गबन/भाग 33

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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पीसने लगी। जागेश्वरी ने जाकर जालपा से कहा--बहू, वह जांत पर बैठी गेहूं पीस रही हैं। उठाती हूं, उठती ही नहीं। कोई देख ले तो क्या कहे।

जालपा ने मुंशीजी के कमरे से निकलकर सास की घबराहट का आनंद उठाने के लिए कहा-यह तुमने क्या गजब किया, अम्मांजी ! सचमुच, कोई देख ले तो नाक ही कट जाय । चलिए, जरा देखें।

जागेश्वरी ने विवशता से कहा-क्या करूं, मैं तो समझा के हार गई, मानती ही नहीं।

जालपा ने जाकर देखा, तो रतन गेहूं पीसने में मग्न थी। विनोद के स्वाभाविक आनंद से उसका चेहरा खिला हुआ था। इतनी ही देर में उसके माथे पर पसीने की बूंदें आ गई थीं। उसके बलिष्ठ हाथों में जांत लट्टू के समान नाच रहा था।

जालपा ने हंसकर कहा-ओ री, आटा महीन हो, नहीं पैसे न मिलेंगे।

रतन को सुनाई न दिया। बहरों की भांति अनिश्चित भाव से मुस्कराई। जालपा ने और जोर से कहा-आटा खूब महीन पीसना, नहीं पैसे न पाएगी।

रतन ने भी हंसकर कहा-जितना महीन कहिए उतना महीन पीस दें, बहूजी। पिसाई अच्छी मिलनी चाहिए।

जालपा-धेले सेर।

रतन-धेले सेर सही।

जालपा-मुंह धो आओ। धेले सेर मिलेंगे।

रतन-मैं यह सब पीसकर उठूँगी। तुम यहां क्यों खड़ी हो?

जालपा-आ जाऊं, मैं भी खींच दूँ।

रतन-जी चाहता है, कोई जांत का गीत गाऊं।

जालपा-अकेले कैसे गाओगी । (जागेश्वरी से) अम्मां आप जरा दादाजी के पास बैठ जायं, मैं अभी आती हूँ।

जालपा भी जांत पर जा बैठी और दोनों जांत का यह गीत गाने लगी।

मोही जोगिन बनाके कहां गए रे जोगिया।

दोनों के स्वर मधुर थे। जांत की घुमुर-घुमुर उनके स्वर के साथ साज का काम कर रही थी। जब दोनों एक कड़ी गाकर चुप हो जातीं, तो जांत का स्वर मानो कठ-ध्वनि से रंजित होकर और भी मनोहर हो जाता था। दोनों के हृदय इस समय जीवन के स्वाभाविक आनंद से पूर्ण थे? न शोक का भार था, न वियोग का दुःख। जैसे दो चिड़ियां प्रभात की अपूर्व शोभा से मग्न होकर चहक रही हों।

तैंतीस

रमानाथ की चाय की दुकान खुल तो गई, पर केवल रात को खुलती थी। दिन-भर बंद रहती थी। रात को भी अधिकतर देवीदीन ही दुकान पर बैठता, पर बिक्री अच्छी हो जाती थी। पहले ही दिन तीन रुपये के पैसे आए, दूसरे दिन से चार-पांच रुपये का औसत पड़ने लगा। चाय
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इतनी स्वादिष्ट होती थी कि जो एक बार यहां चाय पी लेता फिर दूसरी दुकान पर न जाता। रमा ने मनोरंजन की भी कुछ सामग्री जमा कर दी। कुछ रुपये जमा हो गए, तो उसने एक सुंदर मेज ली। चिराग जलने के बाद साग-भाजी की बिक्री ज्यादा न होती थी। वह उन टोकरों को उठाकर अंदर रख देता और बरामदे में वह मेज लगा देता। उस पर ताश के सेट रख देता। दो दैनिक-पत्र भी मंगाने लगा। दुकान चल निकली। उन्हीं तीन-चार घंटों में छ:-सात रुपये आ जाते थे और सब खर्च निकालकर तीन-चार रुपये बच रहते थे।

इन चार महीनों की तपस्या ने रमा को भोग-लालसा को और भी प्रचंड कर दिया था। जब तक हाथ में रुपये न थे, वह मजबूर था। रुपये आते ही सैर-सपाटे की धुन सवार हो गई। सिनेमा की याद भी आई। रोज के व्यवहार की मामूली चीजें, जिन्हें अब तक वह टालता आया था, अव अबाध रूप से आने लगीं। देवीदीन के लिए वह एक सुंदर रेशमी चादर लाया। जग्गो के सिर में पीड़ा होती रहती थी। एक दिन सुगंधित तेल की शीशियां लाकर उसे दे दीं। दोनों निहाल हो गए। अब बुढिया कभी अपने सिर पर बोझ लाती तो डांटता-काकी, अब तो मैं भी चार पैसे कमाने लगा हूं, अब तू क्यों जान देती है? अगर फिर कभी तेरे सिर पर टोकरी देखी तो कहे देता हूं, दुकान उठाकर फेंक दूंगा। फिर मुझे जो सजा चाहे दे देना। बुढिया बेटे की डांट सुनकर गद्गद हो जाती।मंडी से बोझ लाती तो पहले चुपके से देखती, रमा दुकान पर नहीं है। अगर वह बैठा होता तो किसी कली को एक-दो पैसा देकर उसके सिर पर रख देती। वह न होता तो लपकी हुई आती और जल्दी से बोझ उतारकर शांत बैठ जाती, जिससे रमा भांप न सके।

एक दिन 'मनोरमा थियेटर' में राधेश्याम का कोई नया ड्रामा होने वाला था। इस ड्रामे की बड़ी धूम थी। एक दिन पहले से ही लोग अपनी जगहें रक्षित करा रहे थे। रमा को भी अपनी जगह रक्षित करा लेने की धुन सवार हुई। सोचा, कहीं रात को टिकट न मिला तो टापते रह जायेंगे। तमाशे की बड़ी तारीफ है। उस वक्त एक के दो देने पर भी जगह न मिलेगी। इसी उत्सुकता ने पुलिस के भय को भी पीछे डाल दिया। ऐसी आफत नही आई है कि घर से निकलते ही पुलिस पकड़ लेगी। दिन को न सही, रात को तो निकलता ही हूं। पुलिस चाहती तो क्या रात को न पकड़ लेती। फिर मेरा वह हुलिया भी नहीं रहा। पगड़ी चेहरा बदल देने के लिए काफी है। यों मन को समझाकर वह दस बजे घर से निकला। देवीदीन कहीं गया हुआ था। बुढिया ने पूछा- कहां जाते हो बेटा? रमा ने कहा- कहीं नहीं काकी, अभी आता हूँ।

रमा सड़क पर आया, तो उसका साहस हिम की भांति पिघलने लगा। उसे पग-पग पर शंका होती थी, कोई कांस्टेबल न आ रहा हो। उसे विश्वास था कि पुलिस का एक-एक चौकीदार भी उसको हुलिया पहचानता है और उसके चेहरे पर निगाह पड़ते ही पहचान लेगा। इसलिए वह नीचे सिर झुकाए चल रहा था। सहसा उसे ख़याल आया, गुप्त पुलिस वाले सादे कपड़े पहने इधर-उधर घूमा करते हैं। कौन जाने, जो आदमी मेरे बगल में आ रहा है, कोई जासूस ही हो। मेरी ओर ध्यान से देख रहा है। यों सिर झुकाकर चलने से ही तो नहीं उसे संदेह हो रहा है। यहां और सभी सामने ताक रहे हैं। कोई यों सिर झुकाकर नहीं चल रहा है। मोटरों की [ १५० ]
इस रेल-पेल में सिर झुकाकर चलना मौत को नेवता देना है। पार्क में कोई इस तरह चहलकदमी करे, तो कर सकता है। यहां तो सामने देखना चाहिए। लेकिन बगल वाला आदमी अभी तक मेरी ही तरफ ताक रहा है। है शायद कोई खुफिया ही। उसका साथ छोड़ने के लिए वह एक तंबोली की दुकान पर पान खाने लगा। वह आदमी आगे निकल गया। रमा ने आराम की लंबी सांस ली।

अब उसने सिर उठा लिया और दिल मजबूत करके चलने लगा। इस वक्त ट्राम का भी कहीं पता न था, नहीं उसी पर बैठ लेता। थोड़ी ही दूर चला होगा कि तीन कांस्टेबल आते दिखाई दिए। रमा ने सड़क छोड़ दी और पटरी पर चलने लगा। ख्वामख्वाह सांप के बिल में उंगली डालना कौन-सी बहादुरी है। दुर्भाग्य की बात, तीनों कांस्टेबलों ने भी सड़क छोड़कर वहीं पटरी ले ली। मोटरों के आने-जाने से बार-बार इधर-उधर दौड़ना पड़ता था। रमा का कलेजा धक्-धक् करने लगा। दूसरी पटरी पर जाना तो संदेह को ओर भी बढ़ा देगा। कोई ऐसी गली भी नहीं जिसमें घुस जाऊं। अब तो सब बहुत समीप आ गए। क्या बात है, सब मेरी ही तरफ देख रहे हैं। मैंने बड़ी हिमाकत की कि यह पग्गड़ बांध लिया और बंधी भी कितनी बेतुकी। एक टीले-सा ऊपर उठ गया है। यह पगड़ी आज मुझे पकड़ावेगी। बांधी थी कि इससे सूरत बदल जाएगी। यह उल्टे और तमाशा बन गई। हां, तीनों मेरी ही ओर ताक रहे हैं। आपस में कुछ बातें भी कर रहे हैं। रमा को ऐसा जान पड़ा, पैरों में शक्ति नहीं है। शायद सब मन में मेरा हुलिया मिला रहे हैं। अब नहीं बच सकता। घर वालों को मेरे पकड़े जाने की खबर मिलेगी, तो कितने लज्जित होंगे। जालपा तो रो-रोकर प्राण ही दे देगी। पांच साल से कम सजा न होगी। आज इस जीवन का अंंत हो रहा है।

इस कल्पना ने उसके ऊपर कुछ ऐसा आतंक जमाया कि उसके औसान जाते रहे। जब सिपाहियों का दल समीप आ गया, तो उसका चेहरा भय से कुछ ऐसा विकृत हो गया, उसकी आंखें कुछ ऐसी सशंक हो गईं और अपने को उनकी आंखों से बचाने के लिए वह कुछ इस तरह दूसरे आदमियों की आड़ खोजने लगा कि मामूली आदमी को भी उस पर संदेह होना स्वाभाविक था, फिर पुलिस वालों की मंजी हुई आंखें क्यों चूकतीं! एक ने अपने साथी से कहा-यो मनई चोर न होय, तो तुमरी टांगन ते निकर जाई। कस चोरन की नाईं ताकत है। दूसरा बोला-कुछ संदेह तो हमऊ का हुय रहा है। फुरै कह्यो पांडे, असली चोर है।

तीसरा आदमी मुसलमान था, उसने रमानाथ को ललकारा-ओ जी ओ पगड़ी, जरा इधर आना, तुम्हारा क्या नाम है?

रमानाथ ने सीनाजोरी के भाव से कहा-हमारा नाम पूछकर क्या करोगे? मैं क्या चोर हूं?

'चोर नहीं, तुम साह हो, नाम क्यों नहीं बताते?'

रमा ने एक क्षण आगा-पीछा में पड़कर कहा-हीरालाल।

'घर कहां है?'

'घर।'

'हां, घर ही पूछते हैं।'

'शाहजहांपुर।' [ १५१ ]
‘कौन मुहल्ला?'

रमा शाहजहांपुर न गया था, न कोई कल्पित नाम ही उसे याद आया कि बता दे। दुस्साहस के साथ बोला-तुम तो मेरा हुलिया लिख रहे हो।

कांस्टेबल ने भभकी दो-तुम्हारा हुलिया पहले से ही लिखा हुआ है ! नाम झूठ बताया,सकूनत झूठ बताई, मुहल्ला पूछी तो बगलें झांकने लगे। महीनों से तुम्हारी तलाश हो रही है,आज जाकर मिले हो। चलो थाने पर।

यह कहते हुए उसने रमानाथ का हाथ पकड़ लिया। रमा ने हाथ छुड़ाने की चेष्टा करके कहा-वारंट लाओ तब हम चलेंगे। क्या मुझे कोई देहाती समझ लिया है?

कांस्टेबल ने एक सिपाही से कहा-पकड़ लो जो इनका हाथ, वहीं थाने पर वारंट दिखाया जाएगा।

शहरों में ऐसी घटनाएं मदारियों के तमाशों से भी ज्यादा मनोरंजक होती हैं। सैकड़ों आदमी जमा हो गए। देवीदीन इसी समय अफीम लेकर लौटा आ रहा,यह जमाव देखकर वह भी आ गया। देखा कि तीन कांस्टेबल रमानाथ को घसीटे लिए जा रहे हैं। आगे बढ़कर बोला-हैं-हैं, जमादार | यह क्या करते हो? यह पडतजी तो हमारे मिहमान हैं, कहीं पकड़े लिए जाते हो?

तीनों कांस्टेबल देवीदीन से परिचित थे। रुक गए। एक ने कहा-तुम्हारे मिहमान हैं यह,कब से?

देवीदीन ने मन में हिसाब लगाकर कहा--चार महीने से कुछ बेशी हुए होंगे। मुझे प्रयाग में मिल गए थे। रहने वाले भी वहीं के हैं। मेरे साथ ही तो आए थे।

मुसलमान सिपाही ने मन में प्रसन्न होकर कहा-इनका नाम क्या है?

देवीदीन ने सिटपिटाकर कहा–नाम इन्होंने बताया न होगा?

सिपाहियों का संदेह दृढ़ हो गया। पांडे ने आखें निकालकर कहा- जोन परत है तुमहू मिले हौ, नांव काहे नाहीं बतावत हो इनका? देवीदीन ने आधारहीन साहस के भाव से कहा-मुझसे रोब ने जाना पांडे, समझे। यहां धमकियों में नहीं आने के।

मुसलमान सिपाही ने मानो मध्यस्थ बनकर कहा–बूढे बाबा, तुम तो ख्वामख्वाह बिगड़ रहे हो। इनका नाम क्यों नहीं बतला देते?

देवीदीन ने कातर नेत्रों से रमा की ओर देखकर कहा-हम लोग तो रमानाथ कहते हैं। असली नाम यही है या कुछ और, यह हम नहीं जानते।

पांडे ने आंखें निकालकर हथेली को सामने करके कहा-बोलो पंडितजी,क्या नाम है तुम्हारा? रमानाथ या हीरालाल? या दोनों-एक घर का एक ससुराल का।

तीसरे सिपाही ने दर्शकों को संबोधित करके कहा-नांव है रमानाथ,बतावत है। हीरालाल। सबूत हुय गवा। दर्शकों में कानाफूसी होने लगी। शुबहे की बात तो है।

‘साफ है, नाम और पता दोनों गलत बता दिया।'

एक मारवाड़ी सज्जन बोले-उचक्को सो है। [ १५२ ]
एक मौलवी साहब ने कहा-कोई इश्तिहारी मुलजिम है।

जनता को अपने साथ देखकर सिपाहियों को और भी जोर हो गया। रमा को भी अब उनके साथ चुपचाप चले जाने ही में अपनी कुशल दिखाई दी। इस तरह सिर झुका लिया, मानो उसे इसकी बिल्कुल परवा नहीं है कि उस पर लाठी पड़ती है या तलवार। इतना अपमानित वह कभी न हुआ था। जेल की कठोरतम यातना भी इतनी ग्लानि न उत्पन्न करती।

थोड़ी देर में पुलिस स्टेशन दिखाई दिया। दर्शकों की भीड़ बहुत कम हो गई थी। रमा ने एक बार उनकी ओर लज्जित आशा के भाव से ताका। देवीदीन का पता न था। रमा के मुंह से एक लंबी सांस निकल गई। इस विपत्ति में क्या यह सहारा भी हाथ से निकल गया?

चौंतीस

पुलिस स्टेशन के दफ्तर में इस समय बड़ी मेज के सामने चार आदमी बैठे हुए थे। एक दारोगा थे, गोरे से, शौकीन, जिनकी बड़ी-बड़ी आंखों में कोमलता की झलक थी। उनकी बगल में नायब दारोगा थे। यह सिक्ख थे, बहुत हंसमुख, सजीवता के पुतले, गेहुआ रंग, सुडौल,सुगठित शरीर। सिर पर केश था, हाथों में कड़े; पर सिगार से परहेज न करते थे। मेज की दूसरी तरफ इंस्पेक्टर और डिप्टी सुपरिंटेंडेंट बैठे हुए थे। इंस्पेक्टर अधेड़, सांवला, लंबा आदमी था,कौड़ी की-सी आंखें, फूले हुए गाल और ठिगना कद। डिप्टी सुपरिटेंडेंट लंबा छरहरा जवान था,बहुत ही विचारशील और अल्पभाषी। इसकी लंबी नाक और ऊंचा मस्तक उसकी कुलीनता के साक्षी थे।

डिप्टी ने सिगार की एक कश लेकर कहा-बाहरी गवाहों से काम नहीं चल सकेगा। इनमें से किसी को एप्रूवर बनना होगा। और कोई अल्टरनेटिव नहीं है।

इंस्पेक्टर ने दारोगा की ओर देखकर कहा-हम लोगों ने कोई बात उठा तो नहीं रक्खी,हलफ से कहता हूं। सभी तरह के लालच देकर हार गए। सबों ने ऐसी गुट कर रखी है कि कोई टूटता ही नहीं। हमने बाहर के गवाहों को भी आजमाया, पर सब कानों पर हाथ रखते हैं।

डिप्टी-उस मारवाड़ी को फिर आजमाना होगा। उसके बाप को बुलाकर खूब धमकाइए। शायद इसका कुछ दबाव पड़े।

इंस्पेक्टर हलफ से कहता हूं, आज सुबह से हम लोग यही कर रहे हैं। बेचारी बाप लड़के के पैरों पर गिरा, पर लड़का किसी तरह राजी नहीं होता।

कुछ देर तक चारों आदमी विचारों में मग्न बैठे रहे। अंत में डिप्टी ने निराशा के भाव से कहा-मुकदमा नहीं चल सकता। मुफ्त की बदनामी हुई।

इंस्पेक्टर-एक हफ्ते की मुहलत और लीजिए, शायद कोई टूट जाय।

यह निश्चय करके दोनों आदमी यहां से रवाना हुए। छोटे दारोगा भी उसके साथ ही चले गए। दारोगाजी ने हुक्का मंगवाया कि सहसा एक मुसलमान सिपाही ने आकर कहा–दारोगाजी,लाइए कुछ इनाम दिलवाइए। एक मुलजिम को शुबहे पर गिरफ्तार किया है। इलाहाबाद का
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रहने वाला है, नाम है रमानाथ। पहले नाम और सकूनत दोनों गलत बतलाई थीं। देवीदीन खटिक जो नुक्कड़ पर रहता है, उसी के घर ठहरा हुआ है। जरा डांट बताइएगा तो सब कुछ उगल देगा।

दारोगा–देवीदीन वही है न जिसके दोनों लड़के।

सिपाही-जी हां, वही है।

इतने में रमानाथ भी दारोगा के सामने हाजिर किया गया। दारोगा ने उसे सिर से पांव तक देखा, मानो मन में उसका हुलिया मिला रहे हों। तब कठोर दृष्टि से देखकर बोले-अच्छा,यह इलाहाबाद का रमानाथ है। खूब मिले भाई। छ: महीने से परेशान कर रहे हो। कैसा साफ हुलिया है कि अंधा भी पहचान ले। यहां कब से आए हो?

कांस्टेबल ने रमा को परामर्श दिया-सब हाल सच-सच कह दो, तो तुम्हारे साथ कोई सख्ती न की जाएगी।

रमा ने प्रसन्नचित्त बनने की चेष्टा करके कहा-अब तो आपके हाथ में हूं, रियायत कीजिए या सख्ती कीजिए। इलाहाबाद की म्युनिसिपैलिटी में नौकर था। हिमाकत कहिए या बदनसीबी, चुंगी के चार सौ रुपये मुझसे खर्च हो गए। मैं वक्त पर रुपये जमा कर सका। शर्म के मारे घर के आदमियों से कुछ न कहा, नहीं तो इतने रुपये इंतजाम हो जाना कोई मुश्किल न था। जब कुछ बस न चला, तो वहां से भागकर यहां चला आया। इसमें एक हर्फ भी गलत नहीं है।

दारोगा ने गंभीर भाव से कहा- मामला कुछ संगीन है, क्या कुछ शराब का चस्का पड़ गया था?

'मुझसे कसम ले लीजिए, जो कभी शराब मुंह से लगाई हो।'

कांस्टेबल ने विनोद करके कहा-मुहब्बत के बाजार में लुट गए होंगे, हुजूर।

रमा ने मुस्कराकर कहा-मुझसे फाकेमस्तों का वहां कहां गुजर?

दारोगा—तो क्या जुआ खेल डाला? या, बीवी के लिए जेवर बनवा डाले !

रमा झेपकर रह गया। अपराधी मुस्कराहट उसके मुख पर रो पड़ी।

दारोगा—अच्छी बात है,तुम्हें भी यहां खासे मोटे जेवर मिल जायंगे।

एकाएक बूढ़ा देवीदीन आकर खड़ा हो गया।

दारोगा ने कठोर स्वर में कहा-क्या काम है यहां?

देवीदीन-हुजूर को सलाम करने चला आया। इन बेचारों पर दया की नजर रहे हुजूर,बेचारे बड़े सीधे आदमी हैं।

दारोगा-बचा सरकारी मुलजिम को घर में छिपाते हो, उस पर सिफारिश करने आए हो।


देवीदीन-मैं क्या सिफारिस करूंगा हुजूर, दो कौड़ी का आदमी।

दारोगा-जानता है,इन पर वारंट है,सरकारी रुपये गबन कर गए हैं।

देवीदीन-हुजूर, भूल-चूक आदमी से ही तो होती है। जवानी की उम्र है ही, खर्च हो गए होंगे। [ १५४ ]दारोगा ने तड़पकर कहा-यह क्या है?

देवीदीन-कुछ नहीं है, हुजूर को पान खाने को।

दारोगा-रिश्वत देना चाहता है!क्यों? कहो तो बचा, इसी इल्जाम में भेज दें।

देवीदीन-भेज दीजिए सरकार। घरवाली लकड़ी-कफन की फिकर से छूट जाएगी।

वहीं बैठा आपको दुआ दूंगा।

दारोगा—अबे इन्हें छुड़ाना है तो पचास गिन्नियां लाकर सामने रक्खो। जानते हो इनकी गिरफ्तारी पर पांच सौ रुपये का इनाम है।

देवीदीन-आप लोगों के लिए इतनी इनाम हुजूर क्या है। यह गरीब परदेसी आदमी हैं,जब तक जिएंगे आपको याद करेंगे।

दारोग–बक-बक मत कर, यहां धरम कमाने नहीं आया हूं।

देवीदीन-बहुत तंग हूं हुजूर। दुकान-दारी तो नाम की है।

कांस्टेबल- बुढ़िया से मांग जाके।

देवीदीन-कमाने वाला तो मैं ही हूं हुजूर, लड़कों का हाल जानते ही हो। तन-पेट काटकर कुछ रुपये जमा कर रखे थे, सो अभी सातों-धाम किए चला आता हूं। बहुत तंग हो गया है।

दारोगा- तो अपनी गिन्नियां उठा ले। इसे बाहर निकाल दो जी।

देवीदीन-आपका हुकुम है, तो लीजिए जाता हूँ। धक्के क्यों दिलवाइएगा । दारोगा—(कांस्टेबल से) इन्हें हिरासत में रखो। मुंशी से कहो इनका बयान लिख लें।

देवीदीन के होंठ आवेश से कांप रहे थे। उसके चेहरे पर इतनी व्यग्रता रमा ने कभी नहीं देखी, जैसे कोई चिड़िया अपने घोंसले में कौवे को घुसते देखकर विहल हो गई हो। वह एक मिनट तक थाने के द्वार पर खड़ा रहा, फिर पीछे फिरा और एक सिपाही से कुछ कहा, तब लपका हुआ सड़क पर चला गया, मगर एक ही पल में फिर लौय और दारोगा से बोला-हुजूर,दो घंटे की मुहलत न दीजिएगा?

रमा अभी वहीं खड़ा था। उसकी यह ममता देखकर रो पड़ा। बोला-दादा, अब तुम हैरान न हो, मेरे भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह होने दो। मेरे भी यहां होते, तो इससे ज्यादा और क्या करते । मैं मरते दम तक तुम्हारा उपकार देवीदीन ने आंखें पोंछते हुए कहा-कैसी बातें कर रहे हो, भैया | जब रुपये पर आई तो देवीदीन पीछे हटने वाला आदमी नहीं है। इतने रुपये तो एक-एक दिन जुए में हार-जीत गयो हूं। अभी घर बेच दें, तो दस हजार की मालियत है। क्या सिर पर लाद कर ले जाऊंगा। दारोगाजी, अभी भैया को हिरासत में न भेजो। मैं रुपये की फिकर करके थोड़ी देर में आता हूं।

देवीदीन चला गया तो दारोगाजी ने सहयता से भरे स्वर में कहा है तो खुर्राट, मगर बड़ा नेक। तुमने इसे कौन-सी बूटी सुंघा दी?

रमा ने कहा-गरीबों पर सभी को रहम आता है।

दारोगा ने मुस्कराकर कहा–पुलिस को छोड़कर; इतना और कहिए। मुझे तो यकीन नहीं कि पचास गिन्नियां लावे। [ १५५ ]

रमानाथ—अगर लाए भी तो उससे इतना बड़ा तावान नहीं दिलाना चाहता। आप मुझे शौक से हिरासत में ले लें।

दारोगा—मुझे पांच सौ के बदले साढे छ: सौ मिल रहे हैं, क्यों छोडूं। तुम्हारी गिरफ्तारी का इनाम मेरे किसी दूसरे भाई को मिल जाय, तो क्या बुराई है।

रमानाथ—जब मुझे चक्की पीसनी है, तो जितनी जल्द पीस लूं उतना ही अच्छा। मैंने समझा था, मैं पुलिस की नजरों से बचकर रह सकता हूं। अब मालूम हुआ कि यह बेकली और आठों पहर पकड़ लिए जाने का खौफ जेल से कम जानलेवा नहीं।

दारोगाजी को एकाएक जैसे कोई भूली हुई बात याद आ गई। मेज के दराज से एक मिसल निकाली, उसके पन्ने इधर-उधर उल्टे, तब नम्रता से बोले--अगर मैं कोई ऐसी तरकीब बतलाऊं कि देवीदीन के रुपये भी बच जाएं और तुम्हारे ऊपर भी हर्फ न आए तो कैसा?

रमा ने अविश्वास के भाव से कहा—ऐसी कोई तरकीब है, मुझे तो आशा नहीं।

दारोगा—अभी साईं के सौ खेल हैं। इसका इंतजाम मैं कर सकता हूं। आपको महज एक मुकदमे में शहादत देनी पड़ेगी?

रमानाथ—झूठी शहादत होगी।

दारोगा—नहीं; बिल्कुल सच्ची। बस समझ लो कि आदमी बन जाओगे। म्युनिसिपैलिटी के पंजे से तो छूट जाओगे, शायद सरकार परवरिश भी करे। यों अगर चालान हो गया तो पांच साल से कम की सजा न होगी। मान लो इस वक्त देवी तुम्हें बचा भी ले, तो बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। जिंदगी खराब हो जायगी। तुम अपना, नफा-नुकसान खुद समझ लो। मैं जबरदस्ती नहीं करता।

दारोगाजी ने डकैती का वृतांत कह सुनाया। रमा ऐसे कई मुकदमे समाचार-पत्रों में पढ़ चुका था। संशय के भाव से बोला--तो मुझे मुखबिर बनना पड़ेगा और यह कहना पड़ेगा कि मैं भी इन डकैतियों में शरीक था। यह तो झूठी शहादत हुई।

दारोगा—मुआमला बिल्कुल सच्चा है। आप बेगुनाहों को न फंसाएंगे। वही लोग जेल जाएंगे जिन्हें जाना चाहिए। फिर झूठ कहां रहा? डाकुओं के डर से यहां के लोग शहादत देने पर राजी नहीं होते। बस और कोई बात नहीं। यह मैं मानता हूं कि आपको कुछ झूठ बोलना पड़ेगा, लेकिन आपकी जिंदगी बनी जा रही है, इसके लिहाज से तो इतना झूठ कोई चीज नहीं। खूब सोच लीजिए। शाम तक जवाब दीजिएगा।

रमा के मन में बात बैठ गई। अगर एक बार झूठ बोलकर वह अपने पिछले कर्मों का प्रायश्चित् कर सके और भविष्य भी सुधार ले, तो पूछना ही क्या। जेल से तो बच जायगा। इसमें बहुत आगा-पीछा की जरूरत ही न थी। हां, इसका निश्चय हो जाना चाहिए कि उस पर फिर म्युनिसिपैलिटी अभियोग न चलाएगी और उसे कोई जगह अच्छी मिल जायगी। वह जानता था, पुलिस की गरज है और वह मेरी कोई वाजिब शर्त अस्वीकार न करेगी। इस तरह बोला, मानो उसकी आत्मा धर्म और अधर्म के संकट में पड़ी हुई है--मुझे यही डर है कि कहीं मेरी गवाही से बेगुनाह लोग न फंस जाएं।

दारोगा—इसका मैं आपको इत्मीनान दिलाता हूं। [ १५६ ]रमानाथ–लेकिन कल को म्युनिसिपैलिटी मेरी गर्दन नापे तो मैं किसे पुकारूंगा?

दारोगा–मजाल है, म्युनिसिपैलिटी चू कर सके। फौजदारी के मुकदमे में मुद्दई तो सरकार ही होगी। जब सरकार आपको मुआफ कर देगी, तो मुकदमा कैसे चलाएगी। आपको तहरीरी मुआफीनामा दे दिया जायगी, साहब।

रमानाथ-और नौकरी?

दारोग–वह सरकार आप इंतजाम करेगी। ऐसे आदमियों को सरकार खुद अपना दोस्त बनाए रखना चाहती है। अगर आपकी शहादत बढ़िया हुई और उस फरीक की जिरहों के जाल से आप निकल गए, तो फिर आप पारस हो जाएंगे !

दारोगा ने उसी वक्त मोटर मंगवाई और रमा को साथ लेकर डिप्टी साहब से मिलने चल दिए। इतनी बड़ी कारगुजारी दिखाने में विलंब क्यों करते? डिप्टी से एकांत में खूब जीट उड़ाई। इस आदमी का यों पता लगाया। इसकी सूरत देखते ही भांप गया कि मफरूर है, बस गिरफ्तार ही तो कर लिया ! बात सोलह आने सच निकली। निगाह कहीं चूक सकती है। हुजूर, मुजरिम की आंखें पहचानता हूं। इलाहाबाद की म्युनिसिपैलिटी के रुपये गबन करके भागी है। इस मामले में शहादत देने को तैयार है। आदमी पढ़ा-लिखा, सूरत का शरीफ और जहीन है।

डिप्टी ने सदग्ध भाव से कहा-हां, आदमी तो होशियार मालूम होता है।

'मगर मुआफीनामा लिए बगैर इसे हमारा एतबार न होगा। कहीं इसे यह शुबहा हुआ कि हम लोग इसके साथ कोई चाल चल रहे हैं, तो साफ निकल जाएगा।'

डिप्टी-यह तो होगा ही। गवर्नमेंट से इसके बारे में बातचीत करना होगा। आप टेलीफोन मिलाकर इलाहाबाद पुलिस से पूछिए कि इस आदमी पर कैसा मुकदमा है। यह सब तो गवर्नमेंट को बताना होगी। दारोगाजी ने टेलीफोन डाइरेक्टरी देखी, नंबर मिलाया और बातचीत शुरू हुई।

डिप्टी-क्या बोला?

दारोगा-कहता है, यहां इस नाम के किसी आदमी पर मुकदमा नहीं है।

डिप्टी-यह कैसा है भाई, कुछ समझ में नहीं आता। इसने नाम तो नहीं बदल दिया?

दारोगा- कहता है, म्युनिसिपैलिटी में किसी ने रुपये बिन नहीं किए। कोई मामला नहीं।

डिप्टी-ये तो बड़ा ताज्जुब का बात है। आदमी बोलता है हम रुपया लेकर भागा;म्युनिसिपैलिटी बोलता है कोई रुपया गबन नहीं किया। यह आदमी पागल तो नहीं?

दारोगा-मेरी समझ में कोई बात नहीं आती, अगर कह दें कि तुम्हारे ऊपर कोई इल्जाम नहीं है, तो फिर उसकी गर्द भी न मिलेगी।

'अच्छा, म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर से पूछिए।'

दारोगा ने फिरे नंबर मिलाया। सवाल-जवाब होने लगा।

दारोगा—आपके यहां रमानाथ कोई क्लॅक था?

जवाब-जी हां;था।

दारोगा-वह कुछ रुपये गबन करके भागा है? [ १५७ ]
जवाब-नहीं। वह घर से भागा है, पर गबन नहीं किया। क्या वह आपके यहां है?

दारोगा जी हां, हमने उसे गिरफ्तार किया है। वह खुद कहता है कि मैंने रुपये गबन किए। बात क्या है?

जवाब-पुलिस तो लाल बुझक्कड़ है। जरा दिमाग लड़ाइए।

दारोगा-यहां तो अक्ल काम नहीं करती।

जवाब-यहीं क्या, कहीं भी काम नहीं करती। सुनिए, रमानाथ ने मीजान लगाने में गलती की, डरकर भागा। बाद को मालूम हुआ कि तहबील में कोई कमी न थी। आई समझ में बात?

डिप्टी–अब क्या करना होगा खां, साहब। चिड़िया हाथ से निकल गया !

दारोगा-निकल कैसे जाएगी हुजूर। रमानाथ से यह बात कही ही क्यों जाए? बस उसे किसी ऐसे आदमी से मिलने न दिया जाय जो बाहर की खबरें पहुंचा सके। घरवालों को उसका पता अब लग जावेगा ही, कोई न कोई जरूर उसकी तलाश में आवेगा। किसी को न आने दें। तहरीर में कोई बात न लाई जाए। जबानी इत्मीनान दिला दिया जाय। कह दिया जाय,कमिश्नर साहब को मुआफीनामा के लिए रिपोर्ट की गई है। इंस्पेक्टर साहब से भी राय ले ली जाय।

इधर तो यह लोग सुपरिंटेंडेंट से परामर्श कर रहे थे, उधर एक घंटे में देवीदीन लौटकर थाने आया तो कांस्टेबल ने कहा-दारोगाजी तो साहब के पास गए।

देवीदीन ने घबड़ाकर कहा-तो बाबूजी को हिरासत में डाल दिया?

कांस्टेबल-नहीं, उन्हें भी साथ ले गये।

देवीदीन ने सिर पीटकर कहा-पुलिस वालों की बात का कोई भरोसा नहीं। कह गया कि एक घंटे में रुपये लेकर आता हूं, मगर इतना भी संबरे न हुआ। सरकार से पांच ही सौ तो मिलेंगे। मैं छ: सौ देने को तैयार हूं। हां, सरकार में कारगुजारी हो जायगी और क्या। वहीं से उन्हें परागराज़ भेज देंगे। मुझसे भेंट भी न होगी। बुढिया रो-रोकर मर जायग। यह कहता हुआ देवीदीन वहीं जमीन पर बैठ गया।

कांस्टेबल ने पूछा-तो यहां कब तक बैठे रहोगे?

देवीदीन ने मानो कोड़े की कार से आहत होकर कहा-अब तो दारोगाजी से दो-दो बातें करके ही जाऊंगा। चाहे जेहल ही जाना पड़े, पर फटकारूगा जरूर, बुरी तरह फटकारूंगा। आखिर उनके भी तो बाल-बच्चे होंगे । क्या भगवान् से जरा भी नहीं डरते ! तुमने बाबूजी को जाती बार देखा था? बहुत रंजीदा थे?

कांस्टेबल-रंजीदा तो नहीं थे, खासी तरह हंस रहे थे। दोनों जने मोटर में बैठकर गए हैं।

देवीदीन ने अविश्वास के भाव से कहा-हंस क्या रहे होंगे बेचारे। मुंह से चाहे हंस लें,दिल तो रोता ही होगा।

देवीदीन को यहां बैठे एक घंटा भी न हुआ था कि सहसा जग्गो आ खड़ी हुई। देवीदीन को द्वार पर बैठे देखकर बोली-तुम यहां क्या करने लगे? भैया कहां हैं?

देवीदीन ने मर्माहत होकर कहा-भैया को ले गए सुपरीडेंट के पास। न जाने भेंट होती है। [ १५८ ]
कि ऊपर ही ऊपर परागराज भेज दिए जाते हैं।

जग्गो-दारोगाजी भी बड़े वह हैं। कहां तो कहा था कि इतना लेंगे,कहां लेकर चल दिए

देवीदीन-इसीलिए तो बैठा हूं कि आवें तो दो-दो बातें कर लें।

जग्गो-हां,फटकारना जरूर। जो अपनी बात को नहीं, वह अपने बाप का क्या होगा। मैं तो खरी कहगी। मेरा क्या कर लेंगे !

देवीदीन-दुकान पर कौन है?

जग्गो–बंद कर आई हूं। अभी बेचारे ने कुछ खाया भी नहीं। सबेरे से वैसे ही हैं। चूल्हे में जाय वह तमासा। उसी के टिकट लेने तो जाते थे। न घर से निकलते तो काहे को यह बला सिर पड़ती।

देवीदीन-जो उधर ही से पराग भेज दिया तो?

जग्गो–तो चिट्ठी तो आवेगी ही। चलकर वहीं देख आयेंगे?

देवीदीन-(आंखों में आंसू भरकर) सजा हो जायगी?

जग्गो-रुपया जमा कर देंगे तब काहे को होगी। सरकार अपने रुपये ही तो लेगी?

देवीदीन–नहीं पगली, ऐसा नहीं होता। चोर माल लौटा दे तो वह छोड़ थोड़े ही दिया जाएगा।

जग्गो ने परिस्थिति की कठोरता अनुभव करके कहा-दारोगाजी।

वह अभी बात भी पूरी न करने पाई थी कि दारोगाजी की मोटर सामने आ पहुंची। इंस्पेक्टर साहब भी थे। रमा इन दोनों को देखते ही मोटर से उतरकर आया और प्रसन्न मुख से बोला-तुम यहां देर से बैठे हो क्या दादा?आओ,कमरे में चलो। अम्मां,तुम कब आईं?

दारोगाजी ने विनोद करके कहा-कहो चौधरी,'लाएं रुपये?

देवीदीन-जब कह गया कि मैं थोड़ी देर में आता हूं, तो आपको मेरी राह देख लेनी चाहिए थी। चलिए, अपने रुपये लीजिए।

दारोगा–खोदकर निकाले होंगे?

देवीदीन-आपके अकबाल से हजार-पांच सौ अभी ऊपर ही निकल सकते हैं। जमीन खोदने की जरूरत नहीं पड़ी। चलो भैया बुढ़िया कब से खड़ी है। मैं रुपये चुकाकर आता हूं। यह तो इंसपिट्टर साहब थे ? पहले इसी थाने में थे।

दारोगा-तो भाई, अपने रुपये ले जाकर उसी हांडी में रख दो। अफसरों की सलाह हुई कि इन्हें छोड़ना ने चाहिए। मेरे बस की बात नहीं है।

इंस्पेक्टर साहब तो पहले ही दफ्तर में चले गए थे। ये तीनों आदमी बातें करते उसके बगल वाले कमरे में गए। देवीदीन ने दरोगा की बात सुनी,तो भौहें तिरछी हो गई बोला-दारोगाजी,मरदों की बात होती है,मैं तो यही जानता हूं। मैं रूपये आपके हुक्म से लाया हूं। आपको अपना कौल पूरा करना पड़ेगा। कहके मुकर जाना नीचों का काम है।

इतने कठोर शब्द सुनकर दारोगाजी को भन्ना जाना चाहिए था; पर उन्होंने जरा भी बुरी [ १५९ ]
न माना। हंसते हुए बोले–भई अब चाहे, नीच कहो, चाहे दगाबाज कहो; पर हम इन्हें छोड़ नहीं सकते। ऐसे शिकार रोज नहीं मिलते। कौल के पीछे अपनी तरक्की नहीं छोड़ सकता।

दरोगा के हंसने पर देवीदीन और भी तेज हुआ—तो आपने कहा किस मुंह से था?

दारोगा-कहा तो इसी मुंह से था, लेकिन मुंह हमेशा एक-सा तो नहीं रहता। इसी मुंह से जिसे गाली देता हूं, उसकी इसी मुंह से तारीफ भी करता हूं।

देवीदीन-(तिनककर) यह मूंछे मुड़वा डालिए।

दारोगा-मुझे बड़ी खुशी से मंजूर है। नीयत तो मेरी पहले ही थी; पर शर्म के मारे न मुड़वाता था। अब तुमने दिल मजबूत कर दिया।

देवीदीन-हंसिए मत दारोगाजी, आप हंसते हैं और मेरा खून जला जाता है। मुझे चाहे जेहल ही क्यों न हो जाए, लेकिन मैं कप्तान साहब से जरूर कह दूंगा। हूं तो टके का आदमी पर आपके अकबाले से बड़े अफसरों तक पहुंच है।

दारोगा-अरे, यार तो क्या सचमुच कप्तान साहब से मेरी शिकायत कर दोगे?

देवीदीन ने समझा कि धमकी कारगर हुई। अकड़कर बोला-आप जब किसी की नहीं सुनते, बात कहकर मुकर जाते हैं, तो दूसरे भी अपने-सी करेंगे ही। मेम साहब तो रोज ही दुकान पर आती हैं।

दारोगा-कौन, देवी? अगर तुमने साहब या मेम साहब से मेरी कुछ शिकायत की,तो कसम खाकर कहता हूं, कि घर खुदवाकर फेंक दूंगा।

देवीदीन-जिस दिन मेरा घर खुदेगा, उस दिन यह पगड़ी और चपरास भी न रहेगी,हुजूर।

दारोगा-अच्छा तो मारो हाथ पर हाथ। हमारी तुम्हारी दो-दो चोटें हो जायं, यही सही।

देवीदीन-पछताओगे सरकार, कहे देता हूं पछताओगे।

रमा अब जब्त न कर सका। अब तक वह देवीदीन के बिगड़ने का तमाशा देखने के लिए भीगी बिल्ली बना खड़ा था। कहकहा मारकर बोला-दादा, दारोगाजी तुम्हें चिढ़ा रहे हैं। हम लोगों में ऐसी सलाह हो गई है कि मैं बिना कुछ लिए दिए ही छूजाऊंगा, ऊपर से नौकरी भी मिल जायगी। साहब ने पक्का वादा किया है। मुझे अब यहीं रहना होगा।

देवीदीन ने रास्ता भटके हुए आदमी की भांति कहा-कैसी बात है भैया, क्या कहते हो ! क्या पुलिस वालों के चकमे में आ गए? इसमें कोई न कोई चाल जरूर छिपी होगी।

रमा ने इत्मीनान के साथ कहा-और बात नहीं, एक मुकदमे में शहादत देनी पड़ेगी।

देवीदीन ने संशय से सिर हिलाकर कहा-झूठा मुकदमा होगा?

रमानाथ–नहीं दादा; बिल्कुल सच्चा मामला है। मैंने पहले ही पूछ लिया है।

देवीदीन की शंका शांत न हुई। बोला-मैं इस बारे में और कुछ नहीं कह सकता भैया, जरा सोच-समझकर काम करना। अगर मेरे रुपयों को डरते हो, तो यही समझ लो कि देवीदीन ने अगर रुपयों की परवा की होती, तो आज लखपति होता। इन्हीं हाथों से सौ-सौ रुपये रोज कमाए और सब-के-सब उड़ा दिए हैं। किस मुकदमे में सहादत देनी है? कुछ मालूम हुआ? [ १६० ]दारोगाजी ने रमा को जवाब देने का अवसर न देकर कहा-वही डकैतियों वाला मुआमला है जिसमें कई गरीब आदमियों की जान गई थी। इन डाकुओं ने सूबे भर में हंगामा मचा रखा था। उनके डर के मारे कोई आदमी गवाही देने पर राजी नहीं होता।

देवीदीन ने उपेक्षा के भाव से कहा-अच्छा तो यह मुखबिर बन गए? यह बात है। इसमें तो जो पुलिस सिखाएगी वही तुम्हें कहना पड़ेगा, भैया । मैं छोटी समझ का आदमी हूं, इन बातों का मर्म क्या जानू पर मुझसे मुखबिर बनने को कहा जाता, तो मैं न बनता, चाहे कोई लाख रुपया देता! बाहर के आदमी को क्या मालुम कौन अपराधी है, कौन बेकसूर है। दो-चार अपराधियों के साथ दो-चार बेकसूर भी जरूर ही होंगे।

दारोगा-हरगिज नहीं। जितने आदमी पकड़े गए हैं, सब पक्के डाकू हैं।

देवीदीन—यह तो आप कहते हैं न, हमें क्या मालूम।

दारोगा–हम लोग बेगुनाहों को फंसाएंगे ही क्यों? यह तो सोचो।

देवीदीन-यह सब भुगते बैठा हूँ, दारोगाजी ! इससे तो यही अच्छा है कि आप इनका चालान कर दें। साल-दो साल का जेहल ही तो होगा; एक अधरम के दंड से बचने के लिए बेगुनाहों का खून तो सिर पर न चढ़ेगा।

रमा ने भीरुता से कहा- मैंने खूब सोच लिया है दादा, सब कागज देख लिए हैं, इसमें कोई बेगुनाह नहीं है।

देवीदीन ने उदास होकर कहा-होगा भाई ! जान भी तो प्यारी होती है।

यह कहकर वह पीछे घूम पड़ा। अपने मनोभावों को इससे स्पष्ट रूप से वह प्रकट न कर सकता था।

एकाएक उसे एक बात याद आ गई। मुड़कर बोला-तुम्हें कुछ रुपये देता जाऊं।

रमा ने खिसियाकर कहा-क्या जरूरत है?

दारोगा—आज से इन्हें यहीं रहना पड़ेगा।

देवीदीन ने कर्कश स्वर में कहा-हां हुजूर, इतना जानता हूं। इनकी दावत होगी, बंगला रहने को मिलेगा,नौकर मिलेंगे,मोटर मिलेगी। यह सब जानता हूं। कोई बाहर की आदमी इनसे मिलने न पावेगा,न यह अकेले आ-जा सकेंगे,यह सब देख चुका हूं। यह कहता हुआ देवीदीन तेजी से कदम उठाता हुआ चल दिया, मानो वहां उसका दम घुट रहा हो। दारोगा ने उसे पुकारा,पर उसने फिरकर न देखा। उसके मुख पर पराभूत वेदना छाई हुई थी।

जग्गो ने पूछा-भैया नहीं आ रहे हैं?

देवीदीन ने सड़क की ओर ताकते हुए कहा- भैया अब नहीं आयेंगे। अब अपने ही अपने न हुए तो बेगाने तो बेगाने हैं ही ।

वह चला गया। बुढिया भी पीछे-पीछे भुनभुनाती चली। [ १६१ ]

पैंतीस

रुदन में कितना उल्लास,कितनी शांति,कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर,किसी की स्मृति में,किसी के वियोग में,सिसक-सिसक और बिलख-बिलख नहीं रोया,वह जीवन के ऐसे सुख से वंचित है, जिस पर सैकड़ों हँसिया न्योछावर हैं। उस मीठी वेदना का आनंद उन्हीं से पूछो,जिन्होंने यह सौभाग्य प्राप्त किया है। हंसी के बाद मन खिन्न हो जाता है,आत्मा क्षुब्ध हो जाती है, मानो हम थक गए हों, पराभूत हो गए हों। रुदन के पश्चात् एक नवीन स्फूर्ति,एक नवीन जीवन,एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है। जालपा के पास 'प्रजा-मित्र' कार्यालय का पत्र पहुंचा, तो उसे पढ़कर वह रो पड़ी। पत्र एक हाथ में लिए,दूसरे हाथ से चौखट पकड़े, वह खूब रोई। क्या सोचकर रोई,वह कौन कह सकता है। कदाचित् अपने उपाय की इस आशातीत सफलता ने उसकी आत्मा को विह्वल कर दिया,आनंद की उस गहराई पर पहुंचा दिया जहां पानी है,या उस ऊंचाई पर जहां उष्णता हिम बन जाती है। आज छः महीने के बाद यह सुख-संवाद मिला। इतने दिनों वह छलमयी आशा और कठोर दुराशा का खिलौना बनी रही। आह ! कितनी बार उसके मन में तरंग उठी कि इस जीवन को क्यों न अंत कर दें। कहीं मैंने सचमुच प्राण त्याग दिए होते तो उनके दर्शन भी न पाती। पर उनका हिया कितना कठोर है। छः महीने से वहां बैठे हैं, एक पत्र भी न लिखा,खबर तक नहीं ली। आखिर यही न समझ लिया होगा कि बहुत होगा रो-रोकर मर जायगी। उन्होंने मेरी परवाह ही कब की । दस-बीस रुपये तो आदमी यार-दोस्तों पर भी खर्च कर देता है। वह प्रेम नहीं है। प्रेम हृदय की वस्तु है, रुपये की नहीं। जब तक रमा का कुछ पता न था, जालपा सारा इल्जाम अपने सिर रखती थी, पर आज उनका पता पाते ही उसका मन अकस्मात् कठोर हो गया। तरह-तरह के शिकवे पैदा होने लगे। वहां क्या समझकर बैठे हैं? इसीलिए तो कि वह स्वाधीन हैं, आजाद हैं, किसी का दिया नहीं खाते। इसी तरह मैं कहीं बिना कहे-सुने चली जाती, तो वह मेरे साथ किस तरह पेश आते? शायद तलवार लेकर गर्दन पर सवार हो जाते या जिंदगी भर मुंह न देखते। वहीं खड़े-खड़े जालपा ने मन-ही-मन शिकायतों का दफ्तर खोल दिया।

सहसा रमेश बाबू ने द्वार पर पुकारा-गोपी, गोपी, जरा इधर आना। मुंशीजी ने अपने कमरे में पड़े-पड़े कराहकर कहा-कौन है भाई, कमरे में आ जाओ। अरे ! आप हैं रमेश बाबू ! बाबूजी, मैं तो मरकर जिया हूं। बस यही समझिए कि नई जिंदगी हुई। कोई आशा न थी। कोई आगे न कोई पीछे; दोनों लौंडे आवारा है, मैं मरू या जीऊ, उनसे मतलब नहीं। उनकी मां को मेरी सूरत देखते डर लगता है। बस बेचारी बहू ने मेरी जान बचाई। वह न होती तो अब तक चल बसा होता।

रमेश बाबू ने कृत्रिम संवेदना दिखाते हुए कहा-आप इतने बीमार हो गए और मुझे खबर तक न हुई। मेरे यहां रहते आपको इतना कष्ट हुआ ! बहू ने भी मुझे एक पुर्जा न लिख दिया। छुट्टी लेनी पड़ी होगी?

मुंशी–छुट्टी के लिए दरख्वास्त तो भेज दी थी; मगर साहब मैंने डाक्टरी सर्टिफिकेट
[ १६२ ]
नहीं भेजी। सोलह रुपये किसके घर से लाता। एक दिन सिविल सर्जन के पास गया,मगर उन्होंने चिट्ठी लिखने से इनकार किया। आप तो जानते हैं वह बिना फीस लिए बात नहीं करते। मैं चला आया और दरख्वास्त भेज दी। मालूम नहीं मंजूर हुई या नहीं। यह तो डाक्टरों का हाल है। देख रहे हैं कि आदमी मर रहा है, पर बिना भेट लिए कदम न उठावेंगे !

रमेश बाबू ने चिंतित होकर कहा-यह तो आपने बुरी खबर सुनाई। मगर आपकी छुट्टी नामंजूर हुई तो क्या होगा?

मुंशीजी ने माथा ठोंकर कहा-होगा क्या, घर बैठ रहूंगा। साहब पूछेगे तो साफ कह दूंगा,मैं सर्जन के पास गया था, उसने छुट्टी नहीं दी। आखिर इन्हें क्यों सरकार ने नौकर रखा है।महज कुर्सी की शोभा बढ़ाने के लिए? मुझे डिसमिस हो जाना मंजूर है, पर सर्टिफिकेट न दूंगा। लौंडे गायब हैं। आपके लिए पान तक लाने वाला कोई नहीं। क्या करूं?

रमेश ने मुस्कराकर कहा-मेरे लिए आप तरद्दुद न करें। मैं आज पान खाने नहीं,भरपेट मिठाई खाने आया हूं। (जालपा को पुकारकर) बहुजी, तुम्हारे लिए खुशखबरी लाया हूं। मिठाई मंगवा लो।

जालपा ने पान की तश्तरी उनके सामने रखकर कहा-पहले वह ख़बर सुनाइए! शायद आप जिस खबर को नई-नई समझ रहे हों, वह पुरानी हो गई हो।

रमेश-जी कहीं हो न। रमानाथ का पता चल गया। कलकत्ते में हैं।

जालपा-मुझे पहले ही मालूम हो चुका है।

मुंशीजी झपटकर उठ बैठे। उनका ज्वर मान भागकर उत्सुकता की आड़ में जा छिपा।

रमेश का हाथ पकड़कर बोले–मालूम हो गया कलकत्ते में हैं? कोई खत आया था?

रमेश-खत नहीं था, एक पुलिस इंक्वायरी थी। मैंने कह दिया, उन पर किसी तरह का इल्जाम नहीं है। तुम्हें कैसे मालूम हुआ, बहूजी?

जालपा ने अपनी स्कीम बयान की। 'प्रजा-मित्र' कार्यालय को पत्र भी दिखाया। पत्र के साथ रुपयों की एक रसीद थी जिस पर रमा का हस्ताक्षर था।

रमेश—दस्तख़त तो रमा बाबू की है,बिल्कुल साफ! धोखा हो ही नहीं सकता। मान गया बहूजी तुम्हें । वाह, क्या हिकमत निकाली है। हम सबके कान काट लिए। किसी को न सूझी। अब जो सोचते हैं,तो मालूम होता है, कितनी आसान बात थी। किसी को जाना चाहिए जो बचा को पकड़कर घसीट लाए।

यह बातचीत हो रही थी कि रतन आ पहुंची। जालपा उसे देखते ही वहां से निकली और उसके गले से लिपटकर बोली-बहन कलकत्ते से पत्र आ गया। वहीं हैं।

रतन–मेरे सिर की कसम?

जालपा-हां, सच कहती हूं। खत देखो न ।

रतन-तो आज ही चली जाओ।

जालपा-यही तो मैं भी सोच रही हूं। तुम चलोगी?

रतन-चलने को तो मैं तैयार हूं, लेकिन अकेला घर किस पर छोड़ू। बहन, मुझे मणिभूषण पर कुछ शुबहा होने लगा है। उसकी नीयत अच्छी नहीं मालूम होती। बैंक में बीस [ १६३ ]
हजार रुपये से कम न थे। सब न जाने कहां उड़ा दिए। कहता है, क्रिया-कर्म में खर्च हो गए। हिसाब मांगती हूँ, तो आंखें दिखाता है। दफ्तर की कुंजी अपने पास रखे हुए है। मांगती हूं, तो टोल जाता है। मेरे साथ कोई कानूनी चाल चल रहा है। डरती हूं, मैं उधर जाऊँ, इधर वह सब कुछ ले-देकर चलता बने। बंगले के गाहक आ रहे हैं। मैं भी सोचती हूँ, गांव में जाकर शांति से पड़ी रहूं। बंगला बिक जायगा, तो नकद रुपये हाथ आ जाएंगे। मैं न रहूंगी, तो शायद ये रुपये मुझे देखने को भी न मिलें। गोपी को साथ लेकर आज ही चली जाओ। रुपये का इंतजाम मैं कर दूंगी।

जालपा–गोपीनाथे तो शायद न जा सके। दादा की दवा-दारू के लिए भी तो कोई चाहिए।

रतन-वह मैं कर दूंगी। मैं रोज सवेरे आ जाऊंगी और दवा देकर चली जाऊंगी। शाम को भी एक बार आ जाया करूंगी।

जालपा ने मुस्कराकर कहा-और दिन- पर उनके पास बैठा कौन रहेगा?

रतन-मैं थोड़ी देर बैठी भी रहा करूंगी;मगर तुम आज ही जाओ। बेचारे वहां न जाने किस दशा में होंगे। तो यही तय ही न?

रतन मुंशीजी के कमरे में गई,तो रमेश बाबू उठकर खड़े हो गए और बोले-आइए देवीजी, रमा बाबू का पता चल गया !

रतन-इसमें आधा श्रेय मेरा है।

रमेश-आपकी सलाह से तो हुआ हीं होगा। अब उन्हें यहां लाने की फिक्र करनी है।

रतन-जालपा चली जाएं और पकड़ लाएं। गोपी को साथ लेती जावें। आपको इसमें कोई आपत्ति तो नहीं है, दादाजी?

मुंशीजी को आपत्ति तो थी, उनका बस चलता तो इस अवसर पर दस-पांच आदमियों को और जमा कर लेते,फिर घर के आदमियों के चले जाने पर क्यों पत्ति न होती,मगर समस्या ऐसी आ पड़ी थी कि कुछ बोल न सके।

गोपी कलकत्ते की सैर का ऐसा अच्छा अवसर पाकर क्यों न खुण होता। विशम्भर दिल में ऐंठकर रह गया। विधाता ने उसे छोटी न बनाया होता, तो आज उसकी यह हकतलफी न होती। गोपी ऐसे कहां के बड़े होशियार हैं, जहां जाते हैं कोई-न-कोई चीज खो आते हैं। हां, मुझसे बड़े हैं। इस दैवी विधान ने उसे मजबूर कर दिया।

रात को नौ बजे जालपा चलने को तैयार हुई। सास-ससुर के चरणों पर सिर झुकाकर आशीर्वाद लिया,विशम्भर रो रहा था,उसे गले लगा कर प्यार किया और मोटर पर बैठी रतन स्टेशन तक पहुंचाने के लिए आई थी।

मोटर चली तो जालपा ने कहा-बहन, कलकत्ता तो बहुत बड़ा शहर होगा। वहां कैसे पता चलेगा?

रतन-पहले 'प्रजा-मित्र' के कार्यालय में जाना। वहां से पता चल जाएगा। गोपी बाबू तो हैं ही।

जालपा–ठहरूंगी कहां? [ १६४ ]रतन-कई धर्मशाले हैं। नहीं होटल में ठहर जाना। देखो रुपये की जरूरत पड़े, तो मुझे तार देना। कोई-न-कोई इंतजाम करके भेजूंगी। बाबूजी आ जाएं,तो मेरा बड़ा उपकार हो। यह मणिभूषण मुझे तबाह कर देगा।

जालपा–होटल वाले बदमाश तो ने होंगे?

रतन-कोई जरा भी शरारत करे, तो ठोकर मारना। बस, कुछ पूछना मत। ठोकर जमाकर तब बात करनी। (कमर से एक छुरी निकालकर) इसे अपने पास रख लो। कमर में छिपाए रखना। मैं जब कभी बाहर निकलती हैं, तो इसे अपने पास रख लेती हैं। इससे दिल बड़ा मजबूत रहता है। जो मर्द किसी स्त्री को छेड़ता है, उसे समझ लो कि पल्ले सिरे को कायर,नीच और लंपट है। तुम्हारी छुरी की चमक और तुम्हारे तेवर देखकर ही उसकी रूह फना हो जायगी। सीधा दुम दबाकर भागेगा, लेकिन अगर ऐसा मौका आ ही पड़े जब तुम्हें छुरी से काम लेने के लिए मजबूर हो जाना पड़े, तो जरा भी मत झिझकना। छुरी लेकर पिल पड़ा। इसकी बिल्कुल फिक्र मत करना कि क्या होगा, क्या न होगा। जो कुछ होगा, हो जायगी।

जालपा ने छुरी ले ली, पर कुछ बोली नहीं। उसका दिल भारी हो रहा था। इतनी बातें सोचने और पूछने की थीं उनके विचार से ही उसका दिल बैठा जाता था।

स्टेशन आ गया। कुलियों ने असबाब उतारा। गोपी टिकट लाया। जालपा पत्थर की मूर्ति की भांति प्लेटफार्म पर खड़ी रही, मानो चेतना शून्य हो गई हो। किसी बड़ी परीक्षा के पहले हम मौन हो जाते हैं। हमारी सारी शक्तियां उस संग्राम की तैयारी में लग जाती हैं।

रतन ने गोपी से कहा-होशियार रहना।

गोपी इधर कई महीनों से कसरत करता था। चलता तो मुड्ढे और छाती को देखा करता। देखने वालों को तो वह ज्यों का त्यों मालूम होता है, पर अपनी नजर में वह कुछ और हो गया था। शायद उसे आश्चर्य होता था कि उसे आते देखकर क्यों लोग रास्ते से नहीं हट जाते, क्यों उसके डील-डौल से भयभीत नहीं हो जाते। अकड़कर बोला-किसी ने जरा चीं-चपड़ की तो हड्डी तोड़ दूंगा।।

रतन मुस्कराई-यह तो मुझे मालूम है। सो मत जाना।

गोपी-पलक तक तो झपकेगी नहीं। मजाल है नींद आ जाय।

गाड़ी आ गई। गोपी ने एक डिब्बे में घुसकर कब्जा जमाया। जालपा की आंख में आंसू भरे हुए थे। बोली-बहन,आशीर्वाद दो कि उन्हें लेकर कुशल से लौट आऊं।।

इस समय उसका दुर्बल घने कोई आश्रय, कोई सहारा, कोई बल ढूंढ रहा था और आशीर्वाद और प्रार्थना के सिवा यह बल उसे कौन प्रदान करता। यही बल और शांति का वह अक्षय भंडार है जो किसी को निराश नहीं करता, जो सबकी बांह पकड़ता है, सबका बेड़ा पार लगाता है।

इंजन ने सीटी दी। दोनों सहेलियां गले मिलीं। जालपा गाड़ी में जा बैठी।

रतन ने कहा-जाते ही जाते खत भेजना।

जालपा ने सिर हिलाया।

'अगर मेरी जरूरत मालूम हो,तो तुरंत लिखना। मैं सब कुछ छोड़कर चली आऊंगी।' [ १६५ ]जालपा ने सिर हिला दिया।

'रास्ते में रोना मत।'

जालपा हंस पड़ी। गाड़ी चल दी।

छत्तीस

देवीदीन ने चाय की दुकान उसी दिन से बंद कर दी थी और दिन-भर उस अदालत की खाक छानता फिरता था जिसमें डकैती का मुकदमा पेश था और रमानाथ की शहादत हो रही थी। तीन दिन रमा की शहादात बराबर होती रही और तीनों दिन देवीदीन ने ने कुछ खाया और न सोया। आज भी उसने घर आते ही आते कुरती उतार दिया और एक पखया लेकर झलने लगा। फागुन लग गया था और कुछ-कुछ गर्मी शुरू हो गई थी,पर इतनी गर्मी न थी कि पसीना बहे या पंखे की जरूरत हो। अफसर लोग तो जाड़ों के कपड़े पहने हुए थे,लेकिन देवीदीन पसीने में तर था। उसका चेहरा,जिस पर निष्कपट बुढ़ापा हंसता रहता था, खिसियाया हुआ था,मानो बेगार से लौटा हो।

जग्गो ने लोटे में पानी लाकर रख दिया और बोली-चिलम रख दूं? देवीदीन को आज तीन दिन से यह खातिर हो रही थी। इसके पहले बुढ़िया कभी चिलम रखने को न पृछती थी।

देवीदीन इसका मतलब समझता था। बुढ़िया को सदय त्रों से देखकर बोला-नहीं, रहने दो, चिलम न पिऊगा।

'तो मुंह-हाथ तो धो लो। गर्द पड़ी हुई है।

‘धो लूंगा,जल्दी क्या है।'

बुढिया आज का हाल जानने को उत्सुक थी, पर डर रही थी कह देवीदीन झुंझला न पड़े। वह उसकी थकान मिटा देना चाहती थी, जिससे देवीदीन प्रसन्न होकर आप-ही-आप सारा वृत्तांत कह चले 'तो कुछ जलपान तो कर लो। दोपहर को भी तो कुछ नहीं खाया था, मिठाई लाऊँ? लाओ, पंखी मुझे दे दो।'

देवीदीन ने पँखिया दे दी। बुढिया झलने लगी। दो-तीन मिनट तक आंखें बंद करके बैठे रहने के बाद देवीदीन ने कहा-आज भैया की गवाही खत्म हो गई।

बुढिया का हाथ रुक गया। बोली-तो कल से वह घर आ जाएंगे?

देवीदीन-अभी नहीं छुट्टी मिली जाती, यही बयान दीवानी में देना पड़े। और अब वह यहां आने ही क्यों लगे । कोई अच्छी जगह मिल जायेगी, घोड़े पर चढ़े-चढ़े घूमेंगे, मगर है बड़ा पक्का मतलबी। पंद्रह बेगुनाहों को फंसा दिया। पांच-छ: को तो फांसी हो जाएगी। औरों को दस-दस बारह-बारह साल की सजा मिली रक्खी है। इसी के बयान से मुकदमा सबूत हो गया। कोई कितनी ही जिरह करे,क्या मजाल जरा भी हिचकिचाए। अब एक भी न बचेगा। किसने कर्म किया,किसने नहीं किया इसका हाल दैव जाने पर मारे सब जाएंगे। घर से भी तो [ १६६ ]
सरकारी रुपया ख़ाकर भागा था। हमें बड़ा धोखा हुआ।

जग्गो ने मौठे तिरस्कार से देखकर कह–अपनी नेकी-बदी अपने साथ है। मतलबी तो संसार है, कौन किसके लिए मरती है।

देवीदीन ने तीव्र स्वर में कहा-अपने मतलब के लिए जो दूसरों का गला काटे उसको जहर दे देना भी पाप नहीं है।

सहसा दो प्राणी आकर खड़े हो गए। एक गोरा, खूबसूरत लड़का था, जिसकी उम्र पंद्रह-सोलह साल से ज्यादा न थी। दूसरा अधेड़ था और सूरत से चपरासी मालूम होता था।

देवीदीन ने पूछा-किसे खोजते हो?

चपरासी ने कहा-तुम्हारा ही नाम देवीदीन है न? मैं 'प्रजा-मित्र' के दफ्तर से आया है। यह बाबू उन्हीं रमानाथ के भाई हैं जिन्हें शतरंज का इनाम मिला था। यह उन्हीं की खोज में दफ्तर गए थे। संपादकजी ने तुम्हारे पास भेज दिया। तो मैं जाऊं न?

यह कहता हुआ वह चला गया। देवीदीन ने गोपी को सिर से पांव तक देखा। आकृति रमा से मिलती थी। बोला-आओ बेटा, बैठो। कब आए घर से?

गोपी ने एक खटिक की दुकान पर बैठना शान के खिलाफ समझा। खड़ा-ख़ड़ा बोला-आज ही तो आया हूं। भाभी भी साथ हैं। धर्मशाले में ठहरा हुआ हूं।

देवीदीन ने खड़े होकर कहा-तो जाकर बहू को यहां लाओ ना ऊपर तो रमा बाबू को कमरा है ही, आराम से रहो। धरमसाले में क्यों पड़े रहोगे। नहीं चलो, मैं भी चलता हूं। यहीं सब तरह का आराम है।

उसने जग्गो को यह खबर सुनाई और ऊपर झाडू लगाने को कहकर गोपी के साथ धर्मशाले चल दिया। बुढिया ने तुरंत ऊपर जाकर झाडू लगाया, लपककर हलवाई की दुकान से मिठाई और दही लाई। सुराही में पानी भरकर रख दिया। फिर अपना हाथ-मुंह धोया, एक रंगीन साड़ी निकाली, गहने पहने और बन-ठनकर बहू की राह देखने लगी।

इतने में फिटन भी आ पहुंची। बुढिया ने जाकर जालपा को उतारा। जालपा पहले तो साग-भाजी की दुकान देखकर कुछ झिझकी, पर बुढ़िया का स्नेह-स्वागत देखकर उसकी झिझक दा हो गई। उसके साथ ऊपर गई, तो हर एक चीज इसी तरह अपनी जगह पर पाई मानों अपना ही घर हो।

जग्गो ने लोटे में पानी रखकर कहा-इसी घर में भैया रहते थे, बेटी आज पंद्रह रोज़ से घर सना पड़ा हुआ है। हाथ-मंह धोकर दही-चीनी खा लो न ,बेटी। भैया का हाल तो अभी तुम्हें न मालूम हुआ होगा।

जालपा ने सिर हिलाकर कहा-कुछ ठीक-ठीक नहीं मालूम हुआ। वह जो पत्र में छपता है,वहां मालूम हुआ था कि पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

देवीदीन भी ऊपर आ गया था। बोला-गिरफ्तार तो किया था, पर अब तो वह एक मुकदमे में सरकारी गवाह हो गए हैं। परागराज में अब उन पर कोई मुकदमा न चलेगा और साइत नौकरी-चाकरी भी मिल जाए।

जालपा ने गर्व से कहा-क्या इसी दर से वह सरकारी गवाह हो गए हैं? वहां तो उन [ १६७ ]
पर कोई मामला ही नहीं है। मुकदमा क्यों चलेगा?

देवीदीन ने डरते-डरते कहा-कुछ रुपये-पैसे का मुआमला था न?

जालपा ने मानो आहत होकर कहा-वह कोई बात न थी। ज्योंही हम लोगों को मालूम हुआ कि कुछ सरकारी रकम इनसे खर्च हो गई है, उसी वक्त पहुंचा दी। यह व्यर्थ घबड़ाकर चले आए और फिर ऐसी चुप्पी साधी कि अपनी खबर तक न दी।

देवीदीन का चेहरा जगमगा उठा, मानो किसी व्यथा से आराम मिल गया हो। बोला-तो यह हम लोगों को क्यों मालूम 'बार-बार समझाया कि घर पर खत-पत्तर भेज दो, लोग घबड़ाते होंगे; पर मारे शर्म के लिखते ही न थे। इसी धोखे में पड़े रहे कि परागराज में मुकदमा चल गया होगा। जानते तो सरकारी गवाह क्यों बनते?

'सरकारी गवाह' का आशय जालपा से छिपा न था। समाज में उनकी जो निंदा और अपकीर्ति होती है, यह भी उससे छिपी ने थी। सरकारी गवाह क्यों बनाए जाते हैं, किस तरह प्रलोभन दिया जाता है, किस भाति वह पुलिस के पुतले बनकर अपने ही मित्रों का गला घोंटते हैं, यह उसे मालूम था। अगर कोई आदमी अपने बुरे आचरण पर लज्जित होकर भी सत्य का उद्घाटन करे, अन्न और कपट का आवरण हय दे, तो वह सज्जन है, उसके साहस की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। मगर शर्त यही है कि वह अपनी गोष्ठी के साथ किए का फल भोगने को तैयार रहे। हंसती-खेलता फांसी पर चढ़ जाए तो वह सच्चा धीर है,लेकिन अपने प्राणों की रक्षा के लिए स्वार्थ के नोच विचार से,दंड की कठोरता से भयभीत होकर अपने साथियों से दगा करे, आस्तीन का सांप बन जाए तो वह कायर है,पतित है,बेहया है। विश्वासघात डाकुओं और समाज के शत्रुओं में भी उतना ही हेय है जितना किसी अन्य क्षेत्र में। ऐसे प्राणी को समाज कभी क्षमा नहीं करता,कभी नहीं-जालपा इसे खूब समझती थी। यहां तो समस्या और भी जटिल हो गई थी। रमा ने दंड के भय से अपने किए हुए पापों का परदा नहीं खोला था। उसमें कम-से-कम सच्चाई तो होती। निंद्य होने पर भी आंशिक सच्चाई का एक गुण तो होता। यहां तो उन पापों का परदा खोला गया था, जिनकी हवा तक उसे न लगी थी। जालपा को सहसा इसका विश्वास न आयो। अवश्य कोई-न-कोई बात हुई होगी, जिसने मा को सरकारी गवाह बनने पर मजबूर कर दिया होगा। सकुचाती हुई बोली-क्या यहां भी कोई कोई बात हो गई थी?

देवीदीन उसकी मनोव्यथा का अनुभव करता हुआ बोला--कोई बात नहीं। यहां वह मेरे साथ ही परागराज से आए। जब से आए यहां से कहीं गए नहीं। बाहर निकलते ही न थे। बस एक दिन निकले और उसी दिन पुलिस ने पकड़ लिया। एक सिपाही को आते देखकर डरे कि मुझी को पकड़ने आ रहा है, भाग खड़े हुए। उस सिपाही को खटका हुआ। उसने शुबहे में गिरफ्तार कर लिया। मैं भी इनके पीछे थाने में पहुंचा। दारोगा पहले तो रिसवत मांगते थे, मगर जब मैं घर से रुपये लेकर गया, तो वहां और ही गुल खिले चुका था। अफसरों में न जाने क्या बातचीत हुई। उन्हें सरकारी गवाह बना लिया। मुझसे तो भैया ने कहा कि इस मुआमले में बिल्कुल झूठ न बोलना पड़ेगा। पुलिस का मुकदमा सच्चा है। सच्ची बात कह देने में क्या हरज है। मैं चुप हो रहा। क्या करता [ १६८ ]जग्गो–ने जाने सबों ने कौन-सी बूटी सुंघा दी। भैया तो ऐसे न थे। दिन-भर अम्मां-अम्मा करते रहते थे। दुकान पर सभी तरह के लोग आते हैं, मर्द भी औरत भी। क्या मजाल कि किसी की ओर आंख उठाकर देखा हो।

देवीदीन-कोई बुराई न थी। मैंने तो ऐसा लड़का ही नहीं देखा। उसी धोखे में आ गए।

जालपा ने एक मिनट सोचने के बाद कहा-क्या उनको बयान हो गया?

'हां, तीन दिन बराबर होता रहा। आज खतम हो गया।'

जालपा ने उद्विग्न होकर कहा-तो अब कुछ नहीं हो सकता? मैं उनसे मिल सकती हैं?

देवीदीन जालपा के इस प्रश्न पर मुस्करा पड़ा। बोला- हां, और क्या, जिसमें जाकर भंडाफोड़ कर दो, सारा खेल बिगाड़ दो ! पुलिस ऐसी गधी नहीं है। आजकल कोई भी उनसे नहीं मिलने पाता। कड़ा पहरा रहता है।

इस प्रश्न पर इस समय और कोई बातचीत न हो सकती थी। इस गुत्थी को सुलझाना आसान न था। जालपा ने गोपी को बुलाया। वह छज्जे पर खड़ा सड़क का तमाशा देख रहा था। ऐसा शरमा रहा था, मानो ससुराल आया हो। धीरे-धीरे आकर खड़ा हो गया।

जालपा ने कहा-मुंह-हाथ धोकर कुछ खा तो लो। दही तो तुम्हें बहुत अच्छा लगता गोपी लजा कर फिर बाहर चला गया।

देवीदीन ने मुस्कराकर कहा-हमारे सामने न खाएंगे। हम दोनों चले जाते हैं। तुम्हें जिसशचीज की जरूरत हो,हमसे कह देना,बहूजी । तुम्हारा ही घर है। भैया को तो हम अपना ही समझते थे। और हमारे कौन बैठा हुआ है।

जग्गो ने गर्व से कहा-वह तो मेरे हाथ का बनाया खा लेते थे। गरूर तो छू नहीं गया था।

जालपा ने मुस्कराकर कहा-अब तुम्हें भोजन न बनाना पड़ेगा, मांजी, मैं बना दिया करूंगी।

जग्गो ने आपत्ति की-हमारी बिरादरी में दूसरों के हाथ का खाना पना है,बहू। अब चार दिन के लिए बिरादरी में नक्कू क्या बनू ।

जालपा-हमारी बिरादरी में भी तो दूसरों का खाना मना है।

जग्गो–यहां तुम्हें कौन देखने आता है। फिर पढ़े-लिखे आदमी इन बातों का विचार भी तो नहीं करते। हमारी बिरादरी तो मूरख लोगों की है।

जालपा–यह तो अच्छा नहीं लगता कि तुम बाओं और मैं खाऊ। जिसे बहू बनाया उसके हाथ का खाना पड़ेगा। नहीं खाना था, तो बहू क्यों बनाया।

देवीदीन ने जागो की ओर प्रशंसा-सूचक नेत्रों से देखकर कहा-बहू ने बात पते की कह दी। इसका जवाब सोचकर देना। अभी चलो। इन लोगों को जरा आराम करने दो।

दोनों नीचे चले गए,तो गोपी ने आकर कहा–भैया इसी खटिक के यहां रहते थे क्या? खटिक ही तो मालूम होते हैं।

जालपा ने फटकारकर कहा-खटिक हों या चमार हों, लेकिन हमसे और तुमसे सौगुने अच्छे हैं। एक परदेशी आदमी को छ: महीने तक अपने घर में ठहराया, खिलाया, पिलाया। [ १६९ ]
हममें है इतनी हिम्मत ! यहां तो कोई मेहमान आ जाता है, तो वह भी भारी हो जाता है। अगर यह नीचे हैं, तो हम इनसे कहीं नीचे हैं।

गोपी मुंह-हाथ धो चुका था। मिठाई खाता हुआ बोला-किसी को ठहरा लेने से कोई ऊंचा नहीं हो जाता। चमार कितना ही दान-पुण्य करे, पर रहेगा तो चमार ही।

जालपा–मैं उस चमार को उस पंडित से अच्छा समझूंगी, जो हमेशा दूसरों का धन खाया करता है।

जलपान करके गोपी नीचे चला गया। शहर घूमने की उसकी बड़ी इच्छा थी। जालपा की इच्छा कुछ खाने की न हुई। उसके सामने एक जटिल समस्या खड़ी थी-रमा को कैसे इस दलदल से निकाले। उस निंदा और उपहास की कल्पना ही से उसका अभिमान आहत हो उठता था। हमेशा के लिए वह सबकी आंखों से गिर जाएंगे, किसी को मुंह न दिखा सकेंगे।

फिर बेगनाहों का खून किसकी गर्दन पर होगा। अभियक्तों में न जाने कौन अपराधी है,कौन निरपराध है, कितने द्वेष के शिकार हैं, कितने लोभ के सभी सजा पा जाएंगे। शायद दो-चार को फांसी भी हो जाये। किस पर यह हत्या पड़ेगी?

उसने फिर सोचा, माना किसी पर हत्या न पड़ेगी। कौन जानता है, हत्या पडती है या नहीं; लेकिन अपने स्वार्थ के लिए-ओह । कितनी बड़ी नीचता है। यह कैसे इस बात पर राजी हुए। अगर म्युनिसिपैलिटी के मुकदमा चलाने का भय भी था, तो दो-चार साल की कैद के सिवा और क्या होता? उससे बचने के लिए इतनी घोर नीचता पर उतर आए ।

अब अगर मालूम भी हो जाए कि म्युनिसिपैलिटी कुछ नहीं कर सकती, तो अब हो ही क्या सकता है। इनकी शहादत तो हो ही गई।

सहसा एक बात किसी भारी कोल की तरह उसके हृदय में चुभ गई। क्यों न यह अपना बयान बदल दें। उन्हें मालूम हो जाए कि म्युनिसिपैलिटी उनका कुछ नहीं कर सकती, तो शायद वह खुद ही अपना बयान बदल दें। यह बात उन्हें कैसे बताई जाए? किसी तरह संभव है।

वह अधीर होकर नीचे उतर आई और देवीदीन को इशारे से बुलाकर बोली—क्यों दादी,उनके पास कोई खत भी नहीं पहुंच सकता? पहरे वालों को दस-पांच रुपये देने से तो शायद खत पहुंच जाय।

देवीदीन ने गर्दन हिलाकर कहा-मुसकिल है। पहरे पर बड़े जंचे हुए आदमी रखे गए हैं।मैं दो बार गया था। सबों ने फाटक के सामने खड़ा भी न होने दिया।

'उस बंगले के आसपास क्या है?'

'एक ओर तो दूसरा बंगला है। एक ओर एक कलमी आम का बाग है और सामने सड़क है।

'हां, शाम को घूमने-घामने तो निकलते ही होंगे?'

'हां, बाहर कुरसी डालकर बैठते हैं। पुलिस के दो-एक अफसर भी साथ रहते हैं।'

'अगर कोई उस बाग में छिपकर बैठे, तो कैसा हो ! जब उन्हें अकेले देखे, खत फेंक दे। वह जरूर उठा लेंगे।'

देवीदीन ने चकित होकर कहा-हां, हो तो सकता है, लेकिन अकेले मिलें तब तो ! [ १७० ]
जरा और अंधेरा हुआ, तो जालपा ने देवीदीन को साथ लिया और रमानाथ का बंगला देखने चली। एक पत्र लिखकर जेब में रख लिया था। बार-बार देवीदीन से पूछती, अब कितनी दूर है? अच्छा । अभी इतनी ही दूर और । वहां हाते में रोशनी तो होगी ही उसके दिल में लहरे-सी उठने लगीं। रमा अकेले टहलते हुए मिल जाएं, तो क्या पूछना। रूमाल में बांधकर खत को उनके सामने फेंक दें। उनकी सूरत बदल गई होगी।

सहसा उसे शंका हो गई-कहीं वह पत्र पढ़कर भी अपना बयान न बदलें, तब क्या होगा? कौन जाने अब मेरी याद भी उन्हें है या नहीं। कहीं मुझे देखकर वह मुंह फेर लें तो? इस शंका से वह सहम उठी। देवीदीन से बोली-क्यों दादा, वह कभी घर की चर्चा करते थे?

देवीदीन ने सिर हिलाकर कहा--कभी नहीं। मुझसे तो कभी नहीं की। उदास बहुत रहते थे।

इन शब्दों ने जालपा की शंका को और भी सजीव कर दिया। शहर की घनी बस्ती से ये लोग दूर निकल आए थे। चारों ओर सन्नाटा था। दिन भर वेग से चलने के बाद इस समय पवन भी विश्राम कर रहा था। सड़क के किनारे के वृक्ष और मैदान चन्द्रमा के मंद प्रकाश में हतोत्साह, निर्जीव-से मालूम होते थे। जालपा को ऐसा आभास होने लगा कि उसके प्रयास को कोई फल नहीं है, उसकी यात्रा का कोई लक्ष्य नहीं है, इस अनंत मार्ग में उसकी दशा उस अनाथ को-सी है जो मुट्ठीभर अन्न के लिए द्वार-द्वार फिरता हो। वह जानता है, अगले द्वार पर उसे अन्न न मिलेगा, गालियां ही मिलेंगी, फिर भी वह हाथ फैलाता है, बढ़ती भनाता है। उसे आशा का अवलंब नहीं निराशा ही का अवलंब है। एकाएक सड़क के दोहनी तरफ बिजली का प्रकाश दिखाई दिया। देवीदीन ने एक बंगले की ओर उंगली उठाकर कहा-यही उनका बंगला है। जालपा ने डरते-डरते,उधर देखा, मगर बिल्कुल सन्नाटा छाया हुआ था। कोई आदमी न था। फाटक पर ताला पड़ा हुआ था। जालपा बोली--यहां तो कोई नहीं है। देवीदीन ने फाटक के अंदर झांककर कहा-हां, शायद यह बगला छोड़ दिया। 'कहीं घूमने गए होंगे?' 'घूमने जाते तो द्वार पर पहरा होता। यह बंगला छोड़ दिया। 'तो लौट चलें।' नहीं, जरा पता लगाना चाहिए गए कहां?' बंगले की दहिनी तरफ आमों के बाग में प्रकाश दिखाई दिया। शायद खटिक बाग की रखवाली कर रहा था। देवीदीन ने बाग में आकर पुकारा-कौन है यहां? किसने यह बाग लिया एक आदमी आमों के झुरमुट से निकल आया। देवीदीन ने उसे पहचानकर कहा- अरे । तुम हो जगली? तुमने यह बाग लिया है? जगली ठिगना-सा गठीला आदमी था, बोला–हां दादा, ले लिया, पर कुछ है नहीं। इंड ही भरना पड़ेगा। तुम यहां कैसे आ गए? [ १७१ ]

'कुछ नहीं, यों ही चला आया था। इस बंगले वाले आदमी क्या हुए?'

जंगली ने इधर-उधर देखकर कनबतियों में कहा-इसमें वही मुखबर टिका हुआ था। आज सब चले गए। सुनते हैं, पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, जब फिर हाइकोर्ट में मुकदमा पेस होगा। पढ़े-लिखे आदमी भी ऐसे दगाबाज होते हैं, दादा! सरासर झूठी गवाही दी। न जाने इसके बाल-बच्चे हैं या नहीं, भगवान् को भी नहीं डरा!

जालपा वहीं खड़ी थी। देवीदीन ने जंगली को और जहर उगलने का अवसर न दिया। बोला-तो पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, खूब मालूम है?

जंगली-हां, वही पहरे वाले कह रहे थे।

'कुछ मालूम हुआ, कहां गए हैं?'

'वही मौका देखने गए हैं जहां वारदात हुई थी।'

देवीदीन चिलम पीने लगा और जालपा सड़क पर आकर टहलने लगी। रमा की यह निंदा सुनकर उसका हृदय टुकड़े-टुकड़े हुआ जाता था। उसे रमा पर क्रोध न आया, ग्लानि न आई, उसे हाथों का सहारा देकर इस दलदल से निकालने के लिए उसका मन विकल हो उठा। रमा चाहे उसे दुत्कार ही क्यों न दे, उसे ठुकरा ही क्यों न दे, वह उसे अपयश के अंधेरे खड्ड में न गिरने देगी।

जब दोनों यहां से चले तो जालपा ने पूछा-इस आदमी से कह दिया न कि जब वह आ जायं तो हमें खबर दे दे?

'हां, कह दिया।'

सैंतीस

एक महीना गुजर गया। गोपीनाथ पहले तो कई दिन कलकत्ते की सैर करता रहा, मगर चार-पांच दिन में ही यहां से उसका जी ऐसा उचाट हुआ कि घर की रट लगानी शुरू की। आखिर जालपा ने उसे लौटा देना ही अच्छा समझा। यहां तो वह छिप-छिप कर रोया करता था।

जालपा कई बार रमा के बंगले तक हो आई। वह जानती थी कि अभी रमा नहीं आए हैं। फिर भी वहां का एक चक्कर लगा आने में उसको एक विचित्र संतोष होता था।

जालपा कुछ पढ़ते-पढ़ते या लेटे-लेटे थक जाती, तो एक क्षण के लिए खिड़की के सामने आ खड़ी होती थी। एक दिन शाम को वह खिड़की के सामने आई, तो सड़क पर मोटरों की एक कतार नजर आई। कौतूहल हुआ, इतनी मोटरें कहां जा रही हैं! गौर से देखने लगी। छः मोटरें थीं। उनमें पुलिस के अफसर बैठे हुए थे। एक में सबसपाही थे। आखिरी मोटर पर जब उसकी निगाह पड़ी तो,मानो उसके सारे शरीर में बिजली की लहर दौड़ गई। वह ऐसी तन्मय हुई कि खिड़की से जीने तक दौड़ी आई, मानो मोटर को रोक लेना चाहती हो; पर इसी एक पल में उसे मालूम हो गया कि मेरे नीचे उतरते-उतरते मोटरें निकल जाएंगी। वह फिर खिड़की के सामने आयी। रमा अब बिल्कुल सामने आ गया था। उसकी आंखें खिड़की की ओर लगी हुई