कर्मभूमि/पाँचवाँ भाग ८

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ३७७ ]

काले खाँ के आत्म-समर्पण ने अमरकान्त के जीवन को जैसे कोई आधार प्रदान कर दिया। अब तक उसके जीवन का कोई लक्ष्य न था, कोई आदर्श न था, कोई व्रत न था। इस मृत्यु ने उसकी आत्मा में प्रकाश सा डाल दिया। काले खाँ की याद उसे एक क्षण के लिए भी न भूलती और किसी गुप्त शक्ति से उसे शांति और बल देती थी। वह उसकी वसीयत इस तरह पूरी करना चाहता था कि काले खाँ की आत्मा को स्वर्ग में शांति मिले। घड़ी रात से उठकर क़ैदियों का हाल-चाल पूछना और उनके घरों पर पत्र लिखकर रोगियों के लिए दवा-दारू का प्रबन्ध करना, उनकी शिकायतें सुनना और अधिकारियों से मिलकर शिकायतों को दूर करना यह सब उसके काम थे। और इस काम को वह इतनी विनय, इतनी नम्रता और सहृदयता से करता कि अमलों को भी उस पर सन्देह [ ३७८ ]की जगह विश्वास होता था। वह क़ैदियों का भी विश्वासपात्र था और अधिकारियों का भी।

अब तक वह एक प्रकार से उपयोगितावाद का उपासक था। इसी सिद्धान्त को मन में, यद्यपि अज्ञात रूप से, रखकर वह अपने कर्तव्य का निश्चय करता था। तत्व-चिन्तन का उसके जीवन में कोई स्थान न था। प्रत्यक्ष के नीचे जो अथाह गहराई है, वह उसके लिए कोई महत्व न रखती थी। उसने समझ रखा था, जहाँ गहराई है वहाँ शून्य के सिवा और कुछ नहीं। काले खाँ की मृत्यु ने जैसे उसका हाथ पकड़कर बल-पूर्वक उसे उस गहराई में डुबा दिया और उसमें डूबकर उसे अपना सारा जीवन किसी तृण के समान ऊपर तैरता हुआ दीख पड़ा, कभी लहरों के साथ आगे बढ़ता हुआ, कभी हवा के झोंकों से पीछे हटता हुआ, कभी भँवर में पड़कर चक्क खाता हुआ उसमें स्थिरता न थी, संयम न था, इच्छा न थी। उसकी सेवा में भी दंभ था, प्रमाद था, द्वेष था। उसने दंभ में सुखदा की उपेक्षा की। उस बिलासिनी के जीवन में जो सत्य था, उस तक पहुँचने का उद्योग न करके वह उसे त्याग बैठा। उद्योग करता भी क्या? तब उसे उद्योग का ज्ञान भी न था। प्रत्यक्ष ने उसकी भीतरवाली आँखों पर परदा डाल रखा था। इसी प्रमाद में उसने सकीना से प्रेम का स्वाँग किया। क्या उस उन्माद में लेशमात्र भी प्रेम की भावना थी? उस समय मालूम होता था, वह प्रेम में रत हो गया है, अपना सर्वस्व उस पर अर्पण किये देता है; पर आज उस प्रेम में लिप्सा के सिवा और उसे कुछ न दिखाई देता था। लिप्सा ही न थी, नीचता भी थी। उसने उस सरला रमणी की हीनावस्था से अपनी लिप्सा शान्त करनी चाही थी। फिर मुन्नी उसके जीवन में आयी, निराशाओं से भग्न, कामनाओं से भरी हुई। उस देवी से उसने कितना कपट व्यवहार किया। यह सत्य है कि उसके व्यवहार में कामुकता न थी। वह इसी विचार से अपने मन को समझा लिया करता था; लेकिन अब आत्म-निरीक्षण करने पर उसे स्पष्ट ज्ञात हो रहा था कि उस विनोद में भी, उस अनुराग में भी कामुकता का समावेश था। तो क्या वह वास्तव में कामुक है? इसका जो उत्तर उसने स्वयं अपने अन्तःकरण से पाया, वह किसी तरह श्रेयस्कर न था। उसने सूखदा को विलासिता का दोष लगाया; पर वह स्वयं उससे कहीं कुत्सित, [ ३७९ ]कहीं विषय-पूर्ण विलासिता में लिप्त था। उसके मन में प्रबल इच्छा हई कि दोनों रमणियों के चरणों पर सिर रखकर रोये और कहे--देवियो, मैंने तुम्हारे साथ छल किया है, तुम्हें दगा दी है। मैं नीच हूँ, अधम हूँ, मुझे जो सजा चाहे दो, यह मस्तक तुम्हारे चरणों पर है।

पिता के प्रति भी अमरकान्त के मन में श्रद्धा का भाव उदय हुआ। जिसे उसने माया का दास और लोभ का कीड़ा समझ लिया था, जिसे वह किसी प्रकार के त्याग के अयोग्य समझता था, वह आज देवत्व के ऊँचे सिंहासन पर बैठा हुआ था। प्रत्यक्ष के नशे में उसने किसी न्यायी, दयालु ईश्वर की सत्ता को कभी स्वीकार न किया था; पर इन चमत्कारों को देखकर अब उसमें विश्वास और निष्ठा का जैसे एक सागर-सा उमड़ पड़ा था। उसे अपने छोटे-छोटे व्यवहारों में भी ईश्वरीय इच्छा का आभास होता था। जीवन में अब एक नया उत्साह था, जीवन अब उसके लिए अन्धकारमय न था। दैवी इच्छा में अन्धकार कहाँ?

सन्ध्या का समय था। अमरकान्त परेड में खड़ा था कि उसने सलीम को आते देखा। सलीम के चरित्र में जो कायापलट हुई थी, उसकी उसे खबर मिल चुकी थी; पर यहाँ तक नौबत पहुँच चुकी है, इसका उसे गुमान भी न था। वह दौड़कर सलीम के गले लिपट गया और बोला--तुम खूब आये दोस्त, अब मुझे यकीन आ गया कि ईश्वर हमारे साथ है। सुखदा भी तो यहीं है, जनाने जेल में, मुन्नी भी आ पहुँची। तुम्हारी कसर थी, वह पूरी हो गयीं। मैं दिल में समझ रहा था, तुम भी एक-न-एक दिन आओगे, पर इतनी जल्द आओगे, यह उम्मीद न थी। वहाँ की ताज़ी खबरें सुनाओ। कोई हंगामा तो नहीं हुआ?

सलीम ने व्यंग्य से कहा--जी नहीं, जरा भी नहीं। हंगामे की कोई बात भी हो। लोग मजे से खा रहे हैं और फाग गा रहे हैं। आप यहाँ आराम से बैठे हुए हैं न!

उसने थोड़े-से-शब्दों में वहाँ की सारी परिस्थिति कह सुनाई--मवेशियों का कुर्क किया जाना, क़साइयों का आना, अहीरों के मुहाल में गोलियों का चलना। घोष को पटककर मारने की कथा उसने विशेष रुचि से कही।

अमरकान्त का मुंह लटक गया--तुमने सरासर नादानी की। [ ३८० ]'और आप क्या समझते थे, कोई पंचायत है, जहाँ शराब और हुक्के के साथ सारा फैसला हो जायगा?'

'मगर फरियाद तो इस तरह नहीं की जाती।'

'हमने तो कोई रिआयत नहीं चाही थी।'

'रिआयत तो थी ही। जब तुमने एक शर्त पर जमीन ली, तो इंसाफ़ यह कहता है कि वह शर्त पूरी करो। पैदावार की शर्त पर किसानों ने ज़मीन नहीं जोती थी; बल्कि सालाना लगान की शर्त पर। जमींदार या सरकार को पैदावार की कमी-बेशी से कोई सरोकार नहीं है।'

'जब पैदावार के महँगे हो जाने पर लगान बढ़ा दिया जाता है, तो कोई वजह नहीं कि पैदावार के सस्ते हो जाने पर घटा न दिया जाय। मन्दी में तेज़ी का लगान वसूल करना सरासर बेइन्साफी है।'

'मगर लगान लाठी के जोर से तो नहीं बढ़ाया जाता। उसके लिए भी तो कानून है?'

सलीम को विस्मय हो रहा था, इतनी भयानक परिस्थिति सुनकर भी अमर इतना शान्त कैसे बैठा हुआ है। इसी दशा में उसने यह खबरें सुनी होतीं, तो शायद उसका खून खौल उठता और वह आपे से बाहर हो जाता। अवश्य ही अमर जेल में आकर दब गया है। ऐसी दशा में उसने उन तैयारियों को उससे छिपाना ही उचित समझा, जो आजकल दमन का मुकाबला करने के लिए की जा रही थीं।

अमर उसके जवाब की प्रतीक्षा कर रहा था। जब सलीम ने कोई जवाब न दिया, तो उसने पूछा--तो आजकल वहाँ कौन है? स्वामी जी हैं?

सलीम ने सकुचाते हुए कहा--स्वामीजी तो शायद पकड़ गये। मेरे बाद ही वहाँ सकीना पहँच गयी।

'अच्छा! सकीना भी परदे से निकल आई। मुझे तो उससे ऐसी उम्मीद न थी।'

'तो क्या तुमने समझा था कि आग लगाकर तुम उसे एक दायरे के अन्दर रोक लोगे?'

अमर ने चिन्तित होकर कहा--मैंने तो यही समझाया कि हमने हिंसाभाव को लगाम दे दी है और वह काबू से बाहर नहीं हो सकता। [ ३८१ ]'आप आज़ादी चाहते हैं। मगर उसकी कीमत नहीं देना चाहते।'

'आपने जिस चीज़ को आजादी की कीमत समझ रखा है, वह उसकी क़ीमत नहीं है। उसकी कीमत है--हक और सच्चाई पर जमे रहने की ताकत।'

सलीम उत्तेजित हो गया--यह फ़जूल की बात है। जिस चीज़ की बुनियाद जब्र पर है, उस पर हक और इन्साफ़ का कोई असर नहीं पड़ सकता।

अमर ने पूछा--क्या तुम इसे तसलीम नहीं करते कि दुनिया का इन्तज़ाम हक और इन्साफ़ पर कायम है और हरेक इन्सान में दिल की गहराइयों के अन्दर वह तार मौजूद है, जो कुरबानियों से झंकार उठता है?

सलीम ने कहा--नहीं, मैं इसे तसलीम नहीं करता। दुनिया का इन्तज़ाम खुदगरजी और जोर पर कायम है और ऐसे बहुत कम इन्सान हैं जिनके दिल की गहराइयों के अन्दर वह तार मौजद हो।

अमर ने मुसकराकर कहा--तुम तो सरकार के खैरख्वाह नौकर थे। तुम जेल में कैसे आ गये?

सलीम हँसा--तुम्हारे इश्क में।

'दादा को किसका इश्क था?'

'अपने बेटे का।'

'और सुखदा को?'

'अपने शौहर का।'

'और सकीना को? और मन्नी को? और इन सैकड़ों आदमियों को जो तरह-तरह की सख्तियाँ झेल रहे हैं?'

'अच्छा मान लिया कि कुछ लोगों के दिल की गहराइयों के अन्दर यह तार है; मगर ऐसे आदमी कितने हैं?'

'मैं कहता हूँ ऐसा आदमी नहीं जिसके अन्दर हमदर्दी का तार न हो। हाँ, किसी पर जल्द असर होता है, किसी पर देर में और कुछ ऐसे ग़रज़ के बन्दे भी हैं, जिन पर शायद कभी न हो।'

सलीम ने हारकर कहा--तो आखिर तुम चाहते क्या हो? लगान हम दे नहीं सकते। वह लोग कहते हैं, हम लेकर छोड़ेंगे। क्यों? अपना सब कुछ कुर्क हो जाने दें? अगर हम कुछ कहते हैं, तो हमारे ऊपर गोलियाँ चलती [ ३८२ ]हैं। नहीं बोलते, तो तबाह हो जाते हैं। फिर दूसरा कौन-सा रास्ता है? हम जितना ही दबते जाते हैं, उतना वह लोग शेर होते जाते हैं। मरनेवाला बेशक दिलों में रहम पैदा कर सकता है; लेकिन मारनेवाला खौफ पैदा कर सकता है, जो रहम से कहीं ज्यादा असर डालनेवाली चीज़ है।

अमर ने इस प्रश्न पर महीनों विचार किया था। वह मानता था, संसार में पशुबल का प्रभुत्व है, किन्तु पशुबल को भी न्यायबल की शरण लेनी पड़ती है। आज बलवान से बलवान राष्ट्र में भी यह साहस नहीं है कि वह किसी निर्बल राष्ट्र पर खुल्लम-खुल्ला यह कहकर हमला करे कि 'हम तुम्हारे ऊपर राज करना चाहते हैं; इसलिये तुम हमारे अधीन हो जाओ।' उसे अपने पक्ष को न्याय-संगत दिखाने के लिये कोई न कोई बहाना तलाश करना पड़ता है। बोला--अगर तुम्हारा खयाल है कि खून और कत्ल से किसी कौम की नजात हो सकती है, तो तुम सख्त ग़लती पर हो। मैं इसे नजात नहीं कहता कि एक जमाअत के हाथों से ताकत निकल कर दूसरी जमाअत के हाथों में आ जाय और वह भी तलवार के ज़ोर में राज करे। मैं नजात उसे कहता हूँ कि इंसान में इंसानियत आ जाय। और इंसानियत की जब, बेइंसाफ़ी और खुदगरज़ी से दुश्मनी है।

सलीम को यह कथन तत्वहीन मालूम हुआ। मुँह बनाकर बोला--हुजूर को मालूम रहे कि दुनिया में फ़रिश्ते नहीं बसते, आदमी बसते हैं।

अमर ने शांत-शीतल हृदय से जवाब दिया--लेकिन तुम देख नहीं रहे हो कि हमारी इंसानियत सदियों तक खून और कत्ल में डूबे रहने के बाद अब सच्चे रास्ते पर आ रही है! उसमें यह ताकत कहाँ से आई? उसमें खुद वह दैवी शक्ति मौजूद है। उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता। बड़ी से बड़ी फ़ौजी ताकत भी उसे कुचल नहीं सकती। जैसे सूखी जमीन में घास की जड़ें पड़ी रहती हैं और ऐसा मालूम होता है कि ज़मीन साफ़ हो गयी, लेकिन पानी के छींटे पड़ते ही वह जड़ें पनप उठती है, हरियाली से सारा मैदान लहराने लगता है, उसी तरह इस कलों और हथियारों और खुदगरजियों के जमाने में भी हममें वह दैवी शक्ति छिपी हुई अपना काम कर रही है। वह जमाना आ गया है, जब हक की आवाज तलवार की झंकार या तोप की गरज़ से ज्यादा कारगर होगी। बड़ी-बड़ी कौमें अपनी-अपनी फौजो और जहाजी [ ३८३ ]ताकतें घटा रही हैं। क्या तुम्हें इससे आनेवाले जमाने का कुछ अन्दाज नहीं होता? हम इसलिये गुलाम है कि हमने खुद गुलामी की बेड़ियां अपने पैरों में डाल ली है। जानते हो कि यह बेड़ी क्या है? आपस का भेद। जब तक हम इस बेड़ी को काटकर प्रेम करना न सीखेंगे, सेवा में ईश्वर का रूप न देखेंगे, हम गुलामी में पड़े रहेंगे। मैं यह नहीं कहता कि जब तक भारत का हरेक व्यक्ति इतना बेदार न हो जायेगा, तब तक हमारी नजात न होगी। ऐसा तो शायद कभी न हो, पर कम से कम उन लोगों के अन्दर तो यह रोशनी आनी ही चाहिए, जो कौम के सिपाही बनते हैं। पर हममें कितने ऐसे हैं जिन्होंने अपने दिल को प्रेम से रोशन किया हो? हममें अब भी वहीं ऊँच-नीच का भाव है, स्वार्थ लिप्सा है, अहंकार है।

बाहर ठंड पड़ने लगी थी। दोनों मित्र अपनी-अपनी कोठरियों में गये। सलीम जवाब देने के लिए उतावला हो रहा था; पर वार्डन ने जल्दी की और उन्हें उठना पड़ा।

दरवाज़ा बन्द हो गया, तो अमरकान्त ने एक लम्बी साँस ली और फरियादी आँखों से छत की तरफ देखा। उसके सिर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। उसके हाथ कितने बेगुनाहों के खून से रँगे हुए हैं। कितने यतीम बच्चे और अबला विधवाएँ उसका दामन पकड़कर खींच रही हैं! उसने क्यों इतनी जल्दबाजी से काम किया? क्या किसानों की फरियाद के लिए यही एक साधन रह गया था? और किसी तरह फरियाद की आवाज नहीं उठाई जा सकती थी? क्या यह इलाज बीमारी से ज्यादा असाध्य नहीं है? इन प्रश्नों ने अमरकान्त को पथभ्रष्ट-सा कर दिया। इस मानसिक संकट में काले खाँ की प्रतिमा उसके सम्मुख आ खड़ी हुई। उसे आभास हुआ कि वह उससे कह रही है--ईश्वर की शरण में जा। वहीं तुझे प्रकाश मिलेगा।