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अद्भुत आलाप


थे; पर नासपाती के साथ खाने की और कोई चीज़ न आती थी। यह उन्हें बुरा लगता। वह नासपाती का छिलका तक खाने लगे। यह देखकर उनको सिखाना पड़ा कि नासपाती में वह क्या खायँ, और क्या न खायँ।

कमरे की दीवार पर लटकती हुई एक तसवीर को छूने की चेष्टा करने पर हाना साहब को दूरी का ज्ञान हुआ। उन्होंने आईने में मुँह देखकर उसे छूने की चेष्टा की। आईना उन्हें चिकना जान पड़ा। इस पर उनको बहुत आश्चर्य हुआ। आईने को उन्होंने उलट दिया। पर जब उनको अपना मुँह न पकड़े मिला, तब उन्होंने समझा कि वह कोई ऐसा चित्र है, जो हट सकता है।

बालक हाना को यह समझते कुछ समय लगा कि और लोग मुझसे भिन्न हैं। पुरुष-स्त्री का भेद भी उन्हें नहीं ज्ञात था। एक बार एक बच्चे को देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह समझते थे कि लोग उन्हीं के समान बड़े होते हैं। वह अपने को अल्पवयस्क समझते थे। अपनी माता से उन्हें कुछ भी स्नेह न था।

हाना के शरीरस्थ इस बालक ने शब्द-उच्चारण करना शीघ्र सीख लिया। एक ही सप्ताह में वह थोड़ा-सा पढ़ने भी लगा, पर जो कुछ उसने पढ़ा, उसे दुबारा ही सीखना पड़ा। उसे ईश्वर और अपने पिता का ज्ञान न था। कुछ दिन बाद उसने एक पत्र लिखा। उसमें कोई गलती न थी। जो शब्द एक बार वह सुनता था, उसे भूलता न था।