दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग/ दूसरा परिच्छेद

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दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग  (1918) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद गदाधर सिंह

[  ] पुस्तक पाठ करनेवाला यवन उसके मुंह की ओर देखने लगा। वह उठकर धीरे २ यवन के समीप जाकर उसके कान में बोली—

'उसमान शीघ्र वैद्य के समीप किसीको भेजो।'

दुर्गजयी उसमान ही गलीचे पर बैठा था। आयेशा की बात सुनकर उठ गया।

आयेशा ने एक रूपे का बर्तन उठा उसमें से जलवत एक वस्तु लेकर राजपुत्र के मुख और मस्तक पर छिड़का।

उसमानखां भी शीघ्रही लौट आया और चिकित्सक को लेता आया। उसने अपनी बुद्धि के अनुसार यत्न कर लहू का बहना बन्द किया और अनेक औषध आयेशा के पास रख उनके सेवन की विधि बताने लगा।

आयेशा ने धीरे से पूछा 'अब क्या बोध होता है?'

भिषक ने कहा-'ज्वर बहुत है।'

वैद्य को जाते देख उसमान ने द्वार पर जाकर उसके कान में कहा 'बचने की आशा है कि नहीं?"

भिषक ने उत्तर दिया "लक्षण तो नहीं है पर ईश्वर की गति जानी नहीं जाती जब फिर कोई विशेष क्लेश हो तो हम को बुला लेना।"

दूसरा परिच्छेद।
पाषाण संयुक्त कुसुम।

उस दिन आयेशा और उसमान बड़ी रात तक जगतसिंह के समीप बैठे थे। कभी उनको चेत होजाता था और कभी मूर्छा आ जाती थी। भिषक भी कई बेर आए और गए [  ]आयेशा चित्त लगाकर राजकुमार की सेवा करती थी जब आधी रात हुई एक परिचारिका ने आकर कहा "बेगम तुम को बुलाती हैं।'

'अच्छा जाती हूं' कह कर आयेशा उठी। उसमान भी उठे। आयेशा ने पूछा 'तुम क्यों उठे?'

उसने कहा 'रात बहुत गई है चलो तुमको पहुंचाय आयें।

आयेशा दास दासी को सावधान रहने की आज्ञा दे माता के घर चली। मार्ग में उसमान ने पूछा 'आज क्या तुम बेगम के पास रहोगी?'

आयेशा ने कहा 'नहीं मैं अभी राजपुत्र के पास लौट आऊंगी।' उसमान ने कहा 'आयेशा, तुम्हारे गुण का बखान मैं क्या करूं तुम इस परम शत्रु के ऊपर इतनी दया प्रकाश करती हो कि बहिन भाई पर न करेगी। तुम ने मानो इसको प्राण दान दिया।

आयेशा हँसने लगी और बोली 'उसमान' मेरा तो यह स्वभाव है। दुखी की सेवा करना तो मेरा धर्म है, यदि न करूं तो दोष है और करने में कुछ प्रशंसा नहीं। किन्तु तुम्हारा तो वह शत्रु हैं रण में तुम्हारे उसके परामर्ष हुआ था और तुम्ही ने उसकी यह दशा की है तुम उस पर इतनी कृपा करते हो तुम्हारी निस्सन्देह प्रशंसा है।'

उसमान ने कहा 'आयेशा, तुम अपने सुन्दर स्वभाव के कारण सब को समान समझती हो। मेरा अभिप्राय वैसा नहीं है, तुम नहीं जानती हो कि जगतसिंह की रक्षा से हमलोगों को कितना लाभ है उनकी मृत्यु से हमारी हानि हैं। कुछ मानसिंह लड़ाई में जगतसिंह से कम नहीं हैं। एक योद्धा नहीं दूसरा आवेगा किन्तु जगतसिंह यदि जीता हमारे हाथ [  ] में रहे तो मानसिंह को अपनाते कितनी देर है। वह अपने पुत्र के छुड़ाने की लालसा से अवश्य संधि करेगा और अकबरशाह भी ऐसे वीर सेनापति के छुड़ाने की इच्छा करेंगे। और यदि स्वयं जगतसिंह को हमलोग अपने हितसत्कार द्वारा बाधित कर सकें तो वह कृतज्ञता पालन पूर्वक हमारे मन का मेल करा देगा, उसके किये यह होसक्ता है। यदि और कुछ न हो तो मानसिंह अपने पुत्र के छोड़ाने के लिये रूपया बहुत देगा। एक दिन की विजय की अपेक्षा जगतसिंह का जीता रहना विशेष उपकार कारक है।'

उसमान ऊर्ध्व लिखित बातों को सोच बिचार तन मन से राजकुमार के पुनर्जीवन का उद्योग करता था किसी २ का ऐसा भी स्वभाव होता है कि यदि लोग उनको दयावन्त कहें तो लज्जा आती है अतएव बाहर से कठिनता धारण किये रहते हैं। उसमान का भी ऐसा ही स्वभाव देख आयेशा हँस कर बोली 'उसमान! यदि सब का चित्त तुम्हारे ऐसा होता तो फिर धर्म का कुछ काम न था'।

उसमान इधर उधर की बातैं कर बोला 'आयेशा। अब तो मुझ से रहा नहीं जाता, कब तक लव लगाये रहूं?'

आयेशा के मुंह पर गम्भीरता आ गयी। उसमान उसकी ओर देखने लगा। उसने कहा 'उसमान हम तुम भाई बहिन की भांति एक स्थान पर उठते बैठते हैं यदि तुम्हारे मन में कुछ और है तो अब मैं तुम्हारे सामने निकलूंगी भी नहीं। उसमान का मुंह मलीन होगया और बोला।'

'हे करतार! क्या तूने इस कोमल कुसुम शरीर को पाषाण हृदय संयुक्त बनाया है!' और आयेशा को माता के गृह पहुंचाय उदास मन अपने घर को लौट आया [ १० ] और जगतसिंह?

बिषम ज्वर में पड़े शय्या पर भुगत रहे हैं।

तीसरा परिच्छेद।
तुम तिलोत्तमा नहीं हो?

दूसरे दिन सन्ध्या को जगतसिंह की कोठरी में उसमान और चिकित्सक चुपचाप बैठे थे आयेशा पलङ्ग पर बैठी हाथ से पंखा झल रही थी। चिकित्सक नाड़ी देख रहा था और जगतसिंह अचेत पड़े थे। चिकित्सक ने कहा 'आज की रात ज्वर उतरने पर यदि प्राण बच जाय तो फिर कुछ चिन्ता नहीं। अब वह समय आता जाता है।'

सब का मन ब्यग्र हो रहा था, चिकित्सक भी बार २ नाड़ी देखता था और 'अब नाड़ी बहुत सुस्त चलती है' 'अब तो कहीं मिलती ही नहीं' 'देखो यह चल रही है' कहता था। एकाएक उसका मुंह श्याम होगया और बोला 'देखो अब समय आ गया।'

आयेशा और उसमान कान लगाकर सुनते थे और भिषक नाड़ी पकड़े बैठा था।

थोड़ी देर बाद वैद्य ने कहा 'नाड़ी बहुत धीमी चलती है' आयेशा का मुंह और सूख गया और जगतसिंह के मुंह की भी आकृति बिगड़ चली बरन कुछ टेढ़ापन भी आ गया और स्वेतता छा गयी, हाथों की मुट्ठी बन्ध गयी आंखैं घूम गयीं। आयेशा से जाना कि अब कुछ आशा नहीं, काल आन पहुंचा। चिकित्सक हाथ में एक शीशी लिये बैठा था जगतसिंह की इस अवस्था को देख उनका मुंह चीर औषधी भीतर डाल दी किन्तु वह ओठों द्वारा निकल पड़ी कुछ थोड़ीसी पेट में गयी।


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