पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१२

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अद्भुत आलाप

"कुछ देर तक वह चुपचाप खड़े पुजारियों और पंडितों की तरफ़ देखते रहे। फिर त्रिशूल को धीरे-धीरे दो-एक दफ़े ऊपर नीचे करके मानो उन लोगों को उन्होंने आशीर्वाद दिया। फिर उस त्रिशूल को कुछ देर हाथ से नोचे लटकाकर इस जोर से ज़मीन के भीतर गाड़ दिया कि देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ। किसी को आशा न थी कि परमहंसजी में इतनी शक्ति है। तब अपने दहिने हाथ से उसके सिरे को ख़ूब मजबूती से उन्होंने पकड़ लिया। मालूम होता था कि उन्होंने सहारे के लिये ऐसा किया। कुछ देर तक वह ऐसे ही निश्चल भाव से खड़े रहे। दर्शकों में सन्नाटा छा गया। धीरे-धीरे उनका शरीर कड़ा होने लगा। यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। क्रम-क्रम से उनकी चेतना जाने लगी। परंतु जैसे वह खड़े थे, वैसे ही खड़े रहे। कुछ मिनटों के बाद वह विलकुल ही निश्चेष्ट हो गए। देखने से यह मालूम होने लगा कि वह मिट्टी की निर्जीव मूर्ति हैं।

"तब ओंकार का गान आरंभ हुआ। वह अनेक प्रकार से ऊँचे-नीचे स्वर में गाया गया। योगिराज की मूर्ति वैसी ही अचल और निश्चेष्ट खड़ी रही । इतने में जो योगी परमहंसजी के साथ आए थे, वे उठे; उन्होंने वेदी की तीन बार प्रदक्षिणा की। ओंकार का गान तब तक बराबर होता रहा। उनमें से तीन बुड्ढे योगी परम-हंसजी के पास पहुँचे। धीरे-धीरे उनका हाथ