पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/६७

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परलोक से प्राप्त हुए पत्र


मेरी अंत्येष्टि-क्रिया नहीं हुई। और अब मेरा शरीर ढ़ूँढ़ने से नहीं मिल सकता।

प्र०--तुम कहाँ पैदा हुए थे?

उ०--लिकनशायर में।

प्र०--तुमने कैसे जाना कि तुम नरक जाओग? क्या किसी ने तुमसे ऐसा कहा है?

उ०--क्योंकि एक बहुत ही भयावनी शक्ति मुझे वहाँ ले जाने को खींच रही है। मैं जानता हूँ, मेरी आत्मा वहाँ ज़रूर गुम हो जायगी। नरक में बर्फ़ नहीं; पर वहाँ के कष्ट बर्फ़ से भी अधिक पीड़ा-जनक हैं।

प्र०--यदि तुम सचमुच आत्मा हो, तो तुमको दुःख क्यों मिलता है?

उ०--मुझे सब बातें वैसी ही मालूम होती हैं, जैसी पृथ्वी पर मालूम होती थीं। मेरा शरीर एक प्रकार का खोखला है; मेरा आत्मतत्त्व उसी में भरा हुआ है। स्याही यदि दावात से अलग कर दी जाती है, तो भी वह स्याही ही बनी रहती है। इसी तरह मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति भी पूर्ववत् बनी रहती है। मुझे खेद है, मैं तुमसे अब फिर बातचीत न कर सकूँगा।

प्र०--क्या तुम फिर न आ सकोगे?

उ०--'पात्र' के द्वारा आने में बहुत कष्ट होता है; आने के लिये जितनी शक्ति दरकार होती है, उतनी नहीं मिलती।

प्र०--'पात्र' किसे कहते हैं?