कर्मभूमि/पाँचवाँ भाग २

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ३३८ ]

सुखदा अपने कमरे में पहुँची, तो देखा--एक युवती कैदियों के कपड़े पहने उसके कमरे की सफाई कर रही है। एक चौकीदारिन बीच-बीच में उसे डाँटती जाती है। [ ३३९ ]चौकीदारिन ने कैदिन की पीठ पर लात मारकर कहा---राँड़, तुझे झाड़ू लगाना भी नहीं आता। गर्द क्यों उड़ाती है? हाथ दबाकर लगा।

कैदिन ने झाड़ू फेंक दी और तमतमाये हुए मुख से बोली---मैं यहाँ किसी की टहल करने नहीं आई हूँ।

'तब क्या रानी बनकर आई है।'

'हाँ, रानी बनकर आई हूँ। किसी की चाकरी करना मेरा काम नहीं है।'

'तू झाड़ू लगायेगी कि नहीं?'

'भलमनसी से कहो, तो मैं तुम्हारे भंगी के घर में झाड़ू लगा दूँगी; लेकिन मार का भय दिखाकर तुम मुझसे राजा के घर में भी झाड़ू नहीं लगवा सकती। इतना समझ रखो।'

'तू न लगायेगी झाड़ू?'

'नहीं!'

चौकीदारिन ने कैदिन के केश पकड़ लिये और खींचती हई कमरे के बाहर ले चली। रह-रहकर गालों पर तमाचे भी लगाती जाती थी।

'चल जेलर साहब के पास!'

'हाँ, ले चलो। मैं यही उनसे भी कहूँगी। मार-गाली खाने नहीं आयी हूँ।'

सुखदा के लगातार लिखा-पढ़ी करने पर यह टहलनी दी गयी थी; पर यह कांड देखकर सुखदा का मन क्षुब्ध हो उठा। इस कमरे में क़दम रखना भी उसे बुरा लग रहा था।

कैदिन ने उसकी ओर सजल आँखों से देखकर कहा---तुम गवाह रहना। इस चौकीदारिन ने मुझे कितना मारा है।

सुखदा ने समीप जाकर चौकीदारिन को हटाया और कैदिन का हाथ पकड़कर कमरे में ले गयी।

चौकीदारिन ने धमकाकर कहा---रोज सबेरे यहाँ आ जाया कर। जो काम यह कहें वह किया कर। नहीं डण्डे पड़ेंगे।

कैदिन क्रोध से काँप रही थी---मैं किसी की लौंडी नहीं हूँ और न यह काम करूँगी। किसी रानी-महरानी की टहल करने नहीं आई। जेल में सब बराबर हैं! [ ३४० ]सुखदा ने देखा युवती में आत्म-सम्मान की कमी नहीं। लज्जित होकर बोली---यहाँ कोई रानी-महरानी नहीं है, बहन, मेरा जी अकेले घबराया करता था, इसलिए तुम्हें बुला लिया! हम दोनों यहाँ बहनों की तरह रहेंगी। क्या नाम है तुम्हारा?

युवती की कठोर मुद्रा नर्म पड़ गयी। बोली----मेरा नाम मुन्नी है। हरिद्वार से आयी हूँ।

सुखदा चौंक पड़ी। लाला समरकान्त ने यही नाम तो लिया था। पूछा---यहाँ किस अपराध में सजा हुई?

'अपराध क्या था? सरकार जमीन का लगान नहीं कम करती थी। चार आने की छुट हुई। जिन्स का दाम आधा भी नहीं उतरा। हम किसके घर से लाके देते। इस बात पर हमने फ़रियाद की। बस, सरकार ने सजा देना शुरू कर दिया।'

मुन्नी को सुखदा अदालत में कई बार देख चुकी थी। तबसे उसकी सूरत बहुत कुछ बदरल गयी थी। पूछा---तुम बाबू अमरकान्त को जानती हो? वह भी तो इसी मुआमले में गिरफ्तार हुए हैं?

मुन्नी प्रसन्न हो गयी---जानती क्यों नहीं, वह तो मेरे घर ही में रहते थे। तुम उन्हें जानती हो? वही तो हमारे अगुआ है।

सुखदा ने कहा---मैं भी काशी की रहनेवाली हूँ। उसी मुहल्ले में उनका भी घर है! तुम क्या ब्राह्मणी हो?

'हूँ तो ठकुरानी, पर अब कुछ नहीं हूँ। जात-पाँत पूत-भतार सब को खो बैठी।'

'अमर बाबू कभी अपने घर की बातचीत नहीं करते हैं?'

'कभी नहीं। न कभी आना, न जाना; न चिट्ठी, न पत्तर।'

सुखदा ने कनखियों से देखकर कहा---मगर वह तो बड़े रसिक आदमी हैं। वहाँ गाँव में किसी पर डोरे नहीं डाले?

मुन्नी ने जीभ दाँतों तले दबायी---कभी नहीं बहूजी, कभी नहीं। मैंने तो उन्हें कभी किसी मेहरिया की ओर ताकते या हँसते भी नहीं देखा। न जाने किस बात पर घरवाली से रूठ गये। तुम तो जानती होगी।

सुखदा ने मुसकराते हुए कहा---रूठ क्या गये, स्त्री को छोड़ दिया। [ ३४१ ]छिपकर घर से भाग गये। बेचारी औरत घर में बैठी हुई है। तुमको मालूम न होगा, उन्होंने जरूर कहीं-न-कहीं दिल लगाया होगा।

मुन्नी ने दाहिने हाथ को साँप के फन की भाँति हिलाते हए कहा--ऐसी बात होती, तो गाँव में छिपी न रहती बहूजी। मैं तो रोजही दो-चार बेर उनके पास जाती थी। कभी सिर ऊपर न उठाते थे। फिर उस दिहात में ऐसी थी ही कौन, जिस पर उनका मन चलता। न कोई पढ़ी न लिखी, न गुन, न सहूर।

सुखदा ने फिर नब्ज़ टटोली--मर्द गुन-सहूर, पढ़ना-लिखना नहीं देखते। वह तो रूप-रंग देखते हैं और वह तुम्हें भगवान ने दिया ही है। जवान भी हो।

मुन्नी ने मुँह फेरकर कहा--तुम तो गाली देती हो बहूजी। मेरी ओर भला वह क्या देखते, जो उनके पाँव की जूतियों के बराबर भी नहीं। लेकिन तुम कौन हो बहूजी, तुम यहाँ कैसे आयीं?

'जैसे तुम आयीं, वैसे ही मैं भी आयी।'

'तो यहाँ भी वही हलचल है?'

'हाँ, कुछ उसी तरह की है।'

मुन्नी को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि ऐसी विदुषी देवियाँ भी जेल में भेजी गयी हैं। भला इन्हें किस बात का दुःख होगा!

उसने डरते-डरतें पूछा--तुम्हारे स्वामी भी सजा पा गये होंगे?

'हाँ, तभी तो मैं आयी।'

मुन्नी ने छत की ओर देखकर आशीर्वाद दिया--भगवान् तुम्हारा मनोरथ पूरा करें बहूजी! गद्दी-मसनद लगानेवाली रानियाँ जब तपस्या करने लगीं, तो भगवान् वरदान भी जल्दी ही देंगे। कितने दिन की सजा हुई है? मुझे तो छ: महीने की है।

सुखदा ने अपनी सजा की मियाद बताकर कहा--तुम्हारे ज़िले में बड़ी सख्तियाँ हो रही होंगी। तुम्हारा क्या विचार है, लोग सख्ती से दब जायँगे?

मुन्नी ने मानो क्षमा याचना की--मेरे सामने तो लोग यही कहते थे कि चाहे फाँसी पर चढ़ जायें, पर आधे से बेसी लगान न देंगे; लेकिन अपने दिल से सोचो, जब बैल-बधिये छीने जाने लगेंगे, सिपाही घरों में [ ३४२ ]घुसेंगे, मरदों पर डण्डों और गोलियों की मार पड़ेगी, तो आदमी कहाँ तक सहेगा। मुझे पकड़ने के लिए तो पूरी फौज गयी थी। पचास आदमियों से कम न होंगे। गोली चलते-चलते बची। हजारों आदमी जमा हो गये। कितना समझाती थी---भाइयों, अपने-अपने घर जाओ, मुझे जाने दो; लेकिन कौन सुनता है। आखिर जब मैंने कसम दिलाई तो लोग लौटे नहीं, उसी दिन दस-पाँच की जान जाती। न-जाने भगवान कहाँ सोये हैं कि इतना अन्याय देखते हैं और नहीं बोलते। साल में छ: महीने एक जून खाकर बेचारे दिन काटते हैं, चीथड़े पहनते हैं, लेकिन सरकार को देखो, तो उन्हीं की गर्दन पर सवार! हाकिमों को तो अपने लिए बँगला चाहिए, मोटर चाहिए, हरनियामत खाने को चाहिए, सैर-तमाशा चाहिए, पर गरीबों का इतना सुख भी नहीं देखा जाता। जिसे देखो, गरीबों ही का रक्त चूसने को तैयार है। हम जमा करने को नहीं माँगते, न हमें भोग-विलास की इच्छा है; लेकिन पेट की रोटी और तन ढाँकने का कपड़ा तो चाहिए! साल-भर खाने-पहनने को छोड़ दो, गृहस्थी का जो कुछ खरच पड़े वह दे दो। बाकी जितना बचे, उठा ले जाओ। मुदा गरीबों की कौन सुनता है।

सुखदा ने देखा, इस गँवारिन के हृदय में कितनी सहानुभूति, कितनी दया, कितनी जाग्रति भरी हुई है। अमर के त्याग और सेवा की उसने जिन शब्दों में सराहना की, उसने जैसे सुखदा के अन्तःकरण की सारी मलिनताओं को धोकर निर्मल कर दिया, जैसे उसके मन में प्रकाश आ गया हो, और उसकी सारी शंकाएँ और चिन्ताएँ अन्धकार की भाँति मिट गयी हो। अमरकान्त का कल्पना-चित्र उसकी आँखों के सामने आ खड़ा हुआ---कैदियों का जाँघिया और कन्टोप पहने, बड़े-बड़े बाल बढ़ाये, मुख मलिन, कैदियों के बीच में चक्की पीसता हुआ। वह भयभीत होकर काँप उठी। उसका हृदय कभी इतना कोमल न था।

मेट्रन ने आकर कहा---अब तो आपको नौकरानी मिल गयी। इससे खूब काम लीजिये।

सुखदा धीमे स्वर में बोली---मुझे अब तो नौकरानी की इच्छा नहीं है मेम साहब, मै यहाँ रहना भी नहीं चाहती। आप मुझे मामूली कैदियों में भेज दीजिए। [ ३४३ ]मेट्रन छोटे कद की ऐंग्लो-इंडियन महिला थी। चौड़ा मुँह, छोटी-छोटी आँखें, तराशे हुए बाल, घुटनियों से ऊपर तक का स्कर्ट पहने हुए। विस्मय से बोली---यह क्या कहती हो सुखदा देवी? नौकरानी मिल गयी और जिस चीज का तकलीफ हो हमसे कहो, हम जेलर साहब से कहेगा।

सुखदा ने नम्रता से कहा---आपकी इस कृपा के लिये मैं आपको धन्यवाद देती हूँ। मैं अब किसी तरह की रियाअत नहीं चाहती। मैं चाहती हूँ, कि मुझे मामूली कैदियों की तरह रखा जाय।

'नीच औरतों के साथ रहना पड़ेगा। खाना भी वही मिलेगा।'

'यही तो मैं चाहती हूँ।

'काम भी वही करना पड़ेगा। शायद चक्की में दे दें।'

'कोई हरज नहीं।'

'घर के आदमियों से तीसरे महीने मुलाकात हो सकेगी।'

'मालूम है।'

मेट्रन की लाला समरकान्त ने खूब पूजा की थी। इस शिकार के हाथ से निकल जाने का दुःख हो रहा था। कुछ देर तक समझाती रही। जब सुखदा ने अपनी राय न बदली तो पछताती हई चली गयी।

मुन्नी ने पूछा---मेमसाहब क्या कहती थीं?

सुखदा ने मुन्नी को स्नेह भरी आँखों से देखा---अब मैं तुम्हारे ही साथ रहूँगी मुन्नी।

मुन्नी ने छाती पर हाथ रखकर कहा---यह क्या कहती हो बहू? वहाँ तुमसे न रहा जायगा।

सुखदा ने प्रसन्न मुख से कहा---जहाँ तुम रह सकती हो, वहाँ मैं भी रह सकती हूँ।

एक घण्टे के बाद जब सुखदा यहाँ से मुन्नी के साथ चली, तो उसका मन आशा और भय से काँप रहा था, जैसे कोई बालक परीक्षा में सफल होकर अगली कक्षा में गया हो।