दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग/दसवां परिच्छेद

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दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग  (1914) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद गदाधर सिंह
[ ३९ ]
दसवां परिच्छेद।
आसमानी का प्रवेश।

विद्या दिग्गज की मनमोहनी आसमानी के रूप देखने की इच्छा पाठकों के मन में अवश्य होगी परन्तु उसका वर्णन बिना सरस्वती की सहायता नहीं हो सकता अतएव देवी का आवाहन करता हूं।

हे वागदेवी! हे कमलासनि! हे शरदेन्दु आनन धारिणी! हे अमलकमलवत् भक्तवत्सल चरन! हे आज मैं तुम्हारीही शरण चाहता हूं। आसमानी के रूप वर्णन में मेरी सहायता करो हे महेश मुख चन्द्र चकोरी! हे जगदंब! दया पूर्व्वक साहस प्रदान करो मैं रूप वर्णन की इच्छा करता हूं। हे विद्याप्रदायनि! हे अधम उधारणि! हे अविद्या तिमिरनाशकारिणि! मेरे हृदय के मतिमन्दता रूपी अन्धकार का नाश करो। हे माता! तेरे दो स्वरूप हैं, जिस रूप से तूने काली,दास को बर देकर रघुवंश , कुमार सम्भव, मेघदूत और शकुन्तला की रचना कराई, जिस बर के प्रभाव से बाल्मीकि ने रामायण, भवभूति ने मालती माधव, और भारवि ने किरातार्ज्जुनीय बनाई वह रूप धारण करके मुझ को क्लेश न दे, जिस रूप के ध्यान से श्रीहर्ष ने नैषध बनाया, भारतचन्द्र ने विद्या का अपूर्व रूप वर्णन किया जिसके प्रसाद से दाशरथी राम का प्रादुर्भाव हुआ और जो मूर्ति अद्य पर्यन्त बटतला में विराजमान है, उसी स्वरूप का टुक मुझको दर्शन दे, में आसमानी के रूप राशि का वृत्तान्त लिखूंगा।

आसमानी की वेणी नागिन की भांति पीठ पर लटकती थी उसको देख उर्गिणी मारे भय के बिल में समाय गई [ ४० ] बिधना ने देखा कि हमारी सृष्टि में विघ्न पड़ता है, सांपिन बिल में रहेगी तो मनुष्य को काटैगी कौन? और पोंछ पकड़ कर बाहर खींच लिया। फणिनी झुंझला कर सिर पटकने लगी यहां तक कि माथा चिपटा होगया, उसीको अब लोग फण कहते हैं। मुंह आसमानी का अत्यन्त सुंदर था। चन्द्रमा मारे लज्जा के छिप रहे और ब्रह्मा के पास फ़रियाद लेकर गए, ब्रह्मा ने उन को समझा कर फिर भेजा और कहा कि जाओ अब स्त्रियां घूंघट से मुंह छिपाये रहैंगी, किन्तु भय के मारे आज तक उनका कलेजा सूखकर काला हो रहा है। नयनों को देखकर खजानोंने बस्ती को रहना छोड़ जंगल की राहली, विधना डरीं कि ऐसा न हो कि ये भी उनके पीछे चले जाय, इस कारण दो पलक बना के पिंजड़े में बन्द रक्खा। नाक गरुड़की इतनी लम्बी थी कि आज तक पक्षिराज उसके भयसे उड़ते फिरते हैं। ओठों की लाली देख दाड़िम ने बंगदेश का रहना त्याग किया। हाथियों ने बड़ा श्रम किया कि आसमानी को चाल में परास्त करैं, पर असमर्थ हो ब्रह्मदेश को भागे, जूड़ा की ऊंचाई देख धवलागिरि के मन में बड़ा सोच हुआ और बहुत कसमकस किया पर क्या करैं डील से हैरान थे, अन्त को न रह गया और रोने लगे कि आज तक नदी प्रवाह द्वारा आंसू चले जाते हैं।

परन्तु निष्कलंक तो संसार में इश्वर ने अपने अतिरिक्त और किसी को रक्खाही नही। इस अनुपम सौन्दर्य्य के साथ एक फ़ी भी लगी थीं, आसमानी विधवा थी। उसने दिग्गज के कूटी में आकर देखा की द्वार बन्द है और भीतर दीप जल रहा है। पुकारा महाराज।

किसी ने उत्तर नहीं दिया। [ ४१ ]फिर कहा "पण्डित।"

अभी भी कोई नहीं बोला।

वाह भीतर क्या करता है? ओ रसिकदास स्वामी उत्तर नहीं आया।

आसमानी ने द्वार के छेद में से देखा कि ब्राह्मण बैठा भोजन करता है इसी कारण बोलता नही मन में कहा वस्तुतः यह बोलकर फिर नहीं खाता और फिर पुकारा अरे ओ रसिकदास।

किसी ने उतर न दिया।

ऐ रसराज?

भीतर से शब्द 'हुम'

आ०| बोलते क्यों नहीं, फिर खा लेना?

उत्तर आया हूं-ऊं-ऊम?

आसमानी मुंह पर कपड़ा देके खिलाखिला कर हंसी और बोली—यह लो यह बात नहीं है?

दि०| ठीक, ठीक, ठीक, तो फिर अब न खाऊंगा।

आ०| हां २ उठ कर मुझको कपाट खोलदे?

आसमानी ने छेद में से देखा कि दिग्गज ने बहुत सा भात छोड़ दिया और कहा।

'नहीं नहीं वह भात तो सब खा जाओ।

दि०| नहीं अब क्या खांऊ, अबतो बात कह दिया।

आ०| नहीं २, न खाओ तो हमको खाओ'।

दि०| राधे कृष्ण! बात कह कर कोई खाता है।

आ०| अच्छा तो मैं जाती हूं मुझको तुमसे एक बात कहनी थी, अब कुछ न कहूंगी, लो जाती हूं।

दि०| नहीं नहीं, आसमानी रूठो न, एलो मैं खाता हूं। [ ४२ ] और बैठ कर खाने लगा। जब दो तीन ग्रास खा चुका तब आसमानी ने कहा, चलो हुआ अब केवाड़ खोल दो।

दि०| इतना यह भी खा लूं।

आ०| अभी भण्डार नहीं भरा, उठो नहीं तो मैं कह दूंगी कि तूने बात कहके फिर खाया।

दि०| नहीं नहीं, ए देख मैं उठा और मुंह बिचका कर रहा सहा भात छोड़ कर कवाड़ खोल दिया।

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