कर्मभूमि/दूसरा भाग ६

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

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सलोनी काकी ने अपने घर की जगह पाठशाला के लिए दे दी है। लड़के बहुत आने लगे हैं। उस छोटी-सी कोठरी में जगह नहीं है। सलोनी से किसी ने जगह माँगी नहीं, कोई दबाव भी नहीं डाला गया। बस, एक दिन अमर और चौधरी बैठे बातें कर रहे थे, कि नयी शाला कहाँ बनायी जाय, गाँव में तो बैलों के बाँधने तक की जगह नहीं। सलोनी उनकी बातें सुनती रही। फिर एकाएक बोल उठी--मेरा घर क्यों नहीं ले लेते? बीस हाथ पीछे खाली जगह पड़ी है। क्या इतनी ज़मीन में तुम्हारा काम न चलेगा!

दोनों आदमी चकित होकर सलोनी का मुँह ताकने लगे।

अमर ने पूछा--और तू रहेगी कहाँ काकी?

सलोनी ने कहा--उँह ! मुझे घर-द्वार लेकर क्या करना है बेटा ! तुम्हारी ही कोठरी में आकर एक कोने में पड़ रहूँगी।

गूदड़ ने मन में हिसाब लगाकर कहा--जगह तो बहुत निकल आयेगी।

अमर ने सिर हिलाकर कहा--मैं काकी का घर नहीं लेना चाहता। महन्तजी से मिलकर गाँव में बाहर पाठशाला बनवाऊँगा।

काकी ने दुखित होकर कहा--क्या मेरी जगह में कोई छूत लगी है भैया?
[ १७१ ]गूदड़ ने फैसला कर दिया। काकी का घर मदरसे के लिए ले लिया जाय। उसी में एक कोठरी अमर के लिए भी बना दी जाय। काकी अमर की झोपड़ी में रहे। एक किनारे बैल-गाय बाँध लेगी। एक किनारे पड़ रहेगी।

आज सलोनी जितनी खुश है, उतनी शायद और कभी न हुई हो। वही बुढ़िया, जिसके द्वार पर कोई बैल बाँध देता, तो लड़ने को तैयार हो जाती, जो बच्चों को अपने द्वार पर गोलियाँ न खेलने देती, आज अपने पुरुखों का घर देखकर अपना जीवन सफल समझ रही है। यह कुछ असङ्गत-सी बात है; पर दान कृपण ही दे सकता है। हाँ, दान का हेतु ऐसा होना चाहिए जो उसकी नज़र में उसके मर-मर के संचे हुए धन के योग्य हो।

चटपट काम शुरू हो जाता है। घरों से लड़कियाँ निकल आयीं, रस्सी निकल आयी, मजूर निकल आये, पैसे निकल आये। न किसी से कहना पड़ा, न सुनना। वह उनकी अपनी शाला थी । उन्हीं के लड़के-लड़कियाँ तो पढ़ते थे। और इस छ: सात महीने में ही उन पर शिक्षा का कुछ असर भी दिखायी देने लगा था। वह अब साफ़ रहते हैं, झूठ कम बोलते हैं, झूठे बहाने कम करते हैं, गालियाँ कम बकते हैं, और घर से कोई चीज़ चुराकर नहीं ले जाते। न उतनी ज़िद्द ही करते हैं, घर का जो कुछ काम होता है, उसे शौक़ से करते हैं। ऐसी शाला की कौन मदद न करेगा।

फागुन का शीतल प्रभात सुनहरे वस्त्र पहने पहाड़ पर खेल रहा था। अमर कई लड़कों के साथ गंगा-स्नान करके लौटा; पर आज अभी तक कोई आदमी काम करने नहीं आया। यह बात क्या है ? और दिन तो उसके स्नान करके लौटने के पहले ही कारीगर आ जाते थे। आज इतनी देर हो गई और किसी का पता नहीं ?

सहसा मुन्नी सिर पर कलसा रखे आकर खड़ी हो गयी। वही शीतल, सुनहरा प्रभात उसके गेहुएँ मुखड़े पर मचल रहा था।

अमर ने मुसकराकर कहा--यह देखो, सूरज देवता तुम्हें घूर रहे हैं।

मुन्नी ने कलसा उतारकर हाथ में ले लिया और बोली--और तुम बैठे देख रहे हो।

फिर एक क्षण के बाद उसने कहा--तुम तो जैसे आजकल गाँव में
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रहते ही नहीं हो। मदरसा क्या बनने लगा, तुम्हारे दर्शन ही दुर्लभ हो गये। मैं डरती हूँ, कहीं तुम सनक न जाओ।

'मैं तो दिन भर यहीं रहता हूँ, तुम अलबत्ता जाने कहाँ रहती हो। आज यह सब आदमी कहाँ चले गये? एक भी नहीं आया।'

'गाँव में है ही कौन!'

'कहाँ चले गये सब?'

'वाह! तुम्हें खबर ही नहीं? पहर रात सिरोमनपुर के ठाकुर की गाय मर गई, सब लोग वहीं गये हैं। आज घर-घर सिकार बनेगा।'

अमर ने घृणा-सूचक भाव से कहा--मरी गाय?

'हमारे यहाँ भी तो खाते हैं, यह लोग।'

'क्या जाने। मैंने कभी नहीं देखा। तुम तो...'

मन्नी ने घृणा से मुँह बनाकर कहा--मैं तो उधर ताकती भी नहीं।

'समझाती नहीं इन लोगों को?'

'उँह। समझाने से माने जाते हैं, और मेरे समझाने से!'

अमरकान्त की वंशगत वैष्णव-वृत्ति इस घृणित, पिशाच-कर्म से जैसे मतलाने लगी। सचमुच मतली हो आयी। उसने छूत-छात और भेद-भाव को मन से निकाल डाला था; पर अखाद्य से वही पुरानी घृणा बनी हुई थी। और वह दस-ग्यारह महीने से इन्हीं मुरदाखोरों के घर भोजन कर रहा है।

'आज मैं खाना नहीं खाऊँगा मुन्नी।'

'मैं तुम्हारा भोजन अलग पका दूँगी।'

'नहीं मुन्नी! जिस घर में वह चीज़ पकेगी, उस घर में मुझसे न खाया जायगा।'

सहसा शोर सुनकर अमर ने आँखें उठायीं, तो देखा कि पन्द्रह-बीस आदमी बाँस की बल्लियों पर उस मृतक गाय को लादे चले आ रहे हैं।

कितना वीभत्स दृश्य था। अमर वहाँ खड़ा न रह सका। गंगातट की ओर भागा।

मुन्नी ने कहा--तो भाग जाने से क्या होगा। अगर बुरा लगता है तो जाकर समझाओ।

'मेरी बात कौन सुनेगा मुन्नी?' [ १७३ ]'तुम्हारी बात न सुनेंगे, तो और किसकी सुनेंगे लाला?'

'और जो किसी ने न माना?'

'और जो मान गये? आओ कुछ-कुछ बद लो।'

'अच्छा क्या बदती हो?'

'मान जायँ, तो मुझे एक साड़ी अच्छी-सी ला देना।'

'और न माना, तो तुम मुझे क्या दोगी?'

'एक कौड़ी।'

इतनी देर में वह लोग और समीप आ गये। चौधरी सेनापति की भाँति आगे आगे लपके चले आते थे।

मुन्नी ने आगे बढ़कर कहा--ला तो रहे हो, लेकिन लाला भागे जा रहे हैं।

गूदड़ ने कुतूहल से पूछा--क्यों? क्या हुआ है?

'यही गाय की बात है। कहते हैं, मैं तुम लोगों के हाथ का पानी न पिऊँगा।'

पयाग ने अकड़कर कहा--बकने दो। न पियेंगे हमारे हाथ का पानी, तो हम छोटे न हो जायेंगे।'

काशी बोला--आज बहुत दिन के बाद तो सिकार मिला। उसमें भी यह बाधा ?

गूदड़ ने समझौते के भाव से कहा--आखिर कहते क्या है?

मुन्नी झुँझलाकर बोली--अब उन्हीं से जाकर पूछो। जो चीज़ और किसी ऊँची जातवाले नहीं खाते, उसे हम क्यों खाँय, इसी से तो लोग नीच समझते हैं।

पयाग ने आवेश में कहा--तो हम कौन किसी बाम्हन-ठाकुर के घर बेटी ब्याहने जाते हैं। बाम्हनों की तरह किसी के द्वार पर भीख माँगने तो नहीं जाते? यह तो अपना-अपना रिवाज है।

मन्त्री ने डाँट बतायी--यह कोई अच्छी बात है, कि सब लोग हमें नीच समझें, जीभ के सवाद के लिए?

गाय वहीं रख दी गयी। दो-तीन आदमी गँड़ासे लेने दौड़े। अमर खड़ा देख रहा था कि मुन्नी मना कर रही है; पर कोई उसकी सुन नहीं रहा है। [ १७४ ]
उसने उधर से मुँह फेर लिया, जैसे उसे कै हो जायगी। मुँह फेर लेने पर भी वही दृश्य उसकी आँखों में फिरने लगा। इस सत्य को वह कैसे भूल जाये कि उससे पचास कदम पर मुर्दा गाय की बोटियाँ की जा रही हैं। वह उठकर गंगा की ओर भागा।

गूदड़ ने उसे गंगा की ओर जाते देखकर चिन्तित भाव से कहा--वह तो सचमुच गंगा की ओर भागे जा रहे हैं। बड़ा सनकी आदमी है। कहीं डूब-डाब न जाय।

पयाग बोला--तुम अपना काम करो, कोई डबे-डाबेगा नहीं। किसी को जान इतनी भारी नहीं होती।

मुन्नी ने उसकी ओर कोप-दृष्टि से देखा--जान उन्हें प्यारी होती है, जो नीच हैं और नीच बने रहना चाहते हैं। जिसमें लाज है, जो किसी के सामने सिर नहीं नीचा करना चाहता, वह ऐसी बात पर जान भी दे सकता है।

पयाग ने ताना मारा--उसका बड़ा पच्छ कर रही हो भाभी, सगाई की ठहर गयी है क्या?

मुन्नी ने आहत कंठ से कहा--दादा, तुम सुन रहे हो इनकी बातें और मुँह नहीं खोलते। उनसे सगाई ही कर लूँगी तो क्या तुम्हारी हँसी हो जायगी? और जब मेरे मन में वह बात आ जायगी, तो कोई रोक भी न सकेगा। अब इसी बात पर मैं देखती हूँ, कि कैसे घर में सिकार जाता है। पहले मेरी गर्दन पर गँड़ासा चलेगा।

मुन्नी बीच में घुसकर गाय के पास बैठ गयी और ललकार कर बोली--अब जिसे गँडा़सा चलाना हो चलाये, मैं बैठी हूँ।

पयाग ने कातर भाव से कहा--हत्या के बल खेती खाती हो और क्या।

मुन्नी बोली--तुम्ही जैसों ने बिरादरी को इतना बदनाम कर दिया है। उस पर कोई समझाता है तो लड़ने को तैयार होते हो।

गूदड़ चौधरी गहरे विचार में डूबे खड़े थे। दुनिया में हवा किस तरफ़ चल रही है, उसकी भी उन्हें कुछ खबर थी। कई बार इस विषय पर अमरनाथ बातचीत कर चुके थे। गम्भीर भाव से बोले--भाइयो, यहाँ गाँव के सब आदमी जमा है। बताओ अब क्या सलाह है? [ १७५ ]एक चौड़ी छातीवाला युवक बोला--सलाह जो तुम्हारी है, वहीं सबकी है। चौधरी तो तुम हो।

पयाग ने अपने बाप को विचलित होते देख दूसरों को ललकार कर कहा--खड़े मुँह क्या ताकते हो इतने जने तो हो! क्यों नहीं मुन्नी का हाथ पकड़कर हटा देते? मैं गँड़ासा लिये खड़ा हूँ।

मुन्नी ने कोष से कहा--मेरा ही मांस खा जाओगे, तो कौन हरज है? बह भी तो माँस ही है!

और किसी को आगे बढ़ते न देखकर पयाग ने खुद आगे बढ़कर मुन्नी का हाथ पकड़ लिया और उसे वहाँ से घसीटना चाहता था कि काशी ने उसे जोर से धक्का दिया और लाल आँखें करके बोला--भैया, अगर उसकी देह पर हाथ रखा, तो खून हो जायगा--कहे देता हूं। हमारे घर में गऊमांस की गंध तक न जाने पायेगी। आये वहाँ से बड़े वीर बनकर! चौड़ी छातीवाला युवक मध्यस्थ बनकर बोला--मरी गाय के मांस में ऐसा कौन-सा मज़ा रखा है, जिसके लिए सब जने मरे जा रहे हो? गड्ढा खोदकर माँस गाड़ दो, खाल निकाल लो। वह भी जब अमर भैया की सलाह हो। हमको तो उन्हीं की सलाह पर चलना है। उनकी राह पर चलकर हमारा उद्धार हो जायगा। सारी दुनिया हमें इसीलिए तो अछूत समझती है, कि हम दारू-शराब पीते हैं, मुरदा-माँस खाते हैं और चमड़े का काम करते हैं। और हममें क्या बुराई है? दारू-शराब हमने छोड़ ही दी--हमने क्या छोड़ दी, समय ने छुड़वा दी--फिर मुरदा-मांस में क्या रखा है। रहा चमड़े का काम, उसे कोई बुरा नहीं कह सकता, और अगर कोई कह भी तो हमें उसकी परवाह नहीं। चमड़ा बनाना-बेचना बुरा काम नहीं।

गूदड़ ने युवक की ओर आदर की दृष्टि से देखा--तुम लोगों ने भूरे की बात सुन ली। तो यही सबकी सलाह है?

भूरे बोला--अगर किसी को उजर करना हो तो करे।

एक बूढ़े ने कहा--एक तुम्हारे या हमारे छोड़ देने से क्या होता है? सारी बिरादरी तो खाती है।

भूरे ने जवाब दिया--बिरादरी खाती है, विरादरी नीच बनी रहे। अपना-अपना धरम अपने-अपने साथ है। [ १७६ ]गूदड़ ने भूरे को संबोधित किया--तुम ठीक कहते हो भूरे! लड़कों का पढ़ाना ही ले लो। पहले कोई भेजता था अपने लड़कों को? मगर जब हमारे लड़के पढ़ने लगे, तो दूसरे गाँवों के लड़के भी आ गये।

काशी बोला--मुरदा-मांस न खाने के अपराध की दंड बिरादरी हमें न देगी। इसका मैं जुम्मा लेता हूँ। देख लेना, आज की बात साँझ तक चारों ओर फैल जायगी; और वह लोग भी यहीं करेंगे। अमर भैया का कितना मान है ! किसकी मजाल है कि उनकी बात को काट दे।

पयाग ने देखा अब दाल न गलेगी, तो सबको धिक्कारकर बोला--अब मेहरियों का राज है, मेहरियाँ जो कुछ न करें वह थोड़ा।

यह कहता हुआ वह गँडा़सा लिये घर चला गया।

गूदड़ लपके हए गंगा की ओर चले और एक गोली के टप्पे से पुकारकर बोले--यहाँ क्या खड़े हो भैया, चलो घर, सब झगड़ा तय हो गया।

अमर विचार-मग्न था। आवाज़ उसके कानों तक न पहुँची।

चौधरी ने और समीप जाकर कहा--यहाँ कब तक खड़े रहोगे भैया?

'नहीं दादा, मुझे यहीं रहने दो। तुम लोग वहाँ काट-कूट करोगे, मुझसे देखा न जायगा। जब तुम फुरसत पा जाओगे, तो मैं आ जाऊँगा।

'बहू' कहती थी, तुम हमारे घर खाने भी नहीं कहते?'

'हाँ दादा, आज तो न खाऊँगा, मुझे कै हो जायगी।'

'लेकिन हमारे यहाँ तो आये दिन यही धन्धा लगा रहता है।'

'दो-चार दिन के बाद मेरी भी आदत पड़ जायगी।'

'तुम हमें मन में राच्छस समझ रहे होगे!'

अमर ने छाती पर हाथ रखकर कहा--नहीं दादा, मैं तो तुम लोगों से कुछ सीखने, तुम्हारी कुछ सेवा करके अपना उद्धार करने आया हूँ। यह तो अपनी-अपनी प्रथा है। चीन एक बहुत बड़ा देश है। वहाँ बहत से आदमी बुद्ध भगवान को मानते हैं। उनके धर्म में किसी जानवर को मारना पाप है। इसलिए वह लोग मरे हुए जानवर ही खाते हैं। कुत्ते, बिल्ली, गीदड़, किसी को भी नहीं छोड़ते। तो क्या वह हमसे नीच हैं? कभी नहीं। हमारे ही देश में कितने ही ब्राह्मण-क्षत्री माँस खाते हैं। वह जीभ के स्वाद के लिए जीवहत्या करते हैं। तुम उनसे तो कहीं अच्छे हो। [ १७७ ] गूदड़ ने हँसकर कहा--भैया, तुम बड़े बुद्धिमान हो, तुमसे कोई न जीतेगा। चलो, अब कोई मुर्दा नहीं खायेगा। हम लोगों ने यह तय कर लिया। हमने क्या तय किया, बहू ने तय किया। मगर खाल तो न फेंकनी होगी?

अमर ने प्रसन्न होकर कहा--नहीं दादा, खाल क्यों फेंकोगे? जूते बनाना तो सब से बड़ी सेवा है। मगर क्या भाभी बहुत बिगड़ी थी?

गूदड़ बोला--बिगड़ी ही नहीं थी भैया, वह तो जान देने को तैयार थी। गाय के पास बैठ गयी और बोली--अब चलाओ, गँडा़सा, पहला गँडा़सा मेरी गरदन पर होगा! फिर किसकी हिम्मत थी, कि गँडा़सा चलाता।

अमर का हृदय जैसे एक छलांग मारकर मुन्नी के चरणों पर लोटने लगा।