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दुखी भारत/३२ दुःखदायक, जटिल और अनिश्चित पद्धति

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दुखी भारत  (1928) 
द्वारा लाला लाजपत राय
[ ४४२ ]

बत्तीसवाँ अध्याय
'दुःखदायक, जटिल और अनिश्चित पद्धति'

हम यह देख चुके कि जिन सुधारों का मांटेग्यू और चेम्सफोर्ड के नामों के साथ सम्बन्ध है उनकी उत्पत्ति 'दयावेश की शीघ्रता' में नहीं हुई थी। तब भी पाठक तो यह जानना ही चाहेंगे कि व्यवहार में वे कैसे रहे? भारतवासियों पर कभी कभी यह दोषारोपण किया जाता है कि वे 'प्रजातान्त्रिक' सुधारों पर काम करके प्रजातान्त्रिक शासन की व्यवस्था करने में सहयोग नहीं देते और अड़चनें उपस्थित करते हैं। यह बात अत्यन्त भ्रमोत्पादक है। सच बात तो यह है कि यह सुधार-क़ानून प्रजातान्त्रिक व्यवस्था ही नहीं है। यह मुश्किल से सम्पूर्ण जन-संख्या के २ प्रतिशत भाग को मताधिकार देता है। और इससे कार्य करने योग्य विधानात्मक मन्त्र की सृष्टि नहीं होती। इसमें जो थोड़ा सा उन्नति का भाव था भी उसे अनुदार ऐंग्लो इंडियन अफ़सरों ने और इंडिया आफ़िस ने दबा दिया है। जो लोग सुधारों पर उत्साह प्रदर्शित कर रहे थे उन्होंने भी इस पर काम करने में कठिनाई अनुभव की है। १९२४ ईसवी में सर मुडीमैन के सभापतित्व में इन सुधारों की जाँच करने के लिए जो कमेटी नियुक्त हुई थी उसके सामने अनेक भारतीय मन्त्रियों और भूतपूर्व मन्त्रियों ने इस कठिनाई को उपस्थित किया था। अँगरेज़ शासक भी अनुभव से इस परिणाम पर पहुँचने के लिए विवश हुए हैं। बिहार और उड़ीसा के गवर्नर सर हेनरी ह्वीलर ने मांटेग्यू चेम्सफोर्ड की इस दोहरी राज्य-व्यवस्था के सम्बन्ध में कहा था कि-'इस पद्धति में जो कुछ भी दोष हैं वे सब इसके जन्म से ही इसमें विद्यमान हैं।......अब इस पद्धति पर काम हो सकता है पर यह जटिल बहुत है।' गवर्नर की कार्य्य-कारिणी समिति के योरपियन सदस्य सर हफ़ मेकफ़रसन ने भी ऐसे ही विचार प्रकट किये थे। [ ४४३ ]आगरा और अवध के गवर्नर सर विलियम मेरिस ने, जिनका सुधार-मन्त्री की हैसियत से आरम्भ से ही इन सुधारों के साथ सम्बन्ध था, दोहरी शासन-व्यवस्था को 'दुःखदायक, जटिल और अनिश्चित पद्धति कहा था।'

प्रसिद्ध भारतीयों ने भी, जिनका इस दोहरे चन्द्र से काम पड़ा है, इसके सम्बन्ध में स्पष्टरूप से अपने विचार प्रकट किये हैं। एक वर्ष हुए बिहार-उड़ीसा के बड़े मन्त्री सर मुहम्मद फ़ख़रुद्दीन ने पटना की कौंसिल में कहा था:-

"दत्त विभागों का श्रेणी-क्रम अत्यन्त दोषपूर्ण है। इसका कोई कारण नहीं है कि आप मन्त्री को कृषि-विभाग दें और सिंचाई-विभाग उससे पृथक रक्खें! उसे आप कोष पर बिना कोई अधिकार दिये व्यय करनेवाले विभाग क्यों सौंपते हैं? बिना हाथ में रुपये के, दूसरे हमें मसौदा आदि तैयार करने के लिए कोरा क्लर्क समझते हैं। मसौदे के तैयार हो जाने पर अर्थ-विभाग को अधिकार है कि वह धन का अभाव देखे तो उसे रद कर दे।"

कहा जाता है कि मदास-प्रान्त में सुधारों पर बड़े उत्साह के साथ काम हुआ था। परन्तु वहां के मन्त्री सर के॰ वी॰ रिद्दी ने ११२३ ईसबी में कहा था:-

“मैं 'डेवलपमेंट विभाग का मन्त्री हूँ पर वन-विभाग का नहीं। और आप सब जानते हैं कि 'डेवलपमेंट' बहुत कुछ वन पर ही निर्भर है। मैं उद्योग-धन्धों का मन्त्री हूँ पर कल-कारख़ाने का नहीं जो कि अदत्त विभाग है। और बिना कल-कारख़ानों के उद्योग-धन्धे कल्पनातीत हैं। मैं कृषि-विभाग का मन्त्री हूँ पर सिंचाई-विभाग का नहीं। आप समझ सकते हैं कि इसका क्या अर्थ है। बिना सिंचाई के कृषि का कार्य्य कैसे किया जा सकता है? जिन लोगों पर ऐसे उत्तर-दायित्व हैं उनकी कठिनाई का अनुमान करना मुश्किल है। और भी, मैं उद्योग-धन्धों के विभाग का मन्त्री हूँ पर बिजली का नहीं हूँ क्योंकि वह भी अदत्त-विभाग है। श्रम और वाष्प-एंजिन के विभाग भी अदत्त-विभाग हैं।"

मन्त्री ने अपने भाषण के अन्त में यह ठीक ही कहा था-परन्तु सुधार-योजना के दोषों के ये केवल थोड़े से नमूने हैं।' [ ४४४ ]सर के॰ वी॰ रिद्दी के ऊपर उद्धृत किये गये वाक्यों से दत्त-विभागों की कथा की अच्छी समालोचना हो जाती है। 'उत्तरदायित्वपूर्ण' मन्त्री बिलकुल उत्तरदायित्वपूर्ण नहीं हैं। इसके अतिरिक्त—जैसा कि श्रीयुत सच्चिदानन्द सिनहा, जो स्वयं भी बिहार-उड़ीसा की सरकार के अदत्त-विभागों से सम्बन्ध रखते थे, कहते हैं-'कार्य्यकारिणी-समिति का नये से नया सदस्य पुराने से पुराने मंत्री से भी बड़ा और अनुभवी समझा जाता है*[१]।' कार्य्यकारिणी समिति में या अदत्त-विभागों में योरपियन सदस्यों की प्रधानता रहती है। एक उदाहरण लीजिए। कार्य्यकारिणी समिति का एक भारतीय सदस्य 'होम मेंबर' बनाया गया। परन्तु गवर्नर ने कर्मचारियों की नियुक्ति का मुख्य कार्य्य उसे न देकर उसके सिविलियन सहकारी को सौंपा। जब व्यवस्थापिका सभा में यह प्रश्न उठाया गया तब उत्तर मिला कि सरकारी कार्य्य का संचालन सरकार का घरेलू विषय है!

दत्त-विभागों का सञ्चालन प्रायः भारतीय मन्त्रियों-द्वारा नहीं होता बल्कि उनके स्थायी मन्त्रियों-द्वारा होता है जो साधारणतया योरपियन आई॰ सी॰ एस॰ होते हैं। सर अली इमाम, जो ताज के अधीन न्याय-विभाग और कार्य्यकारिणी सभा के उच्च से उच्च पद पर रह चुके हैं, कहते हैं:-

"दत्त-विभाग मंत्रियों के हाथ में होते हैं जो उनके लिए सभा के सामने उत्तरदायी समझे जाते हैं। परन्तु यद्यपि प्रजातान्त्रिक शासन का सब स्वरूप दिखाई पड़ता है तथापि यह वैसा ही होता है जैसा बिना गिरी का नारियल। मंत्री अपने विभाग का कार्य सञ्चालन करता है परन्तु उसको एक स्थायी सेक्रेटरी रखना पड़ता है, जिसके ऊपर उसका कोई अधिकार नहीं होता। यदि मंत्री कुछ करना चाहता है तो सेक्रेटरी गवर्नर के पास जाकर उसके विरूद्ध कह सकता है और गवर्नर मंत्री को वह कार्य्य करने के लिए मना कर सकता है। परिणाम यह होता है कि मंत्री उत्तरदायी तो समझा जाता है सभा के सम्मुख; परन्तु उसे कार्य्य करना पड़ता है गवर्नर की आज्ञा के अनुसार।


[ ४४५ ]सङ्कट इस बात में है कि विधान को एक रूप तो दे दिया गया है परन्तु उसके भीतर तत्त्व कुछ नहीं है।"

मिस्टर ई॰ विलियर्स ने, जो बङ्गाल के योरपियनों के प्रतिनिधि बन कर व्यवस्थापिका सभा में दो बार जा चुके थे, गत वर्ष के चुनाव में अपने खड़े न होने का कारण बतलाते हुए एक घोषणा-पत्र निकाला था। उसमें उन्होंने लिखा था:-

"मैं समझता हूँ कि उनका (सुधारों का) व्यावहारिक रूप ठीक नहीं है। इसलिए, यदि हम भारत को कम से कम व्यय में अधिक से अधिक योग्यता के साथ शासन करने की नीति सिखाने जा रहे हैं, यदि हम उसे 'राजनैतिक उत्तरदायित्व' के भाव की शिक्षा देने जा रहे हैं, तो मैं कहूँगा कि हमारा यह ढङ्ग ठीक नहीं है। हम उसे उत्तरदायित्व की शिक्षा देने के बजाय अनुत्तरदायित्व की शिक्षा देने जा रहे हैं।..........ऐसी परिस्थिति में, इस प्रश्न को खूब अच्छी तरह अनुभव करते हुए मैं नहीं समझता कि मैं आपके हितों की या आपके प्रान्त के हितों की कोई विशेष सेवा कर सकता हूँ।"

प्रमुख अँगरेज़ राजनीतिज्ञ इस दोहरी शासन-व्यवस्था की कार्य्य-योग्यता के सम्बन्ध में अपने निर्धारित दोष प्रकट कर चुके हैं। हाउस आफ़ लार्डस में जब सुधारों पर बहस हुई थी तब लार्ड कर्ज़न ने हाउस के निर्णय को स्वीकार कर लिया था परन्तु यह कहने से वे नहीं चूके थे कि व्यक्तिगत रूप से मैं इस पद्धति से घृणा करता हूँ। बङ्गाल के भूतपूर्व गवर्नर लार्ड रोनाल्डशे ने इस पद्धति के सम्बन्ध में लिखा था कि यह एक 'जटिल विधान-यन्त्र' है। लार्ड वर्कनहेड ने कहा था कि 'मेरा दोहरी शासन-व्यवस्था के सिद्धान्त पर ही विश्वास नहीं है।' उन्होंने इसे 'दम्भ के चमड़े से ख़ूब मढ़ी हुई' बताया था।

जब भारतीय भी, जिन्हें इस पद्धति पर कार्य्य करने के लिए कहा जाता है, इसके सम्बन्ध में इन्हीं विचारों को प्रकट करते हैं तब उन्हें दोष क्यों देते हो?

 

  1. *उनका 'भारतीय प्रान्तों में दोहरा शासन' नामक निबन्ध देखिए। जिसे उन्होंने गत वर्ष ईस्ट इंडिया एसोसिएशन लंदन के सम्मुख पढ़ा था। इस अध्याय की कुछ बातें उसी निबन्ध से ली गई हैं।