पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१४९

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भयंकर भूत-लीला


अब मुझे साफ़-साफ़ देख पड़ने लगा कि वह मशाल एक हिंदोस्तानी हरकारे, के हाथ में है। इसलिये जहाँ तक मुझमें ज़ोर था, मैंने हिंदी में आवाज़ दो कि तू वहीं ठहर जा। मैंने इस बात का प्रण कर लिया था कि मैं अपने उन दोनो डरपोक साथियों के निर्मूल भय का कारण जरूर मालूम करूँगा। परंतु उस मशालवाले ने मेरे चिल्लाने की कुछ भी परवा न की। वह पूर्ववत् बेतहाशा आगे को दोड़ता हुआ देख पड़ा। इस हुक्मउदूली पर---इस गुस्ताख़ी पर---मुझे बड़ा ग़ुस्सा आया। मैंने घोड़े की बग़ल में ज़ोर से ऐंड़ मारी, और यह निश्चय किया कि उस गुस्ताख मशालवाले को अपने दौड़ते हुए घोड़े से कुचल दू़ँगा। पर अफ़सोस है, मेरा घोड़ा भी अकस्मात् बिगड़ उठा। उसने अपनी टापें वहीं ज़मीन के भीतर गाड़ सी दीं। वह फुफकारने लगा। पर एक क़दम भी आगे को न बढ़ा। जब मैंने उसे आगे बढ़ने के लिये बहुत तंग किया, तब वह यहाँ तक बिगड़ उठा कि उसने मुझे क़रीब-क़रीब ज़मीन पर पटक देना चाहा। घोड़े का प्रत्येक अंग काँपने लगा। अब मेरे लिये उतर पड़ने के सिवा और कोई चारा न रहा। इससे मैं उतर पड़ा, और पैदल ही आगे बढ़ा। ज्यों ही मैंने घोड़े की रास छोड़ी, त्यों हो वह भयभीत होकर पीछे को उसी गाँव की तरफ़ भागा, जिसे हम लोगों ने एक घंटे पहले छोड़ा था।

मामला ज़रा संगीन होता जाता था। न मेरे पास मेरा घोड़ा ही रहा, और न वे दोनो आदनी ही रहे। वक्त रात का। राह का