पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१४८

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अद्भुत आलाप


मैंने कहा, क्या डर है, क्यों दूर की राह जाकर व्यर्थ फेर खायँ। चलो, सीधे खेतों ही मे निकल चलें।

इस वक्त रात के ३ बजे होंगे। हवा खूब ठंडी-ठंडी चल रही थी, कुछ दूर तक हम लोग मजे में गए और तेजी से गए। मैं घोड़े पर था। मेरे दोनो हमराही मेरे अगल-बग़ल दौड़ रहे थे।

इस समय हम एक ऐसी जगह पहुँचे, जिसके चारो तरफ़ दूर-दूर तक कपास के खेत थे। मैंने अकस्मात् आगे देखा, तो मुझे जलती हुई आग का एक धुंधला-सा छोटा गोला देख पड़ा। मैं उसी की तरफ़ ध्यान से देखता रहा। देखते-देखते मुझे ऐसा मालूम हुआ कि वह बड़े वेग से मेरी तरफ़ आ रहा है। मुझे मालूम हुआ कि वह एक मशाल है, और बराबर आगे को बढ़ रही है। इस पर मैंने अपने साथी, उन दोनो हिंदोस्तानियों से पूछा कि यह जंगमशील ज्वाला क्या चीज़ है? मेरे पूछते ही वे लोग भय से बेतरह चिल्लाने और काँपने लगे। उनका दम फूलने लगा। वे चिल्ला उठे-"यह तो विजली है।" यह दशा देख मेरे आश्चर्य की सीमा न रही। बिजली से उन लोगों का मतलब उसी तालाबवाले भूत से था। मैं और कुछ कहने भी न पाया था कि वे दोनो कापुरुष भयभीत होकर अपनी-अपनी जान लेकर पीछे को भागे। मैं अकेला रह गया। इस कापुरुषता के लिये मैंने उनको बहुत कोसा। पर कोसने से क्या होता था। मैंने घोड़े के ऐंड़ मारी, और जिस तरफ़ से वह ज्वाला उड़ती हुई आ रही थी, उसी तरफ़ को मैं बढ़ा।