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आदर्श हिंदू ३/५३ दीनबंधु के दर्शन

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आदर्श हिंदू तीसरा भाग
द्वारा मेहता लज्जाराम शर्मा
[ ६७ ]
दीनबंधु के दर्शन

उंचासवे प्रकरण के अतर प्रामेश्वर की धाराप्रवाह वक्तता सुनकर यदि प्राप्यारी के संतोष हो गया हो तो अच्छी बात है, हो जाने दीजिए। पत्नी के प्रसन्न रखना पति का प्रधान कर्तव्य है किंतु पंडित जी अब भी बाते करते करते बीच बीच में, कभी कभी रुक जाते हैं, मौत्र व्रत धारण कर लेते हैं और अपने कमल नयनों से दो चार आंसू गिराकर तब अर्द्ध स्फुट शब्दों से--"भगवान् की इच्छा ! ईश्वर की लीला !" कहकर फिर गौड़बोले से बाते में प्रवृत्त हो जाते हैं ! उनकी ऐसी दशा घंटे दो घंटे रही हो तब तो कोई बात नहीं किंतु श्री जगदीशपुरी से चले एक किंवा गुजरा, एक रात गुजरी और फिर दूसरा दिन्' गुजरने को आया । केवल गौड़बाले से संभाषना होने ही पर यदि कोई मान लो कि उनकी विह्वज्ञता मिट गई तो माननेवाले को अधिकार है किंतु उनके हृदय की वास्तविक विह्वलता अभी ज्यों की त्यों है । यदि कंजूस के धन की तरह' पंडित जी अपने मन की बात मन में न छिपाते, साथियों के सामने प्रकाशित कर देते तो उनके मन का बोझ थोड़ा बहुत हलके भी हो जाता क्योंकि दुःख दूसरों को सुनने में घटता और सुख पढ़ता हैं । औरों के [ ६८ ]आगे प्रकट कर देने से मन के काम, क्रोध, लोग, मोहादी विकार दुख,सुख, शोक,भय,शति इत्यादि शांत होते हैं।

कुछ भी हो किंतु पंडित प्रियानाथ यूं ही करते करते अपने साथियों सहित जब मुगलसराय स्टेशन पर पहुँचे तब एकाएक इनकी दृष्टि पंडित दीनबंधु पर पड़ी । गाड़ी ठहरते ही पंडित जी उतरकर लटके हुए उनके पास। पहुंच कर उन्होंने उनके चरणों में सिर रख दिया। दीनबंधु ने प्रियानाथ को उठाकर अपनी छाती से लगाया और पंडित जी"आप यहां कैसे?"इस प्रश्न के उत्तर में'इसलिए'काकर पंडित दीनबंधु इनके हाथ में तार का लिफाफा दिया। इन्होंने खोलकर उसे एक बार पढ़ा, दूसरी बार पढ़ा और तब भोला के हाथ प्रियावंदा हुए कहा --

“हे भगवन् ! तुमने बड़ी कृपा की !..हे दयासागर ! तुमने बचाया ! हे परमेश्वर ! अब जी में जी आया ! आपकी लीला अपार है। अब मुझे बोध हुआ कि आपकी इच्छा हमें दक्षिण यात्रा कराने की नहीं थी। अब सिद्ध हो गया कि आप सचमुच प्राणी मात्र को नटमर्कड की तरह नचाते हैं। आपने गीता में घुनर्धर अर्जुन को विराट् स्वरूप के दर्शन कराकर दिखला दिया है कि हम सब निमित्त मात्र हैं। होता वही है जो आपको मंजूर होता है। यह भी एक आफत थी । बिचारे के निरपराध कष्ट उठाना पड़ा। खैर, अच्छा हुआ है। [ ६९ ]जल्दी बला टल गई। भगवान्, तेर। धन्यवाद ! रोम रोम से धन्यवाद !"

ऐसे पंडित जी ने, पंडितायिन तार पढ़कर अपना संतोष कर लिया। पंडित दीनबंधु से दोनों बार पढ़वाकर उनका संदेह निवृत्त कर दिया किंतु गौड़बोले, भगदानहास, वुढ़िया, गोपीवल्लग और भोला क्या जाने कि तार में क्या है ? पहिले तार में क्या लिखा था सा पाठक पचासवे प्रकरण में पढ़ चुके हैं। दूसरे तार का भावार्थ यो था---

बदमाशों ने झूठा इलज़ाम लगाने में तो कसर नहीं रखी थी । एक मेरे नाम पर अपको झूठा तार दे आया और दूसरे ने पुलिस में झूठी रिपेार्ट की । पुलिस आई भी किंतु जब मामले की कुछ बुनियाद ही नहीं तो अपना सा मुंह लिए लौट गई । हम दोनों प्रसन्न हैं । लोग उन दोनों पर मुकदमा चलाने की सलाह देते थे किंतु मेरी इच्छा नहीं है। मरे से क्या मारना ? आप ही मर जायँगे, जेठ चलते वाट ।

सब लोगों को तार सुनाकर पंडित जी बोले ...“शाबाश लड़के ! वाह री क्षमाशीलता ! सज्जनों को ऐसा ही चाहिए। परंतु क्यों महाराज ! आपके यह तार कैसे मिला ? और आपको यह क्या मालुम कि मैं इस ट्रेन से आनेवाला हूँ?

"इसका यश पुरी के पड़ा शितिकंठ जी को है ! बोध होता है कि आपके रवाना होने के अनचर उनको कांता भैया का तार मिला । तार की बात ठहरों । उन्होंने खोलकर पढ़ [ ७० ]लिया। और आपके पास इस खबर को पहुंचाना विशेष आवश्यक समझकर इन्होंने मुझे तार दिया। देख लो! तारुन का भेजा हुआ मेरे नाम है।" "हां बेशक! फिर?"

"जिस समय तार मिला, मैं आप ही के नाम पर घर के पते पर चिट्ठी लिखकर लेटरबक्स में डालने जा रहा था । रेल का टाइम निकद देखकर चिट्ठी को जेल में डालता हुए काशी स्टेशन पर पहुँच । टाइमटेबुल में समय का हिंसाब मिलाकर मैने अनुमान कर लिया कि आप इस गाड़ी से आनेवाले हैं अथवा पुरी से चलकर जल्दी से जल्दी इस समय यहाँ पहुँच सकते हैं ।

"अच्छाछा महाराज, आपका बहुत परिश्रम हुआ । आप मुझे उपकार के बोझ से दबा रहे हैं। जब आप पिता हैं तब मैं आपके कहां तक गुण गान कर सकता हूँ ।?" यो कहते हुए फिर प्रियानाथ ने दीनबंधु के पैर पकड़ लिए। चिट्ठी में क्या था सो वह इसे न कहने पाए । गाड़ी रवाना होने की एक दो और तीन घंटियाँ हो गई। आगरे जाने के लिये इस लेागों को यहाँ गाड़ी बदलनी थी । बस चट पद के गाड़ी में सवार हुए और उनके अनुग्रह से दबे हुए उनकी प्रशंसा करते हुए वहाँ से चल दिए। यहाँ यह भी लिख देने की आवश्यकता है कि पंडित पंडितायिन ने एक एक गिन्नी पंडित दीनबंधु को भेट की थी किंतु उन्होंने ली नहीं । "ऐसा कभी नहीं है। सकता ।" [ ७१ ]कहते हुए वह भी नजर भर प्रेम के साथ उन पर द्वष्टि डालते हुए उसी समय जिस गाड़ी से ये लोग उतरे थे उसी में सवार हाकर बनारस चले गए। पंडित दीनबंधु के पत्र को प्रियानाथ ने पढ़कर "जैसा करता है वैसा पाता है ।" कहते हुए जंगले में हाथ डालकर दूसरे कंपार्टमेंट में प्रियंवदा की ओर फेंक दिया और पत्र को पढ़कर कुछ मुसकुराती हुई वह भी उसे अपनी जेब में डालकर चुप हो गई।

इससे पाठक ने समझ लिया होगा कि इस बार पंडित जी जुठे दर्जे में थे और पंडितायिन जुठे में। केवल इतना ही क्यो, गाड़ी में भीड़ की कसामसी से हर एक अदिमी को अलग अलग बैठना पड़ा था । इस तरह वहाँ से रवाना है--कर आगरे तक पहुँचने में इस पार्टी ने अलग अलग कंपार्टमेंद्र में बैठकर जो जो देखा उसे पृथक पृथक लिखकर विस्तार करने की आवश्यकता नहीं । तीसरे दर्जे में सवार होकर अधिक भीड़ के समय जो अनुभव होता है उसे सब जानते हैं। गत प्रकरणों में समय समय पर थोड़ा बहुत लिखा भी गया है । हाँ देखना यह है कि गाड़ी से उतरने पर प्रियंवदा प्राणप्यारे से क्या रिपोर्ट करे। खैर, घर पहुँचने की जल्दी में अयोध्या न जाने का दुःख सबको था।