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आनन्द मठ/4.2

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आनन्द मठ  (1922) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद ईश्वरीप्रसाद शर्मा

[ १५६ ]

दूसरा परिच्छेद

जिस समय शान्ति अपने आश्रमसे निकलकर उस गहरी रातके समय नगरकी ओर रवाना हुई थी, उस समय जीवानन्द आश्रममें ही मौजूद थे। शान्तिने जीवानन्दसे कहा, "मैं नगकी ओर जाती हूं और शीघ्र ही महेन्द्रकी स्त्रीको लेकर आती हूँ। तुम महेन्द्रसे कह रखना कि उसकी स्त्री जीती है।"

जीवानन्दने भवानन्दसे कल्याणीके जी उठनेकी बात सुन रखी थी। सब स्थानोंमें घूमने-फिरनेवाली शान्तिसे उन्हें इस [ १५७ ] बातका पता भी मालूम हो गया था कि वह इन दिनों कहाँ रहती है। जीवानन्दने धीरे-धीरे सब बातें महेन्द्रको बतला दी।

पहले तो महेन्द्रको विश्वासही न हुआ, पर अन्तमें वे इस आनन्दसे अभिभूत हो, मुग्ध हो रहे।

उस रातके बीतते बीतते शान्तिकी बदौलत महेन्द्रकी कल्याणीसे भेंट हुई। उप्त सुनसान जंगल में सालके पेड़ोंकी घनी श्रेणीके भीतर अन्धेरे में छिपे हुए पशु-पक्षियोंके सोकर उठने के पहले ही उन दोनोंमें देखादेखी हुई। उनके इस मिलने के साक्षी केवल नीले आकाशमें सोहनेवाले, क्षीण-प्रकाश नक्षत्र और चुप-चाप कतार बाँधे खड़े रहनेवाले सालके पेड़ ही थे। दूरसे कभी-कभी पत्थरकी शिलाओंसे टकरानेवाली, मधुर कल-कल नाद करनेवाली, नदीका हर-हर शब्द और कभी-कभी पूर्व दिशामें उषाके मुकुटकी ज्योति जगमगाती हुई देखकर प्रसन्न होनेवाली एक कोयलकी कूक सुनायी पड़ जाती थी।

एक पहर दिन चढ़ आया। जहां शान्ति थी, वहीं जीवानन्द भी आ पहुंचे। कल्याणीने शान्तिसे कहा-"हम लोग आपके हाथों बिना मोल बिक गये हैं! अब हमारी कन्याका पता बता कर आप इस उपकारको पूरा कर दें।"

शान्तिने जीवानन्दके चेहरेकी ओर देखते हुए कहा-"मैं तो अब सोती हूं। आठ पहरसे मैं बैठीतक नहीं है। दो रात जागकर ही बितायी है। मैं पुरुष हूं-

कल्याणीने धीरेसे मुस्कुरा दिया। जीवानन्दने महेन्द्रकी ओर देखते हुए कहा- “अच्छा, इसका भार मेरे ऊपर रहा। आप लोग पदचिह्न चले जाय, वहीं आप अपनी कन्याको पा जायंगे।"

यह कह जीवानन्द, निमाईके घरसे कन्याको ले आनेके लिये भरुईपुर चले गये, पर वहां पहुंचनेपर उन्होंने देखा कि यह काम कुछ आसान नहीं है।

पहले तो निमाई यह बात सुनते हो चकपका गयी और [ १५८ ] इधर-उधर देखने लगी। इसके बाद उसकी नाक-भौं चढ़ गयी और वह रो पड़ी। फिर बोली--"मैं तो लड़की नहीं दूंगी।"

निमाईने अपने गोल-गोल हाथोंकी कलाईसे जब आँखों के आँसू पोंछ डाले तब जीवानन्दने कहा-“बहन! रोती क्यों हो? कुछ दूर भी तो नहीं है? जब तुम्हारे जीमें आये, जाकर देख आया करना।"

निमाईने होंठ फुलाकर कहा-"अच्छा, तुम लोगोंकी लड़की है, ले जाना चाहते हो, तो ले जाओ। मुझे क्या है?" यह कहती हुई वह भीतरसे सुकुमारीको ले आयी और उसे क्रोधके साथ जीवानन्दके पास पटककर आप पैर पसारकर रोने बैठी। लाचार, जीवानन्द उस बारे में कुछ भी न कहकर इधर-उधरकी बातें करने लगे। पर निमाईका क्रोध किसी तरह कम न हुआ। वह उठकर सुकुमारीके कपड़ोंकी गठरी, गहनोंका सन्दूक, बाल बांधनेके फीते खिलौने आदि ला लाकर जीवानन्दके आगे फेंकने लगी। सुकुमारी आप ही उन सब चीजोंको सहेजने लगी। वह निमाईसे पूछने लगी-“मां! मुझे कहां जाना होगा?"

अब तो निमाईसे न रहा गया। वह सुकुमारीको गोद में लिये रोती हुई चली गयी।