कर्मभूमि/चौथा भाग ६

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ३१७ ]

सलीम यहाँ से कोई सात-आठ मील पर डाक-बँगले में पड़ा हुआ था। हलके के थानेदार ने रात ही को उसे सभा की खबर दी और अमरकान्त का भाषण भी सुनाया। उसे इन सभाओं की रिपोर्ट करते रहने की ताकीद कर दी गयी थी।

सलीम को बड़ा आश्चर्य हुआ। अभी एक दिन पहले अमर उससे मिला था, और यद्यपि उसने महन्त की इस नयी कार्रवाई का विरोध किया था; पर उसके विरोध में केवल खेद था, क्रोध का नाम भी न था। आज एकाएक यह परिवर्तन कैसे हो गया? [ ३१८ ]उसने थानेदार से पूछा--महन्तजी की तरफ से कोई खास ज्यादती तो नहीं हुई?

थानेदार ने जैसे इस शंका को जड़ से काटने के लिये तत्पर हो कर कहा---बिल्कुल नहीं हुजूर। उन्होंने तो सख्त ताकीद कर दी थी कि असामियों पर किसी किस्म का जुल्म न किया जाय। बेचारे ने अपनी तरफ से चार आने की छूट दे दी, गाली-गुफ़्ता तो मामूली बात है!

'जलसे पर तकरीर का क्या असर हुआ?'

'हुजूर यही समझ लीजिए, जैसे पुआल में आग लग जाय। महन्तजी के इलाके में बड़ी मुश्किल से लगान वसूल होगा।'

सलीम ने आकाश की तरफ देखकर पूछा--आप इस वक्त मेरे साथ सदर चलने को तैयार हैं?

थानेदार को क्या उज्र हो सकता था। सलीम के जी में एक बार आया कि जरा अमर से मिले लेकिन फिर सोचा, अगर अमर उसके समझाने से माननेवाला होता, तो यह आग ही क्यों लगाता।

सहसा थानेदार ने पूछा--हुजूर से तो इनकी जान-पहचान है?

सलीम ने चिढ़ कर कहा---यह आपसे किसने कहा? मेरी सैकड़ों से जान-पहचान है, तो फिर? अगर मेरा लड़का भी क़ानून के खिलाफ़ काम करे, तो मुझे उसकी तंबीह करनी पड़ेगी।

थानेदार ने खुशामद की---मेरा यह मतलब नहीं था हुजूर! हुजूर से जान-पहचान होने पर भी उन्होंने हुजूर को बदनाम करने में ताम्मुल न किया, मेरी यही मंशा थी।

सलीम ने कुछ जवाब तो न दिया; पर यह उस मुआमले का नया पहलू था। अमर को उसके इलाके में यह तूफान न उठाना चाहिए था। आखिर अफ़सरान यही तो समझेंगे कि यह नया आदमी है, अपने इलाके पर इसका रोब नहीं है।

बादल फिर घिरा आता था। रास्ता भी ख़राब था। उस पर अँधेरी रात, नदियों का उतार; मगर उसका ग़ज़नवी से मिलना ज़रूरी था। कोई तजर्बेकार अफ़सर इस क़दर बदहवास न होता; पर सलीम था नया आदमी।

दोनों आदमी रात-भर की हैरानी के बाद सबेरे मदर पहुँचे। आज
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मियाँ सलीम को आँटे दाल का भाव मालूम हुआ। यहाँ केवल हुकूमत नहीं है, हैरानी और जोखिम भी है, इसका अनुभव हुआ। जब पानी का झोंका आता या कोई नाला सामने आ पड़ता, तो वह इस्तीफ़ा देने की ठान लेता---यह नौकरी है या बला है! मजे से जिन्दगी गुजरती थी। यहाँ कूत्ते-खसी में आ फंँसा। लानत है ऐसी नौकरी पर! कहीं मोटर खड्ड में जा पड़े, तो हड्डियों का भी पता न लगे। नयी मोटर चौपट हो गयी।

बँगले पर पहुँचकर उसने कपड़े बदले, नाश्ता किया और आठ बजे ग़ज़नवी के पास जा पहुँचा। थानेदार कोतवाली में ठहरा था। उसी वक्त बह भी हाज़िर हुआ।

ग़ज़नवी ने वृत्तान्त सुनकर कहा--अमरकान्त कुछ दीवाना तो नहीं हो गया है? बातचीत से तो बड़ा शरीफ़ मालूम होता था; मगर लीडरी भी मुसीबत है। बेचारा कैसे नाम पैदा करे। शायद हजरत समझे होंगे, यह लोग तो दोस्त हो ही गये, अब क्या फ़िक्र। 'सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का!' और ज़िलों में भी तो शोरिश है। मुमकिन है, वहाँ से ताकीद हुई हो। सूझी है इन सभों को दूर की। हक यह है कि किसानों की हालत नाजुक है। यों भी बेचारों को पेटभर दाना न मिलता था, अब तो जिन्सें और भी सस्ती हो गयीं, पूरा लगान कहां, आधे की भी गुंजाइश नहीं है, मगर सरकार का इन्तजाम तो होना ही चाहिए। हुकूमत में कुछ-न-कुछ खौफ़ और रोब का होना भी जरूरी है, नहीं उसकी सुनेगा कौन। किसानों को आज यक़ीन हो जाय कि आधा लगान देकर उनकी जान बच सकती है, तो कल वह चौथाई पर लड़ेंगे और परसों पूरी मुआफ़ी का मुतालबा करेंगे। मैं तो समझता हूँ, आप जाकर लाला अमरकान्त को गिरफ्तार कर लें। एक बार कुछ हलचल मचेगी, मुमकिन है, दो-चार गाँवों में फ़साद भी हो; मगर खुले हुए फसाद को रोकना उतना मुश्किल नहीं है, जितना इस हवा को। मवाद जब फोड़े की सूरत में आ जाता है, तो उसे चीरकर निकाल दिया जा सकता है। लेकिन वही दिल-दिमाग की तरफ चला जाय, तो ज़िन्दगी का खात्मा हो जायगा। आप अपने साथ सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस को भी ले लें और अमर को दफा १२४ में गिरफ्तार कर लें। उस स्वामी को भी लीजिए। दारोगाजी आप जाकर माहब बहादुर से कहिए, तैयार रहें। [ ३२० ]सलीम ने व्यथित कण्ठ से कहा--मैं जानता कि यहाँ आते-ही-आते इस अजाब में जान फंँसेगी, तो किसी और जिले को कोशिश करता। क्या अब मेरा तबादला नहीं हो सकता?

थानेदार ने पूछा--हुजूर कोई खत न देंगे?

ग़ज़नवी ने डाँट बतायी--ख़त की जरूरत नहीं है। क्या तुम इतना भी नहीं कह सकते?

थानेदार सलाम करके चला गया, तो सलीम ने कहा--आपने इसे बुरी तरह डाँटा, बेचारा रुआँसा हो गया। आदमी अच्छा है।

ग़ज़नवी ने मुसकराकर कहा--जी हाँ, बहुत अच्छा आदमी है। रसद खूब पहुँचाता होगा; मगर रिआया से उसकी दसगुनी वसूल करता है। जहाँ किसी मातहत ने ज़रूरत से ज्यादा खिदमत और खुशामद की, मैं समझ जाता हूँ कि यह छटा हुआ गुर्गा है। आपकी लियाकत का यह हाल है कि इलाके में सदा वारदातें होती हैं, एक का भी पता नहीं चलता। इसे झुठी शहादतें बनाना भी नहीं आता। बस खुशामद की रोटियाँ खाता है। अगर सरकार पुलिस का सुधार कर सके, तो स्वराज्य की माँग पचास साल के लिए टल सकती है। आज कोई शरीफ़ आदमी पुलिस से सरोकार नहीं रखना चाहता। थाने को बदमाशों का अड्डा समझकर उधर से मुंह फेर लेता है। यह सीगा इस राज का कलंक है। अगर आपको अपने दोस्त को गिरफ्तार करने में तकल्लुफ़ हो, तो मैं डी० एस० पी० को ही भेज दूं। उन्हें गिरफ्तार करना अब हमारा फर्ज हो गया है। अगर आप यह नहीं चाहते कि उनकी जिल्लत हो, तो आप जाइए। अपनी दोस्ती का हक़ अदा करने ही के लिए जाइए। मैं जानता हूँ, आपको सदमा हो रहा है। मुझे खुद रंज है। उस थोड़ी देर की मुलाकात में ही मेरे दिल पर उनका सिक्का जम गया। मैं उनके नेक इरादों की क़द्र करता हूँ; लेकिन हम और वह दो कैम्पों में हैं। स्वराज्य हम भी चाहते हैं; मगर इनक़लाब की सूरत में नहीं। हालाँकि कभी-कभी मुझे भी ऐसा मालूम होता है कि इनक़लाब के सिवा हमारे लिए दूसरा रास्ता नहीं हैं। इतनी फौज रखने की क्या जरूरत है, जो सरकार की आमदनी का आधा हजम कर जाय। फ़ौज का खर्च आधा कर दिया जाय, तो किसानों का लगान बड़ी आसानी से आधा हो सकता है। मुझे अगर
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स्वराज्य से कोई ख़ौफ है तो यह कि मुसलमानों की हालत कहीं और खराब न हो जाय। गलत तवारीखें पढ़-पढ़ कर दोनों फिरके एक दूसरे के दुश्मन हो गये हैं और मुमकिन नहीं कि हिन्दू मौका पाकर मुसलमानों से पुरानी अदावतों का बदला न लें, लेकिन इस ख्याल से तसल्ली होती है कि इस बीसवीं सदी में हिन्दुओं जैसी पढ़ी-लिखी जमाअत मज़हबी गरोहबन्दी की पनाह नहीं ले सकती। मज़हब का दौर तो ख़त्म हो रहा है; बल्कि यों कहो कि ख़त्म हो गया। सिर्फ हिन्दुस्तान में उसमें कुछ-कुछ जान बाकी है। यह तो दौलत का ज़माना है। अब कौम में अमीर और ग़रीब, जायदादवाले और मर-भुखे, अपनी-अपनी जमाअतें बनायेंगे। उनमें कहीं ज्यादा खूंरेजी होगी, कहीं ज्यादा तंगदिली होगी। आखिर एक-दो सदी के बाद दुनिया में एक सल्तनत हो जायगी। सबका एक कानून एक निज़ाम होगा, कौम के खादिम कौम पर हुकूमत करेंगे, मजहब शख्सी चीज़ होगी। न कोई राजा होगा, न कोई परजा।

फ़ोन की घण्टी बजी, ग़ज़नवी ने चोंगा कान से लगाया--मि० सलीम कब चलेंगे?

ग़ज़नवी ने पूछा--आप कब तैयार होंगे?

'मैं तैयार हूँ।'

'तो एक घण्टे में आ जाइए।'

सलीम ने लम्बी साँस खींचकर कहा--तो मुझे जाना ही पड़ेगा?

'बेशक! मैं आपके और अपने दोस्त को पुलिस के हाथ में नहीं देना चाहता।'

'किसी हीले से अमर को यहीं बुला क्यों न लिया जाय?'

'वह इस वक्त नहीं आयेंगे।'

सलीम ने सोचा, अपने शहर में जब यह ख़बर पहुँचेगी कि मैंने अमर को गिरफ्तार किया, तो मुझ पर कितने जूते पड़ेंगे! शांतिकुमार तो नोच ही खायेंगे और सकीना तो शायद मेरा मुँह देखना भी पसन्द न करे। इस ख़्याल से वह काँप उठा। सोने की हँसिया न उगलते बनती थी, न निगलते।

उसने उठकर कहा--आप डी० एम० पी० को भेज दें। मैं नहीं जाना चाहता। [ ३२२ ]ग़ज़नवी ने गंभीर होकर पूछा--आप चाहते हैं कि उन्हें वहीं से हथकड़ियाँ पहनाकर और कमर में रस्सी डालकर चार कांसटेबलों के साथ लाया जाय और जब पुलिस उन्हें लेकर चले तो उसे भीड़ को हटाने के लिए गोलियाँ चलानी पड़ें?

सलीम ने घबड़ाकर कहा--क्या डी० एस० पी० को इन साख्तियों से रोका नहीं जा सकता?

'अमरकान्त आपके दोस्त हैं, डी० एस० पी० के दोस्त नहीं।'

'तो फिर आप डी० एस० पी० को मेरे साथ न भेजें।'

'आप अमर को यहाँ ला सकते हैं?'

'दग़ा करनी पड़ेगी।'

'अच्छी बात है, आप जाइए, मैं डी० एस० पी० को मना किए देता हूँ।'

'मैं वहाँ कुछ कहूँगा ही नहीं।'

'इसका आपको अख्तियार है।'

सलीम अपने डेरे पर लौटा, तो ऐसा रंजीदा था, गोया अपना कोई अज़ीज़ मर गया हो। आते ही आते उसने सकीना, शांतिकुमार, लाला समरकान्त, नैना, सबों को एक-एक खत लिखकर अपनी मजबूरी और दुःख प्रकट किया। सकीना को उसने लिखा--मेरे दिल पर इस वक्त जो गुज़र रही है, वह मैं तुमसे बयान नहीं कर सकता! शायद अपने जिगर पर खंजर चलाते हुए भी मुझे इससे ज्यादा दर्द न होता। जिसकी मुहब्बत मुझे यहाँ खींच लाई, उसी को मैं आज इन ज़ालिम हाथों से गिरफ्तार करने जा रहा हूँ। सकीना, खुदा के लिए मुझे कमीना, बेदर्द और खुदगरज न समझो! मैं खून के आँसू रो रहा हूँ। इसे अपने आँचल से पोंछ दो। मुझ पर अमर के इतने एहसान है कि मुझे उनके पसीने की जगह अपना खून बहाना चाहिए था; पर मैं उनके खून का मजा ले रहा हूँ। मेरे गले में शिकारी का तौक़ है और उसके इशारे पर मैं वह सब कुछ करने पर मजबूर हूँ, जो मुझे न करना लाजिम था। मुझ पर रहम करो, सकीना! मैं बदनसीब हूँ।

खानसामा ने आकर पूछा--हुजूर, खाना तैयार है।

सलीम ने सिर झुकाये हुए कहा--मुझे भूख नहीं है।

खानसामा पूछना चाहता था, हुजूर की तबीयत कैसी है। मेज पर कई [ ३२३ ]लिखे खत देखकर डर रहा था कि घर से कोई बरी खबर तो नहीं आई।

सलीम ने सिर उठाया और हसरत भरे स्वर में बोला--उस दिन वह मेरे एक दोस्त नहीं आये थे, वहीं देहातियों की-सी सूरत बनाये हुए। वह मेरे बचपन के साथी है। हम दोनों ने एक ही कालेज में पढ़ा। घर के लखपती आदमी हैं। बाप हैं, बाल-बच्चे हैं। इतने लायक हैं कि मुझे उन्होंने पढ़ाया। चाहते, तो किसी अच्छे ओहदे पर होते। फिर उनके घर ही किस बात की कमी है; मगर गरीबों का इतना दर्द है कि घर-बार छोड़कर यहीं एक गाँव में किसानों की खिदमत कर रहे हैं। उन्हीं को गिरफ्तार करने का मुझे हुक्म हुआ है।

खानसामा और समीप आकर जमीन पर बैठ गया--क्या क़सूर किया था हुजूर उन बाबू साहब ने?

'क़सूर कोई नहीं, यही कि किसानों की मुसीबत उनसे नहीं देखी जाती।'

'हुजूर ने बड़े साहब को समझाया नहीं?'

'मेरे दिल पर इस वक्त जो कुछ गुजर रही है, वह मैं ही जानता हूँ हनीफ़, आदमी नहीं फरिश्ता है। यह है सरकारी नौकरी।'

'तो हुजूर को जाना पड़ेगा?'

'हाँ, इसी वक्त! इस तरह दोस्ती का हक़ अदा किया जाता है!'

'तो उन बाबू साहब को नजरबन्द किया जायगा हुजूर?'

'खुदा जाने क्या किया जायगा। ड्राइवर से कहो, मोटर लाये। शाम तक लौट आना जरूरी है।'

ज़रा देर में मोटर आ गयी। सलीम उसमें आकर बैठा तो उसकी आँखें सजल थीं।