कर्मभूमि/दूसरा भाग १

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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दूसरा भाग
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उत्तर की पर्वत श्रेणियों के बीच एक छोटा-सा रमणीक पहाड़ी गाँव है। सामने गंगा किसी बालिका की भाँति हँसती-उछलती, नाचती-गाती, दौड़ती चली जाती है। पीछे ऊँचा पहाड़ किसी वृद्ध योगी की भाँति जटा बढ़ाये, श्याम गंभीर, विचार-मग्न खड़ा है। यह गाँव मानो उसकी बाल-स्मृति है, आमोद-विनोद से रंजित, या कोई युवावस्था का सुनहरा, मधुर स्वप्न। अब भी उन स्मृतियों को हृदय में सुलगाये हुए, उस स्वप्न को छाती से चिपकाये हुए है।

उस गाँव में मुश्किल से बीस-पच्चीस झोपड़े होंगे। पत्थर के रोड़ों को तले ऊपर रखकर दीवारें बना ली गई हैं। उन पर छप्पर डाल दिया गया है। द्वारों पर बनकट की टट्टियाँ हैं। उन्हीं काबुकों में उस गाँव की जनता अपने गाय-बैलों, भेड़-बकरियों को लिये अनन्तकाल से विश्राम करती चली आती है।

एक दिन संध्या समय एक साँवला सा, दुबला-पतला युवक, मोटा कुरता, ऊँची धोती और चमरौधे जूते पहने, कन्धे पर लुटिया-डोर रखे, बग़ल में एक पोटली दबाये इस गाँव में आया और एक बुढ़िया से पूछा--ज्यों माता, यहाँ एक परदेशी को रात भर का ठिकाना मिल जायगा?

बुढ़िया सिर पर एक लकड़ी का गट्ठा रखे, एक बूढ़ी गाय को हार की ओर से हाँकती चली आती थी। युवक को सिर से पाँव तक देखा, पसीने में तर सिर और मुँह पर गर्द जमी हुई, आँखें भूखी, मानो जीवन में कोई आश्रय ढूँढ़ता फिरता हो। दयार्द्र होकर बोली--यहाँ तो सब रैदास रहते हैं भैया !

अमरकान्त इसी भाँति महीनों से देहातों का चक्कर लगाता चला आ रहा है। लगभग पचास छोटे-बड़े गाँवों को वह देख चुका है, कितने ही
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आदमियों से उसकी जान पहचान हो गई है, कितने ही उसके सहायक हो गये हैं, कितने ही भक्त बन गये हैं। नगर का सुकुमार युवक दुबला तो हो गया है; पर धूप और लू, आँधी और वर्षा, भूख और प्यास सहने की शक्ति उसमें प्रखर हो गयी है। भावी जीवन की यही उसकी तैयारी है, यही तपस्या है। वह ग्रामवासियों की सरलता और हृदयता, प्रेम और सन्तोष से मुग्ध हो गया है। ऐसे सीधे-सादे, निष्कपट, मनुष्यों पर आये दिन जो अत्याचार होते रहते हैं, उन्हें देखकर उसका खून खौल उठता है। जिस शान्ति की आशा उसे देहाती जीवन की ओर खींच लाई थी, उसका यहाँ नाम भी न था । घोर अन्याय का राज्य था और अमर की आत्मा इस राज्य के विरुद्ध झण्डा उठाये फिरती थी।

अमर ने नम्रता से कहा--मैं जात-पाँत नहीं मानता, माताजी! जो सच्चा है, वह चमार भी हो, तो आदर के योग्य है; जो दगाबाज, झुठा, लम्पट हो, वह ब्राह्मण भी हो तो आदर के योग्य नहीं। लाओ, लकड़ियों का गट्ठा मैं लेता चलूँ।

उसने बुढ़िया के सिर से गट्ठा उतारकर अपने सिर पर रख लिया।

बुढ़िया ने आशीर्वाद देकर पूछा--कहाँ जाना है बेटा?

'यों ही माँगता-खाता हूँ माता, आना-जाना कहीं नहीं है। रात को सोने की जगह तो मिल जायगी?'

'जगह की कौन कमी है भैया, मन्दिर के चौतरे पर सो रहना। किसी साधु-सन्त के फेर में तो नहीं पड़ गये हो? मेरा भी एक लड़का उनके जाल में फँस गया। फिर कुछ पता न चला। अब तक कई लड़कों का बाप होता।'

दोनों गाँव में पहुँच गये। बुढ़िया ने अपनी झोपड़ी की टट्टी खोलते हुए कहा--लाओ, लकड़ी रख दो यहाँ। थक गये हो, थोड़ा-सा दूध रखा है, पी लो। और सब गोरू तो मर गये बेटा! यही गाय रह गयी है। एक पाव भर दूध दे देती है। खाने को तो पाती नहीं, दूध कहाँ से दे।

अमर ऐसे सरल स्नेह के प्रसाद को अस्वीकार न कर सका। झोपड़ी में गया, तो उसका हृदय काँप उठा। मानो दरिद्रता छाती पीट-पीटकर रो रही है। और हमारा उन्नत समाज विलास में मग्न है। उसे रहने को बँगला चाहिए, सवारी को मोटर। इस संसार का विध्वंस क्यों नहीं हो जाता?

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[ १४७ ]बुढ़िया ने दूध एक पीतल के कटोरे में उड़ेल दिया और आप घड़ा उठा कर पानी लाने चली। अमर ने कहा--मैं खींचे लाता हूँ माता, रस्सी तो कुएँ पर होगी?

'नहीं बेटा, तुम कहाँ जाओगे पानी भरने। एक रात के लिए आ गये, तो मैं तुमसे पानी भराऊँ ?'

बुढ़िया हाँ, हाँ करती रह गयी। अमरकान्त घड़ा लिये कुएँ पर पहुँच गया। बुढ़िया से न रहा गया। वह भी उसके पीछे-पीछे गयी।

कुएँ पर कई औरतें पानी खींच रही थीं। अमरकान्त को देखकर एक युवती ने पूछा--कोई पाहुने हैं क्या सलोनी काकी?

बुढ़िया हँसकर बोली--पाहुने न होते, तो पानी भरने कैसे आते ! तेरे घर ऐसे पाहुने आते हैं ?

युवती ने तिरछी आँखों से अमर को देखकर कहा--हमारे पाहुने तो अपने हाथ से पानी भी नहीं पीते काकी। ऐसे भोले-भाले पाहुने को मैं अपने घर ले जाऊँगी।

अमरकान्त का कलेजा धक् से हो गया। यह युवती वही मुन्नी थी, जो खून के मुक़दमे में बरी हो गयी थी। वह अब उतनी दुर्बल, चिन्तित नहीं है। रूप में माधुर्य है, अंगों में विकास, मुख पर हास्य की मधुर छवि। आनन्द जीवन का तत्व है। वह अतीत की परवाह नहीं करता। पर शायद मुन्नी ने अमरकान्त को नहीं पहचाना। उसकी सूरत इतनी बदल गयी है। शहर का सुकुमार युवक देहात का मजूर हो गया है।

अमर ने झेंपते हुए कहा--मैं पाहुना नहीं हूँ देवी, परदेशी हूँ। आज इस गाँव में आ निकला। इस नाते सारे गाँव का अतिथि हूँ।

युवती ने मुस्कराकर कहा--तब एक-दो घड़ों से पिंड न छूटेगा। दो सौ घड़े भरने पड़ेंगे, नहीं तो घड़ा इधर बढ़ा दो। झूठ तो नहीं कहती काकी?

उसने अमरकान्त के हाथ से घड़ा ले लिया और चट फंदा लगा, कुएँ में डाल, बात-की-बात में घड़ा खींच लिया।

अमरकान्त घड़ा लेकर चला गया, तो मुन्नी ने सलोनी से कहा--किसी भले घर का आदमी है काकी। देखा, कितना शर्माता था। मेरे यहाँ से अचार मँगवा लीजियो, आटा-वाटा तो है ?

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[ १४८ ]सलोनी ने कहा--बाजरे का है, गेहूँ कहाँ से लाती ?

'तो मैं आटा लिये आती हूँ। नहीं चलो दे दूँ। वहाँ काम-धन्धे में लग जाऊँगी तो सुरति न रहेगी।'

मुन्नी को तीन साल हुए मुखिया का लड़का हरिद्वार से लाया था। एक सप्ताह से एक धर्मशाले के द्वार पर जीर्ण दशा में पड़ी थी। बड़े-बड़े आदमी धर्मशाले में आते थे, सैकड़ों-हजारों दान करते थे; पर इस दुखिया पर किसी को दया न आती थी। वह चमार युवक जूते बेचने गया था। इस पर उसे दया आ गयी। गाड़ी पर लादकर घर लाया। दवा-दारू होने लगी; चौधरी बिगड़े, यह मुर्दा क्यों लाया; पर युवक बराबर दौड़-धूप करता रहा। वहाँ डाक्टर-वैद्य कहाँ थे। भभूत और आशीर्वाद का भरोसा था। एक ओझे की तारीफ़ सुनी, मुर्दो को जिला देता है। रात को उसे बुलाने चला, चौधरी ने कहा--दिन होने दो तब जाना। युवक ने न माना, रात को ही चल दिया। गंगा चढ़ी हुई थी। उसे पार करके जाना था। सोचा, तैरकर निकल जाऊँगा, कौन बहुत चौड़ा पाट है। सैकड़ों ही बार इस तरह आ-जा चुका था। निश्शंक पानी में घुस पड़ा; पर लहरें तेज थीं, पाँव उखड़ गये। बहुत सँभालना चाहा पर न सँभाल सका। दूसरे दिन दो कोस पर उसकी लाश मिली। एक चट्टान से चिमटी पड़ी थी। उसके मरते ही मुन्नी जी उठी और तबसे यहीं है। यही घर उसका घर है। यहाँ उसका आदर है, मान है। वह अपनी जात-पाँत भूल गयी, आचार-विचार भूल गयी,और ऊँच जाति की ठकुराइन अछूतों के साथ, अछूत बनकर आनन्दपूर्वक रहने लगी। वह घर की मालकिन थी। बाहर का सारा काम वह करती, भीतर की रसोई-पानी, कूटना-पीसना दोनों देवरानियाँ करती थीं। वह बाहरी न थी। चौधरी की बड़ी बहू हो गयी थी।

सलोनी को ले जाकर मुन्नी ने एक थाल में आटा, अचार और दही रखकर दिया; पर सलोनी को यह थाल लेकर घर में जाते लाज आती थी। पाहुना द्वार पर बैठा हुआ है। सोचेगा, इसके घर में आटा भी नहीं? ज़रा और अँधेरा हो जाय तो जाऊँ।

मुन्नी ने पूछा--क्या सोचती हो काकी?

'सोचती हूँ, जरा और अँधेरा हो जाय तो जाऊँ। अपने मन में क्या कहेगा !'

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[ १४९ ]'चलो मैं पहुँचा देती हूँ। कहेगा क्या, क्या समझता है यहाँ धन्ना सेठ बसते हैं ? मैं तो कहती हूँ, देख लेना वह बाजरे की ही रोटियाँ खायेगा। गेहूँ की छुयेगा भी नहीं।'

दोनों पहुँची तो देखा अमरकान्त द्वार पर झाड़ू लगा रहा है। महीनों से झाड़ू न लगी थी। मालूम होता था, उलझे-बिखरे बालों पर कंघी कर दी गायी है।

सलोनी थाली लेकर जल्दी से भीतर चली गयी। मुन्नी ने कहा--अगर ऐसी मेहमानी करोगे, तो यहाँ से कभी न जाने पाओगे।

उसने अमर के पास जाकर उसके हाथ से झाड़ू छीन ली। अमर ने कूड़े को पैरों से एक जगह बटोरकर कहा--सफाई हो गयी, तो द्वार कैसा अच्छा लगने लगा।

'कल चले जाओगे, तो यह बातें याद आवेंगी। परदेशियों का क्या विश्वास? फिर इधर क्यों आओगे ?'

मुन्नी के मुख पर उदासी छा गयी।

'जब कभी इधर आना होगा, तो तुम्हारे दर्शन करने अवश्य आऊँगा। ऐसा सुन्दर गाँव मैंने नहीं देखा। नदी, पहाड़, जंगल, इसकी शोभा ही निराली है। जी चाहता है, यहीं रह जाऊँ और कहीं जाने का नाम न लूँ।'

मुन्नी ने उत्सुकता से कहा--तो यहीं रह क्यों नहीं जाते।

मगर फिर कुछ सोचकर बोली--तुम्हारे घर में और लोग भी तो होंगे, वह तुम्हें यहाँ क्यों रहने देंगे ?

'मेरे घर में ऐसा कोई नहीं है, जिसे मेरे मरने-जीने की चिन्ता हो। मैं संसार में अकेला हूँ।'

मुन्नी आग्रह करके बोली--तो यहीं रह जाओ, कौन भाई हो तुम?

'यह तो मैं बिल्कुल भूल गया भाभी। जो बुलाकर प्रेम से एक रोटी खिला दे वही मेरा भाई है।'

'तो कल मुझे आ लेने देना। ऐसा न हो, चुपके से भाग जाओ।

अमरकान्त ने झोपड़ी में आकर देखा, तो बुढ़िया चूल्हा जला रही थी। गीली लकड़ी, आग न जलती थी। पोपले मुँह में फूँक भी न थी। अमर को

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देखकर बोली--तुम यहाँ धुएँ में कहाँ आ गये बेटा, जाकर बाहर बैठों, यह चटाई उठा ले जाओ।

अमर ने चूल्हे के पास जाकर कहा--तू हट जा, मैं आग जलाये देता हूँ।

सलोनी ने स्नेहमय कठोरता से कहा--तू बाहर क्यों नहीं जाता। मरदों का तो इस तरह रसोई में घुसना अच्छा नहीं लगता।

बुढ़िया डर रही थी, कि कहीं अमरकान्त दो प्रकार के आटे न देख ले। शायद वह उसे दिखलाना चाहती थी कि मैं भी गेहूँ का आटा खाती हूँ। अमर वह रहस्य क्या जाने। बोला--अच्छा तो आटा निकाल दे, मैं गूँध दूँ।

सलोनी ने हैरान होकर कहा--तू कैसा लड़का है भाई ! बाहर जाकर क्यों नहीं बैठता।

उसे वह दिन याद आये, जब उसके अपने बच्चे उसे अम्मा-अम्मा कहकर घेर लेते थे और वह उन्हें डाँटती थी। उस उजड़े हुए घर में आज एक दिया जल रहा था; पर कल फिर वही अंधेरा हो जायगा वही सन्नाटा। इस युवक की ओर क्यों उसकी इतनी ममता हो रही थी ? कौन जाने कहाँ से आया है, कहाँ जायगा; पर यह जानते हुए भी अमर का सरल बालकों का-सा निष्कपट व्यवहार, उसका बार-बार घर में आना और हरएक काम करने को तैयार हो जाना उसकी सूखी मातृ-भावना को सींचता हुआ-सा जान पड़ता था, मानो अपने ही सिधारे हुए बालक की प्रतिध्वनि कहीं दूर से उसके कानों में आ रही है।

एक बालक लालटेन लिये कन्धे पर एक दरी रखे आया और दोनों चीजें उसके पास रखकर बैठ गया। अमर ने पूछा--दरी कहाँ से लाये ?

'काकी ने तुम्हारे लिये भेजी है। वही काकी, जो अभी आई थीं।'

अमर ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा--अच्छा, तुम उनके भतीजे हो? तुम्हारी काकी कभी तुम्हें मारती तो नहीं !

बालक सिर हिलाकर बोला--कभी नहीं। वह तो हमें खेलाती हैं। दुरजन को नहीं खेलातीं, वह बड़ा बदमाश है।

अमर ने मुसकराकर पूछा--कहाँ पढ़ने जाते हो?

बालक ने नीचे का ओठ सिकोड़कर कहा--कहाँ जायँ, हमें कौन पढ़ाये। मदरसे में कोई जाने तो देता नहीं। एक दिन दादा हम दोनों को

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लेकर गये थे। पण्डितजी ने नाम लिख लिया; पर हमें सबसे अलग बैठाते थे। सब लड़के हमें 'चमार-चमार' कह चिढ़ाते थे। दादा ने नाम कटा दिया।

अमर की इच्छा हुई, चौधरी से जाकर मिले। कोई स्वाभिमानी आदमी मालूम होता है। पूछा--तुम्हारे दादा क्या कर रहे हैं ?

बालक ने लालटेन से खेलते हुए कहा--बोतल लिये बैठे हैं। भुने चने धरे हैं। बस अभी बक-बक करेंगे, खूब चिल्लायेंगे, किसी को मारेंगे, किसी को गालियाँ देंगे। दिन-भर कुछ नहीं बोलते। जहाँ बोतल चढ़ायी, कि बक चले।

अमर ने इस वक्त उनसे मिलना उचित न समझा।

सलोनी ने पुकारा–-भैया, रोटी तैयार है, आओ गरम-गरम खा लो।

अमरकान्त ने हाथ मुँह धोया और अन्दर पहुँचा। पीतल की थाली में रोटियाँ थीं, पथरी में दही, पत्ते पर अचार, लोटे में पानी रखा हुआ था।

थाली पर बैठकर बोला--तुम भी क्यों नहीं खातीं?

'तुम खालो बेटा, मैं फिर खा लूँगी।'

'नहीं मैं यह न मानूँगा । मेरे साथ खाओ!'

'रसोई जूठी हो जायगी कि नहीं?'

'हो जाने दो। मैं ही तो खानेवाला हूँ ?'

'रसोई में भगवान रहते हैं। उसे जूठो न करना चाहिये।'

'तो मैं भी बैठा रहूँगा।'

'भाई, तू बड़ा खराब लड़का है।'

रसोई में दूसरी थाली कहाँ थी। सलोनी ने हथेली पर बाजरे की रोटियाँ ले लीं और रसोई के बाहर निकल आई। अमर ने बाजरे की रोटियाँ देख लीं। बोला--यह न होगा काकी? मुझे तो यह फुलके दे दिये, आप मजेदार रोटियाँ उड़ा रही हो।

'तू क्या खायेगा बाजरे की रोटियाँ बेटा? एक दिन के लिये आ पड़ा तो बाजरे की रोटियाँ खिलाऊँ ?'

मैं तो मेहमान नहीं हूँ। यही समझ लो, कि तुम्हारा कोई खोया हुआ बालक आ गया है।'

'पहले दिन उस लड़के की भी मेहमानी की जाती है। मैं तुम्हारी क्या

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मेहमानी करूँगी बेटा ? रूखी रोटियाँ भी कोई मेहमानी है ? न दारू, न शिकार।'

'मैं तो दारू शिकार छूता भी नहीं काकी।'

अमरकान्त ने बाजरे की रोटियों के लिये ज्यादा आग्रह न किया। बुढ़िया को और दुःख होता। दोनों खाने लगे। बुढ़िया यह बात सुनकर बोली--इस उमिर में तो भगतई नहीं अच्छी लगती बेटा? यही तो खाने-पीने के दिन है। भगतई के लिये तो बुढ़ापा है ही।

'भगत नहीं हूँ काकी। मेरा मन नहीं चाहता।'

'माँ-बाप भगत रहे होगे।'

'हाँ, वह दोनों जने भगत थे।'

'अभी दोनों हैं न?'

'अम्मा तो मर गयीं, दादा हैं। उनसे मेरी नहीं पटती।'

'तो घर से रूठकर आये हो?'

'एक बात पर दादा से कहा-सुनी हो गयी। मैं चला आया।'

'घरवाली तो है न?'

'हाँ, वह भी है।'

'बेचारी रो-रोकर मरी जाती होगी। कभी चिट्ठी-पत्री लिखते हो?'

'उसे भी मेरी परवाह नहीं है काकी? बड़े घर की लड़की है। अपने भोग विलास में मगन है। मैं कहता हूँ, चल किसी गाँव में खेती-बारी करें। उसे शहर अच्छा लगता है।'

अमरकान्त भोजन कर चुका, तो अपनी थाली उठा ली और बाहर आकर माँजने लगा। सलोनी भी पीछे-पीछे आकर बोली--तुम्हारी थाली मैं माँज देती, तो छोटी हो जाती?

अमर ने हँसकर कहा--तो मैं अपनी थाली माँजकर छोटा हो जाऊँगा?

'यह तो अच्छा नहीं लगता कि एक दिन के लिये कोई आया तो थाली माँजने लगे। अपने मन में सोचते होगे, कहाँ इस भिखारिन के घर ठहरा।'

अमरकान्त के दिल पर चोट न लगे, इसलिए वह मुसकराई।

उसने थाली धोकर रख दी और दरी बिछाकर ज़मीन पर लेटने ही जा रहा था, कि पन्द्रह बीस लड़कों का एक दल खड़ा हो गया । दो-तीन

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लड़कों के सिवा और किसी के देह पर साबित कपड़े न थे। अमरकान्त कुतूहल से उठ बैठा, मानो कोई तमाशा होनेवाला है।

जो बालक अभी दरी लेकर आया था, आगे बढ़कर बोला--इतने लड़के हैं हमारे गाँव में। दो-तीन नहीं आये, कहते थे वे कान काट देंगे।

अमरकान्त ने उठकर उन सभी को एक कतार में खड़ा किया और एक-एक का नाम पूछा। फिर बोले--तुममें जो रोज़ हाथ मुँह धोता है, अपना हाथ उठाये।

किसी लड़के ने हाथ न उठाया। यह प्रश्न किसी की समझ में न आया।

अमर ने आश्चर्य से कहा--ऐं ! तुममें से कोई रोज हाथ-मुँह नहीं धोता?

सबों ने एक दूसरे की ओर देखा। दरीवाले लड़के ने हाथ उठा दिया। उसे देखते ही दूसरों ने भी हाथ उठा दिये।

अमर ने फिर पूछा--तुममें से कौन-कौन लड़के रोज नहाते हैं ? हाथ उठायें।

पहले किसी ने हाथ न उठाया। फिर एक-एक करके सबों ने हाथ उठा दिये। इसलिए नहीं कि सभी रोज नहाते थे, बल्कि इसलिए कि वह दूसरों से पीछे न रहें।

सलोनी खड़ी थी। बोली--तू तो महीने भर में भी नहीं नहाता रे जंगलिया ! तू क्यों हाथ उठाये हुए है ?

जंगलिया ने अपमानित होकर कहा--तो गूदड़ ही कौन रोज नहाता है। भुलई, पुन्नू, घसीटे, कोई भी तो नहीं नहाता।

सभी एक दूसरे की कलई खोलने लगे।

अमर ने डाँटा-–अच्छा आपस में लड़ो मत। मैं एक बात पूछता हूँ, उसका जवाब दो। रोज मुंह हाथ धोना अच्छी बात है या नहीं ?

सबों ने कहा--अच्छी बात है।

'और नहाना?'

सबों ने कहा--अच्छी बात है।

'मुंह से कहते हो या दिल से?'

'दिल से।'

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'बस जाओ। मैं दस-पाँच दिन में फिर आऊँगा और देखूँगा कि किन लड़कों ने झूठा वादा किया था, किसने सच्चा।

लड़के चले गये, तो अमर लेटा। तीन महीने से लगातार घूमते-घूमते उसका जी ऊब उठा था। कुछ विश्राम करने का जी चाहता था। क्यों न वह इसी गाँव में टिक जाय ? यहाँ उसे कौन जानता है। यहाँ उसका छोटा सा घर बन गया। सकीना उस घर में आ गयी, गाय बैल और अन्त में नींद भी आ गयी।