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आदर्श महिला


राम-लक्ष्मण ने वन के योग्य वेष धारण किया। रामचन्द्र के जिस मस्तक पर बड़े मोल का राज-मुकुट शोभा पाता उसी मस्तक पर आज जटाजूट है! जो पवित्र शरीर रोली-चन्दन की सुगन्ध से स्निग्ध और बहुमूल्य वस्त्र तथा गहनों से सुशोभित होता उसी पर आज चीर-वस्त्र है! राजकुमार ने आज सत्य के सामने सब विलास-सामग्री को बलि देकर वैराग्य लिया; केवल सीता देवी ने सास के अनुरोध से रानी का वेष नहीं छोड़ा। इसके बाद वे लोग पिता और माताओं के पैर छूकर और दूसरे गुरुजनों को प्रणाम करके राजधानी से निकल पड़े। आगे राम, बीच में सीता और पीछे लक्ष्मण चलते थे; उस समय ऐसा प्रतीत होता था मानो राज्य के मङ्गल और शान्ति के पीछे-पीछे साक्षात् धनुर्वेद भी जा रहा है।

आज वन के रास्ते में ये तीनों यात्री कैसे हैं? मानो भविष्य में मनुष्य-जाति को त्याग और संयम सिखाने के लिए इन तीन श्रेष्ठ मूर्तियों ने, भविष्य आशा को हृदय में रखकर, पृथ्वी के सारे दुःखों को अङ्गीकार किया है। जन्म से ही सुख में पले हुए सूर्यवंश के गौरव-पुञ्ज दोनों राजकुमार और सती सुकुमारी सीता देवी दीन वेष में वन को जा रही हैं! दोनों राजकुमार कसरत और लड़ाई में दुःख की कठोर मूर्ति से अपरिचित नहीं हैं किन्तु जो सीता देवी पिता के स्नेह में पलीं, जिन राजवधू ने अयोध्या में कभी पलँग से नीचे पैर नहीं रक्खा, जो वीर स्वामी की शान्ति हैं, वही कुसुम-समान कोमल सीताजी आज वन को जा रही हैं! उनके सुन्दर चरण आज धूल से लिपट रहे हैं। आज वे रामचन्द्र की बाहु के सहारे धीरे-धीरे चल रही हैं।

धीरे-धीरे वे लोग गङ्गा-किनारे पहुँचे । गङ्गा-तट के विशाल वन में प्रकृति देवी मानो सौन्दर्य की सैकड़ों भेंटें लेकर सत्य की धुन के