पृष्ठ:आनन्द मठ.djvu/३६

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दसवां परिच्छेद

दसवां परिच्छेद 3 ? हमारी, (पुराकालय) शक्ति मुक्ति देनी जय करनी। जननी आराध्य बहुबल धारिनि रिपुदल दमनी ॥ लाहाबा तू दुर्गा दस आयुध धारिनि, तू ही कमला कमल विहारिनि ॥ सुखदा, वरदा, अतुला, अमला, वानी, विधा-दायिनि, तारिनि ॥ सुस्मित, सरला, भूषित विमला, धरती, भरती, जननी, पावनि । “जगन्नाथ" कर जोरे बंदत; जय जय भारत भूमि सुहावनि ॥ महेंद्रने देखा, डाकू गाते गाते रोने लगा। महेंद्रने विस्मित होकर पूछा-“भाई ! आप लोग कौन हैं ?" भवानंद-"हमलोग संतान हैं।" महेंद्र-“सन्तान क्या ? किसकी सन्तान ?" भवा०-"मांकी सन्तान ।” महेंद्र-“अच्छा तो क्या संतानका काम चोरी डकैती करके मांकी पूजा करना है ? यह कैसी मातृ-भक्ति है ?" भवा०-“हमलोग चोरी डकैती नहीं करते!" महेंद्र-"अभी तो तुम लोगोंने भरी गाड़ी लूट ली है ?" भवा०-"यह चोरी डकैती थोड़े ही है ? हमने किसका धन लूटा है ?" महेंद्र- "क्यों ? राजाका ?" भवा०-"राजाका यह धन लेनेका उसे क्या अधिकार है ?" महेंद्र-“यह राजकर था।" भवा०-"जो राजा प्रजाका पालन नहीं करता, वह राजा कैसा?" महेंद्र-“देखता हू', तुम लोग किसी दिन सिपाहियोंकी