कर्मभूमि/पाँचवाँ भाग ४

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ३५३ ]

प्रातःकाल समरकान्त और सलीम डाकबँगले से गाँव की ओर चले। पहाड़ियों से नीली भाप उठ रही थी और प्रकाश का हृदय जैसे किसी अव्यक्त वेदना से भारी हो रहा था। चारों ओर सन्नाटा था। पृथ्वी किसी रोगी की भाँति कोहरे के नीचे पड़ी सिहर रही थी। कुछ लोग बन्दरों की भाँति छप्परों पर बैठे उसकी मरम्मत कर रहे थे और कहीं-कहीं स्त्रियाँ गोबर पाथ रही थीं। दोनों आदमी पहले सलोनी के घर गये।

सलोनी को ज्वर चढ़ा हुआ था और सारी देह फोड़े की भाँति दुख रही थी; मगर उसे गाने की धुन सवार थी—

सन्तो देखत जग बौराना। [ ३५४ ]साँच कहो तो मारन धावे, झूठे जग पतियाना, सन्तो देखत..

मनोव्यथा जब असह्य और अपार हो जाती है, तब उसे कहीं प्राण नहीं मिलता; जब वह रुदन और क्रंदन की गोद में भी आश्रय नहीं पाती, तो वह संगीत के चरणों पर जा गिरती है।

समरकान्त ने पुकारा---भाभी, जरा बाहर तो आओ!

सलोनी चट-पट उठकर पके बालों को घूंघट से छिपाती, नवयौवना की भाँति लजाती आकर खड़ी हो गयी और पूछा--तुम कहाँ चले गये थे, देवरजी?

सहसा सलीम को देखकर वह एक पग पीछे हट गयी और जैसे गाली दी--यह तो हाकिम है।

फिर सिंहनी की भाँति झपटकर उसने सलीम को ऐसा धक्का दिया कि वह गिरते-गिरते बचा और जब तक समरकान्त उसे हटायें हटायें, सलीम की गरदन पकड़कर इस तरह दबाई, मानो घोंट देगी।

सेठजी ने उसे बल-पूर्वक हटाकर कहा--पगला गयी है क्या भाभी, अलग हट जा, सुनती नहीं?

सलोनी ने फटी-फटी, प्रज्वलित आँखों से सलीम को घूरते हुए कहा--मार तो दिखा दूँ आज मेरा सिरदार आ गया है! सिर कुचलकर रख देगा!

समरकान्त ने तिरस्कार-भरे स्वर में कहा--सिरदार के मुंह में कालिख लगा रही हो और क्या। बूढ़ी हो गयीं, मरने के दिन आ गये और अभी लड़कपन नहीं गया! यही तुम्हारा धर्म है कि कोई हाकिम द्वार पर आये तो उसका अपमान करो?

सलोनी ने मन में कहा--यह लाला भी ठाकुर सुहाती करते हैं। लड़का पकड़ गया है न, इसी से। फिर दुराग्रह से बोली---पूछो, इसने सबको पीटा नहीं था?

सेठजी बिगड़कर बोले--तुम हाकिम होती और गाँववाले तुम्हें देखते ही लाठियाँ ले-लेकर निकल आते, तो तुम क्या करतीं? जब प्रजा लड़ने पर तैयार हो जाय, तो हाकिम क्या उसकी पूजा करे! अमर होता, तो वह लाठी लेकर न दौड़ता। गाँववालों को लाजिम था कि हाकिम के पास आकर अपना-अपना हाल कहते, अरज-बिनती करते; अदब से, नम्रता से। [ ३५५ ]यह नहीं कि हाकिम को देखा और मारने दौड़े, मानो वह तुम्हारा दुश्मन है। मैं इन्हें समझा-बुझाकर लाया था कि मेल करा दूँ, दिलों की सफ़ाई हो जाय, और तुम उनसे लड़ने पर तैयार हो गयी!

यहाँ की हलचल सुनकर गाँव के और कई आदमी जमा हो गये; पर किसी ने सलीम को सलाम नहीं किया। सबकी त्यौरियाँ चढी हुई थीं।

समरकान्त ने उन्हें संबोधित किया---तुम्हीं लोग सोचो। यह साहब तुम्हारे हाकिम हैं। जब रिआया हाकिम के साथ गुस्ताखी करती है, तो हाकिम को भी क्रोध आ जाय तो कोई ताज्जुब नहीं। यह विचारे तो अपने को हाकिम समझते ही नहीं। लेकिन इज्जत तो सभी रखते हैं, हाकिम हों या न हों। कोई आदमी अपनी बेइज्जती नहीं देख सकता। बोलो गूदड़, कुछ ग़लत कहता हूँ।

गूदड़ ने सिर झुकाकर कहा--नहीं मालिक, सच ही कहते हो। मुदा वह तो बावली है। उसकी किसी बात का बुरा न मानो। सब के मुँह में कालिख लगा रही है और क्या।

'यह हमारे लड़के के बराबर हैं। अमर के साथ पढ़े, उसी के साथ खेले। तुमने अपनी आँखों देखा कि अमर को गिरफ्तार करने यह अकेले आये थे। क्या समझकर? क्या पुलीस को भेजकर न पकड़वा सकते थे? सिपाही हुक्म पाते ही आते और धक्के देकर बाँध ले जाते। इनकी शराफत थी कि खुद आये और किसी पुलिस को साथ न लाये। अमर ने भी वही किया, जो उसका धर्म था। अकेले आदमी को बेइज्जत करना चाहते, तो क्या मुश्किल था। अब तक जो कुछ हुआ, उसका इन्हें रंज है, हालांकि कसूर तुम लोगों का भी था। अब तुम भी पिछली बातों को भूल जाओ। इनकी तरफ से अब किसी तरह की सख्ती न होगी। इन्हें अगर तुम्हारी जायदाद नीलाम करने का हुक्म मिलेगा, नीलाम करेंगे, गिरफ्तार करने का हुक्म मिलेगा, गिरफ्तार करेंगे, तुम्हें बुरा न लगना चाहिए। तुम धर्म की लड़ाई लड़ रहे हो। लड़ाई नहीं, यह तपस्या है। तपस्या में क्रोध और द्वेष आ जाता है, तो तपस्या भंग हो जाती है।

स्वामीजी बोले--धर्म की रक्षा एक ओर से नहीं होती! सरकार नीति बनाती है। उसे नीति की रक्षा करनी चाहिए। जब उसके कर्म-[ ३५६ ]चारी नीति को पैंरों से कुचलते हैं, तो फिर जनता कैसे नीति की रक्षा कर सकती है?

समरकान्त ने फटकार बताई---आप संन्यासी होकर ऐसा कहते हैं स्वामीजी। आपको अपनी नीतिपरता से अपने शासकों को नीति पर लाना है। यदि वह नीति पर ही होते, तो आपको यह तपस्या क्यों करनी पड़ती? आप अनीति पर अनीति से नहीं, नीति से विजय पा सकते हैं।

स्वामीजी का मुँह जरा-सा निकल आया। ज़बान बन्द हो गयी।

सलोनी का पीड़ित हृदय पक्षी के समान पिंजरे से निकलकर भी कोई आश्रय खोज रहा था। सज्जनता और सत्प्रेरणा में भरा हुआ यह तिरस्कार उसके सामने जैसे दाने बिखेरने लगा। पक्षी ने दो-चार बार गरदन झुकाकर दानों को सतर्क नेत्रों से देखा, फिर अपने रक्षक को 'आ, आ' करते सुना और पर फैलाकर दानों पर उतर आया।

सलोनी आँखों में आँसू भरे, दोनों हाथ जोड़े, सलीम के सामने आकर बोली--सरकार, मुझसे बड़ी खता हो गयी। माफ़ी दीजिए। मुझे जूतों से पीटिए...

सेठजी ने कहा---सरकार नहीं, बेटा कहो।

'बेटा, मुझसे बड़ा अपराध हुआ। मूरख हूँ, बावली हूँ। जो सज़ा चाहे दो।'

सलीम के नेत्र भी सजल हो गये। हुकूमत का रोब और अधिकार का गर्व भूल गया। बोला--माताजी, मझे शर्मिन्दा न करो। यहाँ जितने लोग खड़े हैं, मैं उन सबसे और जो यहाँ नहीं हैं, उनसे भी अपनी खताओं की मुआफी चाहता हूँ।

गूदड़ ने कहा--हम तुम्हारे गुलाम हैं भैया, लेकिन मूरख जो उहरे आदमी पहचानते, तो क्यों इतनी बातें होतीं।

स्वामीजी ने समरकान्त के कान में कहा---मुझे तो जान पड़ता है कि दगा करेगा।

सेठजी ने आश्वासन दिया---कभी नहीं। नौकरी चाहे चली जाय; पर तुम्हें सतायेगा नहीं। शरीफ़ आदमी है।

'तो क्या हमें पूरा लगान देना पड़ेगा?' [ ३५७ ]'जब कुछ है ही नहीं, तो दोगे कहाँ से?'

स्वामीजी हटे तो सलीम ने आकर सेठजी के कान में कुछ कहा।

सेठजी मुसकराकर बोले--जंट साहब तुम लोगों को दवा-दारू के लिए १००) भेंट कर रहे हैं। मैं अपनी ओर से उसमें ९००) मिलाये देता हूँ। स्वामीजी डाक-बँगले पर चलकर मुझसे रुपये ले लो।

गूदड़ ने कृतज्ञता को दबाते हुए कहा---भैया ...पर मुख से एक शब्द भी न निकला।

समरकान्त बोले---यह मत समझो कि यह मेरे रुपये हैं। मैं अपने बाप के घर से नहीं लाया। तुम्हीं से, तुम्हारा ही गला दबाकर लिये थे। वह तुम्हें लौटा रहा हूँ!

गाँव में जहाँ सियापा-सा छाया हुआ था, वहाँ रौनक नज़र आने लगी। जैसे कोई संगीत वायु में घुल गया हो।