुझे क्या दे देता है? क्या केवल झूठी बदनामी के भय से मैं उस रत्न को त्याग दूँ, जो मालूम नहीं मेरे पूर्व जन्म की कितनी ही तपस्याओं का फल है? अगर अपने धर्म का पालन करने के लिए मेरे बन्धुगण मुझे छोड़ दे तो क्या हानि है? लोकनिन्दा का भय इसलिए है कि वह हमें बुरे कामों से बचाती है। अगर वह कर्त्तव्य मार्ग में बाधक हो तो उससे डरना कायरता है। यदि हम किसी निरापराध पर झूठ अभियोग लगावे, तो संसार हमको बदनाम नहीं करता, वह इस अकर्म में हमारी सहायता करता है, हमको गवाह और वकील देता है। हम किसी का धन दबा बैठे, किसी की जायदाद हड़प ले, तो संसार हमको कोई दण्ड नहीं देता, देता भी है तो बहुत ही कम, लेकिन ऐसे कुकर्मों के लिए वह हमें बदनाम करता है, हमारे माथे पर सदा के लिए कलंक का टीका लगा देता है। नहीं, लोकनिन्दा का भय मुझसे [ २४५ ] कर दिया। उसे अपने माता-पिता पर, अपने चाचा पर, संसार पर और अपने आपपर क्रोध आता। अभी थोड़े ही दिन पहले वह स्वयं फिटन पर सैर करने निकलता था, लेकिन अब किसी फिटन को आते देखकर उसका रक्त खौलने लगता था। वह किसी फैशनेबुल मनुष्य को पैदल चलते पाता तो अदबदाकर, उससे कन्धा मिलाकर चलता और मन में सोचता कि यह जर भी नाक-भौं सिकोड़े तो इसकी खबर लूँ। बहुधा वह कोचवानों के चिल्लाने की परवाह न करता। सबसे छेड़कर लड़ना चाहता था। ये लोग गाड़ियों पर सैर करते हैं, कोट-पतलून डालकर बनठन कर हवा खाने जाते हैं और मेरा कहीं ठिकाना नहीं।

घर पर जमींदारी होने के कारण सदन के सामने जीविका का प्रश्न कभी न आया था। इसीलिए उसने शिक्षा की ओर विशेष ध्यान न दिया था, पर अकस्मात् जो यह प्रश्न उसके सामने आ गया, तो उसे मालूम होने लगा कि इस विषय में मैं असमर्थ हूँ। यद्यपि उसने अंग्रेजी न पढ़ी थी, पर इधर उसने हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह शिक्षित समाज को मातृभाषा में अश्रद्धा रखने के कारण देश और जाति का विरोधी समझता था। उसे अपने सच्चरित्र होने पर भी घमण्ड था। जबसे उसके लेख “जगत” में प्रकाशित हुए थे वह अंग्रेजी पढ़े-लिखे आदमियों को अनादर की दृष्टि से देखने लगा था। यह सबके सब स्वार्थ-सेवी हैं, इन्होंने केवल दोनों का गला दबाने के लिए, केवल अपना पेट पालने के लिए अंगरेजी पढ़ी है, यह सबके सब फैशन के गुलाम हैं, जिनकी शिक्षा ने उन्हें अंगरेजो का मुँह चिढ़ाना सिखा दिया है, जिनमें दया नहीं, धर्म नहीं, निज भाषा से प्रेम नहीं, चरित्र नहीं, आत्मबल नहीं, वे भी कुछ आदमी है। ऐसे ही विचार उसके मन में आया करते थे लेकिन अब जो जीविका की समस्या उसके सामने आई तो उसे ज्ञात हुआ कि मैं इनके साथ अन्याय कर रहा था। ये दया के पात्र हैं। मैं भाषा का पंण्डित न सही, पर बहुतों से अच्छी भाषा जानता हूँ, मेरा चरित्र उच्च न सही, पर बहुतों से अच्छा है, मेरे विचार उच्च न हों, पर ऐसे नीच नहीं, लेकिन मेरे लिए सब [ २४६ ] दरवाजे बन्द हैं। मैं या तो कही चपरासी हो सकता हूँ या बहुत होगा तो कान्सटेबिल हो जाऊँगा। बस, यही मेरी सामर्थ्य है। यह हमारे साथ कितना बड़ा अन्याय है, हम कैसे ही चरित्रवान् हों, कितने ही बुद्धिमान् हों, कितने ही विचारशील हों, पर अग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने से उनका कुछ मूल्य नहीं। हमसे अधम और कौन होगा जो इस अन्याय को चुपचाप सहते हैं। नहीं, बल्कि उस पर गर्व करते हैं। नहीं, मुझे नौकरी करने का विचार मन से निकाल डालना चाहिए।

सदन की दशा इस समय उस मनुष्य की सी थी जो रात को जंगल में भटकता हुआ अन्धेरी रात में झुँझलाता है।

इसी निराशा और चिन्ता की दशा में एक दिन वह टहलता हुआ, नदी के किनारे उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ बहुत सी नावे लगी हुई थी। नदी में छोटी-छोटी नावे इधर-उधर इठलाती फिरती थी। किसी-किसी नौका में सुरीली ताने सुनाई देती थी। कई किश्तियों पर से मल्लाह लोग बोरे उतार रहे थे। सदन एक नाव पर जा बैठा। संध्या समय की शान्तिदायिनी छटा और गंगातट के मनोरम काव्यमय दृश्य ने उसे वशीभूत कर लिया। वह सोचने लगा, यह कैसा आनन्दमय जीवन है, ईश्वर मुझे भी ऐसा ही एक झोपड़ा दे देता, तो मैं उसीपर सन्तोष करता, यही नदी तट पर विचरता लहरों पर चलता और आनन्द के राग गाता। शान्ता झोपड़ा के द्वारपर खड़ी मेरी राह देखती। कभी-कभी हम दोनों नाव पर बैठकर गंगा की सैर करते। उसकी रसिक कल्पना ने उस सरल सुखमय-जीवन का ऐसा सुन्दर चित्र खींचा, उस आनन्दमय स्वप्न के देखने में वह ऐसा मग्न हुआ कि उसका चित्त ब्याकुल हो गया। वहाँ की प्रत्येक वस्तु उस समय सुख, शान्ति और आनन्द के रंग में डूबी हुई थी। वह उठा और एक मल्लाह से बोला, क्यों जी चौधरी यहाँ कोई नाव बिकाऊ भी है?

मल्लाह बैठा हुक्का पी रहा था। सदन को देखते ही उठ खड़ा हुआ और उसे कई नावे दिखाई। सदन ने एक नई किश्ती पसन्द की, मोल-तोल होने लगा, कितने ही और मल्लाह एकत्र हो गये। अन्त में ३००) में नाव [ २४७ ] पक्की हो गई, यह भी तै हो गया कि जिसकी नाव है वही उसे चलाने के लिए नौकर होगा।

सदन घर को ओर चला तो ऐसा प्रसन्न था मानों अब उसे जीवन में किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है, मानों उसने किसी बड़े भारी संग्राम में विजय पायी है। सारी रात उसकी आँखो में नींद नहीं आई। वहीं नाव जो पाल खोले क्षितिज की ओर से चली आती थी उसके नेत्रों के सामने नाचती रही, वही दृश्य उसे दिखाई देते रहे। उसकी कल्पना ने तटपर एक सुन्दर, हरि-भरि लताओं से सजा हुआ झोपड़ा बनाया और शान्ता की मनोहारिणी मूर्ति आकर उसमें बैठी। झोपड़ा प्रकाशमान हो गया। यहाँ तक कि आनन्द-कल्पना धीरे-धीरे नदी के किनारे एक सुन्दर भवन बनाया, उसमें एक वाटिका लगवाई और सदन उसकी कुञ्जों में शान्ता के साथ बिहार करने लगा। एक ओर नदी की कलकल ध्वनि थी, दूसरी ओर पक्षियों का कलरव गान। हमें जिससे प्रेम होता है उसे हम सदा एक ही अवस्था में देखते है, हम उसे जिस अवस्था में स्मरण करते है, उसी समय के भाव उसी समय के वस्त्राभूषण हमारे हृदय पर अंकित हो जाते है। सदन शान्ता को उसी अवस्था में देखता था, जब वह एक सादी साड़ी पहने सिर झुकाये गंगातट पर खड़ी थो, वह चित्र उसकी आँखों से न उतरता था।

सदन को इस समय ऐसा मालूम होता था कि इस व्यवसाय में लाभ ही लाभ है, हानि की सम्भावना ही उसके ध्यान से बाहर थी। सबसे विचित्र बात यह थी कि अबतक उसने यह न सोचा था कि रुपये कहाँ से आवेगे?

प्रातःकाल होते ही उसे चिन्ता हुई कि रुपयों का क्या प्रबन्ध करूँ? किससे माँगू और कौन देगा? माँगू किस बहाने से? चाचा से कहूँ? नहीं उनके पास आजकल रुपये में होगे। महीनों से कचहरी नहीं जाते और दादा से माँगना तो पत्थर से तेल निकालना है। क्या कहूँ? यदि इस समय न गया तो चौधरी अपने मन से क्या कहेगा? वह छत पर इधर-उधर टहलने लगा। अभिलाषाओं का वह विशाल भवन, अभी थोड़ी देरप हले उसकी कल्पना ने जिसका निर्माण किया था देखते-देखते गिरने