कर्मभूमि/दूसरा भाग ७

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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कई महीने गुजर गये। गाँव में फिर मुरदा-मांस न आया। आश्चर्य की को बात तो यह थी, कि दूसरे गाँवों के चमारों ने भी मुर्दा-माँस खाना छोड़ दिया। शुभ उद्योग कुछ संक्रामक होता है।

अमर की शाला अब नई इमारत में आ गई थी। शिक्षा का लोगों को कुछ ऐसा चस्का पड़ गया था, कि जवान तो जवान, बूढ़े भी आ बैठते और कुछ-न-कुछ सीख जाते। अमर की शिक्षा-शैली आलोचनात्मक थी। अन्य देशों को सामाजिक और राजनैतिक प्रगति, नये-नये आविष्कार, नये-नये विचार, उसके मुख्य विषय थे। देश-देशान्तरों के रस्मो-रिवाज, आचार-विचार की कथा सभी चाव से सुनते। उसे यह देखकर कभी-कभी विस्मय होता था कि ये निरक्षर लोग जटिल सामाजिक सिद्धान्तों को कितनी आसानी से समझ जाते हैं। सारे गाँव में एक नया जीवन प्रवाहित होता हुआ जान पड़ता था। छूत-छात का जैसे लोप हो गया था। दूसरे गाँवों की ऊँची जातियों के लोग भी अक्सर आ जाते थे।

दिन भर के परिश्रम के बाद अमर लेटा हुआ एक उपन्यास पढ़ रहा था, कि मुन्नी आकर खड़ी हो गयी। अमर पढ़ने में इतना लिप्त था, कि मन्नी के आने की उसको खबर न हुई। राजस्थान की वीर नारियों के बलिदान की
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कथा थी, उस उज्ज्वल बलिदान की जिसकी संसार के इतिहास में कहीं मिसाल नहीं है, जिसे पढ़कर आज भी हमारी गरदन गर्व से उठ जाती है। जीवन को किसने इतना तुच्छ समझा होगा! मर्यादा की रक्षा का ऐसा अलौकिक आदर्श और कहाँ मिलेगा? आज का बुद्धिवाद उन वीर माताओं पर चाहे जितना कीचड़ फेंक ले, हमारी श्रद्धा उनके चरणों पर सदैव सिर झुकाती रहेगी।

मुन्नी चुपचाप खड़ी अमर के मुख की ओर ताकती रही। मेघ का वह अल्पांश जो आज एक साल हुए उसके हृदय-आकाश में पक्षी की भाँति उड़ता हुआ आ गया था, धीरे-धीरे सम्पूर्ण आकाश पर छा गया था। अतीत की ज्वाला में झुलसी हुई कामनाएँ इस शीतल छाया में फिर हरी होती जाती थीं। वह शुष्क जीवन उद्यान की भाँति सौरभ और विकास से लहराने लगा है। औरों के लिए तो उसकी देवरानियाँ भोजन पकाती, अमर के लिए वह खुद पकाती, बेचारे दो तो रोटियाँ खाते हैं, और यह गँवारिनें मोटे-मोटे लिट्ट बनाकर रख देती हैं। अमर उससे कोई काम करने को कहता, तो उसके मुंह पर आनन्द की ज्योति-सी झलक उठती। वह एक नये स्वर्ग की कल्पना करने लगती--एक नये आनन्द का स्वप्न देखने लगती।

एक दिन सलोनी ने उससे मुसकराकर कहा--अमर भैया तेरे ही भाग से यहाँ आ गये मुन्नी। अब तेरे दिन फिरेंगे।

मुन्नी ने हर्ष को जैसे मुट्ठी में दबाकर कहा--क्या कहती हो काकी? कहाँ मैं कहाँ वह। मुझसे कई साल छोटे होंगे। फिर ऐसे विद्वान् ऐसे चतुर! मैं तो उनकी जूतियों के बराबर भी नहीं।

काकी ने कहा--यह सब ठीक है मुन्नी, पर तेरा जादू उनपर चल गया है, यह मैं देख रही हूँ। संकोची आदमी मालूम होते हैं, इससे तुझसे कुछ कहते नहीं, पर तू उनके मन मे समा गयी है, विश्वास मान। क्या तुझे इतना भी नहीं सूझता? तुझे उनकी सरम दूर करनी पड़ेगी।

मुन्नी ने पुलकित होकर कहा--तुम्हारी असीस है काकी, तो मेरा मनोरथ भी पूरा हो जायगा।

मुन्नी एक क्षण अमर को देखती रही, तब झोपड़ी में जाकर उसकी खाट निकाल लायी। अमर का ध्यान टूटा। बोला--रहने दो अभी बिछाये लेता
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हूँ। तुम मेरा इतना दुलार करोगी मुन्नी, तो मैं आलसी हो जाऊँगा। आओ तुम्हें हिन्दू देवियों की कथा सुनाऊँ।

'कोई कहानी है क्या?'

'नहीं, कहानी नहीं है, सच्ची बात है।'

अमर ने मुसलमानों के हमले, क्षत्राणियों के जौहर और राजपूत वीरों के शौर्य की चर्चा करते हुए कहा--उन देवियों को आग में जल मरना मंजूर था पर यह मंजूर न था, कि परपुरुष की निगाह भी उन पर पड़े। अपने नाम पर मर मिटती थीं। हमारी देवियों का यह आदर्श था। आज यूरोप का क्या आदर्श है? जर्मन सिपाही फ्रांस पर चढ़ आये और पुरुषों से गाँव खाली हो गये, फ्रांस की नारियाँ जर्मन सैनिकों और नायकों ही से प्रेम क्रीड़ा करने लगीं।

मुन्नी नाक सिकोड़कर बोली--बड़ी चंचल है सब; लेकिन उन स्त्रियों से जीते जी कैसे जला जाता था?

अमर ने पुस्तक बन्द कर दी--बड़ा कठिन है मुन्नी! यहाँ तो जरा सी चिनगारी लग जाती है, तो बिलबिला उठते हैं। तभी तो आज सारा संसार उनके नाम के आगे सिर झुकाता है। मैं तो जब यह कथा पढ़ता हूँ तो रोयें खड़े हो जाते हैं। यही जी चाहता है, कि जिस पवित्र भूमि पर उन देवियों की चिताएँ बनीं उसकी राख सिर पर चढ़ाऊँ, आँखों में लगाऊँ और वहीं मर जाऊँ।

मुन्नी किसी विचार में डूबी भूमि की ओर ताक रही थी।

अमर ने फिर कहा--कभी-कभी तो ऐसा भी हो जाता था, कि पुरुषों को घर के माया-मोह से मुक्त करने के लिये स्त्रियाँ लड़ाई के पहले ही जौहर कर लेती थीं। आदमी को जान इतनी प्यारी होती है, कि बूढ़े भी मरना नहीं चाहते! हम नाना कष्ट झेलकर भी जीते हैं। बड़े-बड़े ऋषि-महात्मा भी जीवन का मोह नहीं छोड़ सकते; पर उन देवियों के लिए जीवन खेल था।

मन्नी अब भी मौन खड़ी थी। उसके मुख का रंग उड़ा हुआ था, मानो कोई दुस्सह अन्तर्वेदना हो रही हो।

अमर ने घबड़ाकर पूछा--कैया जी है मुन्नी? चेहरा क्यों उतरा हुआ है? [ १८० ]मुन्नी ने क्षीण मुस्कान के साथ कहा--मुझे पूछते हो? मुझे क्या हुआ

'कुछ बात तो है! मुझसे छिपाती हो।'

'नहीं जी, कोई बात नहीं।'

एक मिनट के बाद उसने फिर कहा--तुमसे आज अपनी कथा कहूँ, सुनोगे?

'बड़े हर्ष से। मैं तो तुमसे कई बार कह चुका। तुमने सुनाई ही नहीं।'

'मैं तुमसे डरती हूँ। तुम मुझे नीच और जाने क्या-क्या समझने लगोगे।'

अमर ने मानो क्षुब्ध होकर कहा--अच्छी बात है, मत कहो। मैं तो जो कुछ हूँ वही रहूँगा, तुम्हारे बनाने से तो नहीं बन सकता।

मुन्नी ने हारकर कहा--तुम तो लाला जरा सी बात पर चिढ़ जाते हो, तभी स्त्री से तुम्हारी नहीं पटती। अच्छा लो, सुनो। जो जी में आये समझना--में जब काशी से चली, तो थोड़ी देर तक तो मुझे कुछ होश ही न रहा–कहाँ जाती हूं, क्यों जाती हूं, कहाँ से आती हूं। और मैं उसमें डूबने उतराने लगी। अब मालूम हुआ, क्या कुछ खोकर मैं चली जा रही हूं। ऐसा जान पड़ता था कि मेरा बालक मेरी गोद आने के लिए हुमक रहा है। ऐसा मोह मेरे मन में कभी न जागा था। मैं उसकी याद करने लगी। उसका हँसना और रोना, उसकी तोतली बातें, उसका लटपटाते हुए चलना, उसे चुप करने के लिए चन्दा मामा को दिखाना, सुलाने के लिए लोरियां सुनाना, एक-एक बात' याद आने लगी। मेरा वह छोटा-सा संसार कितना सुखमय था। उस रत्न को गोद में लेकर मैं कितनी निहाल हो जाती थी, मानो संसार की संपत्ति मेरे पैरों के नीचे है। उस सुख के बदले में स्वर्ग का सूख भी न लेती। जैसे मन की सारी अभिलाषाएँ उसी बालक में आकर जमा हो गयी हों। अपना टूटा-फूटा झोपड़ा, अपने मैले कुचैले कपड़े, अपना नंगा-बूचापन, कर्ज-दाम की चिंता, अपनी दरिद्रता, अपना दुर्भाग्य, ये सभी पैने काँटे जैसे फूल बन गये। अगर कोई कामना थी, तो यह कि मेरे लाल को कुछ न होने पाये। और आज उसी को छोड़कर मैं न जाने कहाँ चली जा रही थी। मेरा चित्त चंचल हो गया। मन की सारी स्मृतियाँ सामने दौड़नेवाले वृक्षों की तरह, जैसे मेरे साथ दौड़ी चली आ रही थीं। और उन्हीं के साथ
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मेरा बालक भी जैसे दौड़ता चला आता था। आखिर मैं आगे न जा सकी। दुनिया हँसती है, हँसे, बिरादरी मुझे निकालती है, निकाल दे, मैं अपने लाल को छोड़कर न जाऊँगी। मेहनत-मजूरी करके भी तो अपना निबाह कर सकती हूँ। अपने लाल को आँखों से देखती तो रहूँगी। उसे मेरी गोद से कौन छीन सकता है। मैं उसके लिए मरी हूं, मैंने उसे अपने रक्त से सिरजा है। वह मेरा है। उस पर किसी का अधिकार नहीं।

ज्यों ही लखनऊ आया, मैं गाड़ी से उतर पड़ी। मैंने निश्चय कर लिया, लौटती हुई गाड़ी से काशी चली जाऊँगी। जो कुछ होना होगा, होगा।

मैं कितनी देर प्लैटफार्म पर खड़ी रही, मालूम नहीं। बिजली की बत्तियों से सारा स्टेशन जगमगा रहा था। मैं बार-बार कुलियों से पूछती थी, काशी की गाड़ी कब आयेगी? कोई दस बजे मालूम हुआ, गाड़ी आ रही है। मैंने अपना सामान सँभाला। दिल धड़कने लगा। गाड़ी आ गयी। मुसाफ़िर चढ़ने-उतरने लगे। कुली ने आकर कहा--असबाब जनाने डब्बे में रखूँ, कि मरदाने में।

मेरे मुँह से आवाज़ न निकली।

कुली ने मेरे मुँह की ओर ताकते हुए फिर पूछा--जनाने डब्बे में रख दूं असबाब ?

मैंने कातर होकर कहा--मैं इस गाड़ी से न जाऊँगी।

'अब दूसरी गाड़ी दस बजे दिन को मिलेगी।'

'मैं उसी गाड़ी से जाऊँगी।'

'तो असबाब बाहर ले चलूँ या मुसाफिरखाने में?'

'मुसाफिरखाने में।'

अमर ने पूछा--तुम उस गाड़ी से चली क्यों न गयीं?

मुन्नी काँपते हुए स्वर में बोली--न जाने कैसा मन होने लगा। जैसे कोई मेरे हाथ-पाँव बाँधे लेता हो। जैसे मैं गऊ-हत्या करने जा रही हूँ। इन कोढ़ भरे हाथों से मैं अपने लाल को कैसे उठाऊँगी। मुझे अपने पति पर क्रोध आ रहा था। वह मेरे साथ आया क्यों नहीं ? अगर उसे मेरी परवाह होती, तो मुझे अकेली आने देता? इसी गाड़ी से वह भी आ सकता था। जब उसकी इच्छा नहीं है, तो मैं भी न जाऊँगी। और न जाने कौन-कौन-सी
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बातें मन में आकर मुझे जैसे बल-पूर्वक रोकने लगीं। मैं मुसाफिरखाने में मन मारे बैठी थी कि एक मर्द अपनी औरत के साथ आकर मेरे ही समीप दरी बिछाकर बैठ गया। औरत की गोद में लगभग एक साल का बालक था। ऐसा सुन्दर बालक ! ऐसा गुलाबी रंग, ऐसी कटोरे-सी आँखें, ऐसी मक्खन-सी देह ! मैं तन्मय होकर देखने लगी और अपने पराये की सूधि भूल गयी। ऐसा मालूम हुआ, यह मेरा है। बालक माँ की गोद से उतरकर धीरे-धीरे रेंगता हुआ मेरी ओर आया। मैं पीछे हट गयी। बालक फिर मेरी तरफ चला। मैं दूसरी ओर चली गयी। बालक ने समझा, मैं उसका अनादर कर रही हूँ। रोने लगा। फिर भी मैं उसके पास न आयी। उसकी माता ने मेरी ओर रोप-भरी आँखों से देखकर बालक को दौड़कर उठा लिया; पर बालक मचलने लगा और बार-बार मेरी ओर हाथ बढ़ाने लगा। पर मैं दूर खड़ी रही। ऐसा जान पड़ता था, मेरे हाथ कट गये हैं। जैसे मेरे हाथ लगाते ही वह सोने-सा बालक कुछ और हो जायगा, उसमें से कुछ निकल जायगा।

स्त्री ने कहा--लड़के को जरा उठा लो देवी, तुम तो जैसे भाग रही हो। जो दुलार करते हैं, उनके पास तो अभागा जाता नहीं, जो मुँह फेर लेते हैं, उनकी ओर दौड़ता है।

बाबूजी, मैं तुमसे नहीं कह सकती, कि इन शब्दों ने मेरे मन को कितनी चोट पहुँचायी। कैसे समझा दूं कि मैं कलंकिनी हूँ, पापिष्ठा हूँ, मेरे छूने से अनिष्ट होगा, अमङ्गल होगा। और यह जानने पर क्या वह मुझसे फिर अपना बालक उठा लेने को कहेगी ?

मैंने समीप आकर बालक की ओर स्नेह भरी आँखों से देखा और डरते-डरते उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। सहसा बालक चिल्लाकर माँ की तरफ़ भागा, मानो उसने कोई भयानक रूप देख लिया। अब सोचती हूँ, तो समझ में आता है--बालकों का यही स्वभाव है; पर उस समय मुझे ऐसा मालम हुआ कि सचमच मेरा रूप पिशाचिनी का-सा होगा। मैं लज्जित हो गयी।

माता ने बालक से कहा--अब जाता क्यों नहीं रे, बुला तो रही हैं। कहां जाओगी बहन ? मैंने हरिद्वार बता दिया। वह स्त्री-पुरुष भी हरिद्वार
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रहे थे।

गाड़ी छूट जाने के कारण ठहर गये थे। घर दूर था। लौटकर न जा सकते थे। मैं बड़ी खुश हुई, कि हरिद्वार तक साथ तो रहेगा; लेकिन फिर वह बालक मेरी ओर न आया।

थोड़ी देर में स्त्री-पुरुष तो सो गये, पर मैं बैठी रही। माँ से चिमटा हुआ बालक भी सो रहा था। मेरे मन में बड़ी प्रबल इच्छा हुई कि बालक को उठाकर प्यार करूँ; पर दिल काँप रहा था कि कहीं बालक रोने लगे, या माता जाग जाये, तो दिल में क्या समझे। मैं बालक का फुल-सा मुखड़ा देख रही थी। वह शायद कोई स्वप्न देखकर मुसकरा रहा था। मेरा दिल काबू से बाहर हो गया। मैंने सोते हुए बालक को छाती से लगा लिया पर दूसरे ही क्षण मैं सचेत हो गयी और बालक को लिटा दिया। उस क्षणिक प्यार में कितना आनन्द था! जान पड़ता था, मेरा ही बालक यह रूप धरकर मेरे पास आ गया है।

देवीजी का हृदय बड़ा कठोर था। बात-बात पर उस नन्हें से बालक को झिड़क देतीं, कभी-कभी मार बैठती थीं। मुझे उस वक्त ऐसा क्रोध आता था, कि उन्हें खूब डाटूँ। अपने बालक पर माता इतना क्रोध कर सकती है, यह मैने आज ही देखा।

जब दूसरे दिन हम लोग हरिद्वार की गाड़ी में बैठे, तो बालक मेरा हो चुका था! मैं तुमसे क्या कहूँ बाबूजी, मेरे स्तनों में दुघ भी उतर आया और माता को मैंने इस भार से भी मुक्त कर दिया।

हरिद्वार में हम लोग एक धर्मशाले में ठहरे। मैं बालक के मोह-फांस में बँधी हुई उस दम्पती के पीछे-पीछे फिरा करती। मैं अब उसकी लौंडी थी। बच्चे का मल-मूत्र धोना मेरा काम था, उसे दूध पिलाती, खिलाती। माता का जैसे गला छूट गया लेकिन मैं इस सेवा में मगन थी। देवीजी जितनी आलसिन और घमंडिन थीं, लालाजी उतने ही शीलवान् और दयालु थे। वह मेरी तरफ कभी आँख उठाकर भी न देखते। अगर मैं कमरे में अकेली होती तो कभी अन्दर न जाते। कुछ-कुछ तुम्हारे ही जैसा स्वभाव था। मुझे उन पर दया आती थी। उस कर्कशा के साथ उनका जीवन इस तरह कट रहा था, मानो बिल्ली के पंजे में चूहा हो। वह उन्हें बात-बात पर झिड़कती। बेचारे खिसियाकर रह जाते। [ १८४ ]पन्द्रह दिन बीत गये थे। देवी जो ने घर लौटने के लिए कहा। बाबूजी अभी वहाँ कुछ दिन और रहना चाहते थे। इसी बात पर तकरार हो गई। मैं बरामदे में बालक को लिये खड़ी थी। देवीजी ने गरम होकर कहा, तुम्हें रहना हो तो रहो, मैं आज जाऊँगी। तुम्हारी आँखों रास्ता नहीं देखा है।

पति ने डरते-डरते कहा--यहाँ दस-पाँच दिन रहने में हरज ही क्या है ? मुझे तो तुम्हारे स्वास्थ्य में अभी कोई तबदीली नहीं दिखती।

'आप मेरे स्वास्थ्य की चिन्ता छोड़िए। मैं इतनी जल्द नहीं मरी जा रही हूँ। सच कहते हो, तुम मेरे स्वास्थ्य के लिए यहाँ ठहरना चाहते हो ?'

'और किसलिए आया था?'

'आये चाहे जिस काम के लिए हो; पर तुम मेरे स्वास्थ्य के लिए नहीं ठहर रहे हो। यह पट्टियाँ उन स्त्रियों को पढ़ाओ, जो तुम्हारे हथकण्डे न जानती हों। मैं तुम्हारी नस नस पहचानती हूँ। तुम ठहरना चाहते हो विहार के लिए क्रीड़ा के लिए......'

बाबूजी ने हाथ जोड़कर कहा--अच्छा, अब रहने दो बिन्नी, कलंकित न करो। मैं आज ही चला जाऊँगा।

देवीजी इतनी सस्ती विजय पाकर प्रसन्न न हुई, अभी उनके मन का गुबार तो निकलने ही नहीं पाया था। बोली--हाँ, चले क्यों न चलोगे, यही तो तुम चाहते थे। यहां पैसे खर्च होते हैं न ? ले जाकर उसी काल कोठरी में डाल दो। कोई मरे या जिये, तुम्हारी बला से। एक मर जायगी, तो दूसरी फिर आ जायगी, बल्कि और नई-नवेली। तुम्हारी चाँदी ही चाँदी है ! सोचा था, यहाँ कुछ दिन रहूँगी; पर तुम्हारे मारे कहीं रहने पाऊँ? भगवान् भी नहीं उठा लेते कि गला छूट जाय !

अमर ने पूछा--उन बाबूजी ने सचमुच कोई शरारत की थी, या मिथ्या आरोप था ?

मुन्नी ने मुँह फेरकर मुसकराते हुए कहा--लाला, तुम्हारी समझ बड़ी मोटी है। वह डायन मुझ पर आरोप कर रही थी। बेचारे बाबूजी दबे जाते थे, कि कहीं वह चुड़ैल बात खोलकर न कह दे, हाथ जोड़ते थे, मिन्नतें करते थे; पर वह किसी तरह रास न होती थी।

आँखें मटकाकर बोली--भगवान् ने मुझे भी आँखें दी हैं, अन्धी नहीं
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हूँ। मैं तो कमरे में पड़ी-पड़ी कराहूँ और तुम बाहर गुलछरें उड़ाओ ! दिल बहलाने को कोई शगल चाहिए।

धीरे-धीरे मुझ पर रहस्य खुलने लगा। मन में ऐसी ज्वाला उठी कि अभी इसका मुँह नोच लूँ। मैं तुमसे कोई परदा नहीं रखती लाला, मैंने बाबूजी की ओर कभी आँख उठाकर देखा भी न था; पर यह चुड़ैल मुझे कलंक लगा रही थी। बाबूजी का लिहाज न होता, तो मैंने उस चुड़ैल का मिजाज ठीक कर दिया होता। जहाँ सुई न चुभे, वहाँ फाल चुभाये देती थी।

आखिर बाबूजी को भी क्रोध आया !

'तुम बिलकुल झूठ बोलती हो। सरासर झूठ।'

'मैं सरासर झूट बोलतो हूँ ?'

'हाँ, सरासर झूठ बोलती हो।'

'खा जाओ अपने बेटे की क़सम।'

मुझे चुपचाप वहाँ से टल जाना चाहिए था, लेकिन अपने मन को क्या करूँ, जिससे अन्याय नहीं देखा जाता। मेरा चेहरा मारे क्रोध के तमतमा उठा। मैंने उसके सामने जाकर कहा--बहुजी, बस अब जबान बन्द करो, नहीं तो अच्छा न होगा। मैं तरह देती जाती हूँ और तुम सिर चढ़ती जाती हो। मैं तुम्हें शरीफ़ समझकर तुम्हारे साथ ठहर गयी थी। अगर जानती कि तुम्हारा स्वभाव इतना नीच है, तो तुम्हारी परछाई से भागती। मैं हरजाई नहीं हूँ, न अनाथ हूँ, भगवान की दया से मेरे भी पति हैं। किस्मत का खेल है कि यहाँ अकेली पड़ी हूँ। मैं तुम्हारे पति को अपने पति का पैर धोने के जोग भी नहीं समझती। मैं उसे बुलाये देती हूँ, तुम भी देख लो, बस आज और कल रह जाओ।

अभी मेरे मुँह से पूरी बात भी न निकलने पायी थी कि मेरे स्वामी मेरे लाल को गोद में लिये आकर आँगन में खड़े हो गये और मुझे देखते ही लपककर मेरी तरफ़ चले। मैं उन्हें देखते ही ऐसी घबड़ा गयी, मानो कोई सिंह आ गया हो, तुरंत अपनी कोठरी में जाकर भीतर से द्वार बन्द कर लिया। छाती धड़-धड़ कर रही थी; पर किवाड़ की दरार में आँख लगाये देख रही थी। स्वामी का चेहरा सँवलाया हआ था, बालों पर धुल जमी
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हुई थी, पीठ पर कम्बल और लुटिया-डोर रखे, हाथ में लंबा लट्ठ लिये भौचक्के से खड़े थे।

बाबूजी ने बाहर आकर स्वामी से पूछा--अच्छा आप ही इनके पति हैं। आप खूब आये। अभी तो वह आप ही की चर्चा कर रही थीं। आइए, कपड़े उतारिए। मगर बहन भीतर क्यों भाग गयीं। यहां परदे में कौन परदा।

मेरे स्वामी को तो तुमने देखा ही है। उनके सामने बाबूजी बिल्कुल ऐसे लगते थे, जैसे साँड़ के सामने नाटा बैल।

स्वामी ने बाबूजी को कोई जवाब न दिया, मेरे द्वार पर आकर बोले--मुन्नी, यह क्या अन्धेर करती हो। मैं तीन दिन से तुम्हें खोज रहा हैं। आज मिली भी तो भीतर जा बैठी। ईश्वर के लिए किवाड़ खोल दो और मेरी दुःख कथा सुन लो, फिर तुम्हारी जो इच्छा हो करना।

मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे। जी चाहता था, किवाड़ खोलकर बच्चे को गोद में ले लूं।

पर न जाने मन के किसी कोने में कोई बैठा हुआ कह रहा था--खबरदार, जो बच्चे को गोद में लिया ! जैसे कोई प्यास से तड़पता हुआ आदमी पानी का बरतन देखकर टूटे; पर कोई उससे कह दे, पानी जूठा है। एक मन कहता था, स्वामी का अनादर मत कर, ईश्वर ने जो पत्नी और माता का नाता जोड़ दिया है, वह क्या किसी के तोड़े टूट सकता है ! दूसरा मन कहता था, तू अब अपने पति को पति और पुत्र को पुत्र नहीं कह सकती। क्षणिक मोह के आवेश में पड़कर तू क्या उन दोनों को कलंकित कर देगी !

मैं किवाड़ छोड़कर खड़ी हो गयी।

बच्चे ने किवाड़ को अपनी नन्हीं-नन्हीं हथेलियों से पीछे ढकेलने के लिए, जोर लगाकर कहा--तेवाल थोलो !

यह तोतले बोल कितने मीठे थे ! जैसे सन्नाटे में किसी शंका से भयभीत होकर हम गाने लगते हैं, अपने ही शब्दों से दुकेले होने की कल्पना कर लेते हैं, मैं भी इस समय अपने उमड़ते हुए प्यार को रोकने के लिए बोल उठी--तुम क्यों मेरे पीछे पड़े हो ? क्यों नहीं समझ लेते कि मर गई ? तुम ठाकुर होकर भी इतने दिल के कच्चे हो ! एक तुच्छ नारी के लिए अपनी कुलमरजाद डुबाये देते हो। जाकर अपना ब्याह कर लो और बच्चे को पालो। [ १८७ ]इस जीवन में मेरा तुमसे कोई नाता नहीं है। हाँ, भगवान् से यही माँगती हूँ, कि दूसरे जन्म में तुम फिर मुझे मिलो। क्यों मेरी टेक तोड़ रहे हो, मेरे मन को क्यों मोह में डाल रहे हो ? पतिता के साथ तुम सुख से न रहोगे। मुझ पर दया करो, आज ही चले जाओ, नहीं मैं सच कहती हूँ, जहर खा लूँगी।

स्वामी ने करुण आग्रह से कहा- मैं तुम्हारे लिए अपनी कुल-मर्यादा; भाई बन्द सब कुछ छोड़ दूँगा। मुझे किसी की परवाह नहीं है। घर में आग लग जाय, मुझे चिन्ता नहीं। मैं या तो तुम्हें लेकर जाऊँगा, या यहीं गंगा में डूब मरूँगा। अगर मेरे मन में तुमसे रत्ती भर भी मैल हो, तो भगवान् मुझे सौ बार नरक दें। अगर तुम्हें नहीं चलना है, तो तुम्हारा बालक तुम्हें सौंपकर मैं जाता हूँ। इसे मारो या जिलाओ, मैं फिर तुम्हारे पास न आऊँगा। अगर कभी सुधि आये, तो चुल्लू भर पानी देना।

लाला, सोचो, मैं कितने बड़े संकट में पड़ी हुई थी। स्वामी बात के धनी है, यह मैं जानती थी। प्राण को वह कितना तुच्छ समझते हैं, यह भी मुझसे छिपा न था। फिर भी मैं अपना हृदय कठोर किये रही। ज़रा भी नर्म पड़ी और सर्वनाश हुआ। मैंने पत्थर का कलेजा बनाकर कहा- अगर तुम बालक को मेरे पास छोड़कर गये, तो उसकी हत्या तुम्हारे ऊपर होगी, क्योंकि मैं उसकी दुर्गति देखने के लिए जीना नहीं चाहती। उसके पालने का भार तुम्हारे ऊपर है, तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। मेरे लिए जीवन में अगर कोई सुख था, तो यही कि मेरा पुत्र और स्वामी कुशल से हैं। तुम मुझसे यह सुख छीन लेना चाहते हो, छीन लो; मगर याद रखो वह मेरे जीवन का आधार है।

मैंने देखा स्वामी ने बच्चे को उठा लिया, जिसे एक क्षण पहले गोद से उतार दिया था और उलट पाँव लौट पड़े। उनकी आँखों से आँसू जारी थे, और ओंठ काँप रहे थे।

देवीजी ने भलमनसी से काम लेकर स्वामी को बैठाना चाहा, पूछने लगीं- क्या बात है, क्यों रूठी हुई हैं; पर स्वामी ने कोई जवाब न दिया। बाबू साहब फाटक तक उन्हें पहुँचाने गये‌। कह नहीं सकती, दोनों जनों में क्या बातें हुई; अनुमान करती हूँ, कि बाबूजी ने मेरी प्रशंसा की होगी। मेरा दिल अब भी काँप रहा था कि कहीं स्वामी सचमुच आत्मघात न कर लें। [ १८८ ]
देवियों और देवताओं की मनौतियां कर रही थी कि मेरे प्यारे की रक्षा करना।

ज्यों ही बाबूजी लौट, मैंने धीरे से किवाड़ खोलकर पूछा--किधर गये? कुछ और कहते थे?

बाबूजी ने तिरस्कार--भरी आँखों से देखकर कहा--कहतें क्या, मुँह से आवाज़ भी तो निकले। हिचकी बँधी हुई थी। अबसे कुशल है, जाकर रोक लो। वह गंगाजी की ओर ही गये हैं। तुम इतनी दयावान् होकर भी इतनी कठोर हो, यह आज ही मालूम हुआ। ग़रीब, बच्चों की तरह फूट-फूटकर रो रहा था।

मैं संकट की उस दशा को पहुँच चुकी थी, जब आदमी परायों को अपना समझने लगता है। डाँटकर बोली--तब भी तुम दौड़े यहाँ चले आये ? उनके साथ कुछ देर रह जाते, तो छोटे न हो जाते और न यहाँ देवीजी को कोई उठा ले जाता। इस समय वह आपे में नहीं हैं, फिर भी तुम उन्हें छोड़कर भागे चले आये।

देवीजी बोली--यहाँ न दौड़ आते तो क्या जाने मैं कहीं निकल भागती। लो, आकर घर में बैठो। मैं जाती हूँ। पकड़कर घसीट न लाऊँ, तो अपने बाप की नहीं!

धर्मशाले में बीसों ही यात्री टिके हुए थे। सब अपने-अपने द्वार पर खड़े यह तमाशा देख रहे थे। देवीजी ज्यों ही निकलीं, चार पाँच आदमी उनके साथ हो लिये। आध घण्टे में सभी लौट आये। मालूम हुआ कि वह स्टेशन की तरफ़ चले गये।

पर मैं जब तक उन्हें गाड़ी पर सवार होते न देख लूँ चैन कहाँ। गाड़ी प्रातःकाल जायगी। रात-भर वह स्टेशन पर रहेंगे। ज्यों ही अँधेरा हो गया, मैं स्टेशन जा पहुँची। वह एक वृक्ष के नीचे कम्बल बिछाये बैठे हुए थे। मेरा बच्चा लोटे की गाड़ी बनाकर डोर से खींच रहा था ! बार-बार गिरता था और फिर उठकर खींचने लगता था। मैं एक वृक्ष की आड़ में बैठकर यह तमाशा देखने लगी। तरह-तरह की बातें मन में आने लगीं। बिरादरी का ही तो डर है। मैं अपने पति के साथ किसी दूसरी जगह रहने लगूँ, तो बिरादरी क्या कर लेगी; लेकिन क्या अब मैं वह हो सकती हूँ, जो पहले थी?
[ १८९ ]एक क्षण के बाद फिर वही कल्पना। स्वामी ने साफ़ कहा है, उनका दिल साफ़ है। बातें बनाने की उनकी आदत नहीं। तो वह कोई ऐसी बात कहेंगे ही क्यों जो मुझे लगे। गड़े मुरदे उखाड़ने की उनकी आदत नहीं। वह मुझसे कितना प्रेम करते थ़े। अब भी उनका हृदय वही है। मैं व्यर्थ के संकोच में पड़कर उनका और अपना जीवन चौपट कर रही हूँ। लेकिन . . . लेकिन मैं अब क्या वह हो सकती हूँ, जो पहले थी? नहीं, अब मैं वह नहीं हो सकती।

पतिदेव अब मेरा पहिले से अधिक आदर करेंगे। मैं जानती हूँ। मैं घी का घड़ा भी लुढ़का दूँगी, तो कुछ न कहेंगे। वह उतना ही प्रेम भी करेंगे; लेकिन यह बात कहाँ, जो पहले थी। अब तो मेरी दशा उस रोगिणी की-सी होगी, जिसे कोई भोजन रुचिकर नहीं होता।

तो फिर मैं जिन्दा ही क्यों रहूँ? जब जीवन में कोई सुख नहीं, कोई अभिलाषा नहीं, तो वह व्यर्थ है। कुछ दिन और रो लिया; तो इससे क्या। कौन जानता है, क्या-क्या कलंक सहने पड़ें, क्या-क्या दुर्दशा हो। मर जाना कहीं अच्छा।

यह निश्चय करके मैं उठी। सामने ही पतिदेव सो रहे थे। बालक भी पड़ा सोता था। ओह ? कितना प्रबल बन्धन था। जैसे सूम का धन हो। वह उसे खाता नहीं, देता नहीं, इसके सिवा उसे और क्या संतोष है कि उसके पास धन है। इस बात से ही उसके मन में कितना बल आ जाता है। मैं उसी मोह को तोड़ने जा रही थी।

मैं डरते-डरते, जैसे प्राणों को आँखों में लिये, पतिदेव के समीप गई; पर वहाँ एक क्षण भी खड़ी न रह सकी। जैसे लोहा खिंचकर चुम्बक से जा चिमटता है, उसी तरह मैं उनके मुख की ओर खिंची जा रही थी। मैंने अपने मन का सारा बल लगाकर उसका मोह तोड़ दिया और उसी आवेश में दौड़ी हुई गंगा के तट पर आई। मोह अब भी मन से चिपटा हुआ था। मैं गंगा में कूद पड़ी।

अमर ने कातर होकर कहा--अब नहीं सुना जाता मुन्नी। फिर कभी कहना।

मुन्नी मुसकराकर बोली--वाह, अब रह ही क्या गया ? मैं कितनी देर पानी में रही, कह नहीं सकती। जब होश आया, तो इसी घर में पड़ी हुई थी। [ १९० ]
मैं बहती चली जाती थी। प्रातःकाल चौधरी का बड़ा लड़का सुमेर गंगा नहाने गया और मुझे उठा लाया। तब से मैं यहीं हूँ। अछूतों की इस झोपड़ी में मुझे जो सुख और शांति मिली उसका बखान क्या करूँ ? काशी और पयाग मुझे भाभी कहते हैं, पर सुमेर मुझे बहन कहता था। मैं अभी अच्छी तरह उठने-बैठने भी न पाई थी, कि वह परलोक सिधार गया।

अमर के मन में एक काँटा बराबर खटक रहा था। वह कुछ निकला; पर अभी कुछ बाकी था।

'सुमेर से तुमसे प्रेम तो होगा ही ?'

मुन्नी के तेवर बदल गये--हाँ था, और थोड़ा नहीं, बहुत था, तो फिर उसमें मेरा क्या बस? जब में स्वस्थ हो गयी, तो एक दिन उसने मुझसे अपना प्रेम प्रकट किया। मैंने क्रोध को हँसी में लपेट कर कहा--क्या तुम इस रूप में मुझसे नेकी का बदला चाहते हो ? अगर यह नीयत है, तो मुझे फिर ले जाकर गंगा में डुबा दो। अगर इस नीयत से तुमने मेरी प्राण-रक्षा की तो तुमने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया। तुम जानते हो, मैं कौन हूँ ? मैं राजपूत हूँ। फिर कभी भूलकर भी मुझसे ऐसी बात न कहना, नहीं गंगा यहाँ से दूर नहीं है। सुमेर ऐसा लज्जित हुआ कि फिर मुझसे बात तक नहीं की; पर मेरे शब्दों ने उसका दिल तोड़ दिया। एक दिन मेरी पसलियों में दर्द होने लगा। उसने समझा भूत का फेर है। ओझा को बुलाने गया। नदी चढ़ी हुई थी। डूब गया। मुझे उसकी मौत का जितना दुःख हुआ, उतना ही अपने सगे भाई के मरने का हुआ था। नीचों में भी ऐसे देवता होते हैं, इसका मुझे यहीं आकर पता लगा। वह कुछ दिन और जी जाता, तो इस घर के भाग जाग जाते। सारे गाँव का गुलाम था। कोई गाली दे, डाँटे, कभी जवाब न देता।

अमर ने पूछा--तब से तुम्हें अपने पति और बच्चे की खबर न मिली होगी?

मुन्नी की आँखों से टपटप आँसू गिरने लगे। रोते-रोते हिचकी बँध गयी। फिर सिसक-सिसक कर बोली--स्वामी प्रातःकाल फिर धर्मशाले में गये। जब उन्हें मालूम हुआ कि मैं रात को वहाँ नहीं गयी, तो मुझे खोजने लगे। जिधर कोई मेरा पता बता देता, उधर ही चले जाते। एक महीने तक वह सारे इलाके में मारे-मारे फिरे। इसी निराशा और चिन्ता में वह कुछ सनक
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गये। फिर हरिद्वार आये, पर अबकी बालक उनके साथ न था। कोई पूछता--तुम्हारा लड़का क्या हुआ, तो हँसने लगते। जब मैं अच्छी हो गयी और चलने-फिरने लगी, तो एक दिन जी में आया, हरिद्वार जाकर देखूँ, मेरी चीज़ें कहाँ गयीं। तीन महीने से ज्यादा हो गये थे। मिलने की आशा तो न थी; पर इसी बहाने स्वामी का कुछ पता लगाना चाहती थी। विचार था--एक चिट्ठी लिखकर छोड़ दूँ। उस धर्मशाले के सामने पहुँची, तो देखा, बहुत से आदमी द्वार पर जमा है। मैं भी चली गयी। एक आदमी की लाश थी। लोग कह रहे थे वही पागल है, वही जो अपनी बीबी को खोजता फिरता था। मैं पहचान गयी। वही मेरे स्वामी थे। यह सब बातें महल्ले वालों से मालूम हुई। छाती पीटकर रह गयी। जिस सर्वनाश से डरती थी, वह हो ही गया। जानती, कि यह होने वाला है तो पति के साथ ही न चली जाती! ईश्वर ने मझे दोहरी सजा दी; लेकिन आदमी बड़ा बेहया है। अब मरते भी न बना। किसके लिए मरती? खाती-पीती भी हूँ, हँसती-बोलती भी हूँ, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बस यही मेरी राम कहानी है।