कर्मभूमि

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कर्मभूमि  (1932)  द्वारा प्रेमचंद
कर्मभूमि

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क र्म भू मि


प्रेमचंद
















हंस प्रकाशन
इलाहाबाद
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प्रकाशक
अमृतराय
हंस प्रकाशन
इलाहाबाद









मुद्रक
सम्मेलन मुद्रणालय
प्रयाग
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निवेदन

संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो उपन्यास को इतिहास की दृष्टि से पढ़ते हैं। उनसे हमारा यह निवेदन है कि जिस तरह इस पुस्तक के पात्र कल्पित है, उसी तरह इसके स्थान भी कल्पित है। बहुत सम्भव है कि लाला समरकान्त और अमरकान्त, सुखदा और नैना, सलीम और सकीना नाम के व्यक्ति संसार में हों; पर कल्पित और यथार्थ व्यक्तियों में वह अन्तर अवश्य होगा, जो ईश्वर और ईश्वर के बनाये हुए मनुष्य की सृष्टि में होना चाहिए। उसी भाँति इस पुस्तक के काशी और हरिद्वार भी कल्पित स्थान है, और बहुत संभव है कि उपन्यास में चित्रित घटनाओं और दृश्यों को संयुक्तप्रांत के इन दोनों तीर्थ-स्थानों में आप न पा सकें। हम ऐसे चरित्रों और स्थानों के ऐसे नाम आविष्कार न कर सके, जिनके विषय में यह विश्वास होता कि इनका कहीं अस्तित्व नहीं है। तो फिर अमरकान्त और काशी ही क्या बुरी। अमरकान्त की जगह टमरकान्त हो सकता था और काशी की जगह टासी या दुम्दल या डम्पू; लेकिन हमने ऐसे-ऐसे विचित्र नाम सुने हैं कि ऐसे नामों के भी व्यक्ति या स्थान निकल आयें, तो आश्चर्य नहीं! फिर जब हम अपने झोपड़े का नाम 'शान्ति-उपवन' और 'सन्त-धाम' रखते हैं और अपने सड़ियल पुत्र का रामचन्द्र या हरिश्चन्द्र तो हमने अपने पात्र और स्थानों के लिए सुन्दर से सुन्दर और पवित्र से पवित्र नाम रखे तो क्या कुछ अनुचित किया ?

५ सितम्बर, १९३२
प्रेमचंद
 
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हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फीस का दाखिल होना अनिवार्य है। या तो फीस दीजिए, या नाम कटवाइए; या जब तक फीस न दाखिल हो, रोज कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं-कहीं ऐसा भी नियम है, कि उस दिन फीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख को दुगुनी फीस न दी तो नाम कट जाता है। काशी के क्वीन्स कॉलेज में यही नियम था। ७वीं तारीख को फीस न दो, तो २१वीं तारीख को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जायँ। वह हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रिआयत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ, कर्ज लो, गहने गिरवी रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फीस जरूर दो, नहीं दूनी फीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रिआयत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता। वहाँ स्थायी रूप से मार्शल-लॉ का व्यवहार होता है। कचहरी में पैसे का राज है, उससे कहीं कठोर, कहीं निर्दय यह राज है। देर में आइए तो जुर्माना, न आइए तो जुर्माना, सबक न याद हो तो जुर्माना, किताबें न खरीद सकिये तो जुर्माना, कोई अपराध हो जाए तो जुर्माना, शिक्षालय क्या है जुर्मानालय है। यही हमारी पश्चिमी शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफों के पूल बाँधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों से पैसे पर जान देनेवाले, पैसे के लिए ग़रीबों का
[  ]गला काटनेवाले, पैसे के लिए अपनी आत्मा को बेच देनेवाले छात्र निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या है ?

आज वही वसूली की तारीख है। अधयापकों की मेजों पर रुपयों के ढेर लगे हैं। चारों तरफ खनाखन की आवाजें आ रही हैं। सराफे में भी रुपये की ऐसी झंकार कम सुनाई देती है। हरेक मास्टर तहसील का चपरासी बना बैठा हुआ है। जिस लड़के का नाम पुकारा जाता है, वह अध्यापक के सामने जाता है, फीस देता है और अपनी जगह पर आ बैठता है। मार्च का महीना है। इसी महीने में एप्रिल, मई और जून की फीस भी वसूल की जा रही है। इम्तहान की फीस भी ली जा रही है। दसवें दर्जे में तो एक-एक लड़के को ४०) देने पड़ रहे हैं।

अधयापक ने बीसवें लड़के का नाम पुकारा-अमरकान्त !

अमरकान्त गैरहाजिर था।

अधयापक ने पूछा--क्या आज अमरकान्त नहीं आया?

एक लड़के ने कहा--आये तो थे, शायद बाहर चले गये हों ?

'क्या फीस नहीं लाया है ?'

किसी लड़के ने जवाब नहीं दिया।

अध्यापक की मुद्रा पर खेद की रेखा झलक पड़ी। अमरकान्त अच्छे लड़कों में था। बोले--शायद फीस लाने गया होगा। इस घंटे में न आया, तो दूनी फीस देनी पड़ेगी। मेरा क्या अख्तियार है। दूसरा लड़का चले--गोवर्धनलाल !

सहसा एक लड़के ने पूछा--अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं बाहर जाकर देखूँ ।

अधयापक ने मुस्कराकर कहा-घर की याद आई होगी। खैर, जाओ, मगर दस मिनट के अंदर आ जाना। लडकों को बुला-बुलाकर फीस लेना मेरा काम नहीं है।

लड़के ने नम्रता से कहा--अभी आता हूं। कसम ले लीजिए, जो हाते के बाहर जाऊँ ।

यह इस कक्षा के संपन्न लड़कों में था, बड़ा खिलाड़ी, बड़ा बैठकबाज। हाजिरी देकर गायब हो जाता, तो शाम की खबर लाता। हर महीने फीस [  ]की दूनी रकम जुर्माना दिया करता था। गोरे रंग का, लंबा, छरहरा, शौकीन युवक था। जिसके प्राण खेल में बसते थे। नाम था मोहम्मद सलीम।

सलीम और अमरकान्त दोनों पास-पास बैठते थे। सलीम को हिसाब लगाने में, तर्जुमा करने में अमरकान्त से विशेष सहायता मिलती थी। उसकी कापी से नकल कर लिया करता था। इससे दोनों में दोस्ती हो गई थी। सलीम कवि था। अमरकान्त उसकी गजलें बड़े चाव से सुना करता था। मैत्री का यह एक और कारण था।

सलीम ने बाहर जाकर इधर-उधर निगाह दौड़ाई, अमरकान्त का कहीं पता न था। जरा और आगे बढे, तो देखा, वह एक वृक्ष की आड़ में खड़ा है। पुकारा--अमरकान्त ! ओ बुद्धूलाल ! चलो फीस जमा करो, पंडितजी बिगड़ रहे हैं।

अमरकान्त ने अचकन के दामन से आँखें पोंछ लीं, और सलीम की तरफ आता हुआ बोला--क्या मेरा नंबर आ गया ?

सलीम ने उसके मुँह की तरफ देखा, तो उसकी आँखें लाल थीं। वह अपने जीवन में शायद ही कभी रोया हो। चौंककर बोला--अरे तुम रो रहे हो ! क्या बात है ?

अमरकान्त साँवले रंग का, छोटा-सा दुबला-पतला कुमार था। अवस्था बीस की हो गई थी; पर अभी मसें भी न भीगी थीं। चौदह-पंद्रह साल का किशोर-सा लगता था। उसके मुख पर एक वेदनामय दृढ़ता, जो निराशा से बहुत कुछ मिलती-जुलती थी, अंकित हो रही थी, मानो संसार में उसका कोई नहीं है। इसके साथ ही उसकी मुद्रा पर कुछ ऐसी प्रतिभा, कुछ ऐसी मनस्विता थी, कि एक बार उसे देखकर फिर भूल जाना कठिन था।

उसने मुस्कराकर कहा--कुछ नहीं जी, रोता कौन है !

'आप रोते हैं, और कौन रोता है। सच बताओ क्या हुआ है ?'

अमरकान्त की आँखें फिर भर आयी। लाख यत्न करने पर भी आँसू न रूक सके। सलीम समझ गया। उसका हाथ पकड़कर बोला--क्या फीस के लिए रो रहे हो ? भले आदमी, मुझसे क्यों न कह दिया। तुम मुझे भी गैर समझते हो ? कसम खुदा की, बड़े नालायक आदमी हो तुम। ऐसे आदमी को गोली मार देनी चाहिए ! दोस्तों से भी यह गैरियत ! चलो क्लास


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में, मैं फीस दिए देता हूँ। जरा-सी बात के लिए घंटे-भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता!

अमरकान्त को तसल्ली तो हुई पर अनुग्रह के बोझ से उसकी गर्दन दब गई। बोला--पंडितजी आज मान न जाएंगे?

सलीम ने खड़े होकर कहा--पंडितजी के बस की बात थोड़े ही है। यही सरकारी कायदा है। मगर हो तुम बड़े शैतान, वह तो खैरियत हो गई, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खूब इम्तहान देते! देखो, आज एक ताज़ा ग़ज़ल कही है। पीठ सहला देना--

आपको मेरी वफ़ा याद आई,

खै़र है आज यह क्या याद आई।

अमरकान्त का व्यथित चित्ता इस समय गजल सुनने को तैयार न था; पर सुने बगैर काम भी तो नहीं चल सकता। बोला--नाजुक चीज़ है। खूब कहा है। मैं तुम्हारी ज़बान की सफ़ाई पर जान देता हूँ।

सलीम यही तो ख़ास बात है भाई साहब! लफ्ज़ों की झंकार का नाम ग़ज़ल नहीं है। दूसरा शेर सुनो--

फिर मेरे सीने में एक हूक उठी,

फिर मुझे तेरी अदा याद आई

अमरकान्त ने फिर तारीफ़ की--लाजवाब चीज़ है। कैसे तुम्हें ऐसे शेर सूझ जाते हैं?

सलीम हँसा--उसी तरह, जैसे तुम्हें हिसाब और मजमन सूझ जाते हैं। जैसे ऐसोसियेशन में स्पीचें दे लेते हो। आओ पान खाते चलें।

दोनों दोस्तों ने पान खाये और स्कूल की तरफ़ चले। अमरकान्त ने कहा--पण्डितजी बड़ी डांट बतायेंगे।

'फीस ही तो लेंगे!'

'और जो पूछें, अब तक कहाँ थे?'

'कह देना, फ़ीस लाना भूल गया था।'

'मुझसे तो न कहते बनेगा। मैं साफ़-साफ़ कह दूँगा।'

'तो तुम पिटोगे भी मेरे हाथ से!" [  ]संध्या समय जब छुट्टी हुई और दोनों मित्र घर चले, तो अमरकान्त ने कहा--तुमने आज मुझ पर जो एहसान किया है.......

सलीम ने उसके मुँह पर हाथ रखकर कहा--बस खबरदार, जो मुँह से एक आवाज भी निकाली। कभी भूलकर भी इसका जिक्र न करना।

'आज जलसे में आओगे?'

'मजमून क्या है, मुझे तो याद नहीं।'

'अजी वही पश्चिमी सभ्यता है।'

'तो मुझे दो चार पाइंट बता दो, नहीं मैं वहां कहूँगा क्या?"

'बताना क्या है। पश्चिमी सभ्यता की बुराइयाँ हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।'

'तुम जानते होगे, मुझे तो एक भी नहीं मालूम ।'

'एक तो यह तालीम ही है। जहाँ देखो वहीं दुकानदारी। अदालत की दुकान, इल्म की दुकान, सेहत की दुकान, इस एक पाइन्ट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है।'

'अच्छी बात है, आऊँगा।'

अमरकान्त के पिता लाला समरकान्त बड़े उद्योगी परुष थे। उनके पिता केवल एक झोपड़ी छोड़कर मरे थे; मगर समरकान्त ने अपने बाहुबल से लाखों की सम्पत्ति जमा कर ली थी। पहले उनकी एक छोटी-सी हल्दी की आढत थी। हल्दी से गुड़ और चावल की बारी आयी। तीन बरस तक लगातार उनके व्यापार का क्षेत्र बढ़ता ही गया। अब आढ़ते बन्द कर दी थीं। केवल लेन-देन करते थे। जिसे कोई महाजन रुपये न दे, उसे वह बेखटके दे देते और वसूल भी कर लेते। उन्हें आश्चर्य होता था, किसी के रुपये मारे कैसे जाते हैं ऐसा मेहनती आदमी भी कम होगा। घड़ी रात रहे गंगास्नान करने चले जाते और सूर्योदय के पहले विश्वनाथजी के दर्शन करके दुकान पर पहुँच जाते। वहाँ मुनीम को जरूरी काम समझाकर तगादे पर निकल जाते और तीसरे पहर लौटते । भोजन करके फिर दुकान आ जाते [ १० ]और आधी रात तक डटे रहते थे भी भीमकाय। भोजन तो एक ही बार करते थे। पर खूब डटकर। दो-ढाई सौ मुग्दर के हाथ अभी तक फेरते थे। अमरकान्त की माता का उसके बचपन ही में देहान्त हो गया था। समरकान्त ने मित्रों के कहने सूनने से दूसरा विवाह कर लिया था। उस सात साल के बालक ने नयी माँ का बड़े प्रेम से स्वागत किया; लेकिन उसे जल्द मालूम हो गया, कि उसकी नयी माता उसकी ज़िद और शरारतों को उस क्षमादृष्टि से नहीं देखतीं, जैसे उसकी माँ देखती थी। वह अपनी माँ का अकेला लाड़ला लड़का था, बड़ा जिद्दी, बड़ा नटखट । जो बात मुँह से निकल जाती उसे पूरा करके ही छोड़ता। नई माताजी बात बात पर डाँटती थीं। यहाँ तक कि उसे माता से द्वेष हो गया। जिस बात को वह मना करतीं, उसे वह अदबदाकर करता। पिता से भी ढीठ हो गया। पिता और पुत्र में स्नेह का बन्धन न रहा। लालाजी जो काम करते, बेटे को उससे अरुचि होती। वह मलाई के प्रेमी थे, बेटे को मलाई से अरुचि थी। वह पूजा-पाठ बहुत करते थे, लड़का इसे ढोंग समझता था। वह परले सिरे के लोभी थे, लड़का पैसे को ठीकरा समझता था।

मगर कभी-कभी वराई से भलाई पैदा हो जाती है। पुत्र सामान्य रीति से पिता का अनुगामी होता है। महाजन का बेटा महाजन, पण्डित का पण्डित, वकील का वकील, किसान का किसान होता है ; मगर यहाँ इस द्वेष ने महाजन के पुत्र को महाजन का शत्रु बना दिया। जिस बात का पिता ने विरोध किया, वह पुत्र के लिए मान्य हो गयी, और जिसको सराहा, वह त्याज्य। महाजनी के हथकण्डे और षडयन्त्र उसके सामने रोज़ ही रचे जाते थे। उसे इस व्यापार से घृणा होती थी। इसे चाहे पूर्वसंस्कार कह लो; पर हम तो यही कहेंगे, कि अमरकान्त के चरित्र का निर्माण पितृ-द्वेष के हाथों हुआ।

खारयत यह हुई कि उसके कोई सौतेला भाई न हुआ। नहीं शायद वह घर से निकल गया होता। समरकान्त अपनी सम्पत्ति को पुत्र से ज्यादा मूल्यवान् समझते थे। पुत्र के लिए तो सम्पत्ति की कोई जरूरत न थी; पर सम्पत्ति के लिए पुत्र की जरूरत थी विमाता की तो इच्छा यही थी, कि उसे बनवास देकर अपनी चहेती नैना के लिए रास्ता साफ कर दे; पर समर

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