पृष्ठ:आदर्श हिंदू १.pdf/२५२

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न आऊंगी। इसके बाद उसने सुखदा को भी खूब ही मिहीं मार से जिससे उसकी जान का खतरा न हो जिससे उसके कहीं खून न निकलने पावे इस तरह खूब ही मारा और इस तरह मारते मारते उसका भूत निकाल कर तब वह बोला―

"अब कहो मा जी मुझको क्या आज्ञा है? इस हरामजादी के लिये मैं अपनी यात्रा छोड़ कर दौड़ा आया हूँ!"

"लाला! आज्ञा क्या मेरी विनती यही है कि बुरी और भली जैसी है तुम्हारी है। तुम इसे अपने घर ले जाओ। मैं इसे एक पल भी अब अपने पास न रक्खूँगी। मैं इससे तंग आगई। मैंने उनका (अपने पति के लिये) कहना न मान कर फल पा लिया।"

"मा, मैं तेरी गौ हूँ। तेरे हाहा! खाती हूँ। मुझे इनके साथ न भेज, नहीं तो यह किसी दिन मेरी जान ले डालेंगे। हाय मरी! मैं किससे कहूँ! कोई सुननेवाला भी नहीं!"

"नहीं मैं इसे हरगिज न ले जाऊँगा। अब तक इसके लिये निश्चय न कर लूँ कि यह बिगड़ी नहीं है तब तक इसे घर में घुसने लक न दँगा।"

इतना कह कर काँतानाथ ने पुड़िया की दवा देखी और पत्र पढ़ा। दोनों को देख कर वे बड़े विचार में पड़ गए। इल दोनों में से किसी ने जाना कि इनके मन में क्या है? केवल इतना ही क्यों? ये इस बात को भी न जान सकीं कि