सेवासदन ८

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सेवासदन (१९१९) 
द्वारा प्रेमचंद

[ २८ ]सुमन-—क्यों, भोली के घर जाने में कोई हानि है? उसके घर तो बड़े-बड़े लोग आते है, मेरी क्या गिनती है।

गजाधर—बड़े बड़े भले ही आवे,लेकिन तुम्हारा वहाँ जाना बड़ी लज्जा की बात है। मैं अपनी स्त्री को वेश्या से मेलजोल करते नही देख सकता। तुम क्या जानती हो कि जो बड़े-बड़े लोग उसके घर आते है यह कौन लोग हैं? केवल धन से कोई बड़ा थोड़े ही हो जाता है? धर्म का महत्व कहीं धन से बढ़कर है। तुम उस मौलूद के दिन जमाव देखकर धोखे मे आ गई होगी, पर यह समझ लो कि उनमें से एक भी सज्जन पुरुष नही था। मेरे सेठजी लाख धनी हों पर उन्हे मैं अपनी चौखट न लांघने दूँगा। यह लोग धनके घमण्ड में धर्म की परवाह नही करते। उनके आने से भोली पवित्र नही हो गई है। मैं तुम्हे सचेत कर देता हूँ कि आज से फिर कभी उधर मत जाना, नही तो अच्छा न होगा।

सुमन के मन मे बात आ गई ठीक ही है, मै क्या जानती हूँ कि वह कौन लोग थे। धनी लोग तो वेश्याओ के दास हुआ ही करते है। यह बात रामभोली भी कह रही थी। मुझे बड़ा धोखा हो गया था।

सुमन को इस विचार से बड़ा सन्तोष हुआ। उसे विश्वास हो गया कि वे लोग नीच प्रकृति के विषय-वासनावाले मनुष्य थे। उसे अपनी दशा अब उतनी दुःखदायी न प्रतीत होती थी। उसे भोली से अपने को ऊंचा समझने के लिए एक आधार मिल गया था।

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सुमन की धर्मनिष्ठा जागृत हो गई। वह भोलीपर अपनी धार्मिकता का सिक्का जमाने के लिए नित्य गंगा स्नान करने लगी। एक रामायण मँगवाई और कभी-कभी अपनी सहेलियों को उसकी कथाएँ सुनाती। कभी अपने आप उच्च स्वर मे पढ़ती। इससे उसकी आत्मा को तो क्या शान्ति होती, पर मन को बहुत सन्तोष होता था। चैत का महीना था। रामनौमी के दिन सुमन कई सहेलियो के साथ एक बड़े मन्दिर में जन्मोत्सव देखने गई। मन्दिर खूब सजाया हुआ था। बिजली बत्तियों से दिनका-सा प्रकाश हो रहा था, बड़ी भीड थी। मन्दिर के [ २९ ]सुमन ने सावधान होकर उत्तर दिया, उसमें कोई छूत तो नही लगी है! शोलस्वभाव में वह किसी से घटकर नही, मान-मर्यादा मे किसी से कम नही, फिर उससे बातचीत करने में मेरी क्या हेठी हुई जाती है? वह चाहे तो हम जैसो को नौकर रख ले।

गजाघर-—फिर तुमने वही बेसिर-पैर की बातें की। मान-मर्यादा वन से नहीं होती।

सुमन—पर घर्म से तो होती है?

गजाधर--तो वह बडी धर्मात्मा है?

सुमन-—यह भगवान जानें, पर धर्मात्मा लोग उसका आदर करते है। अभी रामनवमी के उत्सव में मैने उन्हें बडे-बडे पण्डितो और धर्मात्माओ की मण्डलो में गाते देखा। कोई उससे घृणा नही करता था। सब उसका मुह देख रहे थे। लोग उसका आदर सत्कार ही नही करते थे, बल्कि उससे बातचीत करने में अपना अहोभाग्य समझते थे। मन में वह उससे घृणा करते थे या नही, यह ईश्वर जाने पर देखने मे तो उस समय भोली ही भोली दिखाई देती थी। संसार तो व्यवहारो को ही देखता है, मनकी बात कौन किसकी जानता है।

गजाधर--तो तुमने उन लोगो के बड़े-पड़े तिलक छापे देखकर ही उन्हें धर्मात्मा समझ लिया? आजकल धर्म तो धूर्तो का अड्डा बना हुआ है। इस निर्मल सागर में एक-एक मगरमच्छ पड़े हुए है। भोले-भाले भक्तों को निगल जाना उनका काम है। लम्बी लम्बी जटाएँ लम्बे-लम्बे तिलक छापे और लम्बी-लम्बी दाढियाँ देखकर लोग धोखे में आ जाते है, पर वह सबके सब महापाखण्डी, धर्म के उज्ज्वल नाम को कलंकित करने वाले, घर्म के नाम पर टका कमानेवाले, भोग-विलास करनेवाले पापी है। भोली का आदर सम्मान उनके यहाँ न होगा तो किसके यहां होगा?

सुमन ने सरल भाव से पूछा, फुसला रहे हो या सच कह रहे हो?

गजाघर ने उसकी ओर करुण दुष्टि से देखकर कहा, नही सुमन, वास्तव में यही बात है। हमारे देश मे सज्जन मनुष्य बहुत कम है, पर [ ३० ] अभी देश उनसे खाली नही है। वह दयावान होते है, सदाचारी होते है, सदा परोपकार मे तत्पर रहते है। भोली यदि अप्सरा बनकर आवे तो वह उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखेंगे।

सुमन चुप हो गयी। वह गजाधर की बातों पर विचार कर रही थी।

दूसरे दिन से सुमन ने चिकके पास खड़ा होना छोड दिया। खोचे वाले आते और पुकार कर चले जाते। ठेले गजल गाते हुए निकल जाते। चिककी आड़ मे अब उन्हें कोई न दिखाई देती थी। भोली ने कई बार बुलाया, लेकिन सुमन ने बहाना कर दिया कि मेरा जी अच्छा नही है। दो-तीन बार वह स्वयं आई पर सुमन उससे खुलकर न मिली।

सुमन को यहाँ आये अब दो साल हो गए थे। उसकी रेशमी साड़ियाँ फट चली थी। रेशमी जाकटे तार-तार हो गई थी। सुमन अब अपनी मंडली की रानी न थी। उसकी बात उतने आदर से न सुनी जाती थी। उसका प्रभुत्व मिटता जाता था। उत्तम वस्त्रविहीन होकर वह अपने उच्चासन से गिर गई थी। इसलिए वह पडोसिनो के घर भी न जाती। पडोसिनो का आना जाना भी कम हो गया था। सारे दिन अपनी कोठरी में पड़ी रहती। कभी कुछ पढ़ती, कभी सोती।

बन्द कोठरी मे पड़े-पड़े उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। सिर में पीडा़ हुआ करती। कभी बुखार आ जाता, कभी दिल मे धड़कन होने लगती। मन्दारिन के लक्षण दिखाई देने लगे। साधारण कामो से भी जी घबराता, शरीर क्षीण हो गया और कमलका-सा वदन मुरझा गया।

गजाधर को चिन्ता होने लगी। कभी-कभी वह सुमन पर झुझलाता और कहता जब देखो पड़ी रहती है। जब तुम्हारे रहने से मुझे इतना भी सुख नही कि ठीक समय पर भोजन मिल जाय तो तुम्हारा रहना न रहना दोनो बराबर है, पर शीघ्र ही उसे सुमन पर दया आ जाती। वह अपनी स्वार्थपरतापर लज्जित होता।


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