कर्मभूमि/पाँचवाँ भाग ७

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद
[ ३६९ ]

लाला समरकान्त के चले जाने के बाद सलीम ने हर एक गाँव का दौरा करके असामियों की आर्थिक दशा की जाँच करनी शुरू की। अब उसे मालूम हुआ की उनकी दशा उससे कहीं हीन है, जितनी वह समझे बैठा था। पैदावार का मूल्य लागत और लगान से कहीं कम था। खाने-कपड़े की भी गंजाइश न थी, दूसरे ख़र्चों का क्या जिक्र। ऐसा कोई बिरला ही किसान था, जिसका सिर ऋण के नीचे न दबा हो। कालेज में उसने अर्थ-शास्त्र अवश्य पढ़ा था और जानता था कि यहाँ के किसानों की हालत खराब है; पर अब ज्ञात हुआ कि पुस्तक-ज्ञान और प्रत्यक्ष व्यवहार में वही अन्तर है, जो किसी मनुष्य और उसके चित्र में है। ज्यों-ज्यों असली हालत मालूम होती जाती थी, उसे असामियों से सहानुभूति होती जाती थी। कितना अन्याय है कि जो बेचारे रोटियों को मुहताज हों, जिनके पास तन ढँकने को केवल चीथड़े हों, जो बीमारी में एक पैसे की दवा भी न कर सकते हों, जिनके घरों में दीपक भी न जलते हों, उनसे पूरा लगान वसूल किया जाय। जब जिन्स मँहगी थी, तब किसी तरह एक जून रोटियाँ मिल जाती थीं। इस मन्दी में तो उनकी दशा वर्णनातीत हो गयी है। जिनके लड़के पाँच-छः बरस की उम्र से ही मेहनत-मजूरी करने लगें, जो ईंधन के लिए हार में गोबर चनते फिरें, उनसे पुरा लगान वसूल करना, मानो उनके मुँह से रोटी का टुकड़ा छीन लेना है, उनकी रक्त-हीन देह से खून चूसना है।

परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होते ही सलीम ने अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। वह उन आदमियों में न था, जो स्वार्थ के लिए अफ़सरों के हर एक हुक्म की पाबन्दी करते हैं। वह नौकरी करते हुए भी आत्मा की रक्षा करना चाहता था। कई दिन एकान्त में बैठकर उसने विस्तार के साथ अपनी रिपोर्ट लिखी और मि० ग़ज़नवी के पास भेज दी। मि० ग़ज़नवी ने उसे तुरन्त लिखा--आकर मुझसे मिल जाओ। सलीम उनसे मिलना न चाहता था। डरता था, कहीं वह मेरी रिपोर्ट को दबाने का प्रस्ताव न करें। लेकिन फिर सोचा-- चलने में हरज ही क्या है। अगर वह मुझे क़ाय़ल कर दें, तब तो कोई बात नहीं; लेकिन अफ़सरों के भय से मैं अपनी [ ३७० ]रिपोर्ट को कभी न दबने दूंगा। उसी दिन वह सन्ध्या-समय सदर जा पहुँचा।

मि० ग़जनवी ने तपाक से हाथ बढ़ाते हुए कहा--मि० अमरकान्त के साथ तो तुमने दोस्ती का हक़ खूब अदा किया। वह खुद शायद इतनी मुफ़स्सल रिपोर्ट न लिख सकते। लेकिन तुम क्या समझते हो, सरकार को यह बातें मालूम नहीं?

सलीम ने कहा--मेरा तो ऐसा ही ख्याल है। उसे जो रिपोर्ट मिलती है, वह खुशामदी अहलकारों से मिलती है, जो रिआया का खून करके भी सरकार का घर भरना चाहते हैं। मेरी रिपोर्ट वाक़यात पर लिखी गयी है।

दोनों अफ़सरों में बहस होने लगी। ग़ज़नवी कहता था--हमारा काम केवल अफ़सरों की आज्ञा मानना है। उन्होंने लगान वसूल करने की आज्ञा दी, हमें लगान वसूल करना चाहिये। प्रजा को कष्ट होता है तो हो, हमें इससे प्रयोजन नहीं। हमें खुद अपनी आमदनी का टैक्स देने में कष्ट होता है; लेकिन मजबूर होकर देते हैं। कोई आदमी खुशी से टैक्स नहीं देता।

गज़नवी इस आज्ञा का विरोध करना अनीति ही नहीं, अधर्म समझता था। केवल जाब्ते की पाबन्दी से उसे सन्तोष न हो सकता था। वह इस हुक्म की तामील के लिए सब कुछ करने को तैयार था। सलीम का कहना था--हम सरकार के नौकर केवल इसलिए हैं कि प्रजा की सेवा कर सकें, उसे सुदशा की ओर ले जा सकें, उसकी उन्नति में सहायक हो सकें। यदि सरकार की किसी आज्ञा से इन उद्देश्यों की पूर्ति में बाधा पड़ती हो, तो उमें उस आज्ञा को कदापि न मानना चाहिए।

ग़ज़नवी ने मुँह लंबा करके कहा--मुझे खौफ है कि गवर्नमेण्ट तुम्हारा यहाँ से तबादला कर देगी।

'तबादला कर दे इसकी मुझे परवाह नहीं; लेकिन मेरी रिपोर्ट पर ग़ौर करने का वादा करे। अगर वह मुझे यहाँ से हटाकर मेरी रिपोर्ट को दाखिल दफ्तर करना चाहेगी, तो मैं इस्तीफ़ा दे दूंगा।'

ग़जनवी ने विस्मय से उसके मुंह की ओर देखा।

'आप गवर्नमेंट की दिक्क़तों का मुतलक अन्दाजा नहीं कर रहे हैं। अगर वह इतनी आसानी से दबने लगे, तो आप समझते हैं, रिआया कितनी [ ३७१ ]
शेर हो जायगी! जरा-जरा-सी बात पर तुफ़ान खड़े हो जायेंगे। और यह महज इस इलाके का मुआमला नहीं है, सारे मुल्क में यही तहरीक जारी है। अगर सरकार अस्सी फ़ीसदी काश्तकारों के साथ रिआयत करे, तो उसके लिए मुल्क का इन्तज़ाम करना दुश्वार हो जायगा!'

सलीम ने प्रश्न किया--गवर्नमेंट रिआया के लिए है, रिआया गवर्नमेंट के लिए नहीं। काश्तकारों पर जुल्म करके, उन्हें भूखों मारकर अगर गवर्नमेंट जिन्दा रहना चाहती है, तो कम-से-कम मैं अलग हो जाऊँगा। अगर मालियत में कमी आ रही है तो सरकार को अपना खर्च घटाना चाहिए। न कि रिआया पर सख्तियाँ की जाय।

ग़ज़नवी ने बहुत ऊँच-नीच सुझाया लेकिन सलीम पर कोई असर न हुआ। उसे डंडे से लगान वसूल करना किसी तरह मंजूर न था। आखिर ग़ज़नवी ने मजबूर होकर उसकी रिपोर्ट ऊपर भेज दी और एक ही सप्ताह के अंदर गवर्नमेंट ने उसे पृथक कर दिया। ऐसे भयंकर विद्रोही पर वह कैसे विश्वास करती।

जिस दिन उसने नये अफसर को चार्ज दिया और इलाके से बिदा होने लगा, उसके डेरे में चारों तरफ़ स्त्री-पुरुष का एक मेला लग गया और सब उससे मिन्नतें करने लगे, आप इस दशा में हमें छोड़कर न जायें। सलीम यही चाहता था। बाप के भय से घर न जा सकता था। फिर इन अनाथों से उसे स्नेह हो गया था। कुछ तो दया और कुछ अपने अपमान ने उसे उनका नेता बना दिया। वहीं अफ़सर जो कुछ दिन पहले अफ़सरी के मद से भरा हुआ आया था, जनता का सेवक बन बैठा। अत्याचार सहना अत्याचार करने से कहीं ज्यादा गौरव की बात मालूम हुई।

आन्दोलन की बागडोर सलीम के हाथ में आते ही लोगों के हौसले बँध गये। जैसे पहले अमरकान्त आत्मानन्द के साथ गाँव-गाँव दौड़ा करता था उसी तरह सलीम दौड़ने लगा। वही सलीम, जिसके खून के लोग प्यासे हो रहे थे, अब उस इलाके का मुकुटहीन राजा था। जनता उसके पसीने की जगह खून बहाने को तैयार थी।

सन्ध्या हो गयी थी। सलीम और आत्मानन्द दिन भर काम करने के बाद लौटे थे कि एकाएक नये बंगाली सिविलियन मि० घोष पुलिस कर्म
[ ३७२ ]चारियों के साथ आ पहुँचे और गाँव-भर के मवेशियों को कुर्क करने की घोषणा कर दी। कुछ कसाई पहले ही से बुला लिये थे। वे सस्ता सौदा खरीदने को तैयार थे। दम के दम में कांस्टेबलों ने मवेशियों को खोल-खोलकर मदरसे के द्वार पर जमा कर दिया। गूदड़, भोला, अलगू सभी चौधरी गिरफ्तार हो चुके थे। फ़स्ल की कुर्की तो पहले ही हो चकी थी; मगर फ़स्ल में अभी क्या रखा था। इसलिए अब अधिकारियों ने मवेशियों को कुर्क करने का निश्चय किया था। उन्हें विश्वास था कि किसान मवेशियों की कुर्की देखकर भयभीत हो जायेंगे, और चाहे उन्हें कर्ज लेना पड़े, या स्त्रियों के गहने बेचने पड़ें, वे जानवरों को बचाने के लिए सब कुछ करने पर तैयार होंगे। जानवर किसान के दाहिने हाथ है।

किसानों ने यह घोषणा सुनी, तो छक्के छूट गये। वे समझे थे कि सरकार और जो चाहे करे, पर मवेशियों को कुर्क न करेगी। क्या वह किसानों की जड़ खोद कर फेंक देगी?

यह घोषणा सुनकर भी वे यही समझ रहे थे कि यह केवल धमकी है, लेकिन जब मवेशी मदरसे के सामने जमा कर दिये गये और कसाइयों ने उनकी देख-भाल शुरू की, तो सबों पर जैसे वज्रपात हो गया। अब समस्या उस सीमा तक पहुँच गयी थी, जब रक्त का आदान-प्रदान आरंभ हो जाता है।

चिराग जलते-जलते जानवरों का बाजार लग गया। अधिकारियों ने इरादा किया है कि सारी रकम एकजाई वसूल करें। गाँववाले आपस में लड़-भिड़कर अपने-अपने लगान का फैसला कर लेंगे। इसकी अधिकारियों को कोई चिन्ता नहीं है।

सलीम ने आकर मि० घोष से कहा--आपको मालूम है कि मवेशियों को कुर्क करने का आपको मजाज़ नहीं है?

मि० घोष ने उग्र भाव से जवाब दिया--यह नीति ऐसे अवसरों के लिए नहीं है। विशेष अवसरों के लिए विशेष नीति होती है। क्रांति की नीति, शांति की नीति से भिन्न होनी स्वाभाविक है।

अभी सलीम ने कुछ उत्तर न दिया था कि मालूम हुआ, अहीरों के महाल में लाठी चल गयी। मि० घोष उधर लपके। सिपाहियों ने भी संगीने चढ़ाई और उनके पीछे चले। काशी, पयाग, आत्मानन्द सब उसी तरफ़ [ ३७३ ]दौड़े। केवल सलीम यहाँ खड़ा रहा। जब एकान्त हो गया, तो उसने कसाइयों के सरगना के पास जाकर सलाम-अलेक किया और बोला--क्यों भाई साहब, आपको मालूम है, आप लोग इन मवेशियों को खरीदकर यहाँ की गरीब रिआया के साथ कितनी बड़ी बे-इन्साफ़ी कर रहे हैं?

सरगना का नाम तेग़ मुहम्मद था। नाटे कद का गठीला आदमी था, पूरा पहलवान। ढीला कुरता, चारखाने की तहमद, गले में चाँदी की तावीज, हाथ में मोटा सोटा। नम्रता से बोला--साहब, मैं तो माल खरीदने आया हूँ। मुझे इससे क्या मतलब कि माल किसका है और कैसा है। चार पैसे का फ़ायदा जहाँ होता है वहाँ आदमी जाता ही है।

'लेकिन यह तो सोचिए कि मवेशियों की कुर्की किस सबब से हो रही है। रिआया के साथ आपको हमदर्दी होनी चाहिए।'

तेग़ मुहम्मद पर कोई प्रभाव न हुआ--सरकार से जिसकी लड़ाई होगी उसकी होगी। हमारी कोई लड़ाई नहीं है।

'तुम मुसलमान होकर ऐसी बातें करते हो, इसका अफ़सोस है। इसलाम ने हमेशा मज़लूमों की मदद की है। और तुम मज़लूमों की गरदन पर छुरी फेर रहे हो!'

'जब सरकार हमारी परवरिश कर रही है, तो हम उसके बदखाह नहीं बन सकते।'

'अगर सरकार तुम्हारी जायदाद छीनकर किसी गैर को दे दे, तो तुम्हें बुरा लगेगा, या नहीं?'

'सरकार से लड़ना हमारे मजहब के खिलाफ़ है।'

'यह क्यों नहीं कहते कि तुममें गैरत नहीं है।'

'आप तो मुसलमान हैं। क्या आपका फ़र्ज नहीं है कि बादशाह की मदद करें?'

'अगर मुसलमान होने का यह मतलब है कि ग़रीबों का खून किया जाय, तो मैं काफ़िर हूँ।'

तेगमुहम्मद पढ़ा-लिखा आदमी था। वह वाद-विवाद करने पर तैयार हो गया। सलीम ने उसकी हँसी उड़ाने की चेष्टा की। पन्थों को वह संसार का कलंक समझता था, जिसने मनुष्य-जाति को विरोधी दलों में विभक्त [ ३७४ ]करके एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। तेग़मुहम्मद रोज़ा नमाज का पाबन्द, दीनदार मुसलमान था। मजहब की तौहीन क्योंकर बरदाश्त करता। उधर तो अहिराने में पुलिस और अहीरों में लाठियां चल रही थीं, इधर इन दोनों में हाथा-पाई की नौबत आ गयी। कसाई पहलवान था। सलीम भी ठोकर चलाने और घूंसेबाजी में मँजा हुआ, फुरतीला, चुस्त। पहलवान उसे अपनी पकड़ में लाकर दबोच बैठना चाहते थे। वह ठोकर पर ठोकर जमा रहा था। ताबड़ तोड़ ठोकरें पड़ीं, तो पहलवान साहब गिर पड़े और लगे मातृभाषा में अपने मनोविकारों को प्रकट करने। उसके दोनों साथियों ने पहले दूर ही से तमाशा देखना उचित समझा था; लेकिन जब तेग़ मुहम्मद गिर पड़ा, तो दोनों कसकर पिल पड़े। यह दोनों अभी जवान पट्ठे थे, तेज़ी और चुस्ती में सलीम के बराबर। सलीम पीछे हटता जाता था और यह दोनों उसे ठेलते जाते थे। उसी वक्त सलोनी लाठी टेकती हुई अपनी गाय खोजने आ रही थी। पुलिस उसे उसके द्वार से खोल लायी थी। यहाँ यह संग्राम छिड़ा देखकर उसने अंचल सिर से उतार कर कमर में बाँधा और लाठी सँभालकर पीछे से दोनों कसाइयों को पीटने लगी। उनमें से एक ने पीछे फिरकर बुढ़िया को इतने ज़ोर से धक्का दिया कि वह तीन-चार हाथ पर जा गिरी। इतनी देर में सलीम ने घात पाकर सामने के जवान को ऐसा घूंसा दिया कि उसकी नाक से खून जारी हो गया और वह सिर पकड़ कर बैठ गया। अब केवल एक आदमी और रह गया। उसने अपने दो योद्धाओं की यह गति देखी, तो पुलिसवालों से फरियाद करने भागा। तेग़मुहम्मद की दोनों घुटनियाँ बेकार हो गयी थीं। उठ ही न सकता था। मैदान खाली देख कर सलीम ने लपककर मवेशियों की रस्सियां खोल दी और तालियां बजा-बजा कर उन्हें भगा दिया। बेचारे जानवर सहमे खड़े थे, आनेवाली विपत्ति का उन्हें कुछ आभास हो रहा था। रस्सी खुली तो सब पूंछ उठा-उठा कर भागे और हार की तरफ़ निकल गये।

उसी वक्त आत्मानन्द बदहवास दौड़े आये और बोले--आप ज़रा अपना रिवालवर तो मझे दीजिए।

सलीम ने हक्का-बक्का होकर पूछा--क्या माजरा है, कुछ कहो तो? [ ३७५ ]'पुलिसवालों ने कई आदमियों को मार डाला। अब नहीं रहा जाता, मैं इस घोष को मजा चखा देना चाहता हूँ।'

'आप कुछ भंग तो नहीं खा गये हैं। भला यह रिवालवर चलाने का मौका है?'

'अगर यों न दोगे, तो मैं छीन लूंगा। इस दुष्ट ने गोलियाँ चलवाकर चार-पाँच आदमियों की जान ले ली। दस-बारह आदमी बुरी तरह ज़ख्मी हो गये हैं। कुछ इनको भी तो मजा चखाना चाहिए। मरना तो है ही।'

'मेरा रिवालवर इस काम के लिए नहीं है।'

आत्मानन्द यों भी उद्दण्ड आदमी थे। इस हत्याकाण्ड ने उन्हें बिल्कुल उन्मत्त कर दिया था। बोले--निरपराधों का रक्त बहाकर आततायी चला जा रहा है, तुम कहते हो रिवालवर इस काम के लिए नहीं है! फिर और किस काम के लिए है? मैं तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ भैया, एक क्षण के लिए दे दो। दिल की लालसा पूरी कर लूं। कैसे-कैसे वीरों को मारा है इन हत्यारों ने, कि देखकर मेरी आँखों में खून उतर आया।

सलीम बिना कुछ उत्तर दिये वेग से अहिराने की ओर चला। रास्ते में सभी द्वार बन्द थे, कुत्ते भी कहीं भागकर जा छिपे थे।

एकाएक एक घर का द्वार झोंके के साथ खुला और एक युवती सिर खोले, अस्तव्यस्त, कपड़े खून से तर, भयातुर हिरनी सी आकर उसके पैरों से चिपट गयी और सहमी हुई आँखों से द्वार की ओर ताकती हुई बोली--

'मालिक, यह सब सिपाही मुझे मारे डालते हैं।'

सलीम ने तसल्ली दी--घबराओ नहीं, घबराओ नहीं। माजरा क्या है?

युवती ने डरते-डरते बताया कि घर में कई सिपाही घुस गये हैं। इसके आगे वह और कुछ न कह सकी।

'घर में कोई आदमी नहीं है?'

'वह तो भैंसें चराने गये हैं।'

'तुम्हारे कहाँ चोट आयी?'

'मझे चोट नहीं आयी। मैंने दो आदमियों को मारा है।'

उसी वक्त दो कांसटेबल बन्दूकें लिये घर से निकल आये और युवती को [ ३७६ ]सलीम के पास खड़ी देख दौड़कर उसके केश पकड़ लिये और उसे द्वार की ओर खींचने लगे।

सलीम ने रास्ता रोककर कहा---छोड़ दो उसके बाल, वरना अच्छा न होगा। मैं तुम दोनों को भून कर रख दूँगा।

एक कांसटेबल ने क्रोध भरे स्वर में कहा- छोड़ कैसे दें। इसे ले जायँगे साहब के पास। इसने हमारे दो आदमियों को गँड़ासे से जख्मी कर दिया। दोनों पड़े तड़प रहे हैं।

'तुम इसके घर में क्यों गये थे?'

'गये थे मवेशियों को खोलने! यह गँड़ासा लेकर टूट पड़ी।'

युवती ने टोका--झूठ बोलते हो। तुमने मेरी बाँह नहीं पकड़ी थी?

सलीम ने लाल आँखों से सिपाही को देखा और धक्का देकर कहा--इसके बाल छोड़ दो!

'हम इसे साहब के पास ले जायँगे।'

'तुम इसे नहीं ले जा सकते।'

सिपाहियों ने सलीम को हाकिम के रूप में देखा था। उसकी मातहती कर चुके थे। उस रोब का कुछ अंश उनके दिल पर बाकी था। उसके साथ जबरदस्ती करने का साहस न हुआ। जाकर मि० घोष से फरियाद की। घोष बाबू सलीम से जलते थे। उनका ख्याल था कि सलीम ही इस आन्दोलन को चला रहा है और यदि उसे हटा दिया जाय तो चाहे आन्दोलन तुरन्त शांत न हो जाय, पर उसकी जड़ टूट जायगी। इसलिए सिपाहियों की रिपोर्ट सुनते ही तुरन्त घोड़ा बढ़ाकर सलीम के पास आ पहुँचे और अंग्रेज़ी में कानून बघारने लगे। सलीम को भी अंग्रेजी बोलने का अच्छा अभ्यास था। दोनों में पहले कानूनी मुबाहसा हुआ, फिर धार्मिक तत्व-निरूपण का नम्बर आया, इससे उतरकर दोनों दार्शनिक तर्क-वितर्क करने लगे, यहाँ तक कि अन्त में व्यक्तिगत आक्षेपों की बौछार होने लगी। इसके एक ही क्षण बाद शब्द ने क्रिया का रूप धारण किया। मिस्टर घोष ने हंटर चलाया, जिसने सलीम के चेहरे पर एक नीली-चौड़ी उभरी हुई रेखा छोड़ दी। आँखें बाल-बाल बच गयीं। सलीम भी जामे से बाहर हो गया। घोष की टाँग पकड़ कर जोर से खींचा। साहब घोड़े से नीचे गिर पड़े। सलीम उनकी छाती पर चढ़ बैठा [ ३७७ ]और नाक पर घूंसा मारा। घोष बाबू मूर्छित हो गये। सिपाहियों ने दूसरा घूंसा पड़ने दिया। चार आदमियों ने दौड़कर सलीम को पकड़ लिया। चार आदमियों ने घोष को उठाया और होश में लाये।

अँधेरा हो गया था। आतंक ने सारे गाँव को पिशाच की भाँति छाप लिया था। लोग शोक से मौन और आतंक के भार से दबे, मरनेवालों की लाशें उठा रहे थे। किसी के मुँह से रोने की आवाज न निकलती थी। ज़ख्म ताजा था, इसलिये टीस न थी। रोना पराजय का लक्षण है। इन प्राणियों को विजय का गर्व था। रोकर अपनी दीनता प्रगट न करना चाहते थे। बच्चे भी जैसे रोना भूल गये थे।

मिस्टर घोष घोड़े पर सवार होकर डाकबँगले गये। सलीम एक सब इंसपेक्टर और कई कांसटेबलों के साथ एक लारी पर सदर भेज दिया गया। वह अहीरिन युवती भी उसी लारी पर भेजी गयी। पहर रात जाते-जाते चारों अर्थियां गंगा की ओर चलीं। सलोनी लाठी टेकती हई आगे-आगे गाती जाती थीं---

'सैयाँ मोरा रूठा जाय सखी री...'