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दुखी भारत/२७ भारत के धन का अपव्यय-समाप्त

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दुखी भारत  (1928) 
द्वारा लाला लाजपत राय
[ ३७७ ]

सत्ताईसवाँ अध्याय

भारत के धन का अपव्यय-समाप्त

रेलों के लिए सस्ता ऋण

यह बात सच है कि आज भारतवर्ष में ४० हज़ार मील रेल की सड़कें हैं। परन्तु इनका कैसे निर्माण हुआ, कैसे आर्थिक सहायता मिली, कैसे इनका प्रयोग किया जाता है आदि बातों की कथा में निन्दा के अतिरिक्त और कुछ मिल नहीं सकता। भारतीय रेलवे नीति ने भारतवर्ष के हितों की कभी परवाह नहीं की। इनका मुख्य उद्देश्य केवल ब्रिटेन का युद्ध-सम्बन्धी या व्यापारसम्बन्धी स्वार्थ-साधन रहा है। भारतीय रेलों के निर्माण-कर्ता या सञ्चालक अँगरेज़ों के गुट्ट थे जिन्हें कभी किसी प्रकार का घाटा नहीं हुआ। उलटा उन्होंने भारत के कर-दाताओं के सैकड़ों रुपये मूँड़ लिये। यह सब होते हुए भी उनका बर्ताव भारतीय यात्रियों के साथ अत्यन्त घृणित और निन्दाजनक रहा है। तीसरे दर्जे के यात्रियों के साथ उनका बर्ताव अत्यन्त नीचतापूर्ण रहा है; यद्यपि आय का अधिकांश भाग उन्हीं से मिलता रहा है। इनमें से कुछ कम्पनियाँ जो तीसरे दर्जे के यात्रियों का पैसा खा खाकर मोटी हुई हैं, घृणा के साथ इस दर्जे को 'कुलीदर्जा' कहती रही हैं।

मिस मेयो कहती है कि हम भारतीयों को लन्दन का कृतज्ञ होना चाहिए क्योंकि उसने हमें रेलों के लिए इतने आश्चर्य्यजनक सस्ते ब्याज पर रुपये दिये हैं। वह कहती है-'भारत ने अपने सस्ते बाज़ार, लन्दन, से ऋण लिया।......उसे केवल २.५ से ५ प्रतिशत तक ब्याज देना पड़ा। पूरे ऋण पर इस ब्याज का औसत केवल ३.५ प्रतिशत पड़ा। संसार ने इससे कम ब्याज पर ऋण मिलते कहीं नहीं देखा।' परन्तु यहाँ ऋण शब्द के साधारण अर्थ में ऋण लेना नहीं था। यहाँ पर मिस मेयो जिस बात का उल्लेख कर रही है उसे 'गारंटी-पद्धति' कहते थे। इस पद्धति के अनुसार भारत-सरकार ने रेलवे-कंपनियों को कम से कम ब्याज की गारंटी दी थी। यह सस्ती पूँजी [ ३७८ ] इसने स्वयं नहीं ली, न रेलों का निर्माण किया और न उनकी आय पर अधिकार रखा। इसने कंपनियों को अधिक ब्याज कमाने से रोका भी नहीं।' जिस दर के लिए गारंटी दी गई थी वह केवल नीची सीमा थी।

कंपनियों को कभी किसी प्रकार घाटा नहीं हुआ। उनके समस्त अपव्यय और कमी का भार भारत के कर-दाताओं को वहन करना पड़ा था। इसके अतिरिक्त कंपनियाँ मुफ्त जमीन आदि के रूप में कई एक विशेषाधिकारों का भी उपभोग करती थीं। ऐसे अनेक छोटे मोटे उपाय थे जिनके द्वारा बेभारत का उचित से अधिक धन हरण कर लेती थीं। इस प्रकार जब कंपनी को किसी वर्ष के प्रथम अद्धभाग में खूब प्राय होती थी, पर आगे आय कम होने की सम्भावना रहती थी तब वह अपने समस्त व्ययों को उन कम प्राय के दिनों के लिए रोक रखती थी। इससे प्रथम अर्द्धभाग में तो इसे अच्छी आय हो जाती थी और आगे रोके हुए व्ययों के कारण जो वाटा और भी बढ़ जाता था उसे वह भारतीय कर की आय को सौंप देती थी। इसके अतिरिक्त एक यह बात भी है कि भारत-मंत्री व्यापारिक आदान-प्रदान के कार्य्य की कुछ ऐसी व्यवस्था करते थे कि भारतीय रेलों पर पूँजी लगानेवाले। उनके अँगरेज़ भाइयों को वास्तव में जितना गारंटी किया जाता था उससे कहीं अधिक लाभ हो जाता था।

इस पद्धति का एक मोटा उदाहरण देखना हो तो जी॰ आई॰ पी॰ रेलवे को लीजिए। १८४६ ई० से ११०० तक इस रेलवे का संचालन गारंटीपद्धति के अनुसार होता रहा। १९०१ ईसवी में इस रेलवे को सरकार ने खरीद लिया। परन्तु यह जान कर आपको आश्चर्य होगा कि सरकार ने उसी कंपनी को इस रेलवे का प्रबन्ध आदि करने के लिए अपना एजेंट बना लिया। इस प्रकार कम्पनी एक विशाल-सम्पत्ति की सञ्चालिका बन बैठी यद्यपि उसके पास एक मील भी रेलवे नहीं थी। यह लेखा लगाया गया है कि गारंटी-पद्धति के काल में इस रेलवे ने १४.९१ करोड़ रुपये का नकद घाटा दिखलाया था। उस घाटे पर वार्षिक ब्याज प्रतिशत की दर से १८५२ ईसवी से लेकर १९२४ ईसवी तक ९३,२०,३७,७४१ रु॰ लगाया गया। एजेंसी काल में १९०१ से १९२३ तक १.७३ करोड़ का नकद घाटा दिखलाया गया। [ ३७९ ] इस कंपनी का जन्म १८४६ ईसवी में हुआ था। यह बाटे पर काम करती रही। परन्तु १८४९ ईसवी में इसके बीस-बीस पौंड के हिस्से २५ से ३०.६२ प्रतिशत लाम के साथ बेचे गये थे। गारंटी-पद्धति के समय में कम्पनी जो अपव्यय करती रही और जिसका भार भारत को वहन करना पड़ा उसका अनुमान इस बात से किया जा सकता है कि १८८० ईसवी तक जी॰ आई॰ पी॰ पर जहाँ प्रतिमील १,९५,९४५ रु॰ व्यय बैठता था वहीं उसके पास की नागपूर-छत्तीसगढ़ और घोंद-मनमाड़ स्टेट रेलों पर प्रतिमील क्रमशः ५७,३१५ रू. और ७१,७५६ रु. व्यय होता था*[१]

थोड़े में सस्ती पूँजी की यह कथा है। तब इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो कम्पनियां लोकोपयोगी कार्य्यों के लिए इतने सस्ते दर में पूँजी लगाती थीं और जो घाटे के साथ काम करती हुई प्रतीत होती थीं ये ऐसी परिस्थिति में भी अपने हिस्से यथेष्ट लाभ के साथ बेच दिया करती थीं।

१८७२ ईसवी में पार्लियामेंट-द्वारा नियुक्त एक जांच कमेटी के सम्मुख गवाही देते हुए श्रीयुत थार्नटन ने कहा था:-

"मेरा विश्वास है कि भारत में रेल चलाने के लिए लगाई गई पूँजी की गारंटी न दी जाती तो बिना गारंटी के भी इस काम के लिए वहाँ धन भेजा जाता। इस बात पर विचार करते हुए, कि यह देश दिनों दिन धनी होता जा रहा है और एक बड़ी रकम का इंगलैंड में व्यापार में न लग सकने के कारण दक्षिणी अमरीका और अन्य देशों को भेजा जा रहा है, मैं यह नहीं सोच सकता कि ऐसी दशा में अधिक समय तक भारत की अवहेलना की जाती†[२][ ३८० ]पारसी अर्थ-शास्त्र-विशारद श्रीयुत डी० ई० वाचा, जो राजनीति में सरकार के ही खुशामदी टट्ट माने जाते हैं, लिखते हैं:-

"सच पूछा जाय तो भारतीय व्यय के सम्बन्ध में १८९६-९७ में जो शाही जांच कमीशन नियुक्त हुआ था और जो वेल्बी कमीशन के नाम से विख्यात है उसके विवरण में यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि १८४८ से १८९५ तक का समस्त भारतीय रेलों का व्यय भारत सरकार को, अर्थात् भारत के : कर-दाताओं को, पूरे ५५ करोड़ देने पड़े थे। और यद्यपि तब से बराबर लाभ होते रहे हैं तथापि भारत सरकार की रेलवे हिसाब की बही में अभी उसके ऊपर रेलों का ४० करोड़ का ऋण बाकी ही है।

"केवल १८९९-१९०० से भारतीय रेलों ने पलटा खाया है और भारतीय कर-दाताओं की उस बृहत् पूजी के लिए, जो १९१० के सरकारी विवरण में ४३० करोड़ लिखी हुई है, कुछ कमाया है। १९०४-५ से समस्त रेलवे-कम्पनियों के लाभ का औसत ३ करोड़ रुपये वार्षिक होने लगा है। इसमें सन्देह नहीं कि कुछ रेलों से लाभ हो रहा है। पर इसमें भी लन्देह नहीं कि कुछ घाटे के साथ चल रही हैं। यह ३ करोड़ वार्षिक का लाभ घाटा निकाल देने पर हुआ है। पैदा करनेवाली रेलों से जो बड़ा लाभ होता है उसे घाटे के साथ चलनेवाली रेले हड़प जाती हैं। सरकारी वार्षिक रिपोर्ट के विवरण-पत्र नंबर में प्रत्येक रेलवे की आर्थिक कारगुजारी कर वर्णन रहता है। उससे यह बात बड़ी सरलतापूर्वक जानी जा सकती है।"

मिस्टर वाचा अपनी व्याख्या का सारांश यह बतलाते हैं कि 'भारतीय रेलों के व्यय का इतिहास आदि से अन्त तक एक समझ में न आ सकनेवाली अन्धकारमय कथा है।

रेलवे-प्रबन्ध-विभाग की ओर से भारतीय यात्री-जनता की आवश्यकताओं की जो अवहेलना की जाती है उसका वर्णन, मिस्टर वाचा इस प्रकार करते हैं:-

"भारतीय रेलवे-नीति का सबसे अक्षम्य और बुरा स्वरूप यह है कि इसके अधिकारी लोग भारतीय जनता की आवश्यकताओं और इच्छाओं की अत्यन्त उपेक्षा करते हैं। इस उपेक्षा-कृत जनता में वे लोग हैं जो प्रतिवर्ष लाखों की सँख्या में औसतन ३६ मील प्रतिमनुष्य के हिसाब से यात्रा करते हैं और जिनसे टिकट-विभाग में सबसे अधिक प्राय-करीब १३ करोड़ रुपये वाषिक होती [ ३८१ ]। योरपियन व्यापारियों के हितों पर विशेष ध्यान रखा जाता है पर भारतीय जनता के हितों पर कभी भी ध्यान नहीं दिया जाता। यदि उनका कभी कोई विचार किया भी जाता है तो योरपियनों के पश्चात्। सरकार कर-दाताओं की सम्मति का बिना कुछ विचार किये और बिना यह सोचे कि परिणाम क्या होगा योरपियन व्यापारियों के ज़रा सा सिर हिलाने पर भी उन्हें रेलों में सुविधाएँ देने के लिए लाखों रुपये पानी की भांति बहा देती है। भारतीय रेलवे शासन में सबसे बड़े कलङ्क की बात यही है कि यह इस देश में स्थायी रूप से रहनेवाली जनता की परवाह नहीं करता और सामयिक योरपियन व्यापारियों की शिकायतों को दर करने का सदैव प्रयत्न करता रहता है। कोई रेल-पथ-निर्माण-कर्ता व्यक्तिगत रूप से इतना भारी धन नहीं स्वाहा कर सकता और कोई निजी जायदाद रखनेवाली संस्था, वह कितनी ही धनी और प्रभावशालिनी क्यों न हो, सभ्य जगत् के किसी भाग में इस प्रकार १५ से १६ करोड़ तक प्रतिवर्ष ऋण लेकर बिना रोक केवल अफसरों की रोक को छोड़कर जिसे रोक कह ही नहीं सकते–व्यय कर देने की नीति को सहन नहीं कर सकती।"

रेलों का व्यय घटाने के सम्बन्ध में इंचकेप कमेटी की निम्नलिखित सम्मति भी पढ़ने योग्य है:-

"हम लोगों की यह सम्मति है कि अब देश रेलों की आर्थिक सहायता नहीं कर सकता। और यह कि रेलों का व्यय कम करने की कार्रवाई की जानी चाहिए जिससे कि वे अपना व्यय अपनी आय के भीतर ही करें और यथेष्ट मात्रा में उस बड़े व्यय को भी अदा करने लगे जो सरकार को उनके लिए उठाना पड़ा है। हम लोगों को यह आशा है कि यदि परिमितव्ययता से काम किया जाय तो भारतीय रेलों की इतनी आय बढ़ सकती है कि उन पर जो पूंजी लगी है उसका ५ १/२ प्रतिशतक वसूल होने लगे। गत महायुद्ध से पूर्व ३ वर्षों तक सरकार को रेलों से जो धन वापस मिला उसका औसत ५ प्रतिशत था। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि और भी बड़ी बड़ी रकमें ६ प्रतिशत या अधिक पर ली जा रही हैं हमारा ग्रह ख़याल है कि ५ १/२ प्रतिशत वसूल करना अधिक नहीं कहा जा सकता।"

'सस्ती' पूँजी एक दूसरे प्रकार से भी दी गई थी। यहाँ हम उस बात का उल्लेख कर रहे हैं कि जब इँगलेंड 'भारत का सबसे सस्ता बाज़ार' नहीं [ ३८२ ] था तब भी भारतीय रेलों की सामग्री इंगलैंड से ही खरीदी जाती थी। रिट्रेन्चमेंट कमेटी लिखती है*[३]:-

"हाई कमिश्नर ने हमारा ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया है कि उसके विरोध करने पर भी दलाल लोग प्रायः किसी माल बनानेवाले या बेचनेवाले का ही माल उसके यहाँ आने देते हैं और इस प्रकार उसे इच्छानुसार माल लेने का अवसर नहीं देते। इससे यह स्पष्ट है कि उसे आवश्यकता से अधिक मूल्य देना पड़ जाता होगा। हाई कमिश्नर ने हमें ऐसे कई एक उदाहरण बतलाये है जहाँ ऐसी रुकावट के कारण केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकार के बहुत रुपये नष्ट हुए हैं। इसी प्रकार उन दलालों से भी हानि पहुँचती है जो किसी विशेष दूकान के प्रतिनिधियों से कुछ गुप्तरूप से तय कर लेते हैं। ऐसे व्यवहारों को कम करने की व्यवस्था होनी चाहिए। हम सिफ़ारिश करते हैं कि उनको पूर्णरूप से बन्द कर देने के लिए कानून बन जाना चाहिए। दलालों और माल बेचनेवालों में किसी प्रकार के गुप्त पत्र-व्यवहार की भी आज्ञा न होनी चाहिए।"

जो लोग अफसरों की नियमबद्ध और गम्भीर भाषा से परिचित हैं उन्हें यह एक कड़ी आलोचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्रतीत होगा। इस पत्र की भाषा से जितना अनुमान किया जा सकता है उससे कहीं अधिक भयङ्कर उन लोगों की काररवाइयाँ होंगी। अब भी प्रतिवर्ष भारतीय व्यापार के संरक्षकों या प्रतिनिधियों को सरकार के सम्बन्धित विभागों का ध्यान उस अन्तर की ओर आकर्षित करना पड़ता है जो भेजे गये माल और वास्तव में आर्डर दिये गये माल में होता है। इस सम्बन्ध में सरकार की ओर से जो उत्तर दिये जाते हैं वे प्रायः विषय को ही उड़ा जाते हैं।

प्रारम्भ के 'सस्ते ऋण' के रूप में रेलों की आर्थिक अवस्था का जिन लोगों ने वर्णन किया है उनमें ए॰ जे॰ विलसन, डिग्बी, नौरोजी, गोखले और वाचा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। विलसन ने इसे अपनी 'गिरवी साम्राज्य' और डिग्बी ने अपनी 'उन्नतशील ब्रिटिश भारत' नामक पुस्तक में लिखा था। नौरोजी, गोखले, वाचा तथा अन्य लोगों ने [ ३८३ ] १८८० और १८९७ के शाही कमीशनों के सामने गवाही देते हुए इसका वर्णन किया था। श्रीयुत ए॰ के॰ कोनेल ने इस प्रश्न के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा था:*[४]-

"पूँजी के वास्तविक व्यय का हिसाब नीचे लिखे अनुसार है। जिन रेलों के लिए गारंटी दी गई थी उन पर १८८०-८१ तक में ९,६७,९४,२२६ पौंड व्यय किया गया। ४,६९,१८,१७७ पौंड इँगलैंड में व्यय किया गया था और ४,९८,७६,०४९ पौंड भारतवर्ष में। ब्याज हुआ था लगभग २,८०,००,००० पौंड के जो क़रीब क़रीब सब इंग्लेंड को दे दिया गया था।......... इस लेन-देन में निस्सन्देह ८०,००,००० पौंड का घाटा हुआ था। यहां तक हमने देखा कि इस विदेशी पूँजी के लगाने के फल-स्वरूप 'जितना धन ब्याज से प्राप्त हो सकता था उससे अधिक धन व्यय हुआ' परन्तु यदि गारंटी-पद्धति के अनुसार रेलों का निर्माण न होता तो उस अवस्था में जितना धन व्यय होता उससे यह कम ही हुआ।

"स्टेट रेलवे के लिए जो पूजी ली गई थी उसमें २,४०,००,००० यौंड भारत ने दिये थे और ७५,००,००० पौंड इंग्लैंड ने दिये थे। परन्तु २ और ३ लाख के बीच में जो ब्याज पूरे धन में जुड़ना चाहिए वह मी इंग्लैंड चला जाता था।"

मिस्टर कोनेल ने इस प्रश्न पर भी विचार किया है कि रेलों से भारतवर्ष को लाभ हुआ या नहीं? उनके निष्कर्ष उन्हीं के शब्दों में नीचे दिये जाते हैं†[५]:-

संक्षेप में, रेलों और व्यापार-स्वातंत्र्य का सम्मिलित परिणाम इस प्रकार कहा जा सकता है-पहले भारत अपने लिए वस्त्र तैयार कर लेता था, अब इंग्लेंड उसे वस्त्र भेजता है। इससे भारतीय बुनकरों की आय का एक बड़ा भारी साधन जाता रहा। देश को केवल उतना ही लाभ हुआ जो विलायती और देशी वस्तुओं के मूल्य में अन्तर है। परन्तु इन वस्तुओं को खरीदने के लिए भारत को अपने भोजन का एक बड़ा भाग विदेश को भेज देना पड़ता है। जो लोग यह भोजन बेचते हैं उन्हें पहले की अपेक्षा अधिक धन प्राप्त होता है। इस प्रकार कुछ लोगों को वस सस्ता होने और गल्ला महँगा होने [ ३८४ ] से कुछ लाभ हो जाता है। परन्तु यह फल प्राप्त करने के लिए उन्हें रेल-पथ-निर्माण के लिए वे बड़ी बड़ी रकम देनी पड़ी जिनका कि उल्लेख कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें तङ्गी के दिनों में एक बड़ी बाहरी सहायता का व्यय भी संभालना पड़ता है। आर्थिक स्थिति में परिवर्तन के सब पहलुओं पर विचार करके देखा जाय तो क्या यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि इस देश के हाथ से प्राय का एक भारी साधन निकल गया है? यदि कल भारत में विदेशों से कपड़ा थाना और भारत से विदेशों को गल्ला जाना बन्द हो जाय, तो भारत ही फायदे में रहेगा। हाँ, भारत सरकार के होश-हवास गुम हो जायँगे। वास्तव में दोनों के स्वार्थ एक-रूप नहीं हैं। भारत सरकार इस समय व्यापार के घाटे को कम करने के लिए गेहूँ की निकासी बढ़ाने की चेष्टा कर रही ह; परन्तु इसका परिणाम यह होगा कि भारतवर्ष में खाद्यपदार्थ महँगा हो जायगा। अब हम मिस्टर हंटर के इस कथन का तात्पर्य समझ सकते हैं कि वर्तमान समय में ब्रिटिश भारतीय जनता के पाँच भाग में २ भाग की ऐसी उन्नति है जैसी देशी राजाओं के राज्य में पहले कभी नहीं हुई थी। ब्रिटिश भारत की जनता का दूसरा भाग यथेष्ट पैदा कर लेता है पर क्रमशः उसकी आय घटती जा रही है। और भाग या ४ करोड़ मनुष्य आधा-पेट खाकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। और मिस्टर केयर्ड के अनुसार १० ही वर्ष में २ करोड़ ऐसे मनुष्यों की और वृद्धि हो जायगी जिन्हें भोजन नहीं मिलेगा। तब, क्या इस बात पर दृढ़ रहा जा सकता है कि रेलों पर बड़ी बड़ी पूँजियाँ व्यय करने से भारत की दशा में सुधार हुआ है?

"परन्तु इन बातों के विरोधी उत्तर देते हैं कि अकाल के दिनों में भूखे मरते प्रान्तों को रेलों-द्वारा जो भोजन पहुँचाया जाता है उसको तो आप भूले ही जा रहे हैं। यदि देश में रेले न होती तो गत अकाल के समय में मदरास, बम्बई और सीमा-प्रान्त के निवासियों की क्या दुर्गति होती? मेरा उत्तर है-उनकी क्या दशा हो गई? यह सच है कि रेलों से अनाज पहुँचा। परन्तु पहले ये रेलें अनाज ले भी तो गई थीं। उसी को ये चौगुने मूल्य पर वापस ले आईं। और सरकार को कृषकों को इस योग्य बनाने में कि वे इसे खरीद सके लाखों रुपये व्यय करने पड़े, सो ऊपर से। और तब भी जो दिल दहलानेवाली मृत्युएँ हुई उनको वह रोक नहीं सकी।

"दुर्दिनों का सामना करने के लिए यहाँ के निवासियों में अतीत काल से क्या प्रथा चली आती थी? बही जो मिस्र देश में जोसेफ़ की थी-अन्न इकट्ठा करके रखना। मैसूर के अकाल के सम्बन्ध में वहाँ का सरकारी वक्तव्य क्या कहता है? सुनिए-पहले, वर्षा न होने से देश को कष्ट उठाना पड़ता था, इसमें सन्देह नहीं, परन्तु रागी-एक प्रकार का मोटा अन्न जो पृथ्वी [ ३८५ ] के नीचे गड्ढों में एकत्रित करके रक्खा जाता था-की अधिकता से वास्तविक अकाल नहीं पड़ने पाता था। रागी पृथ्वी के भीतर चालीस-चालीस और पचास-पचास वर्षों तक ज्यों का त्यों बना रहता था। और आवश्यकता पड़ने पर निकाला जाता था। जान पड़ता है अकाल के केवल दर कमिश्नरों ने, केयर्ड और सल्लिवन ने इस प्रथा का महत्त्व समझा था।..........

"हमें यह विश्वास करने का कारण है कि रेलों के प्रचलित हो जाने से कृषक लोग या लो तात्कालिक लाभ की लालच से या वर अदा करने की विवशता से अन्न बेच देते हैं। और भोजन के स्थान पर रुपये इकट्ठा करके रखने लगे हैं। परन्तु ने रुपये या गहने नहीं खा सकते: खेतों में खाद देने के लिए ईधन नहीं खरीद सकते है और अपने जमा किये हुए रुपयों से श्रद्धालु के दिनों में चौगुने मूल्य में भोजन खरीदते हैं। अकाल के कमिश्नरों का कहना है कि इस प्रकार इस लम्बी दौड़ के अन्त में उन्हें लाभ होने में सन्देह ही है। और फिर मजदूर लोग जिनके पास भूमि नहीं होती और जो रूपये खरीद कर रखने के लिए कुछ उत्पन्न नहीं करते, अकाल के दिनों में बाजार-भाव को सर्वथा अपनी शक्ति के बाहर पाते हैं। तब सरकार 'सहायता देने के लिए कार्य्यों के साथ उनकी रक्षा करने आती है। रेलें आश्चर्यजनक लाभ उठाने लगती हैं-वास्तव में अकाल और युद्ध दोनों देश के लिए घातक हैं, परन्तु विदेशी सूदखोरों के लिए ये ईश्वरीय उपहार के समान पाते हैं-भारतीय सरकार आनन्द के साथ अपने सार्वजनिक हित के कार्यों को प्रारम्भ करती है और ब्रिटिश जनता जिसका इन कार्यों में स्वार्थ रहता है, उसकी प्रशंसा करती है। सरकार इस बात का बिलकुल उल्लेख नहीं करती कि बीते दिनों में उसने कर की आय से ३,००,००.००० पौंड व्याज में दे दिये हैं। यदि यह धन कृषकों की जेब में बना होता तो वे बड़े मजे में बुरे दिनों में अपनी रक्षा कर सकते थे और सजदरों को भी इससे लाभ पहुँच सकता था। परन्तु सर जान स्ट्रेची प्रश्न के इस अङ्गकी सर्वथा उपेक्षा करते हैं। अकाल के दिन में कृषकों को सहायता प्रादि देने के लिए सरकार जो काम खोलती है उसी पर वे पूर्ण संतोष प्रकट करते हैं। और भागे पड़नेवाले अकालों में सहायता पहुँचाने के लिए वे और भी रेल निकलवाने का हट करते हैं। आप सोचते होंगे कि उदार ब्रिटिश पूँजीपतियों के दान से भारत में रेलों का निर्माण हुआ है। परन्तु वात ऐसी नहीं है। इसमें भारत के आधा पेट खाकर जीवन व्यतीत करनेवाले हिन्दुओं की ख़ूराक लगी है। ऊपर जिस ३,००,००,००० पौंड' का उल्लेख किया गया है वह भारतीय कृषकों की कर की आय का धन है। भारत के कोप से यह धन भारत में रेलें चलाने के लिए व्यय किया गया था। इसके पश्चात् भारत ने १,५०,००,००० पौंड और दिया। (जिसका एक भाग रेलवे कंपनियों के हिस्सेदारों को मिला, का करती है। सकर की आय का होता तो बाम पहुँच सकत [ ३८६ ]यह सब लोगों को जीवित रखने के लिए किया गया। और फिर भी अकाल में ५० लाख मनुष्य मर गये।"

सार्वजनिक सेवा-वृत्तियाँ

इस अध्याय को समाप्त करने से पूर्व सार्वजनिक वृत्तियों के सम्बन्ध में कुछ बातें और अ्ङक उपस्थित कर देना उपयुक्त होगा। इस संसार में भारत के अतिरिक्त ऐसा एक भी देश नहीं है जहाँ उच्च सरकारी कर्मचारियों को इतने बड़े बड़े वेतन दिये जाते हैं। और जिसकी सार्वजनिक सेवकों की बचत का अधिकांश भाग देश के बाहर चला जाता हो।

भारतीय ब्रिटिश सरकार प्रायः 'नौकरशाही' के नाम से पुकारी जाती इसमें सन्देह नहीं कि समस्त देशों में किसी न किसी अंश में कुछ 'नौकरशाही' करनी ही पड़ती है। परन्तु भारतवर्ष में––लायर्ड जार्ज के शब्दों में––ये नौकरियाँ ब्रिटेन के प्रभुत्व का लोहे का ढाँचा निर्माण करती हैं। नौकरशाही के 'आई॰ सी॰ एस॰' और दूसरे अङ्ग केवल क़ानूनों का पालन ही नहीं करते बरन वे ही अधिकांश में इन क़ानूनों को बनाते भी हैं

इसलिए भारतवर्ष में बड़ी बड़ी नौकरियाँ अँगरेज़ों को बहुत अधिक दी जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि ब्रिटिश के 'लौंडों' को तो जीवन में अच्छे साधन प्राप्त हो जाते हैं और भारतवर्ष के सार्वजनिक कोष पर तबाही आ जाती है। केवल ब्रिटिश लौड़ों को लाभ पहुँचाने के लिए शासन का व्यय इतना अधिक बढ़ा दिया गया है। नौकरशाही के ब्रिटिश लाड़लों के लिए प्रायः नई नई नौकरियों की सृष्टि की जाती है। और भारतीय कोष जितना सहन कर सकता है उससे कहीं अधिक वेतन उन्हें दिया जाता है। ये नौकरियाँ वास्तव में भारत के धन की 'अपव्यय-स्वरूप' हैं। इन पर भारत को इतना अधिक धन तो व्यय करना ही पड़ता है, इनकी आय का अधिकांश भाग भारत के बाहर व्यय होता है। पेन्शन के रूप में जो बड़ी बड़ी रक़में बाहर भेजी जाती हैं उनसे देश को और भी बड़ी भयङ्कर हानि होती है। [ ३८७ ] अप्रैल १९१३ ईसवी में सरकार के भिन्न भिन्न विभागों में अँगरेज़, भारतीय और ऐंगलो इंडियन नौकरों की संख्या नीचे लिखे अनुसार थी[६]:-

२०० रुपये मासिक या इससे अधिक की कुल नौकरियों की संख्या.................११,०६४

इसमें अँगरेज़ और ऐंगलो इंडियनों की संख्या...................६,४९१ अर्थात् ५२ प्रतिशत।

भारतीयों की संख्या.......................................................४,५७३ या ४८ प्रतिशत।

प्रोफेसर के॰ टी॰ साह ने इस व्यय की एक अङ्क-चक्र में विस्तृत व्याख्या की है। उसे हम नीचे उद्धृत कर रहे हैं। आशा है पाठकों को वह रुचिकर प्रतीत होगी:—

नौकरियाँ अँगरेज़ भारतीय ऐंग्लो इंडियन
२००—३०० रू॰ की १२ % ६४ % २४ %
३००—४०० " १९ " ६२ " १९ "
४००—५०० " ३६ " ४९ " १५ "
५००—६०० " ५८ " ३१ " ११ "
६००—७०० " ५४ " ३६ " १० "
७००—८०० " ७८ " १४ " ८ "
८००—९०० " ७३ " २१ " ६ "
९००—१,००० " ९२ " ४ " ४ "

हमारी राष्ट्रीय महासभा ने अपने प्रारम्भिक दिनों में भारतवासियों को स्वयं उन्हीं के देश में उच्च नौकरियों से इस प्रकार जानबूझ कर पृथक् रखने की सरकार की नीति का विरोध किया था। कांग्रेस के मनुष्यों ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि इम्पीरियल सर्विसों के लिए भारतवर्ष और इंगलैंड में [ ३८८ ] दोनों जगह एक ही समय परीक्षाएँ हो जाया करें। इस सिद्धान्त को पार्लियामेंट ने स्वीकार कर लिया था पर इसे व्यवहार में लाने का कोई उद्योग नहीं किया गया। मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपेार्ट ने इस बात की घोषणा की थी कि 'उत्तर-दायित्व-पूर्ण शासन की सफलता की नवीन नीति अधिकांश में वहीं तक काम कर सकती है जहां तक शासन के प्रत्येक विभाग में भारतीयों का प्रवेश सम्भव हो सके। इस पर तुरन्त ब्रिटिश के लौंडों ने चिल्लपों मचाना प्रारम्भ कर दिया। और अब व्यवस्थापिका सभा के विरोध करने पर भी सरकार ने 'ली कमीशन' के प्रस्तावों को स्वीकार करके अपनी वास्तविक नीति को प्रकट कर दिया है।

१९१४ से लेकर १९२४ तक में अर्थात् १० वर्षों में सार्वजनिक नौकरियों के वेतन और भत्तों में बहुत अधिक वृद्धि कर दी गई है। और पेंशन के लिए उदार नियम बना दिये गये हैं तथा मार्ग-व्यय की व्यवस्थायें कर दी गई हैं, सो ऊपर से। इंचकेप कमेटी के अनुसार केन्द्रीय कोष से जिन कर्मचारियों को वेतन दिया जाता है उनकी कुल संख्या (रेलवे स्टाफ़ के अतिरिक्त) १९१३-१४ में ४,७४,९६६ थी, १९२२-२३ में यह बढ़कर ५,२०,७६२ हो गई—लगभग १० प्रतिशत की वृद्धि हुई। ३८४ पृष्ठ पर दिये गये अङ्क-चक्र से यह प्रश्न और भी भली भांति समझ में आ जायगा।

विशेष वेतन और भत्ते आदि में जो अधिक व्यय हुआ है उस पर ज़रा ध्यान दीजिए। ली कमीशन की सम्मति में यह यथेष्ट नहीं था इसलिए उसने चारों तरफ़ वृद्धि करने का प्रस्ताव किया।

ली-शासन-पद्धति के अनुसार प्रथम वर्ष में जो वृद्धि हुई उसका अनुमान नीचे लिखे अनुसार किया जाता है—

वेतन और हुंडी का व्यय... आई॰ सी॰ एस॰ १८.६ लाख
आई॰ पी॰ एस॰ १२.७ "
आई॰ एम॰ एस॰ (सिविल) ७.० "
आई॰ ई॰ एस॰ (पुरुष) ३.३ "
आई॰ एस॰ ई॰ १०.९ "
आई॰ ए॰ एस॰ .८ "
आई॰ वी॰ एस॰ .८ "

योग ५७.१ "
[ ३८९ ]
दूसरी नौकरियों पर व्यय (क़रीब क़रीब) ... १३.० से १५.० लाख तक
पेंशन—बिना शर्त की नौकरियों पर ... १.२ लाख
उच्च पदों पर आई॰ सी॰ एस॰ ... .१८ लाख
मार्गव्यय २५.० लाख
योग (प्रथम वर्ष) ९६.५ लाख से ९८.५ लाख तक।

यह एक करोड़ वार्षिक व्यय निःसन्देह इस 'लोहे के ढांचे' को मज़बूत करेगा। साथ ही भारतवर्ष की आय का एक भारी अपव्यय भी सिद्ध होगा।


[ ३९० ]
मिलीटरी सर्विस सिविल सर्विस
(००० छोड़ दिया गया है)
१९१३-१४ १९२२-२३ वृद्धि १९१३-१४ १९२२-२३ वृद्धि
मुख्य वेतन १,२१,३७५ २,३६,७९१ १,१५,४१६ ५८,५३७ १,१९,७६० ६१,२२३
विशेष वेतन ८,४६३ ११,९२९ ३,४६६ ४२२ १,६२५ १,२०३
क्षतिपूर्ति या स्थानिक भत्ता १४० १४४ १,३५१ २,९९३ १,६४२
किराया मकान १७६ १६८ ५४२ १,४९८ ९५६
मार्ग-व्यय ३,०५९ ७,००१ ३,९४२ ३,५०९ ६,९९७ ३,४८७
अन्य-व्यय १,५०५ १३,९३५ २,४३० ३,१५१ ४,६४९ १,४९७
कुल १,३४,५५४ २,६९,९७२ १,३५,४१८ ६७,५१४ १,३७,५२५ ७०,००९

  1. *२९ नवम्बर १९२५ के 'पीपुल' (लाहौर) में 'भारतीय रेल-पथ के रचयिता श्रीयुत सी॰ पी॰ तिवारी का एक लेख।
  2. † आर॰ सी॰ दत्त द्वारा उनकी पुस्तक 'विक्टोरिया-कालीन भारत में उद्धृत। पृष्ठ ३५४।
  3. * भाग ४, पैराग्राफ ५२।
  4. * "भारतवर्ष में अर्थक्रान्ति" १८८३, पृष्ठ ३१।
  5. † उसी पुस्तक से, पृष्ट ५३।
  6. के॰ टी॰ साह-कृत 'भारतीय अर्थविभाग के ६० वर्ष' द्वितीय संस्करण, पृष्ठ १२१।