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दुखी भारत/१६ देवदासी

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दुखी भारत  (1928) 
द्वारा लाला लाजपत राय
[ २१७ ]

सोलहवाँ अध्याय
देवदासी

मिस मेयो जिन कुप्रथाओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है उनमें एक 'देवदासियों' की उपस्थिति भी है। इसमें सन्देह नहीं कि यह प्रथा अत्यन्त घृणित है। परन्तु यहाँ भी मिस मेयो ने अपनी कल्पना से ही काम अधिक लिया है। उसकी पुस्तक के ५१ वें तथा ५२ वें पृष्ठ पर लिखा है:–

"देश के कुछ भागों में विशेषतः मदरास-प्रान्त में और उड़ीसा में हिन्दुओं में एक ऐसी प्रथा प्रचलित है जिसके अनुसार माता-पिता अपने किसी उद्देश्य की सिद्धि में देवताओं से सहायता प्राप्त करने के लिए यह प्रतिज्ञा करते हैं कि यदि उनका कार्य सिद्ध हो जायगा तो वे अपनी प्रथम संतान को, यदि वह लड़की हुई, देवताओं को भेंट कर देंगे। या कोई विशेष सुन्दर कन्या अपने कुटुम्ब में अनावश्यक समझी जाने के कारण देवताओं को भेंट कर दी जाती है। छोटी बालिका इस प्रकार मन्दिर की स्त्रियों को सौंप दी जाती है। ये स्त्रियाँ भी उसी के समान दान-स्वरूप मन्दिर में आई हुई होती हैं और उसे नाचना तथा गाना सिखाती हैं। वह बालिका प्रायः पाँच ही वर्ष की आयु में, जब वह भोग के लिए अत्यन्त उपयुक्त समझी जाती है, पुजारी की वेश्या बन जाती है।

"यदि वह इसके पश्चात् जीवित रह जाती है तो दैनिक पूजा के समय नाचती है और गाती है। विशेष अवसरों पर जो भक्त लोग आते हैं वे मन्दिर के आस पास के घरों में कुछ देने पर जब चाहें उसके साथ विषय-भोग कर सकते हैं। अब वह सुन्दर पोशाक पहने रहती है और देवताओं के रत्नाभूषणों से लदी रहती है। जब तक उसका सौंदर्य नष्ट नहीं हो जाता तब तक वह बड़ा चञ्चल जीवन व्यतीत करती है। इसके पश्चात् जिस देवता की सेवा में वह रहती है उसकी मुहर के साथ वह मन्दिर से निकाल दी जाती है। जीविका के लिए उसे एक प्रकार का अल्प वेतन भी मिलता पर वह यथेष्ट नहीं होता। इससे वह जनता पर अपना भार रख देती है और उसे भिखारी-वृत्ति करने का स्वीकृत अधिकार भी रहता है। उसके माता-पिता धन-धान्य से सम्पन्न हो सकते हैं, उच्च श्रेणी के और [ २१८ ]उच्च जाति के हो सकते हैं। पर उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करने में वे अपना ज़रा भी अनादर नहीं समझते। बल्कि उनका यह कार्य्य सर्वथा सम्माननीय समझा जाता है। वह और उसके समान अन्य स्त्रियाँ मिलकर अपनी एक खास जाति की रचना करती हैं। और 'देवदासियाँ' या 'देवों की वेश्याओं' के नाम से पुकारी जाती हैं। मन्दिर की सजावट उनके बिना सूनी समझी जाती है।"

हम यह नहीं समझते कि देवदासी की प्रथा का विषय मिस मेयो की निजी खोज है। हाँ, इसमें सन्देह नहीं कि उसने इसी प्रकार के विषयों की खोज की है। यहाँ हम अपने पाठकों का ध्यान सर जेम्स फ्रे़जर-कृत 'गोल्डेन बाऊ' (सुनहली डाली) की ओर आकर्षित कर देना चाहते हैं*[१]। फ्रे़जर के वर्णन से मिस मेयो की सारी बातें सिद्ध नहीं होतीं! उनकी पुस्तक में हम पढ़ते हैं:–

"भारतवर्ष में तामिल मन्दिरों की सेवा के लिए जो नाचनेवाली बालिकाएँ भेंट की जाती हैं वे अपने आपको देवदासी अर्थात् देवताओं की सेविका कहती हैं परन्तु साधारण जनता में वे केवल वेश्या के नाम से प्रसिद्ध हैं। दक्षिण भारत में जितने सुविख्यात तामिल मन्दिर हैं प्रायः उन सबमें इन धार्मिक स्त्रियों की एक सेना पाई जाती है। उनका मन्दिर-सम्बन्धी कर्तव्य यह है कि वे मन्दिर में प्रातः, सायं दो बार नाचें, मूर्ति पर चवँर चलावें, जब जलूस निकले तो मूर्ति के आगे आगे नाचती गाती हुई चलें और पवित्र प्रकाश लेकर चलें। इस प्रकाश को कुम्बरती कहते हैं। जिन माताओं के सन्तान होनेवाली होती है, वे कुशलपूर्वक उसे जन्म देने के लिए प्रायः यह संकल्प कर लेती हैं कि यदि वह सन्तान कन्या होगी तो उसे वे देवताओं की भेंट कर देंगी। मदरास प्रान्त के एक छोटे से नगर त्रिकुली कुन्द्रम के जुलाहों में यह प्रथा है कि वे अपनी ज्येष्ठ कन्या को देवताओं के भेंट कर देते हैं। इस प्रकार जो कन्यायें देवार्पण की जाती हैं वे अपना कार्य्यारम्भ करने से पूर्व या तो देवता की मूर्ति के साथ या कटार के साथ विवाह करती हैं। इससे यह पता चलता है कि वे सदैव नहीं तो कभी कभी देवता की पत्नियाँ समझी जाती हैं।

"दक्षिण भारत में चारों तरफ़ फैली हुई तामिल जुलाहों की कैकोलन नाम की एक बड़ी जाति में यह प्रथा है कि प्रत्येक कुटुम्ब की कम से कम एक [ २१९ ]कन्या मन्दिर की सेवा के लिए अनिवार्य्य रूप से भेंट की जाती है। कोयम्बटूर में ऐसी बालिकाओं के मन्दिर-प्रवेश के अवसर पर जो धार्मिक कृत्य किये जाते हैं उनमें 'एक प्रकार का विवाह-संस्कार' भी सम्मिलित रहता है।

"ट्रावनकोर के मन्दिरों में ऐसी जो कुमारियाँ नियुक्त रहती हैं उन्हें देवदासी कहते हैं।

"उसके समर्पण और जीवन-चर्य्या का निम्नलिखित वर्णन उल्लेखनीय है; क्योंकि यह उसके जीवन के ओछे कृत्यों की उपेक्षा करते हुए भी यह प्रकट करता है कि उसका देवता के साथ विवाह क्यों किया जाता है। देवदासियों के विवाह का मूल तात्पर्य्य यह था कि देवमूर्ति के साथ विवाह हो जाने पर वे अपने जीवन का शेष सम्पूर्ण भाग साधारण गृहस्थ जीवन को त्याग कर देवता की सेवा में लगा दें। आरम्भ में हिन्दू मन्दिरों में देवदासियों की सम्भवतः जो स्थिति रही होगी उसकी तुलना अस्पताल की दाइयों या ईसाइयों के स्त्री-मठों की बहनों के साथ भली भाँति की जा सकती है। समर्पण-काल की धार्मिक क्रियाओं––दासी के देवमूर्ति के साथ विवाह की रीतियों––में ऐसी बातें अब भी मौजूद हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि वर्तमान समय में उनका जीवन जैसा कलङ्कमय है, पहले उसका बिल्कुल उलटा था। जिस बालिका का इस प्रकार विवाह किया जाता है उसकी आयु प्रायः ६ से ८ वर्ष के भीतर होती है। स्थानीय मन्दिर में जो देवता होता है वही दूल्हा बनता है। उस समय से वह उस देवता की पत्नी बन जाती है। और यह समझा जाता है कि उसने नियमानुकूल और गम्भीरतापूर्वक अपना शेष जीवन उस देवता की सेवा के लिए वैसे ही समर्पित कर दिया है जैसे पवित्र वैवाहिक बन्धन से बँधी कोई पति-भक्ता नारी अपना शेष जीवन अपने स्वामी की सेवा में लगा देती है। उन समस्त गुणों से युक्त देवदासी का जीवन निश्चय ही अत्यन्त पवित्र और कलङ्क-विहीन जीवन था। अब भी मन्दिर से ही उसका पालन-पोषण होता है। मन्दिर के उत्सवों के अवसर पर वह व्रत-उपवास करती है। अपामरागम समारोह से सम्बन्ध रखनेवाला सात दिन का उपवास इसका एक उदाहरण है। इस उपवास के समय में उसे कठिन संयम का पालन करना पड़ता है। वह केवल एक बार भोजन करती है और वह भी मन्दिर के भीतर। तात्पर्य्य यह कि कम से कम इस सात दिन के समय के लिए उसे अपना जीवन ठीक उसी प्रकार बिताना पड़ता है जैसा कि उसे मृत्युपर्य्यन्त बिताने की आज्ञा होती है। उसके कुछ दैनिक कार्य बड़े मनोरञ्जक प्रतीत होते हैं। वह सन्ध्या के समय प्रति दिन की आरती में सम्मिलित होती है। देवता का स्तुति-गान करती है, उसके सम्मुख नाचती है और जब उसकी सवारी निकलती है तो प्रकाश लेकर [ २२० ]उसके साथ जाती है। सवारी का कार्य्य समाप्त होने पर वह जयदेव के गीतगोविन्द से एक या दो गान गाती है। इसके पश्चात् वह देवता को शयन कराने के कुछ मंत्र गाती है। तब उसका रात्रि का कार्य्य समाप्त हो जाता है। जब वह शरीर से इन कर्तव्यों के अयोग्य हो जाती है तब एक विशेष संस्कार––तोतुवैक्कुआ (वृद्धमाता)––द्वारा इससे पृथक् कर दी जाती है। उस दशा में भी उसे निर्वाह के लिए वेतन-स्वरूप कुछ पाने का हक़ रहता है। जब वह मर जाती है तो उसके दाह-संस्कार आदि का व्यय मन्दिर की ओर से किया जाता है। जब वह अपनी मृत्यु-शय्या पर होती है तब पुजारी उसकी सेवा करने आता है और मृत्यु के पश्चात् ही कुछ क्रियाओं के पश्चात् उसके शरीर में केशर का लेप कर देता है।"

पाठक स्वयं इस बात पर विचार करें कि क्या 'गोल्डेन बाऊ' का वर्णन स्थान स्थान पर मदर इंडिया से वास्तव में भिन्न नहीं है।

देवदासियों की प्रथा निस्सन्देह एक पैशाचिक प्रथा है और इसके लिए प्रत्येक दक्षिण भारतीय को लज्जित होना चाहिए। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि दक्षिणी प्रान्त के बाहर इस प्रथा को कोई नहीं जानता। मिस मेयो का यह कथन कि 'देश के कुछ भागों में' यह प्रथा प्रचलित है नितान्त भ्रमोत्पादक है। दक्षिणी प्रान्त में भी मलाबार जैसे बड़े खण्डों में यह अज्ञात है। यह कहना कि 'पाँच वर्ष की आयु में ही वह पुजारी की निजी वेश्या बन जाती है' स्पष्ट रूप से एक बड़ी भद्दी अतिशयोक्ति प्रतीत होती है। इस प्रथा में सबसे बड़ी बुराई यही है कि इन स्त्रियों का मन्दिरों के साथ सम्बन्ध होता है। दक्षिण-भारत में कुछ मन्दिर ऐसे हैं जिन्हें हम पुजारियों द्वारा सञ्चालित वेश्यागृह कह सकते हैं। परन्तु यहाँ यह कह देना अनुचित नहीं है कि योरप के कुछ मठ और गिरजाधर पहले ऐसे ही थे और कुछ अब भी इससे अच्छी अवस्था में नहीं हैं।

डाक्टर सैङ्गर-द्वारा लिखित वेश्या-वृत्ति के इतिहास में निम्नलिखित बातें मिलती हैं:–

"क्लिमेंट द्वितीय नामक पादरी ने एक आज्ञा निकाली थी कि यदि वेश्याएँ अपनी आय का कुछ भाग गिरजाघर को दें तो हम उनकी वृत्ति को धर्मानुकूल कह सकते हैं। [ २२१ ]"सिक्चुअस चतुर्थ नामक पादरी और भी व्यवहार-कुशल था। केवल एक वेश्या-गृह से, जो उसने स्वयं स्थापित किया था, उसे २०,००० मुहरों की आय प्राप्त होती थी।"

रूसी और अमरीकन क्रान्तिकारी तथा स्त्रियों के पक्षपाती एक्मा गोल्ड मैन ने अपनी एक पुस्तक*[२] में सैङ्गर के उपरोक्त दोनों वाक्यों को उद्धृत करके अपनी टिप्पणी इस प्रकार दी है:–

"आधुनिक काल में इस दिशा की ओर गिरजाघर कुछ अधिक सावधानी से काम करता है। कम से कम वह वेश्याओं से खुल्लमखुल्ला दान नहीं माँगता। पर वह ट्रिविटी चर्च की भाँति व्यापार करना अधिक लाभकर समझता है। जो लोग वेश्यावृत्ति के द्वारा जीवन व्यतीत करते हैं उन्हें बड़े महँगे दामों में मृत्यु-शय्या किराये पर देना, इसका एक उदाहरण है।"

इस बुरी से बुरी स्थिति में भी दक्षिण भारत की देवदासी वेश्यायें योरप और अमरीका की इसी श्रेणी की वेश्याओं से बुरी नहीं हैं और न उनसे अच्छी ही हैं। एक उप-महाद्वीप में, जिसमें ३१,५०,००,००० आत्माएँ निवास करती हैं, देवदासी के समान सूक्ष्मदर्शक यन्त्र से देखे जाने योग्य एक जाति की उपस्थिति से सम्पूर्ण राष्ट्र के धर्माचरण पर आक्षेप करना न्याय कदापि नहीं कहा जा सकता।

सुधार-समितियाँ इस कुत्सित प्रथा के मिटाने के उद्योग में लगी हुई हैं। विश्वास के साथ यह आशा की जा सकती है कि यदि सरकार इसकी रक्षा करने के लिए हथियार न उठावे तो मदरास कौंसिल के निर्वाचित सदस्य इसे अधिक समय तक जीवित न रहने देंगे। मिस मेयो लिखती है, 'अब यदि यह पूछा जाय कि एक उत्तरदायी शासन ऐसी प्रथा को क्यों जारी रहने देता है तो उत्तर खोजने के लिए दूर न जाना पड़ेगा।' वह कहती है कि [ २२२ ]सरकार की इस ओर उपेक्षा का कारण कट्टर हिन्दुओं का भयानक धार्मिक विरोध है। परन्तु वहीं मैसूर सरकार के कृत्य से उसका यह कथन भी असत्य सिद्ध हो जाता है। इसमें तथा अन्य बहुत सी बातों––आरम्भिक शिक्षा को अनिवार्य्य करने, बाल-विवाह की प्रथा बन्द करने आदि––में सजग भारतीय राज्य आगे निकल गये हैं परन्तु ब्रिटिश नौकरशाही अब भी प्रत्येक भयङ्कर कुप्रथा को उसी प्रकार बनाये रखने की दृढ़ता दिखा रही है।

 

  1. *पहला भाग (मैकमिलन, १९१४) पृष्ठ ६१-६५
  2. * क्रान्ति और अन्य निबन्ध (अनारकिज़्म एण्ड अदर ऐसेज़) पृष्ठ १८९